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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

14 June 2020

जा चुके सुशांत से पीड़ा में डूबे मन के कुछ सवाल


तुम आज इस दुनिया में नहीं हो सुशांत- मन दुखी है | पीड़ा में डूबा है | पर सच कहूं तो इस पीड़ा के पीछे तुम्हारी परिस्थतियाँ, तुम्हारे मन की टूटन और अकेलापन नहीं बल्कि सवालों की एक बड़ी फेहरिस्त है सुशांत | वो इसलिए कि इस दौर में बेघर, बेरोजगार, अपनों से दूर फंसे लोग भी जीवन से जूझ रहे हैं | आने वाले कल की सुबह अपने साथ क्या लाये कुछ पता नहीं, ऐसी परिस्थतियों में भी जीवन का मान कर रहे हैं | जिजीविषा से जिंदगी को साध रहे हैं | यकीनन तुम्हारी पीड़ा और हालात सड़क पर नंगे पाँव चल रहे लोगों से बढ़कर नहीं हो सकते | इसीलिए तुम्हारे लिए सिर्फ सवाल ही हैं मन में ---- हाँ दिल दुखी जरूर है --- मैं तुम्हारे अपनों के लिए दुखी हूँ.... तुम जो उदाहरण छोड़ गए कमजोर पड़ने का उसके लिए परेशान हूँ | सब कुछ हासिल कर लेने के बाद मन में जो रीतपान तुम जैसे युवा पाल लेते हैं ना, उसके लिए दुखी हूँ मैं |

मुंबई जैसा महानगर एक समंदर सा है सुशांत | यहाँ हर दिन हजारों युवा सपने पूरे करने आते हैं | सपनों के इस संघर्ष की लहरों में तैरते कम और डूबते ज्यादा हैं | पर हर कोई जिंदगी से तो नहीं हारता | फिर इस शहर में तुम्हारे तो सारे सपने पूरे हुए | वो भी किसी समझौते के साथ नहीं बल्कि सम्मानजनक काम करके | स्नेह, सम्मान,पैसा सब कुछ तुम्हारी झोली में आया --- फिर यह क्यों सुशांत ??
इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनकी जिंदगी ही संघर्ष में गुजर जाती है सुशांत | जीवन के सबसे प्यारे और ऊर्जामयी मोड़ पर तो तुमने लगभग सब कुछ पा लिया था | फिर यूँ जिंदगी का हाथ छोड़कर तुम उन युवाओं के लिए कैसा उदाहरण छोड़ गए हो सुशांत- जो आज संघर्षशील हैं | जो नहीं जानते कि उन्हें इस मेहनत का कोई फल मिलेगा भी या नहीं ? तुम्हारा कदम निराश करता है क्योंकि तुम हारने का एक उदाहरण छोड़ गए हो सुशांत - आखिर क्यों ??
तुम चकाचौंध भरी दुनिया में पैदा नहीं हुये थे सुशांत | सब कुछ मेहनत पाया | आम परिवार के बच्चे थे तो उलझनें और कमी-बेशी भी देखी ही होगी | दुःख-पीड़ा और मन की टूटन से पहले भी वास्ता तो पड़ा ही होगा | तो जानते-समझते ही होगे कि आम घरों के बच्चे तो उम्मीदों के सहारे ही जीते-जूझते हैं | हर हाल में जिन्दगी का हाथ थामे रहते हैं | छोटे शहरों -कस्बों के बच्चों के लिए तो तुम एक प्रेरणा के समान थे | जब कुछ नहीं था तब डटे रहे तो अब सब कुछ पाकर तुम्हारी उम्मीद क्यों टूटी सुशांत ?
बैक डांसर से लेकर टीवी सीरियल और फिर सिनेमाई परदे तक का सफ़र आसान तो नहीं रहा होगा ? कितना जूझकर यह सब हासिल किया होगा ? एक छोटे शहर से लेकर मायानगरी तक के सफर में कितने उतार-चढाव देखें होंगें ? कितने अंधेरे तुम्हारे हिस्से आये होंगें समझना मुश्किल नहीं हैं | सुशांत , तुमने तो अपनों से लड़कर भी अपने सपने साकार करने की ठानी और सफल भी हुए | जब रास्तों की मुश्किलों से नहीं हारे तो हर तरह से सफल कही जा सकने वाली जिन्दगी तक पहुंचकर कैसे उसका हाथ छोड़ दिया ??
तुम्हारी एक हालिया फिल्म तो बाकायदा आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बजाय जीवन का सामना करने की सीख देने वाली थी | संवाद और साथ जरूरी है, यही समझाने वाली थी | तुम अवसाद या उलझन में तो कम से कम फिल्म की कहानी को याद करते हुए अपने बड़ों की ओर लौटते | यकीन मानो तुम निराश नहीं होते | घर के अपने बच्चों को निराश करते ही नहीं कभी | तकलीफों के दौर में बिलकुल भी नहीं | पिता के सामने रोते | बहनों के सामने मन खोलते | अब तुम्हारे जाने के बाद उनका यह जानना कि तुम अवसाद के शिकार थे | दवाइयां खा रहे थे | कितना तोड़ेगा उन्हें ? तुम अपनों तक को मन की क्यों नहीं कह पाए सुशांत ? ?
सबसे बड़ा सवाल तुम इतने स्वार्थ कैसे हो गए कि अपनों को यह असहनीय पीड़ा देकर चल दिए | जिस माँ के तुम बहुत करीब रहे, उनके सालों पहले दुनिया से चले जाने की पीड़ा झेलकर भी संभल गये थे तो अब यह कौनसा भय और दुःख तुम्हे बिखेर गया सुशांत ? माँ को तुम हर दिन याद करते रहे, तो यह भी सोचते कि अब तुम्हारे ना होने की इस पीड़ा के पहाड़ तले बहनों और पापा की जिन्दगी कैसे कटेगी ??
यकीन मानो प्रश्न और भी बहुत हैं | लम्बी सूची है सवालों की मन में पर नम आँखों से लिखा न जा रहा |
शायद तुम किसी चीज़ या हालात से नाख़ुश थे सुशांत -- पर यह कदम उठाकर अनगिनत अपनों-परायों को निराश कर गए हो - जहां हो वहां सुकून पाओ यही दुआ है |


तस्वीर -गूगल से 

26 April 2020

कोरोना संकट - लॉकडाउन --- पारिवारिक रिश्तों में संयम और साथ परीक्षा भी


कोरोना संक्रमण की महामारी ने महिलाओं के जीवन के कई पहलुओं पर असर डाला है |  इस  वायरस के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए किये गए लॉकडाउन ने दुनियाभर में  घरेलू हिंसा के आँकड़ों में इजाफा किया है | अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत यूरोप के कई देशों में लॉकडाउन का असर   घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी  के रूप में भी सामने आने लगा है। अमेरिका में डीसी सेफ नामक एक संस्था के अनुसार  हालिया दिनों में उनके पास आने वाले घरेलू हिंसा से जुड़े  शिकायती फोन कॉल की संख्या  दोगुनी हो गई है। इतना ही नहीं ऑस्ट्रेलिया में  भी घरेलू हिंसा के मामले 40 फीसदी बढ़ गए हैं। कोरोना संकट के इस दौर में अमेरिका में तो घरेलू हिंसा के मामले देखने वाले वकीलों ने स्थानीय प्रशासन को विशेष चेतावनी  भी जारी की है। साथ ही पीड़ितों तक आसानी से पहुंचने के लिए वहां  20 राज्यों के सीनेटरों ने सरकार से घरेलू हिंसा पीडि़तों की सहायता करने वाली एजेंसियों  को  लॉकडाउन से छूट देने की मांग भी  रखी है |  यही वजह है कि विशेषज्ञों ने  कोरोना  की महामारी के सामाजिक असर को लेकर भी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अतिरिक्त तनाव या भय से घरों में अत्याचार की तीव्रता बढ़ जाती है। ऐसे में महिलाओं और बच्चों के लिए यह समय  बेहद मुश्किलों भरा साबित हो रहा है।   

गौतरलब है कि  हमारे यहाँ भी इन दिनों कोरोना वायरस के प्रकोप को बढ़ने से रोकने के लिए  पूरे देश में 21दिन का  लॉकडाउन लगाया गया है  | हाल ही में  राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी  लॉकडाउन की इन स्थितियों में महिलाओं के विरुद्ध  हिंसा बढ़ने के मामलों को लेकर ट्ववीट किया है | चिंतनीय है ना  सिर्फ  घरेलू हिंसा में लगातार  बढ़ोतरी की ख़बरें आ रही हैं बल्कि राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक घरेलू हिंसा से संबंधित विभिन्न प्रकार की शिकायतें भी  मिल रही  हैं |  ऐसी शिकायतें भी आई हैं  जिनमें  पति पत्नियों को अभद्र भाषा बोल रहे हैं और उनको कोरोना वायरस  बुला रहे हैं।  राष्ट्रीय महिला आयोग के  मुताबिक 24 मार्च के 1 अप्रेल तक, यानी की लॉकडाउन के बाद के एक  सप्ताह में उन्हें 69 शिकायतें मिलीं |  इतना ही नहीं ऐसी शिकायतें दिन-पर-दिन बढती ही जा रही हैं |  कहना गलत  नहीं होगा की अनगिनत मुश्किलें साथ लाने वाली इस महामारी की चिंता का केवल चिकित्सकीय पक्ष ही नहीं है |  सामाजिक-पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर  भी कई समस्याएं सामने आने लगी हैं |  

दरअसल  परिस्थिजन्य  दबाव मानवीय  व्यवहार को गहराई से प्रभावित करता है | मौजूदा हालातों में  भी कोरोना संक्रमण  को लेकर भय, भ्रम और तनाव का परिवेश बना हुआ है |  घरों  के भीतर सिमटे लोग आर्थिक मंदी से लेकर शारीरिक सेहत तक, कई बातों और हालातों की  चिंता में  डूबे हुए हैं |  दुखद है  कि हमेशा की  तरह भारत ही नहीं वैश्विक स्तर भी आधी आबादी  ही इस बदले हुए सामाजिक-पारिवारिक परिवेश का सबसे ज्यादा शिकार हो रही  हैं | सामान्य स्थितियों में भी औरतें परिवारों में बढ़ते तनाव का आसान शिकार रहती हैं |  ऐसे में इस वैश्विक आपदा में उनकी परेशानियां कई मोर्चों पर बढ़ा दी हैं |  गृहिणियां हों या कामकाजी,  ना केवल उनपर काम का  भार बढ़ गया है बल्कि रिश्तों से संयम और सहजता भी खो रही है |  व्यस्तता और भागमभाग में बीत रही जिन्दगी में अचानक आया यह ठहराव हमारे घरों के  भीतर बहुत कुछ बदल रहा है |  यही वजह है  कोरोना वायरस की मार जीवन के लगभग हर पहलू पर दिख रही है | आर्थिक ही नहीं सामाजिक-पारिवारिक मोर्चे पर भी इस संक्रमण के कारण बनीं रहने-जीने की परिस्थितियाँ  गहरा असर डाल रही हैं |  एक ओर इस खतरनाक वायरस ने दुनिया भर  में हजारों लोगों की जिन्दगी लील ली है तो दूसरी ओर यह वैवाहिक रिश्तों में भी दूरिया ला रहा है |  चीन में तो घर में कैद होकर एक-दूजे के  साथ समय बिता रहे  शादीशुदा दंपतियों के बीच कोरोना  वायरस तलाक की वजह तक बन चुका है |   गौरतलब है कि चीन के शिचुआन प्रांत में  बीते  दिनों 300 से ज्यादा दंपतियों ने तलाक की अर्जी दाखिल की  थी |  यहाँ तक कि वहां अब तलाक की अर्जियां स्वीकार करना बंद कर दिया था |   कहना गलत नहीं होगा कि सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़े इन संकटकालीन हालातों में संबंधों की हकीकत भी सामने आ रही है |   

गौरतलब है कि कोरोना वायरस के  कहर के कारण भारत समेत दुनिया के कई देशों में सोशल डिस्टेंसिंग अपनाने के दिशानिर्देश जारी किये गए हैं  |  इस वायरस के फैलाव को रोकने का यही सबसे प्रभावी तरीका भी है | हमारे यहाँ भी इस संक्रमण के  बढ़ते मामलों को देखते हुए आमजन से सावधानियां बरतने की अपील की गई है । केंद्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग अपनाने की बात कही है |  गौरतलब है  कि  सोशल डिस्टेंस का अर्थ लोगों से दूरी बनाए रखना है। इसके लिए कई  कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से ही काम करने को कहा है | कम से कम घर से बाहर निकलने और  सामाजिक मेलजोल कम  रखने का उद्देश्य इस वायरस एक फैलाव को रोकने का है |  ऐसे में घर के भीतर अपनों के साथ समय बिताना  ही एक रास्ता रह गया है | हर उम्र, हर तबके के लोगों के लिए घर से बाहर समय बिताने का  विकल्प बंद हो गया है | ध्यान देने वाली बात है कि पहले  घर में होने वाली हिंसक प्रताड़ना से बचने के लिए औरतें मायके भी चली जाया करतीं थीं | इतना ही नहीं सामान्य दिनों में कामकाजी महिलाओं का लंबा समय दफ्तर, सामाजिक मेलजोल और सार्वजनिक स्थलों पर भी गुजरता था | साथ ही गृहिणियों को  घर के सदस्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाने के बाद कुछ समय खुद के लिए भी मिल जाता था | घर के काम के लिए घरेलू सहायिकाओं की मदद ने जिन्दगी को सहज बना रखा था | इन दिनों दोनों के लिए ही परेशानियां बढ़ गई हैं |  नौकरीपेशा महिलाओं  की मुश्किलें और ज्यादा हैं |  वर्क फ्रॉम होम करते हुए उन्हें घर के कामकाज भी देखने पड़ रहे हैं |  निश्चित रूप से लॉकडाउन के इस दौर में महिलाओं  को आम जीवन की कई बातों से जुड़ी सहजता,  स्वतंत्रता और सहायता नहीं मिल पा रही है | ऐसे में आपसी संबधों में तकरार और उलझनों के नये समीकरण बन रहे हैं  |  विचारणीय है कि लॉकडाउन में वैवाहिक सम्बन्धों में बढती यह आक्रामकता   वैश्विक स्तर पर देखने को मिल रहा है | 

देखा जाय तो  लॉकडाउन के चलते मिला यह वक्त संकट के समय साथ और संवाद का पुल भी बना सकता है | लेकिन बीते  सालों में  जिस जीवनशैली लोग हम आदी हो गए हैं , उसमें साथ रहने को  मिला समय भी समस्या बन रहा है  | चीन से सामने  आई तलाक चाहने वालों कि संख्या और दुनियाभर में बढ़ रहे घरेलू हिंसा के आंकड़े तो यही बताते हैं |  साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि  लॉकडाउन का एक लैंगिक पहलू भी है | अधिकतर घरों में घर के कामकाज स्त्रियों के ही हिस्से हैं | अफसोसनाक ही है कि घर के कामकाज हों या अपनों कि  संभाल  देखभाल के दायित्व निर्वहन की सूची में खुद को दोयम दर्जे पर रखने वाली महिलाओं को अपमानजनक व्यवहार भी झेलन पड़ रहा है |  घरेलू हिंसा और मौखिक अभद्रता के मामले तो वाकई चिंतनीय हैं | यही वजह है कि आल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेन्स एसोसिएशन समेत आठ महिला अधिकार संगठनों  ने कोरोना संक्रमण रोकने के लिए लगाये गए देशव्यापी  लॉकडाउन के चलते महिलाओं के सामने  आ रहीं मुश्किलों पर गहरी चिंता जताई है |  

 दरअसल, बीते कुछ बरसों में साथ और संवाद का भाव इतना रीत गया है कि तकलीफदेह समय में भी अपनों के साथ सहजता से रहने की आदत ही छूट गई है | कोई हैरानी नहीं कि विपत्ति के समय में भी हर पल साथ  रहना,  रिश्तों में पल रही दूरियां सामने  ले आया है | हालिया सालों में दुनियाभर में पारिवारिक-सामाजिक मोर्चे पर अपनों को धैर्य से सुनने और समझने का व्यवहार गुम हुआ है |   स्मार्ट गैजेट्स की व्यस्तता  में साथ होकर भी अकेले रहने की आदत बन चुकी है | गौरतलब है कि कोरोना से चीन के बाद सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल इटली में इन दिनों इंटरनेट उपयोग में 70 फीसदी  का इजाफा हुआ है। टेलीकॉम कंपनी इटालिया एसपीए  के अनुसार इस दौरान देश में इंटरनेट कनेक्शन की  मांग में भी बढ़ोतरी हुई है। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के चलते आइसोलेशन  के कारण इटली  के लोग भी अपने  घरों में कैद हैं।  ऐसे में अधिकतर लोग वेबसीरीज और ऑनलाइन गेम्स के जरिये  अपना समय बिता रहे हैं। यानी इन तकलीफदेह   हालातों में भी अपनों के साथ कम  और इन्टरनेट पर ज्यादा समय बीत रहा है |  दरअसल, ऐसी स्थितियां चौंकाने वाली जरूर हैं पर आज के रिश्तों का कटु सच भी लिए हैं  |  साथ ही पारिवारिक रिश्तों के मोर्चे पर आये ऐसे बदलाव कमोबेश हर देश और समाज के मामले लागू होते हैं |   हालिया बरसों में साथ रहते हुए भी सम्बन्धों में खालीपन बढ़ा है |  जीवनभर के साथ वाले  शादी के रिश्ते में एक दूजे को समझने और साथ देने का भाव कम हुआ है |  ऐसे में परिस्थितिवश  जब समय साथ बिताया जाता है, तब भी भावनात्मक जुड़ाव के बजाय शिकायतें और व्यवहार की आक्रामता ज्यादा सामने आती है | कहना गलत नहीं होगा कि लॉकडाउन का दौर  पारिवारिक रिश्तों में  संयम और साथ की परीक्षा भी है |  

19 March 2020

पीड़ा हो या सुख- हम सनसनी बनाने को अभिशप्त और अभ्यस्त हो चले हैं...


 इन दिनों जिस चीज़ से सबसे ज्यादा कोफ़्त हुई, वो है हद से ज्यादा सूचनाएं और बेवजह के बेहूदा मजाक | ना विषय की गंभीरता को समझा जाता है और ना ही सूचनाओं का सच जानने की जरूरत समझी जाती है | बस, सनसनी बनाना है हर विषय को | चुटकुले बनाकर मायने ही ख़त्म कर देने हैं किसी भी मामले के | बेवजह के विचार और अर्थहीन बातें बो देनी हैं कि नई कोपलें कुछ अलग ही रंग में फूटें | पुरानी समस्या तो जड़ें जमाये रहे ही नई विप्पत्ति और खड़ी हो जाय | कमाल यह कि यह सब बिना रुके-बिना थके जारी है | ऐसे शोर की तरह जो गूँजता तो नहीं पर सोच और समझ गुम करने को काफी है |


अब हर मुसीबत एक मौका है ----अपना प्रोडक्ट बेचने का--अपना ज्ञान बघारने का--ख़ुद को ख़ास दिखाने का--हंसी-ठिठोली करने का | सजगता और सतर्कता को दिया जाने वाला समय ऐसे-ऐसे मोर्चों पर खर्च होता है कि आपदा के लड़ना और मुश्किल हो जाए | हर वो खुरापात की जाए जो ख़ौफ़ को और बढ़ा दे | दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल से इसी सनसनी की बदौलत एक दुखद खबर सामने आ गई है | कोरोना वायरस से संक्रमित एक मरीज ने आत्महत्या कर ली है | सातवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान देने वाला यह व्यक्ति सिडनी से वापस अपने देश लौटा था | कोई हैरानी नहीं हमने इस वैश्विक विपदा को भी मजाक और सूचनाएं ठेलने का मौका बना लिया है | नतीजा, भरोसे से भरे परिवेश की जगह भय का माहौल बन रहा है |

संयम और ठहराव हमारी परवरिश का हिस्सा रहा है | हमारे यहाँ आज भी ज़िंदगी इतनी आसान नहीं कि बिना समझ और धैर्य के कट सके | लेकिन न्यूज चैनल्स हों या सोशल मीडिया - कहीं कोई ठहराव नहीं दिखता | आपदा से लड़ने का नहीं बल्कि कहीं दिखने और कहीं बिकने का भाव ज्यादा दिख रहा है | जीवन पर बन आये तब भी हम एक अलग ही उन्माद में डूबे रहते हैं | ख़ुशी का मौका हो या कोई आपदा | हम तो आदी हो गए हैं इसे सनसनी बनाने के | प्लीज़ इससे बचिए --- थोड़ा ठहरिये |

24 January 2020

बेटियों एक प्रति संवेदनशील बने समाज

जिस समाज में लैंगिक असमानता और भ्रूणहत्या जैसी कुरीतियाँ आज भी मौजूद हैं, वहां संवेदनशील और सहयोगी सामाजिक व्यवस्था ही बालिकाओं के जीवन की दशा बदल सकती है | विचारणीय है कि बेटियों के लिए संवेदनशील और सम्मानजनक परिवेश बनाने का अहम् पहलू जन- जागरूकता से जुड़ा है | राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य समाज में बेटियों को समानता का अधिकार दिलाने की जागरूकता लाना ही है | इस खास दिवस का मकसद देश की बेटियों के लिए सहयोगी, सुविधापूर्ण  और सम्मानजनक वातावरण बनना है, जिसमें उनके व्यक्तित्व का सर्वांगींण विकास हो | बालिकाएं शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक, हर मोर्चे पर भेदभाव से परे संविधान द्वारा दिए गए उन अधिकारों को जी सकें, जो भारत की नागरिक होने के नाते उनके हिस्से आये हैं | सुखद है कि हालिया बरसों में आये बदलावों के चलते बेटियां आगे भी  बढ़ रही हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी गढ़ रही हैं  |  ऐसे में अगर सुरक्षा और समानता का माहौल  मिले तो बेटियों का आज ही नहीं संवरेगा बल्कि आने  वाले कल में वे सशक्त और चेतनासंपन्न नागरिक भी बन पाएगीं |  (  नईदुनिया में प्रकाशित लेख का अंश ) 


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15 January 2020

मानसिक स्वास्थ्य की चिंतनीय स्थितियां



हमारे यहाँ अवसाद और व्यग्रता यानी कि Depression और Anxiety आज सबसे आम मानसिक विकार हैं | दोनों ही बीमारियाँ बहुत तेज़ी से फ़ैल भी रही हैं | ताजा आँकड़े भी इस बात को पुख्ता करते हैं | पर बिगड़ती मनोदशा से जुड़ीं ऐसी स्थितियां सिर्फ आकंड़ों तक नहीं समेटी जा सकतीं | हर उम्र , हर तबके के लोगों के मन की बढ़ती बेचैनी बताती है कि सिमटते रिश्तों और सामाजिकता के इस दौर में इन व्याधियों का विस्तार पाना आसान हो गया है | 

10 January 2020

न्याय की आस को मिलेगा बल

  
सात साल पहले निर्भया के साथ राजधानी दिल्ली के मुनिरका में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने ना केवल देश को दहला दिया था बल्कि बर्बरता की भी ऐसी बानगी सामने रखी थी कि हर माता-पिता के मन में भय का स्याह  अँधेरा छा गया था | इस अमानवीय और क्रूर मामले ने बेटियों की असुरक्षा से जुड़ीं दर्दनाक  स्थितियां ही नहीं, महिलाओं के प्रति पलती कुत्सित सोच को भी सामने रखा था | निर्ममता की सारी सीमायें पार करने वाली सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना ने आमजन को भीतर तक झकझोर दिया था |  वैश्विक स्तर पर भी भारत को 'रेप केपिटल'  और सबसे असुरक्षित देश तक कहा गया | यही वजह थी कि लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे निर्भया के परिवार को ही नहीं पूरे देश को निर्भया के साथ बर्बरता करने वालों को  फांसी पर लटकाने के निर्णय का इंतजार था | गौरतलब है कि निर्भया के दोषियों को फ़ास्ट ट्रैक अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही फाँसी की सजा सुना चुके हैं |  बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी ।  उच्चत्तम न्यायालय  के आदेश के बाद दोषियों को दी गई फांसी की सजा कायम रही । अब साल 2012 में  हुए निर्भया गैंगरेप के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों का डेथ वॉरंट जारी  किया  है | इन चारों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी  दी जायेगी |  निर्भया के माता-पिता ने पिछले महीने चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वारंट जारी करने के लिए दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका दायर की थी। पटियाला हाउस कोर्ट का यह  निर्णय आने के बाद  निर्भया की मां ने कहा है कि 'मेरी बेटी को न्याय मिल गया। अपराधियों को फांसी की सजा मिलने से देश की महिलाओं को ताकत मिलेगी। इस फैसले से लोगों का न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दोषियों को फांसी देने से अपराधी डरेंगे |' यकीनन महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर बिखरते भरोसे के इस दौर में  यह  फैसला एक उम्मीद जगाने वाला है |  डेली न्यूज- राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित लेख  का अंश ) 

31 October 2019

क्यों है दायित्वबोध की कमी

राजस्थान के बीकानेर से सामने आये एक मामले में डाक विभाग  के एक डाकिये ने  बीते एक साल से डाक नहीं बांटी थी  | डाकिये के घर में  10 बोरी एटीएम कार्ड,  पैन कार्ड, चेक बुक, शोक संदेश, सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र, आधार कार्ड, इंश्योरेंश के दस्तावेज़ और शादी के कार्ड मिले हैं  |  पोस्ट ऑफिस से डाक ले जाकर  वितरित करने के बजाय वह अपने घर पर बोरों में भर कर रखता जा रहा था |  काफी समय से उस क्षेत्र के  लोगों की शिकायत थी कि उन्हें डाक नहीं मिल पा रही है |  शिकायत जब उच्च स्तर तक पहुची तो जांच टीम भी  बोरों भरे में  सामान को देख कर  हैरान रह गई | 

दरअसल, यह वाकया अपने काम के प्रति जिम्मेदारी के भाव के अभाव को दर्शाता है  | अफ़सोस कि यह देश में एक अकेला मामला भी नहीं है | दफ्तर पहुँचने में लेटलतीफी करनी हो या दायित्व निर्वहन की राह में बच निकलने के रास्ते तलाशना, ऐसे लोग लगभग हर क्षेत्र में मिल जाते हैं |  सार्वजानिक सेवाओं  से जुड़े  कर्मचारी इस मोर्चे पर आम लोगों को सदा से ही निराश करते आये हैं | काम के प्रति टालमटोल की आदत हमारे वर्क कल्चर हिस्सा बन चुकी है | ऑफिस  में  जानबूझकर अपने  दायित्व निर्वहन में पीछे रह जाना तो बहुत से  कर्मचारियों  के लिए मानसिक संतुष्टि  देने वाली आदत है | उन्हें यह  सोचना भी जरूरी नहीं लगता कि उनकी ऐसी कार्यशैली कितने लोगों के जीवन को प्रभावित करती है | बीकानेर से सामने आये इस  मामले में भी पोस्टमैन की गैर-जवाबदेही की हरकत के कारण हजारों लोगों को  नुकसान हुआ होगा  |  नियुक्ति पत्र समय पर नहीं  मिलने से कई बेरोजगार युवा अपनी नौकरी से वंचित हो गए होंगें  | कितने ही लोग अपने नाते रिश्तेदारों के शोक और शादी समारोह में शामिल नहीं हो  पाए होंगें । कई तरह के जरूरी कागजात लोगों तक नहीं पहुंचे होंगें, जो उनके लिए बेहद उपयोगी थे |यह कटु सच है कि देश और समाज को बदलने की बड़ी-बड़ी बातों में अव्वल रहने वाले भारतीय  सबसे बड़ी चूक उस जिम्मेदारी को निभाने में करते हैं, जो बतौर नागरिक उनके हिस्से आती है |  ( NBT में प्रकाशित लेख का अंश  )  

25 October 2019

विद्यार्थियों के साथ संवेदनहीनता



हाल ही में कर्नाटक के हावेरी जिले  के एक कॉलेज में छात्रों को नकल करने से रोकने के लिए उनके सिर पर कार्डबोर्ड बॉक्स यानी कि गत्ते पहना दिए गए। चौंका देने वाले इस अव्यावहारिक और अमानवीय  व्यवहार  वाले मामले में विद्यार्थियों के सिर पर गत्ता पहनाकर प्रशासन ने नकल पर लगाम लगाने के लिए यह अजीबो-गरीब तरीका निकाल लिया |  इस अनोखे और हैरान-परेशान करने वाले नियम के तहत मुंह की तरफ गत्ते में वर्गाकार छेद किया गया ताकि परीक्षार्थी सवाल देख सकें और जवाब लिख सकें।  परीक्षा कक्ष की सोशल मीडिया में  दिख रही तस्वीर सभी को हैरान कर रही है | हंसी-मजाक का विषय बन गई है |  लेकिन  यह तस्वीर सिर्फ हँसने-मुस्कुराने का मामला भर नहीं है  | यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की भी अजब-गज़ब स्थिति और अव्यवस्था को सामने रखती  है |   जिसमें  परीक्षा के दौरान स्‍टूडेंट्स को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए बाकायदा बाध्‍य किया गया | अब सरकार ने कॉलेज प्रशासन को नोटिस जारी कर इस पर स्‍पष्‍टीकरण मांगा है  कि आखिर छात्रों को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए क्‍यों मजबूर किया गया ? कर्नाटक के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री ने भी नकल रोकने के लिए ऐसी व्यवस्था को निंदनीय और  किसी भी रूप में अस्वीकार्य  बताया है |  
नकल पर लगाम के लिए बच्चों के साथ किया गया यह व्यवहार अनुचित और अव्यावहारिक है | परीक्षा के दौरान छात्रों को सबसे ज्यादा सहूलियत और सहजता की दरकार होती है |  ऐसे में नक़ल पर शिकंजा कसने के लिए निकाला गया यह अजीबो-गरीज़ रास्ता वाकई अफसोसनाक है | आम लोग भी कॉलेज प्रशासन के इस तरीके से हैरान-परेशान हैं |  इसकी आलोचना कर कर रहे हैं |  क्योंकि नकल रोकने के नाम पर परीक्षा केन्द्रों में बच्चों  के साथ किया गया यह बर्ताव बच्चों और अभिभावकों का मनोबल तोड़ने वाला है | ऐसे गत्ते के बॉक्स  पहना देना,  परीक्षा केंद्र में  विद्यार्थियों को असहज करने वाला है | साथ ही अहम्  बात यह कि यह ऐसा कोई   सार्थक रास्ता भी नहीं जो नकल पर लगाम लगा सके |  (दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख  का अंश  )  

12 August 2019

सुषमा स्वराज ----- देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व

जिस देश की आधी आबादी आज भी सुरक्षा, सम्मान और समानता के मोर्चे पर  लड़ाई लड़ रही हो, वहां की आम  स्त्रियों के लिए  सुषमा स्वराज जैसी नेता का व्यक्तित्व पीढ़ियों तक उम्मीद और हौसले की बुनियाद रहेगा | सुषमा स्वराज ने इस देश की महिलाओं को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से यह समझाया है  कि आम सा जीवन जीते हुए भी ख़ास बना जा सकता है |  बदलाव लाने की ठानी जा सकती है | सहज और संयत रहते हुए भी प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी जा सकती है |  अपनी संस्कृति से जुड़ाव रखते हुए  देश ही नहीं  विदेश में भी अपनी और अपने  मुल्क की ख़ास प्रतिष्ठा हासिल की जा सकती है | इतना ही नहीं उन्हें  भारतीय संस्कृति की राजदूत भी  कहा जा सकता है | वे तीज  पर्व  मनाते हुए भी दिखीं तो  महिलाओं की अस्मिता के लिए आवाज़ बुलंद करते हुए भी |   यही वजह है कि  उनका गरिमामयी  और विचारशील व्यक्तित्व देश की आम स्त्रियों को सदैव बेहद अपना सा लगा |

भारतीय राजनीति की यह कद्दावर और विदुषी नेता शुरुआत से ही एक सामर्थ्यवान सोच वाली स्त्री भी रहीं |  संघर्ष और सकारात्मक समझ के साथ  देश के राजनीतिक पटल पर अपना अहम् स्थान बनाया |  इतना ही नहीं वे अपने घर-परिवार के दायित्वों और राजनेता की भूमिका, दोनों का निर्वहन करने में पूरी तरह सफल रहीं  | अपने परिवार के प्रति समर्पित सुषमा ने राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद  निजी जिंदगी में भी अपनी जिम्मेदारियों  को पूरे मनोयोग से निभाया | भारत जैसे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे वाले देश में उनके जीवन का यह पहलू यकीनन प्रेरणादायी है |  क्योंकि यहाँ अधिकतर स्त्रियाँ कई मोर्चों पर जूझते हुए, अनगिनत दायित्व निभाते हुए आगे बढती हैं | सुषमा  जितनी  कुशल सांसद, प्रशासक, केंद्रीय मंत्री और ओजस्वी वक्ता रहीं  उतनी  सहज और मानवीय भावों से भरी इन्सान भी |  यही वजह है कि वे एक राजनीतिक व्यक्तित्व ही नहीं जन-जन के हृदय में बसने वाली जन-प्रतिनिधि भी साबित हुईं |  हमारे यहाँ राजनीतिक पार्टियों में महिलाओं को एक सहयोगी कार्यकर्ता के तौर पर  ही देखा जाता रहा है । इतना ही नहीं उनकी निर्णयात्मक  भूमिका पर भी हमेशा ही सवाल उठाये जाते रहे हैं । ऐसे में सुषमा भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता रहीं, जिन्हें असाधारण सांसद भी चुना गया | पड़ोसी देश को लेकर तीखे तेवर अपनाने की बात हो आया और आमजन की मदद के लिए संवेदनशीलता भरा व्यवहार,  उनका प्रेरणादायी और प्रभावी व्यक्तित्व  सदा के लिए देश और विदेशों में बसे भारतीयों  के मन दर्ज हो गया |  पराई धरती पर जा बसे भारतीय नागरिकों के मन में तो उन्होंने एक भरोसा पैदा किया कि संकट के समय उन्हें अपने आँगन से मदद मिल सकती है । भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने सजग व्यक्तित्व  और विचारशील राजनीतिज्ञ की भूमिका अदा की |  इन्हीं मानवीय भावों के बल पर भारतीय राजनीति  में आधी आबादी का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने वाली सुषमा ने वैश्विक स्तर पर देश की साख को नई पहचान दी  । कूटनीतिक मोर्चे पर सधकर बोलने वाली सुषमा स्वराज  मदद और  इंसानी सरोकारों के मामले में सदैव सहजता से संवाद करती  नज़र आईं | (  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित ) 

03 August 2019

स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति

हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट  ‘हेल्दी स्टेट प्रोगेसिव इंडिया’ ने  देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति को सामने रखा है | ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ रिपोर्ट के इस दूसरे संस्करण में सामने आये बिगड़ती  चिकित्स्कीय सेवाओं के हालात वाकई चिंतनीय हैं | गौरतलब है कि इस अध्ययन के अंतर्गत नीति आयोग ने राज्यों की एक रैंकिंग जारी की है।  23 संकेतकों  को  आधार बनाकर राज्यों की सूची  तैयार की गई है | ये सभी संकेतक जीवन सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक हैं |  इनमें  नवजात  मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय लिंगानुपात, संचालन व्यवस्था-अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि  के  साथ ही   नर्सों और डॉक्टरों के खाली पद आदि शामिल हैं |  भारत में चिकित्सकीय सेवाओं की  दुःखद हकीकत बयान करने वाली इस रिपोर्ट  को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक और नीति आयोग ने मिलकर तैयार किया है।  रिपोर्ट को तीन हिस्सों बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बांटकर बनाया गया है | 21 प्रदेशों की  इस फेहरिस्त में देश के सबसे बड़े राज्य,  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर बताई गई है।  यू पी के बाद क्रमश: बिहार और  ओडिशा जैसे राज्यों को स्थान दिया गया है | दरअसल,  भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति हमेशा से ही चिंता का विषय रही है | जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्स्कीय सेवाओं की स्थिति नागरिकों को निराश ही करती  आई  है | ( जनसत्ता में प्रकाशित लेख का अंश )