My photo
पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

04 April 2015

वैज्ञानिकों की अतुलनीय क्षमता और असाधारण प्रतिबद्धता का सम्मान

भारत के मंगलयान मिशन की सफलता के बाद से ही इसरो ( भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) का डंका देश ही नहीं पूरे  दुनिया भर  में बज रहा है। हाल  ही में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उपग्रह आधारित सेवाओं के माध्यम से देश के विकास में योगदान के लिए 2014 के गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। यह सुखद और सकारात्मक खबर है क्योंकि आज जब भारत  वैश्विक स्तर पर अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज़ करवाना चाहता है तो वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहन दिया जाना अति आवश्यक है । साथ ही इस भाव को बल देना ज़रूरी है कि विज्ञान की तरक्की जान सरोकारों से भी जुड़े  क्योंकि गांधीजी  विचारों में जनहित का भाव गहरे समाहित हैं  । इसीलिए  इसरो को मिला  गांधी शांति पुरस्कार इस बात को भी पुख्ता करता है हिंसा और अराजकता के इस दौर में वैज्ञानिक शोध  को आमजन की सहूलियत और मानवीय समस्याओं  के सरलीकरण   के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है । 

  अहिंसा के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव के लिए 1995 में गांधी शांति पुरस्कार की स्थापन की थी ।  यह पुरस्कार अब तक कई जाने  माने  चेहरों और सस्थानों को दिया जा चुका  है । नेल्सन मंडेला, वाकलाव हावेल,   के  जूलियस नायरेरे , बाबा आम्टे, आर्चबिशप डेसमंड टूटू, ग्रामीण बैंक ऑफ बांग्लादेश, भारतीय विद्या भवन तथा रामकृष्ण मिशन को यह सम्मान  दिया जा चुका है। गौरतलब है कि  भारत सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर दिया जाने वाला वार्षिक पुरस्कार है । गांधी जी के शांति सिद्धांतों को श्रद्धांजलि स्वरूप, भारत सरकार ने यह पुरस्कार वर्ष 1995  में उनके 125वें जन्म-दिवस पर आरंभ किया था। यह वार्षिक पुरस्कार उन व्यक्तियों या संस्थाओं को दिया जाता है, जिन्होंने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक बदलावों को अहिंसा एवं अन्य गांधीवादी तरीकों द्वारा प्राप्त किया है । पहली बार 1995 में  अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार तंजानिया के प्रथम राष्ट्रपति के जूलियस नायरेरे को दिया गया था ।   वर्ष 2009 में यह पुरस्कार ' द चिल्ड्रेन्स लीगल सेंटर' को विश्व भर में बाल मानवाधिकार को बढ़ावा देने के लिए दिया गया ।  'द चिल्ड्रेन्स लीगल सेंटर'  ब्रिटेन स्थित दुनिया भर में बच्चों के मानवाधिकार को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाला एक गैर-सरकारी संगठन है। यह संगठन बच्चों तथा उनकी देखभाल करने वाले लोगों के लिए कानूनी सलाह की व्यवस्था करता है।  गांधीवाद को मनाने वाले  पर्यावरणवादी और समाजिक कार्यकर्ता  चंडीप्रसाद भट्ट और जाने माने समाज सेवक बाबा आम्टे को भी   इस सम्मान से नवाज़ा जा चुका है । अब तक मानवीय मूल्यों को सहेजने के लिए काम करने वाले  जिन संस्थानों  और व्यक्तित्वों को यह सम्मान मिला है उन्होंनें देश दुनिया की सीमाओं से परे जनकल्याण के लिए अपना योगदान दिया है । 

हमारे देश में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्‍थापना 15 अगस्त 1969  को  की गई।  आगे चलकर भारत सरकार द्वारा 1972 में 'अंतरिक्ष आयोग' और 'अंतरिक्ष विभाग' के गठन से अंतरिक्ष शोध गतिविधियों को  बल  मिला । उसके बाद इसरो ने एक बाद एक सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किये । जिसके चलते संचार, टेलीविजन  प्रसारण  और मौसम  विज्ञान के क्षेत्र में भारत एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बना । देश के वैज्ञानिकों की मेहनत और कर्मठता के चलते इसरो के इतिहास में कई उपलब्धियां दर्ज़ हैं । बीते साल मंगल मिशन की सफलता ने हमारे वैज्ञानिकों की असाधारण प्रतिभा और  प्रतिबद्धता  से पूरे विश्व को एक बार फिर अवगत करवाया ।  ये भारत के अंतरिक्ष शोध में एक कालजयी घटना है। जिसमें हमारे देश  को अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले इस संस्थान ने यह साबित किया कि संसाधनों से कमी से जूझते हुए भी सफलता हासिल की जा सकती है । इस अभियान को लेकर वैश्विक स्तर पर भारत की कामयाबी का चर्चा हुआ क्योंकि भारत ने इस मिशन पर क़रीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे ज़्यादा क़िफ़ायती है। भारत के इस  मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) की कुल लागत  अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान 'नासा' के   मंगलयान 'मावेन'  की कुल लागत  का मात्र दसवां हिस्सा  थी ।  इसीलिए इसरो को इस सम्मान के लिए चिन्हित करने के मायने बहुत गहरे हैं । यह हमारे वैज्ञानिकों की अतुलनीय क्षमता और असाधारण  प्रतिबद्धता  का भी सम्मान है । 

आज  जीवन और  विज्ञान एक- दूजे के पर्याय बन गए हैं। इसीलिए विज्ञान की उन्नति को  मानव जाति के कल्याण के लिए सही दिशा देना आवश्यक है । विज्ञान में गुणवत्‍तायुक्‍त शिक्षा और अनुसंधान  को बढ़ावा देकर यह सार्थक कार्य किया जा सकता है । कृषि से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं और संचार से लेकर प्रोद्यौगिक विकास तक विज्ञान अहम भूमिका निभा सकती है । बस, आवश्यकता है तो इस बात कि की यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण जनहित से भी जुड़े ।  विज्ञान के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करके कई तरह की मानवीय और प्राकृतिक आपदाओं से भी बचा जा सकता है ।  ऐसे में शांति और अंहिसा की सोच को लेकर विज्ञान में नित नए प्रयोग कर सफलता अर्जित करने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन को गांधी शांति सम्मान मिलना  वैज्ञानिक दृष्टि को  मानवीय हित की सोच से जोड़ने में  नई दिशा देने वाला साबित होगा । 

                                                                                       दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित  मेरा लेख  

14 comments:

  1. एक सारगर्भित लेख, उपयोगी जानकारियां , सभी वैज्ञानिको को बधाई ,,हमारे कदम यूं ही आकाश की बुलंदियों से भी सूक्ष्म में बढ़ें ..सुन्दर लेख के लिए बधाई

    भ्रमर ५

    ReplyDelete
  2. निस्संदेह भारतीय विज्ञान के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. सुन्दर लेख.

    ReplyDelete
  3. सभी वैज्ञानिकों को उपलब्धियों के लिये बधाई।

    ReplyDelete
  4. बहुत सारगर्भित, विस्तृत आलेख ... अपने देश के वैज्ञानिक और उनकी क्षमता को सम्मान देने की अच्छी बात है ये ... ऐसे पुरुस्कारों को सक्षम लोगों तक पहुंचाने की बात है जिसकी शुरुआत होनी ही चाहिए ...

    ReplyDelete
  5. सभी वैज्ञानिकों को बधाई के साथ विज्ञान के जनहित में कार्य करते रहना भी जरूरी है.

    ReplyDelete
  6. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (06-04-2015) को "फिर से नये चिराग़ जलाने की बात कर" { चर्चा - 1939 } पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  7. बहुत शानदार और उच्‍च कोटि का लेख। पढ़कर अच्‍छा लगा।

    ReplyDelete
  8. बहुत सारगर्भित एवं सुन्दर लेख ...

    ReplyDelete
  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...
    ऐसे पुरस्कारों से निश्चित ही उत्साह का संचार होता है ..
    आपको भी बधाई!

    ReplyDelete
  10. प्रगति के पथ पर भारत के कदम प्रशस्त होते हुए,
    बधाई।

    ReplyDelete
  11. भारतीय विज्ञानता को सलाम

    ReplyDelete
  12. उपयोगी जानकारी के साथ बढ़िया आलेख , बधाई !

    ReplyDelete
  13. बहुत सुंदर !!शुभकामनायें.

    ReplyDelete