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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

31 October 2019

क्यों है दायित्वबोध की कमी

राजस्थान के बीकानेर से सामने आये एक मामले में डाक विभाग  के एक डाकिये ने  बीते एक साल से डाक नहीं बांटी थी  | डाकिये के घर में  10 बोरी एटीएम कार्ड,  पैन कार्ड, चेक बुक, शोक संदेश, सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र, आधार कार्ड, इंश्योरेंश के दस्तावेज़ और शादी के कार्ड मिले हैं  |  पोस्ट ऑफिस से डाक ले जाकर  वितरित करने के बजाय वह अपने घर पर बोरों में भर कर रखता जा रहा था |  काफी समय से उस क्षेत्र के  लोगों की शिकायत थी कि उन्हें डाक नहीं मिल पा रही है |  शिकायत जब उच्च स्तर तक पहुची तो जांच टीम भी  बोरों भरे में  सामान को देख कर  हैरान रह गई | 




दरअसल, यह वाकया अपने काम के प्रति जिम्मेदारी के भाव के अभाव को दर्शाता है  | अफ़सोस कि यह देश में एक अकेला मामला भी नहीं है | दफ्तर पहुँचने में लेटलतीफी करनी हो या दायित्व निर्वहन की राह में बच निकलने के रास्ते तलाशना, ऐसे लोग लगभग हर क्षेत्र में मिल जाते हैं |  सार्वजानिक सेवाओं  से जुड़े  कर्मचारी इस मोर्चे पर आम लोगों को सदा से ही निराश करते आये हैं | काम के प्रति टालमटोल की आदत हमारे वर्क कल्चर हिस्सा बन चुकी है | ऑफिस  में  जानबूझकर अपने  दायित्व निर्वहन में पीछे रह जाना तो बहुत से  कर्मचारियों  के लिए मानसिक संतुष्टि  देने वाली आदत है | उन्हें यह  सोचना भी जरूरी नहीं लगता कि उनकी ऐसी कार्यशैली कितने लोगों के जीवन को प्रभावित करती है | बीकानेर से सामने आये इस  मामले में भी पोस्टमैन की गैर-जवाबदेही की हरकत के कारण हजारों लोगों को  नुकसान हुआ होगा  |  नियुक्ति पत्र समय पर नहीं  मिलने से कई बेरोजगार युवा अपनी नौकरी से वंचित हो गए होंगें  | कितने ही लोग अपने नाते रिश्तेदारों के शोक और शादी समारोह में शामिल नहीं हो  पाए होंगें । कई तरह के जरूरी कागजात लोगों तक नहीं पहुंचे होंगें, जो उनके लिए बेहद उपयोगी थे |
  
यह कटु सच है कि देश और समाज को बदलने की बड़ी-बड़ी बातों में अव्वल रहने वाले भारतीय  सबसे बड़ी चूक उस जिम्मेदारी को निभाने में करते हैं, जो बतौर नागरिक उनके हिस्से आती है | यह निराश  करने वाला व्यवहार घर, सड़क या दफ्तर हर जगह देखा जा सकता है | बहुत से लोगों में तो किसी भी काम को ठीक से ना करने की सोच व्यवहार को ऐसी दिशा देती दे देती है कि फिर कुछ करने की इच्छाशक्ति ही नहीं रहती | जबकि घर हो या दफ्तर, सभी अपनी जिम्मेदारी का सही ढंग से निर्वहन करें तो  इसमें समग्र रूप से समाज की बेहतरी ही है |  सभी का जीवन बहुत हद तक सहज और सुविधाजनक हो सकता है | जिस  देश में हर छोटे-बड़े हर काम के लिए लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं, वहां बहुत से काम समय पर निपट सकते हैं |  साथ ही जवाबदेही की यह सोच भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकती है |  कहना  गलत नहीं होगा कि इस काम के  प्रति  लचरता का अगला पायदान घूसखोरी ही है |  ( NBT में प्रकाशित लेख का अंश  )  


25 October 2019

विद्यार्थियों के साथ संवेदनहीनता



हाल ही में कर्नाटक के हावेरी जिले  के एक कॉलेज में छात्रों को नकल करने से रोकने के लिए उनके सिर पर कार्डबोर्ड बॉक्स यानी कि गत्ते पहना दिए गए। चौंका देने वाले इस अव्यावहारिक और अमानवीय  व्यवहार  वाले मामले में विद्यार्थियों के सिर पर गत्ता पहनाकर प्रशासन ने नकल पर लगाम लगाने के लिए यह अजीबो-गरीब तरीका निकाल लिया |  इस अनोखे और हैरान-परेशान करने वाले नियम के तहत मुंह की तरफ गत्ते में वर्गाकार छेद किया गया ताकि परीक्षार्थी सवाल देख सकें और जवाब लिख सकें।  परीक्षा कक्ष की सोशल मीडिया में  दिख रही तस्वीर सभी को हैरान कर रही है | हंसी-मजाक का विषय बन गई है |  लेकिन  यह तस्वीर सिर्फ हँसने-मुस्कुराने का मामला भर नहीं है  |  यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की भी अजब-गज़ब स्थिति और अव्यवस्था को सामने रखती  है |   जिसमें  परीक्षा के दौरान स्‍टूडेंट्स को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए बाकायदा बाध्‍य किया गया | अब सरकार ने कॉलेज प्रशासन को नोटिस जारी कर इस पर स्‍पष्‍टीकरण मांगा है  कि आखिर छात्रों को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए क्‍यों मजबूर किया गया ? कर्नाटक के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री ने भी नकल रोकने के लिए ऐसी व्यवस्था को निंदनीय और  किसी भी रूप में अस्वीकार्य  बताया है |  
नकल पर लगाम के लिए बच्चों के साथ किया गया यह व्यवहार अनुचित और अव्यावहारिक है | परीक्षा के दौरान छात्रों को सबसे ज्यादा सहूलियत और सहजता की दरकार होती है |  ऐसे में नक़ल पर शिकंजा कसने के लिए निकाला गया यह अजीबो-गरीज़ रास्ता वाकई अफसोसनाक है | आम लोग भी कॉलेज प्रशासन के इस तरीके से हैरान-परेशान हैं |  इसकी आलोचना कर कर रहे हैं |  क्योंकि नकल रोकने के नाम पर परीक्षा केन्द्रों में बच्चों  के साथ किया गया यह बर्ताव बच्चों और अभिभावकों का मनोबल तोड़ने वाला है | ऐसे गत्ते के बॉक्स  पहना देना,  परीक्षा केंद्र में  विद्यार्थियों को असहज करने वाला है | साथ ही अहम्  बात यह कि यह ऐसा कोई   सार्थक रास्ता भी नहीं जो नकल पर लगाम लगा सके |  

अफ़सोस कि हमारे यहाँ परीक्षाओं में नकल करना एक बड़ी समस्या बनी हुई है |  नकल करने की प्रवृत्ति कमोबेश सभी शिक्षा संस्थाओं और हर तरह की परीक्षाओं में गंभीर समस्या के रूप में सामने आई है । दुनिया की  सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश आज  पढ़ाई या रोजगार के सीमित अवसरों को अपनी  झोली में डालने के लिए हर तरह के रास्ते अपना भी रहा है | देश में  पढ़ाई और परीक्षा की वर्तमान व्यवस्था के मुताबिक जो बच्चा परीक्षा में अच्छे नंबर  लाता है  वही उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ सकता है । अफसोसनाक ही है कि  शिक्षा व्यवस्था का कुल मकसद परीक्षा में अच्छे अंकों से पास करने तक सीमित है |  यह एक बड़ी वजह है कि हमारा एजुकेशन सिस्टम बरसों से नक़ल का दंश झेल रहा है | इतना ही नहीं  शिक्षा का व्यावसायीकरण  और अपराधीकरण नकल तंत्र को मजबूत करने वाले अहम् कारण हैं | ऐसे में शिक्षा व्यवस्था को नकल के इस घुन से बचाना जरूरी भी है | पर ऐसे नियम या तरीके कारगर नहीं हो सकते  |  यह पूरे शैक्षणिक तंत्र की गरिमा गिराने वाली बात है कि विद्यार्थियों को यों गत्ते के बॉक्स पहना दिए जाएँ | (हाल ही में  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख  का अंश  )   

12 August 2019

सुषमा स्वराज ----- देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व

जिस देश की आधी आबादी आज भी सुरक्षा, सम्मान और समानता के मोर्चे पर  लड़ाई लड़ रही हो, वहां की आम  स्त्रियों के लिए  सुषमा स्वराज जैसी नेता का व्यक्तित्व पीढ़ियों तक उम्मीद और हौसले की बुनियाद रहेगा | सुषमा स्वराज ने इस देश की महिलाओं को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से यह समझाया है  कि आम सा जीवन जीते हुए भी ख़ास बना जा सकता है |  बदलाव लाने की ठानी जा सकती है | सहज और संयत रहते हुए भी प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी जा सकती है |  अपनी संस्कृति से जुड़ाव रखते हुए  देश ही नहीं  विदेश में भी अपनी और अपने  मुल्क की ख़ास प्रतिष्ठा हासिल की जा सकती है | इतना ही नहीं उन्हें  भारतीय संस्कृति की राजदूत भी  कहा जा सकता है | वे तीज  पर्व  मनाते हुए भी दिखीं तो  महिलाओं की अस्मिता के लिए आवाज़ बुलंद करते हुए भी |   यही वजह है कि  उनका गरिमामयी  और विचारशील व्यक्तित्व देश की आम स्त्रियों को सदैव बेहद अपना सा लगा |

भारतीय राजनीति की यह कद्दावर और विदुषी नेता शुरुआत से ही एक सामर्थ्यवान सोच वाली स्त्री भी रहीं |  संघर्ष और सकारात्मक समझ के साथ  देश के राजनीतिक पटल पर अपना अहम् स्थान बनाया |  इतना ही नहीं वे अपने घर-परिवार के दायित्वों और राजनेता की भूमिका, दोनों का निर्वहन करने में पूरी तरह सफल रहीं  | अपने परिवार के प्रति समर्पित सुषमा ने राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद  निजी जिंदगी में भी अपनी जिम्मेदारियों  को पूरे मनोयोग से निभाया | भारत जैसे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे वाले देश में उनके जीवन का यह पहलू यकीनन प्रेरणादायी है |  क्योंकि यहाँ अधिकतर स्त्रियाँ कई मोर्चों पर जूझते हुए, अनगिनत दायित्व निभाते हुए आगे बढती हैं | सुषमा  जितनी  कुशल सांसद, प्रशासक, केंद्रीय मंत्री और ओजस्वी वक्ता रहीं  उतनी  सहज और मानवीय भावों से भरी इन्सान भी |  यही वजह है कि वे एक राजनीतिक व्यक्तित्व ही नहीं जन-जन के हृदय में बसने वाली जन-प्रतिनिधि भी साबित हुईं |  हमारे यहाँ राजनीतिक पार्टियों में महिलाओं को एक सहयोगी कार्यकर्ता के तौर पर  ही देखा जाता रहा है । इतना ही नहीं उनकी निर्णयात्मक  भूमिका पर भी हमेशा ही सवाल उठाये जाते रहे हैं । ऐसे में सुषमा भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता रहीं, जिन्हें असाधारण सांसद भी चुना गया | पड़ोसी देश को लेकर तीखे तेवर अपनाने की बात हो आया और आमजन की मदद के लिए संवेदनशीलता भरा व्यवहार,  उनका प्रेरणादायी और प्रभावी व्यक्तित्व  सदा के लिए देश और विदेशों में बसे भारतीयों  के मन दर्ज हो गया |  पराई धरती पर जा बसे भारतीय नागरिकों के मन में तो उन्होंने एक भरोसा पैदा किया कि संकट के समय उन्हें अपने आँगन से मदद मिल सकती है । भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने सजग व्यक्तित्व  और विचारशील राजनीतिज्ञ की भूमिका अदा की |  इन्हीं मानवीय भावों के बल पर भारतीय राजनीति  में आधी आबादी का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने वाली सुषमा ने वैश्विक स्तर पर देश की साख को नई पहचान दी  । कूटनीतिक मोर्चे पर सधकर बोलने वाली सुषमा स्वराज  मदद और  इंसानी सरोकारों के मामले में सदैव सहजता से संवाद करती  नज़र आईं |

उनका मन सदैव ममत्व और संवेदनाओं से लबरेज़ रहा | यही वजह है कि  भारत और पाकिस्तान  के तनावपूर्ण सम्बन्धों के बावजूद 2016 में सुषमा चंडीगढ़ में  ग्लोबल यूथ पीस फेस्टिवल में हिस्सा लेने आईं  पाकिस्तानी लड़कियों  के लिए भी आम स्त्री की तरह ही  चिंतित दिखीं थीं | तब वापसी की तय तारीख में संशय होने सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान से आये इस  दल की सुरक्षित वापसी का भरोसा दिलाया था । उनके सुरक्षित और सम्मानपूर्वक अपने घर लौटने का वादा करते हुए भारत विदेश मंत्री ने  ट्वीट किया था कि   "क्योंकि बेटियां सबकी साझी होती हैं, किसी सीमा में बंधी नहीं होतीं ।" उनके इन भावों ने पूरी दुनिया का मन जीत लिया था | । कूटनीटिक बयानों से  परे उनका यूँ यह साधारण बात सोचना और कहना उनके असाधारण व्यक्तित्व को परिलक्षित कर गया था, उस उम्मीद का आधार बना था कि वे इंसानी रिश्तों को सबसे ऊपर रखती हैं  ।यही वजह है कि हमेशा प्रभावी और तार्किक  तरीके से अपने राजनीतिक विचार रखने वाली सुषमा स्वराज विदेश मंत्री के तौर पर जज्बाती बातों को भी गहनता से समझने के लिए जानी जायेंगीं |

भारतीय राजनीति में  महिलाओं  के प्रतिनिधित्व के जो हालात हैं, उनमें ऐसे चहरे कम ही  हैं जिन्हें  जन-जन में मन में स्थान  मिला हो ।  सुषमा स्वराज ऐसे ही चेहरों में से एक रहीं | वे  अपने गरिमामयी  व्यवहार  और कर्मशील व्यक्तित्व बल पर भारतीय राजनीति की लोकप्रियता के शिखर को छूने में कामयाब हो सकीं |  उनकी सहजता और विचारशीलता अपने आप  में एक मिसाल है । वे भारतीयता का सलोना चेहरा बनीं |  उनकी जनप्रियता  राजनीति  में महिलाओं की भागीदारी से जुड़े कई मिथक  तोड़ने वाली है । राजनीतिक दावपेचों और कूटनीतिक चालों के बावजूद भी उनके इस संवेदनशील व्यवहार और विचार को  आमजन  ही नहीं विरोधियों से भी समर्थन और सराहना मिली |  बतौर विदेश मंत्री उन्होंनें  वैश्विक स्तर पर भारत के लिए सकारात्मक और संवेदनशील राष्ट्र की  छवि पेश की  | सुषमा स्वराज जिस तरह अपना राजनीतिक और वैचारिक पक्ष सशक्त ढंग से सामने रखती  थीं, ठीक उसी तरह एक संवेदनशील हृदय वाली महिला  के तौर पर  भी लोगों से जुड़ी  रहीं | उनका यह सफर देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी है | 


03 August 2019

स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति

हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट  ‘हेल्दी स्टेट प्रोगेसिव इंडिया’ ने  देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति को सामने रखा है | ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ रिपोर्ट के इस दूसरे संस्करण में सामने आये बिगड़ती  चिकित्स्कीय सेवाओं के हालात वाकई चिंतनीय हैं | गौरतलब है कि इस अध्ययन के अंतर्गत नीति आयोग ने राज्यों की एक रैंकिंग जारी की है।  23 संकेतकों  को  आधार बनाकर राज्यों की सूची  तैयार की गई है | ये सभी संकेतक जीवन सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक हैं |  इनमें  नवजात  मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय लिंगानुपात, संचालन व्यवस्था-अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि  के  साथ ही   नर्सों और डॉक्टरों के खाली पद आदि शामिल हैं |  भारत में चिकित्सकीय सेवाओं की  दुःखद हकीकत बयान करने वाली इस रिपोर्ट  को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक और नीति आयोग ने मिलकर तैयार किया है।  रिपोर्ट को तीन हिस्सों बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बांटकर बनाया गया है | 21 प्रदेशों की  इस फेहरिस्त में देश के सबसे बड़े राज्य,  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर बताई गई है।  यू पी के बाद क्रमश: बिहार और  ओडिशा जैसे राज्यों को स्थान दिया गया है | दरअसल,  भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति हमेशा से ही चिंता का विषय रही है | जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्स्कीय सेवाओं की स्थिति नागरिकों को निराश ही करती  आई  है | 

अफ़सोस कि स्वास्थ्य सेवाओं की स्तरीय स्थिति के मामले में भारत विकसित देशों से तो पीछे है ही कई विकासशील देशों से भी बराबरी नहीं कर पा रहा है । हम स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर मानक पर हम दुनिया के देशों में निचले पायदान पर खड़े हैं । हमारे यहाँ चिकित्सा सुविधाओं जैसी अतिमहत्त्वपूर्ण सेवाओं के बरसों से वही हालात बने हुए हैं | विचारणीय है नीति आयोग ने दूसरी बार  स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर यह रैंकिंग जारी की है | पिछले साल भी  बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस सूची  में शामिल थे |  ऐसे में यह सवाल अहम् है कि बीमारियां हों या संक्रमण,  जो व्याधियां  बीते बरस लोगों की जान ले  रहीं थीं वही इस साल भी दस्तक दे रही हैं |  प्रश्न यह है कि आखिर क्यों गंभीर बीमारियां फैलने पर भी सही और सकारात्मक कदम उठाते हुए आगे के लिए कोई सबक नहीं लिया जाता । जबकि किसी भी देश के नागरिकों की सेहत वहां के जन-संसाधन के स्वास्थ्य की रक्षा, आर्थिक उन्नति  और स्तरीय जीवन जीने की मानवीय परिस्थितियों  की बानगी होती है |  ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों  को स्वास्थ्य के क्षेत्र को बुनियादी तौर पर मजबूत का प्रण करना चाहिए |  सरकार हो या समाज,  हमें यह समझना होगा कि आर्थिक विकास और सफलता से जुड़ी सभी महत्वाकांक्षी योजनाओं की कामयाबी के मायने भी तभी हैं जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार हो | आमजन की सेहत को बेहतर संभाल मिले । ( जनसत्ता में प्रकाशित लेख का अंश )
   

अन्तरिक्ष विज्ञान में सिरमौर


पाँच साल पहले मार्स ऑर्बिटर मिशन  'मॉम' की इस सफलता के बाद अख़बारों, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया तक,   सहज और साधारण सी दिखने-लगने वाली असाधारण प्रतिभा वाली  स्त्रियों की तस्वीरें दुनियाभर में छा गईं थीं |  ये सभी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की महिला वैज्ञानिक थीं, जो   भारत  के  प्रथम मंगल अभियान की टीम का अहम् हिस्सा रहीं |  भारत को अंतरिक्ष में मिली  मंगल मिशन की ऐतिहासिक सफलता में महिला वैज्ञानिकों की भूमिका को वैश्विक स्तर पर  रेखांकित किया था | गौरतलब है कि  मार्स आर्बिटर मिशन  की  कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने  वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए मार्स आर्बिटर मिशन को मातृत्व के संदर्भ में 'मॉम' कहा था |  इसरो के इस अंतरिक्ष  प्रोजेक्ट की यूनिट में कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को महिला वैज्ञानिकों ने बखूबी निभाया था | इस यूनिट में क़रीब डेढ़ सौ से दो सौ महिला वैज्ञानिकों ने कई मोर्चों  अहम् भागीदारी निभाई  थी | जिनमें 8  आठ महिलाओं की बड़ी भूमिका रही थी |  हाल ही सफलतापूर्वक लांच किये गए चंद्रयान -2 अभियान में भी  इसरो की दो महिला वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है | अपने देश के  सपनों को आकार देने वाले  चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में ऋतु करिधाल अभियान निदेशक और एम. वनिता  परियोजना निदेशक हैं | सुखद है कि भारत का अंतरिक्ष में फतेह पाने का  यह सिलसिला विज्ञान की दुनिया में देश की आधी आबादी की भूमिका भी पुख्ता कर रहा है |  

 ख़ास प्रतिभा की धनी आम सी महिलाएं  

विज्ञान के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी  बढ़ना सामजिक-पारिवारिक स्तर भी बड़ा बदलाव लाएगी | वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी जागरूकता  स्त्री जीवन से जुड़ी कई रूढ़ियों से भी मुक्ति दिला सकती है | आज ज़िंदगी के हर मोर्चे पर महिलाएं बराबरी से शामिल हैं | खेल का मैदान हो, राजनीति का अखाड़ा हो या फिर अंतरिक्ष से जुड़े अनुसन्धान की दुनिया |  हालांकि हमारे यहाँ कई कारणों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम रही है  | यही वजह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को कम करने और आधी आबादी का प्रतिनिधित्‍व बढ़ाने के लिए प्रशासनिक ही नहीं सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी सहयोगी वातावरण बनाना जरूरी है | ताकि बड़ी संख्या में युवा महिलाएं  विज्ञान की दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकें | सुखद है कि इस मोर्चे पर भी  धीरे-धीरे स्थिति बदल भी  रही है |  विज्ञान और अनुसन्धान की दुनिया में न  केवल महिलाओं की  हिस्सेदारी बढ़ रही है, बल्कि वे नेतृत्वकारी भूमिका में भी अपना अहम् योगदान दे रही हैं |  ( हाल ही में दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश )