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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

29 December 2017

न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने वाला निर्णय



मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में करीब दो महीने पहले  नाबालिग लड़की से गैंगरेप की जिस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था, उसमें चारों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा  हुई  है | गौरतलब है कि  भोपाल की एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जज की अदालत में इस केस  पर प्रतिदिन सुनवाई चली और  फास्ट ट्रैक कोर्ट में चले इस मामले में  36 दिन में फैसला आया | जिसमें चारों दोषियों को उम्रकैद की सजा दी गई है | इस  घटना में  दोषियों का दुस्साहस और अमानवीयता इतनी थी कि आरोपी गैंगरेप के बीच पीड़िता को बेहोश छोड़ पान-गुटखा भी खाने गए और लौटकर फिर  उसके साथ दुष्कर्म किया | साथ ही यह मामला  पुलिस के असंवेदनशील व्यवहार के लिए भी सुर्ख़ियों में रहा | पीड़िता ने अपने पिता के साथ तीन  थानों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई |  यह आमजन का मनोबल तोड़ने वाली बात थी कि  पीड़िता के माता-पिता खुद पुलिसकर्मी हैं,  बावजूद इसके रिपोर्ट लिखवाने के लिए उसे ऐसे असंवेदनशील व्यवहार  को झेलना पड़ा | केस दर्ज करने से आनाकानी करने और पीड़िता की शिकायत को फिल्मी कहानी बताने वाले सात  पुलिसकर्मियों को बाद में सस्पेंड भी किया गया था |  इतना ही नहीं इस केस में मेडिकल विभाग की लापरवाही भी सामने आई थी | जिसके चलते रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टर को सस्पेंड कर दिया गया था | ऐसी व्यवस्थागत विसंगतियों से लड़ते हुए भी यह त्वरित फैसला आना और दोषियों सजा मिलना वाकई एक नजीर बनने वाला निर्णय है | 

हमारी लचर न्यायिक व्यवस्था में ऐसे फैसले वाकई उम्मीद जगाने वाले उदाहरण हैं | आमतौर पर ऐसे मामलों में सालों कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने में निकल जाते हैं और दोषी सजा भी नहीं पाते | एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल पोक्सो के तहत  पंद्रह हज़ार मामले दर्ज किये गए लेकिन मात्र  चार  प्रतिशत मामलों में अपराधी को सजा हुई | इनमें  नब्बे फीसदी मामले लंबित हैं और  छह  फीसदी मामलों में अपराधी बरी हो गए | कोई हैरानी नहीं ऐसी लचर व्यवस्था के चलते भी ऐसे बर्बर मामलों के आंकड़े बढ़ रहे हैं |  कितने ही मामलों में तो   ऐसी कुत्सित प्रवृत्ति के अपराधियों ने  सजा से बचकर फिर ऐसी ही किसी आपराधिक घटना को भी अंजाम दिया है  | यही वजह है कि कोर्ट के फैसले पर इस नाबालिग लड़की के अभिभावकों का कहना है कि  "वे दोषियों के लिए फांसी चाहते थे, लेकिन इस फैसले से भी संतुष्ट हैं,  कम से कम दोषी जिंदा रहने तक जेल में तो रहेंगें तो फिर ऐसा गुनाह कभी नहीं कर पाएंगे।" यकीनन यह सही भी है | इस घटना के दोषियों का जीवन पर्यंत जेल में रहने और  इस तरह के मामलों में जल्दी सुनवाई होने से ना केवल कुत्सित सोच वालेलोगों  के हौसले पस्त होते हैं बल्कि आमजन का न्यायिक व्यवस्था में भरोसा भी बढ़ता है । यह मामला वाकई एक उदाहरण है  क्योंकि व्यवस्था की लचरता और असंवेदनशीलता से लड़ते हुए पीड़िता के माता-पिता ने भी हौसला बनाये रखा  | आमतौर पर बेटी से ही सवाल किये जाने वाले हमारे समाज में यह बड़ी बात है कि पिता खुद पीड़िता के साथ  घटनास्थल पर गए और दो आरोपियों को पकड़ा | यह उनकी हिम्मत ही थी कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए जिस केस के घटनाक्रम को ट्रैजडी ऑफ एरर्स करार दिया, उन्होंने  हार नहीं मानी |  

 दरअसल, देश में न्यायिक लचरता और प्रशासनिक गैर जिम्मेदारी की बात किसी से छुपी नहीं है | मामला कैसा भी हो अगर अक्सर उसकी लीपापोती की कोशिश की जाती है | महिलाओं के साथ होने वाले दुष्कर्म जैसे हादसों में तो उलटा पीड़िता से ही अनगिनत सवाल किये जाते हैं | इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ | पुलिस जब थानों के सीमा विवाद में उलझी थी, तभी  पीड़िता और उसके परिजन आरोपियों को ढूंढने निकल गए।   उन्होंने दो बदमाशों को पकड़कर पुलिस के सामने पेश  किया तब जाकर मामला दर्ज हो पाया। लापरवाही की हद ही कही जायेगी कि मेडिकल रिपोर्ट में  डॉक्टरों ने इस बर्बरता को आपसी सहमति से बनाया गया शारीरिक संबंध करार दिया था। मामला सामने आने के बाद दोबारा संशोधित रिपोर्ट जारी कर उन्होंने गैंगरेप की पुष्टि की |ऐसे में हमारे देश में कानून लचरता, जाँच और पुलिस की कार्यवाही के नाम पर ख़ुद पीड़िता के परिवार का पीड़ित बन जाना वाकई आमजन को निराश करने वाला है | इतना ही नहीं समाज में भी ऐसे दुष्कर्म के दंश को झेलने वाली महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार ही किया जाता है | ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाओं के लिए भी कहीं ना कहीं  महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाती है | ऐसी अमानवीयता का शिकार बनीं महिलाओं का जीवन बहुत मुश्किलों से भरा बन ही जाता है । जब भी किसी महिला के साथ यह जघन्य अपराध होता है, कभी सवाल उसके कपड़ों पर तो कभी देर रात घर से बाहर रहने पर उठाए जाते हैं | जिसके चलते विकृत हो रहे माहौल और प्रशासनिक लचरता के बारे में गंभीरता से  सोचा ही नहीं जाता | कुलमिलाकर देखें तो ऐसी पीड़ा झेलने वाली महिलाओं के लिए किसी भी स्तर पर सहयोग भरा माहौल देखने में नहीं आता | 

 असल में देखा जाये तो सामूहिक दुष्कर्म के ऐसे बर्बर मामले केवल शारीरिक शोषण की घटनायें भर नहीं हैं । यह अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस और न्यायिक लचरता की बानगी हैं जो समाज के आम नागरिक के लिए भय का माहौल बना रही हैं | यही वजह है कि न्यायिक लचरता और कानून से मिल रही मायूसी के बीच आया यह निर्णय विश्वास जगाने वाला फैसला है । हालिया बरसों में जिस तरह हर उम्र की महिलाओं के लिए हमारा परिवेश असुरक्षित हो रहा है, ऐसे निर्णय जरूरी भी हैं |  हरिभूमि में प्रकाशित मेरे लेख से ) 

07 November 2017

बिगड़ रही है महिलाओं की मन की सेहत


महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने  के लिए जितनी योजनायें हैं उतना ही स्त्री विमर्श भी होता है |  लेकिन सच यह है कि हमारे यहाँ  औरतों  के स्वास्थ्य से जुड़े खतरे कम नहीं हैं | विशेषकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तो ना खुद महिलायें सजग हैं और ना ही समाज और परिवार में  दिमागी अस्वस्थता के मायने समझने की कोशिश की जाती है |  यही वजह है कि अनगिनत बीमारियों की जकड़न से लेकर बाबाओं के फेर तक, सब कुछ यह साबित करता है कि भारत में महिलायें मानसिक रूप से कितनी  परेशान रहती हैं | सामाजिक-पारिवारिक और कामकाजी मोर्चों पर एक साथ जूझ रही महिलायें आज बड़ी संख्या में मानसिक तनाव  का शिकार बन रही हैं । महिलाओं के जीवन का अनचाहा हिस्सा बना यह  तनाव उन्हें ना केवल अवसाद की ओर ले जा रहा है बल्कि कई  मानसिक व्याधियों की भी वजह बना रहा है । दुःखद ही है कि मौजूदा दौर में भी अनगिनत जिम्मेदारियों के दबाव और हमारी व्यवस्थागत असंवेदनशीलता के चलते स्त्रियों को हर कदम पर उलझनों का शिकार बनता पड़ता है । कभी अपराधबोध तो कभी असुरक्षा का भाव उन्हें घेरे ही रहता है । ऐसे में यह वाकई विचारणीय है कि आज के असुरक्षित और असंवेदनशील परिवेश में आधी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य भी एक भी चिंता का विषय बना हुआ है । 

यह वाकई चिंतनीय है कि भावनात्मक आधार पर परिवार और समाज की रीढ़ बनने वाली महिलाएं आज इन मानसिक व्याधियों का शिकार बन रही हैं । गृहिणी  हों या कामकाजी मानसिक तनाव और अवसाद महिलाओं के जीवन में जड़ें जमा रहा है । आज के देश की आधी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बन रहा है।  जो यकीनन एक विचारणीय समस्या है । महिलाओं में बढ़ रहे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामले इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे हमारी पूरी सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को प्रभावित की धुरी हैं। 2012 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार तकरीबन 57 फीसदी महिलाएं मानसिक विकारों की शिकार बनी थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर 5 में से 1 महिला और हर 12 में से 1 पुरुष मानसिक व्याधि का शिकार है। कुलमिलाकर हमारे यहां लगभग 50 प्रतिशत लोग किसी ना किसी गंभीर मानसिक विकार से जूझ रहे हैं। सामान्य मानसिक विकार के मामले में तो ये आँकड़ा और भी भयावह है। इनमें महिलाओं के आँकड़े सबसे अधिक हैं। 

दरअसल,  मानसिक सेहत आज के दौर में सभी वर्गों और हर उम्र उम्र के लोगों के लिए वाकई चिंता का विषय है । लेकिन महिलायें तेजी से इसकी गिरफ़्त में  आ रही नहीं क्योंकि वे आज भी अपनी परेशानियां खुलकर नहीं कह पातीं हैं । जिसके चलते अवसाद और तनाव के जाल में ज्यादा फंसती हैं । कई बार तो वे इस समस्या से घिर भी जाती हैं और उन्हें भान तक नहीं होता कि वे किस उलझन में हैं । हमारे वैसे यहाँ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी जागरूकता की कमी है । विशेषकर महिलाओं के बारे में तो यह बात विचारणीय  ही नहीं मानी जाती । इतना ही नहीं इन रोगों  के जाल में फंसे लोग और उनके परिवारजन  भी इलाज के बारे में कम ही सचेत हैं । ( हाल ही में प्रकाशित लेख का अंश )