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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

17 March 2017

स्मृतियों में गाँव और गणगौर



 ईसर गणगौर 

गणगौर मेरे लिए त्योहार की तरह नहीं आतीं । मैं कहीं भी रहूँ  यह त्योहार मुझे मेरे गाँव ले जाता है । हर साल मन को  पीहर  के आँगन में ले जाकर खड़ा कर देती गणगौर। गाँव  के  उस एक अकेले रोहिड़े के पेड़ के नीचे खड़ा कर देती है , जिसके तले चुन्नी का पल्ला फैलाये कितनी  बार खड़ी रही कि एक फूल तो झोली में आ गिरे पूजा के लिए । गणगौर, भोर अँधेरे दूब पर टिकी ओस की बूंदों का वो स्पर्श साथ लाती है जिसका नरम मुलायम अहसास कहीं खो सा गया है |  गणगौर,  खेतों की उन पगडंडियों पर ले जाती है जिनपर पूजा के लिए दूब लेने के लिए कितने अधिकार से चलती थी हम बेटियों की टोलियां । मुझे गणगौर  गाँव के उस अँधेरे में ले जाती है जिसमें आज के रौशनी से लबरेज़ शहरों की तरह भय नहीं था । लालटेन लेकर चलते हुए गणगौर की बिंदोरी के लिए  बहू बेटियों की टोलियाँ गाँव  में देर रात तक नाचती-गाती, खिलखिलाती, हंसी ठिठोली करती चलतीं पर डर और असुरक्षा क्या होता है,  मानो पता ही नहीं था ।  उल्टा होता तो यह था कि सामने से आ रहे गाँव  के पुरुष हमारे लिए रास्ता छोड़ एक ओर खड़े हो जाते और मुस्कुरा देते । जैसे कि वे मान के चलते थे  कि इन सोलह दिन इनका ही राज चलेगा :)  क्यों ? ये आज समझ आता है | अब बहुत अच्छे समझ से समझ  पाती हूँ, उनके मन का वो स्नेह और सुरक्षा भरा भाव जिसके तले हँसती -खिलखिलातीं  छोरियाँ भले ही अलग-अलग घरों से होतीं थीं पर बेटियां पूरे गांव की थीं  हम । 

हाथों में सजे मेंहदी के बूंटे और लोकगीतों की मनभावन धुन वाला यह पर्व मेरे मन में बसी बेटी को साल भर के लिए उल्लास देकर जाता है । यूँ भी राजस्थान के बारे कहा जाता है यहाँ इतने तीज-त्योहार  होते हैं कि महिलाओं के हाथों की मेहंदी का रंग कभी फीका नहीं पड़ता । फिर शिव गौरी के दाम्पत्य की पूजा का पर्व गणगौर मानो प्रकृति का उत्सव है । माटी की गणगौर बनती हैं और खेतों से दूब और  जल  भरे  कलश  लाकर  उनकी पूजा की जाती है ।  एक  ऐसा  त्योहार  जब सब सखिया रळ-मिल हर्षित उल्लासित हो माँ गौरी से सुखी और समृद्ध जीवन के लिए प्रार्थना  करती हैं । आज भले ही समय बहुत बदल गया है पर मैंने स्वयं इस त्योहार  को अपने गाँव में कुछ इस तरह मनाया है कि बहू -बेटियां पूरे हक़ से चाहे जिस खेत में जाकर दूब ला सकतीं थीं । कोई रोक-टोक नहीं होती थी । होली के दुसरे दिन से शुरू होकर पूरे सोलह दिन तक चलने वाली गौर पूजा सचमुच उल्लास से भरे दिन होते थे । सिंजारे की मान-मनुहार और मेंहदी रचे हाथ, मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक हैं ।  

गणगौर पूजा के लिए आज भी नवविवाहित युवतियां पीहर आती हैं । शायद इसीलिए गणगौर के गीतों में पीहर का प्रेम, माता -पिता के आँगन में बेटी का आल्हादित होना और अपने ससुराल एवं जीवन साथी की प्रीत से जुड़े सारे रंग भरे  हैं । गणगौर पूजा में तो ये लोकगीत ही  मन्त्रों की तरह गाये जाते हैं । पूजा के हर समय और हर परम्परा के लिए गीत बने हुए हैं, भावों की मिठास और मनुहार लिए । महिलाएं सज-सँवर कर सुहाग चिन्हों को धारण किये  हँसी ठिठोली करती हुईं  पूजा के लिए एकत्रित होती हैं । मुझे आज भी याद है कि  घर की जिम्मेदारियों और खेती किसानी की भागदौड़ के बीच कैसे माँ और गाँव की दूसरी महिलायें गणगौर  की पूजा के लिए समय निकालतीं थीं  |  सारी  दुःख-तकलीफ़ भूल वे बहू -बेटियों के साथ नाचती- गातीं थी | कितना  सुखद था कि माटी की गणगौर  जीवन जीने का उत्साह और उमंग अपने साथ लाती थी | वाकई, श्रृंगारित धरा और माटी की गणगौर का पूजन प्रकृति और स्त्री के उस मेल को बताता है जो जीवन को सृजन और उत्सव की उमंगों से जोड़ती है ।

यही वजह है कि सोलह दिन तक उल्लास और उमंग के साथ चलने वाला यह पारंपरिक पर्व सही मायने में स्त्रीत्व  का उत्सव लगता है मुझे तो ।  एक महिला के ह्रदय के हर भाव को खुलकर कहने, खुलकर जीने का उत्सव । विवाह  के बाद पहली गणगौर मनाने के लिए  ब्याही बेटियों का पीहर आना और सब कुछ भूलकर फिर से अपनी सखियों संग उल्लास में खो जाना रिश्तों को नया जीवन देने वाला है | यादों की उस पगडंडी पर जाने कितने ही गीत और रंग बिखरे पड़े हैं जो नारीत्व का उल्लास लिए हैं | आज  भागदौड़ भरी इस जिंदगी में जब त्योहार और रीति रिवाज महज रस्म अदायगी बनकर रह गये हैं, हर बरस आने वाला गणगौर का पर्व हमें फिर से हमारी संस्कृति की याद दिला जाता है। बहू-बेटियों की खिलखिलाहट से खिले नारीत्व के उन रंगों से रूबरू करवा जाता है जिनके बिना हर आँगन सूना है । 

13 February 2017

बन रहा है बीमार मन का समाज

हाल ही में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सामने आये  सनसनीखेज और खौफ़नाक मामले में एक युवक ने लिव -इन -रिलेशन में साथ रह रही अपनी 28 वर्षीय प्रेमिका की कथित तौर पर गला घोंटकर हत्या करने और घर के चबूतरे में उसकी लाश को दफन कर दिया ।  लिव इन पार्टनर लड़की  सोशल मीडिया के जरिए  इस युवक की दोस्त बनी थी  | जाँच में यह भी सामने आया है कि  छह साल पहले उसने अपने मां-बाप की हत्या कर उन्हें भी यूँ ही  दफना दिया था । उसके कुत्सित कारनामों से लगता है कि यह  32 वर्षीय युवक सीरियल किलर भी हो सकता है । गौरतलब यह भी है यह युवक अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखता है।  शिक्षित और पूरे विश्वास के साथ झूठ बोलने में भी माहिर है। आरोपी का दिमाग बहुत तेज है और उसकी तर्कशक्ति भी काफी प्रबल है।   इतना ही नहीं  इसका  रहन-सहन भी काफी विलासिता पूर्ण था । यानी यह किसी  गरीब और आपराधिक पृष्ठभूमि से भी नहीं आता । इस मामले ने यह बड़ा सवाल उठाया है कि  समाज में कैसी बीमार मानसिकता के लोग मौजूद हैं ?   जिनकी सोच में  बर्बरता है और उनके  कारनामे भी बर्बरता से भरपूर हैं।   यही वजह है कि  ऐसे  मामले आपराधिक होते हैं लकिन उन्हें मनोवैज्ञानिक  आधार पर भी समझे जाने की दरकार भी होती है । समाज और परिवेश में आ रहे बदलाव को समझकर विश्लेषित किये जाने भी जरूरत होती है | क्योंकि पुलिस  और न्यायालयों की रिपोर्ट बताती है कि संसार भर में बर्बरता और हिंसा  की आग तेजी से भड़क रही है  ।  व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में हिंसा का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है। बीमार मानसिकता अब सोच से उतर कर व्यवहार में जगह बना रही है ।

बीते कुछ सालों गांवों से महानगरों तक ऐसे खौफ़नाक मामले आये दिन सुर्खियाँ बन रहे हैं  जिनमें इंसानों ने हैवानियत से भरे काम किये हैं | कुछ साल पहले नॉएडा के निठारी काण्ड ने भी यूँ ही देश को दहला दिया था | जिसमें बच्चों से दुराचार एवं ह्त्या कर उन्हें  दफना दिया जाता था |  देश की राजधानी  में निर्भया के साथ हुई  हैवानियत लोग आज भी नहीं भूले हैं ।  हाल ही में  दिल्ली में ही स्कूली बच्चियों  को  दुष्कर्म का शिकार बनाने वाले  सीरियल रेपिस्ट ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि पिछले 12 सालों के दौरान उसने 600 से ज्यादा बच्चियों को अपना शिकार बनाया।  वह इन  बच्चियों को यह कहकर फंसाता था कि उसे कुछ चीजें देने के लिए उनके माता.पिता द्वारा भेजा गया है। यह कुत्सित मानसिकता वाला व्यक्ति 38 साल है और 3 लड़कियों समेत 5 बच्चों का पिता है। कैसी मानसिकता होगी कि यह इंसान ऐसे कुकर्मों को अंजाम देने ही अपने शहर से दिल्ली आता था | कुछ समय पहले राजस्थान से सामने आये एक मामले में  गैंगरेप के बाद युवती की रीढ़ की हड्डी-पसलियां तोड़ी और उसकी आँख भी फोड़ दी  गई । हाल ही में बेंगलुरु से सामने  सीसीटीवी वीडियो  ने भी  समाज को शर्मसार किया ही था । जिसमें रात काे घर जा रही एक लड़की के साथ उसके घर से महज कुछ दूरी पर ही दो बाइक सवार लड़के  जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे । ऐसी कितनी ही घटनाएं सोचने को विवश करती हैं कि आखिर हम किस ओर जा रहे हैं ? अफसोसजनक ही  बीमार मन के इस समाज में ऐसी  घटनाएं अब आम हो चली हैं । कुछ समय पहले  हैदराबाद  में हुए एक वीभत्स मामले में पांच लड़कों ने अपने इंसान न होने का परिचय  दिया और कुत्ते के बच्चों को जिंदा आग के हवाले कर इन सिरफिरों ने इस पूरी घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर शेयर किया ।  इनकी हैवानियत को जानने के बाद शायद इन्हें जानवर  भी नहीं  कहा  जा सकता ।  बीते साल ही पेरूंबवूर में रहने वाली एक  छात्रा के घर में घुस कर अपराधी ने बलात्कार और बेहद बर्बर तरीके से हत्या को अंजाम दिया, चाकू से उसकी आंतें बाहर निकाल दीं। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपराधी किस बर्बर प्रकृति का होगा ? ऐसी घटनाओं की लम्बी फ़ेहरिस्त तो है ही आये दिन इनका होना भी जारी  है | अफ़सोस  कि सामाजिक नियम व नैतिकता ही नहीं कानून का भय भी ऐसी वारदातों को होने से नहीं रोक  पा रहा है । इसका सीधा सा कारण यही है कि कुत्सित मानसिकता और विकृत सोच अब व्यवहार में परिलक्षित होने लगी है | नतीजतन  समाज का परिवेश ही नहीं रिश्ते-नाते भी बिखराव और हिंसात्मक सनक का शिकार बन रहे हैं | 

मन को उद्वेलित करने वाले ये मामले केवल शारीरिक-मानसिक शोषण या हत्या की घटनायें भर नहीं हैं । ये हमारे बीमार होते  समाज का आइना हैं । जिसमें मनुष्यता के मामने कुछ नहीं बचे हैं । यह एक कटु सच है कि समाज  में ऐसी हैवानियत भरी सोच वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है जो ना अपनों को बक्श रहे हैं और ना दूसरों को । दूषित हो चले इस समाजिक परिवेश में ना बच्चे सुरक्षित हैं और ना ही महिलायें । ना बुजुर्गों का मान बचा है और ना ही इंसानियत की सोच । इससे ज्यादा अफसोसजनक क्या हो सकता है जानवरों के  साथ भी इन्सान  बर्बरता  और  हैवानियत भरा व्यवहार कर रहा है | जाने  कैसी हिंसात्मक सनक है जो हर उम्र, हर वर्ग को अपनी चपेट में ले रही है | ऐसे में  घर से लेकर सड़क तक, दिनोंदिन बढती अराजकता अनगिनत सवाल खड़े कर आ रही है | बीते कुछ सालों में हमारे यहाँ शिक्षित लोगों के आंकड़े भी हैं और जागरूकता के साधन भी | अंतरजाल पर निर्बाध फैली अश्लीलता, शोषण के तरीके, आत्महत्या के तरीके, जैसी बातें लोगों को मनोदैहिक बीमारियों का शिकार बना रही हैं | गौरतलब है कि भोपाल में हुए इस मामले में भी आरोपी ने क्राइम सीरियल देखकर ही मां  और पिता की हत्या की भी योजना बनाई थी।  हाल ही में कर्नाटक में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक पोर्न के ज़रिये हर साल लगभग 13,000 लोगों की मानसिकता इतनी दूषित हो रही है कि दुष्कर्म का विचार उनके मन- मस्तिष्क में जगह बना रहा है | इस सर्वेक्षण के नतीजे  इस ओर इशारा करते हैं कि  पोर्न देखने और दुष्कर्म  की मानसिकता को बढ़ावा मिलने में सीध सीधा सम्बन्ध है |   दुःखद ही है कि विकास और तकनीकी विस्तार की दौड़ में यह नकारात्मकता हमारे परिवेश का अनचाहा हिस्सा बन बैठी है ? विचारणीय तो यह भी है कि अगर बदलाव है भी तो इंसान की सुरक्षा और बेहतरी के लिए क्यों नहीं ? ऐसी घटनायें साफ़ तौर पर बताती  हैं कि  बढ़ती हुई हिंसक प्रवृत्ति धीरे-धीरे अधिकाधिक उग्र होती चली जा रही है  ।  तभी तो ऐसे मामले सभ्य समाज के साथ ही कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती  बन  रहे  हैं | 

पारिवारिक बिखराव, अकेलेपन और स्वार्थ भरी सोच ने अब मानवीयता की सोच ही छीन  ली है | आंकड़े बताते हैं कि गांवों से लेकर शहरों तक. हमारे देश में  पारिवारिक हत्याओं के लिये ज़मीन जायदाद सबसे प्रमुख कारणों में से एक है । इसके अलावा अवैध सम्बन्ध और  ऑनर किलिंग जैसी वजहों के चलते भी कई भयावह मामले सामने आये हैं । महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यहार के मामले तो घर हो या बाहर वाकई बर्बर और चिंतनीय हैं । ऐसे में आँकड़ों में शिक्षित और सभ्य  होते समाज का यह असभ्य चेहरा वाकई डरावना है |  किसी भी सभ्य और संवेदनशील समाज के लिए ऐसे मामले सदमे से कम होने भी नहीं  चाहियें । क्योंकि इन्हें गंभीरता से ना लिया जाना जड़ें जमाती इस कुत्सित सोच और समाज के बीमार होते चेहरे को नज़रंदाज़ करना होगा | हमें यह स्वीकार करना होगा कि व्यक्तिगत,  सामाजिक और प्रशासनिक, हर स्तर पर हमारे सामाजिक संस्कार वाले देश में अब सामाजिक अहंकार फैल रहा है। मनुष्यता से परे एक सामन्ती सोच आम से लेकर ख़ास तक, सबके मन में जड़ें जमा रही है | नकारात्मक और हिंसक विचार और व्यवहार का यह विस्तार वाकई  चिंतनीय है |