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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

06 November 2018

ज़मीनी अनुभवों का दस्तावेज - मीडिया के दिग्गज


आज के समय में मीडिया यानी विवाद, विमर्श और निर्बाध आमजन तक पहुंचती सूचनाएं | लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ जिससे जनता को शिकायतें हैं अपर बदलाव की उम्मीदें भी इसी से जुड़ी  हैं |  मीडिया की इसी दुनिया से रूबरू करवाती है  हीरेन्द्र झा की किताब मीडिया के दिग्गज | लेकिन एक अलग अंदाज़ में | यह सफ़र उन चर्चित चेहरों की जुबानी किताब का हिस्सा बना है जो घर-घर में पहचान बना चुके हैं | दर्शकों और पाठकों के लिए किसी के बोलने का अंदाज़ दिलचस्प है तो किसी के लिए शब्द मन पर चस्पा हो जाते हैं | किसी की क्राइम रिपोर्टिंग बहुत प्रभावी होती है तो कोई मानवीय मुद्दों को भावनात्मक सामने रखने में बेहद सफल है | लेकिन इन चेहरों के मीडिया में अपनी पुख्ता जगह बनाने और जन सामान्य के दिल में बस जाने की यात्रा भी कम रोचक नहीं | मीडिया के दिग्गज ऐसे ही सोलह चर्चित चर्चित चेहरों के साक्षात्कार लिए है | पत्रकारिता के  विद्यार्थियों लेकर आम पाठक तक इस किताब के जरिये उन चेहरों के करीब जा पाते हैं जिन्हें वे नाम और चेहरे से पहचानते हैं | लेखक ने भूमिका में यह बात लिखी भी है कि मीडिया के इन दिग्गजों को जानने, उनकी यात्रा से  परिचित होने के साथ ही आप कुछ बुनियादी सवालों के जवाब भी जान सकेंगें | देश के जाने माने मीडियाकर्मियों के साक्षात्कार के इस संग्रह को पढ़ते हुए यह महसूस भी होता है | 

किताब में बहुत सहज और सरल भाषा में सवाल पूछे गए हैं |  हाँ, पूछे गए सभी सवाल जरूरी लगते हैं | इन जाने -माने चेहरों और इनके सफ़र को जानने-समझने की उत्सुकता लिए हैं | किताब में देश चर्चित मीडियाकर्मियों शम्स ताहिर खान- जुर्म अभी बाकि है जाइयेगा नहीं, वर्तिका नन्दा- रानियाँ सब जानती हैं, शशिशेखर- समय को तराशा है उन्होंनें, ओम थानवी- मेरे पास  अज्ञान का भण्डार है, खुरापाती नितिन- रेडियो मेरी इबादत है, मुकेश कुमार- नौकरी मैं चुटकियों में छोड़ता हूँ, डॉ. वेदप्रताप वैदिक-पत्रकारिता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं ठगी की स्वतंत्रता है, दारैन शाहिदी-दस्ताने दारैन, अजीत अंजुम- मेहनत, ईमानदारी, निष्ठा,वफ़ादारी और काम यही मेरी पहचान, ओ पी राठौर-उसकी योजना मेरी कल्पना से बेहतर है, राहुल देव-भाषा बचेगी तभी भारतीयता बचेगी , आलोक पुराणिक- व्यंग्य लेखन की वर्कशॉप हो, दीपक चौरसिया-काजल की कोठरी में मैं काला नहीं, अमीन सायानी- जीवन के हर क्षेत्र में बढ़ा है फूहड़पन, पुण्य प्रसून वाजपेयी- लिटिल मास्टर ऑफ़  जर्नलिज़्म और  पराग  छापेकर- ग्लैमर दिखता है पर इसके पीछे मेहनत है | ये सभी साक्षात्कार मीडिया की दुनिया में इन शख्सियतों के अपने सफ़र को तो बताते ही हैं, पाठक को भी टीवी, अखबार और रेडियो की की दुनिया कई अनजाने पक्षों से रूबरू करवाते हैं |  

इस क्षेत्र में काम करने की मुश्किलों और काम के दबाव को लेकर किये गए कई सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि  मीडिया की दुनिया में पहचान बनाना कितना मुश्किल काम है | किताब में शामिल सभी विस्तृत इंटरव्यूज़ में  मीडिया के मौजूदा हालातों की भी साफ़ झलक मिलती है | एक पुख्ता पहचान बना चुके इन दिग्गजों के संघर्ष को समझने का परिदृश्य इस क्षेत्र की कई और बातों को भी सामने ले आता है | लेखक के सवालों  ने  सभी  दिग्गजों की कामयाबी के पीछे के पूरे सफ़र को सामने लाने का काम बखूबी किया है | यही वजह है कि यह मीडिया  में आने वाले नवांकुरों के लिए यह किताब काफी उपयोगी है | लेखक हीरेन्द्र झा लिखते भी हैं  कि एक रिपोर्टर, एंकर, रेडियो जॉकी में क्या गुण होने चाहिए. आपकी भाषा कैसी हो, आपकी तैयारी कैसी हो ? इन बातों की जानकरी लेकर इस संसार में अपनी राह तलाशना  ज्यादा  बेहतर है | वाकई, इस संसार का हिस्सा बनने से पहले  विद्यार्थियों के अपने चहेते चेहरों की यात्रा का क्रम जनाना रोचक ही नहीं  कई पहलुओं पर चेताने वाला भी है |  उनकी मेहनत और समर्पण की उस बुनियाद से परिचय करवाने वाला है जिसके बूते इन दिग्गजों ने यह ख्याति हासिल की | 
मौजूदा समय में जब मीडिया से  आमजन का भरोसा भी कुछ डगमगा रहा है, कई सवाल इस दुनिया के भीतर झाँकने का सार्थक प्रयास हैं | असल स्थितियों पर रोशनी डालते हैं | दबाव और भागदौड़ से भरी इस दुनिया में इन चहेरों ने कैसे अपनी पहचान बनाई ? परिवार के लिए कैसे समय निकालते हैं ?  क्या ख़बरें गढ़ी जाती हैं ?   नए बच्चों को क्या मशवरा देंगें ?  आपकी जो शैली है, कैसी विकसित की आपने ? एक पत्रकार में क्या खूबी देखते हैं आप ? सफलता को कैसे देखते हैं ?आज कैसी पत्रकारिता हो रही है ? जैसे कितने ही सवाल  मीडिया के संसार को जानने समझने में मददगार हैं |  बात चाहे रेडियो जॉकी बनने की चुनौतियों की हो पत्रकारिता की दुनिया में भाषा और ख़बरों की समझ के  मायने समझने की | टीआरपी के खेल की बात हो या समाचारों को सनसनी बना देने की | किताब में लेखक के सवालों के जवाब में मीडिया के चर्चित चेहरों द्वारा दिए गए जवाब बहुत कुछ बताते- सिखाते और समझाते हैं | कई प्रश्नों के उत्तर  पढ़ने वाले के वैचारिक द्वंद्व को व्यावहारिक राह दिखाने वाले हैं |  सभी साक्षात्कार बेहतरीन हैं जो मीडिया जगत में इन दिग्गजों के ज़मीनी अनुभव  और संघर्ष से रूबरू करवाते हैं | 

23 October 2018

सहज अभिव्यक्ति लिए सतरंगी विमर्श


कवितायें जितनी सहजता से अपनी बात कहती हैं, उतनी ही सरलता से उन शब्दों के भाव मन में उतर जाते हैं | शिल्पा शर्मा  का काव्य संग्रह ' सतरंगी मन' ऐसी ही सहज अभिव्यक्ति लिए है | संकलन में  कई रचनाएं हमारे परिवेश की स्थितियों को लेकर सार्थक प्रश्न उठाती है तो कुछ कविताओं में उन्होंने उस द्वंद्व पर ही सवाल उठाया है, जो हमने समाज को स्त्री पुरुष खांचे में बांटकर खड़ा किया है |  शिल्पा,अपनी कविताओं में एक मानवीय भाव की बात करती हैं |  इसीलिए दोषारोपण की बात नहीं बल्कि सहजता से सच को शब्दों में  ढालती  हैं | रिश्तों नातों और मानवीय भावों से जुड़े जीवन के कई पहलुओं को उन्होंने इसी सादगी के साथ उकेरा है |  

मौजूदा समय में ऐसे पुरुषों की कमी नहीं है जो अपनी जीवनसंगिनी को बराबरी का दर्ज़ा दे रहे हैं | एक  सार्थक रचना 'काश' इन पुरुषों को ऐसा बनने की परवरिश देने वाली दादियों, माँओं और बहनों को समर्पित करते हुए वे लिखती हैं कि

काश मैं उन्हें बता पाती 
भले ही तुम्हे अवसर नहीं मिले 
पर जो अवसर हमने पाए हैं 
वो तुम्हारे समर्थन की देन है .... इसी कविता का एक अंश यह भी है जो पूरी पीढ़ी की उस भागीदारी को रेखांकित करता है, जिसके चलते आज कई  बदलाव सामने हैं - 

तुम्हारे सपनों को वो पंख नहीं मिले 
 जो मिलने चाहिए थे 
तुम्हारी प्रतिभा को वो रंग नहीं मिले 
जो मिलने चाहिए थे 
 तुम्हारे  व्यक्तित्व को वो संबल नहीं मिला 
जो खिलने के लिए निहायत ज़रूरी था -------- पर यह तुम्हारा मौन समर्थन ही था 
जिसने हमें संबल दिया 
काश मैं उन्हें बता पाती 
कि अब समय बदल रहा है 
लोग समझ रहे हैं 
हमारा पूरक पुरुष बदल रहा है | 
एक रचना के साथ परिचय की पंक्तियों में शिल्पा खुद लिखती हैं कि पुरुष के पुरुष और महिला के महिला होने में ही जीवन छुपा है |   छद्मवाद  से बचें तो पूरक बन जीना कितनी जाने खुशियाँ ले आएगा - 

काश... 
यूँ होता कि हम उठ पाते 
स्त्री-पुरुष शरीर से ऊपर 
 गूँथ पाते मन के तार
बुनते एक चादर इन तारों से 
और उस  चादर पर बैठ 
साझा होने का मर्म समझते |
संकलन की एक रचना 'स्व का अर्थ'  स्त्रीमन की उस जद्दोज़हद को विराम देने की बता कहती है जो अनगिनत जिम्मेदारियों के चलते कभी नहीं थमती :) 
नितांत अकेली हूँ 
पर उदास नहीं 
कामों की लम्बी सूची को 
तह कर के 
डाल दिया है 
अलमारी के 
सबसे ऊपरी खाने में 
और चुरा लिया है 
कुछ घंटों का समय  
केवल अपने लिए---- क्योंकि कभी-कभी 

जीवन का  थोड़ा  सा हिस्सा 
स्व के लिए जीना 
भी तो नितांत  ज़रूरी है | 

आज की भागमभाग जिंदगी में पल भर फुरसत नहीं किसी के पास | महानगरों की जिंदगी का यही हाल उनकी रचना  'मशीनी महानगर की कथा' में  समाहित है | 'क्या यही है परम्परा' शीर्षक की कविता त्योहारों पर होने वाले दिखावे और प्रदूषण  पर प्रश्न उठाती है | 'हिसाब', 'मेरा स्त्रीविमर्श', 'औरों के लिए' (जो कम शब्दों एक पेड़ की आत्मकथा सी रचना है ), 'उम्मीद' , 'ये कटु स्त्रियाँ', 'समानता के पैरोकार' और 'घाव' पठनीय बन पड़ी हैं | जीवन का कोई न  कोई अर्थपूर्ण  दृष्टिकोण हर कविता में परिलक्षित होता है |

आज  के समय में सोशल मीडिया में  प्रबुद्ध  दिखते  हुए जो आडम्बर रचा जा रहा है, उसे लेकर उनकी एक रचना  बहुत सामायिक भाव लिये है -

मैदान था युद्द का 
थी उँगलियों की सेना 
ईंट से ईंट बज रही थी 
और  ईंट का जवाब 
दिया जा रहा था 
पत्थरों से 
चाय की चुस्कियों  के बीच | 

क्योंकि मैदान छद्म था 
स्क्रीन और की बोर्ड वाला 
और सूरमा 
कई थे 
ताल ठोंकते 
अपने विचारों को 
बेहतर बताते 
उम्दा इंसान होने का 
पुरजोर दम भरते |  वाकई आभासी संसार का सच यह भी तो है | एक सवाल और जो इसी माध्यम से जुड़ा है और अहम् है- 

दो दिन 
सुर्ख़ियों में रहकर 
कहाँ गम हो जाते हैं 
ये प्रशासकों, मीडिया और 
आम जनता को 
गरमा देनेवाले  मुद्दे 
क्या इतने उथले हो गए हैं 
अब मानवता के 
ये विषय ?
या हम सभी 
पीड़ित हैं / शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस से ? 
या फिर टीआरपी के 
हिसाब से ये ऊपर नीचे
हो जाते हैं------- हमारे दिमागों में भी   ?  
सहजता से उठाये गए सार्थक प्रश्न और जीवन एवं रिश्तों-नातों का खींचा गया व्यावहारिक खाका हैं शिल्पा की कवितायें | जहाँ 'अब ये क्या हुए जाते हैं हम' भौतिकवादी दौड़ में ठहरकर सोचने को विवश करती रचना हैं वहीँ  ' हिसाब'  घर और दफ्तर की जिम्मेदारियों के बीच जूझती स्त्री के मनोभावों का लेखा जोखा है |  रचना 'दबाव' जीवन में संतुष्टि के मायने समझाने की बात करती है | अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत छोटी उम्र में ही माता-पिता को खो देने के चलते संघर्ष और सच्चाइयों से रूबरू हुईं शिल्पा की रचनाओं में उकेरी गईं संवेदनाएं पढ़ने वाले के मन तक पहुँचती है | शब्द उनका हौसला प्रतीत होते हैं | संकलन में कई कविताओं के साथ प्रकाशित अंजना भार्गव की  सुंदर मधुबनी पेंटिंग्स भी मनमोहक हैं | कुलमिलाकर यह संकलन पढ़ना एक सुखद अनुभव रहा |     हार्दिक बधाई और सतत सृजनशील रहने की शुभकामनाएं | 



14 October 2018

अस्मिता के योद्धाओं का सम्मान



मौजूदा समय में स्त्री अस्मिता की लड़ाई दुनिया के हर हिस्से का दुर्भाग्यपूर्ण सच बन गई है | अफ़सोस कि दुनिया के कई हिस्सों में तो यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है |   विशेषकर अशांत और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो बरसों से हालात बेहद चिंतनीय बने हुए हैं | आर्थिक, राजनीतिक स्वार्थ साधने की हिंसक गतिविधियाँ स्त्री जीवन के लिए दंश बन गई हैं |  ऐसे में  युद्धग्रस्त क्षेत्रों में यौन हिंसा के खिलाफ काम करने के लिए डॉ.  डेनिस मुकवेगे और यजीदी कार्यकर्ता नादिया मुराद को इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार  चुना जाना वाकई सराहनीय है |  इन दोनों शख्सियतों ने  यौन हिंसा के खिलाफ लंबी जंग लड़ी है | गौरतलब है कि आईएस के आंतक का शिकार हुई यजीदी दुष्कर्म पीड़िता, नादिया मुराद ने आंतकवादियों की यातना झेलने के बावजूद  संघर्ष किया और महिलाओं की अस्मिता के लिए डटी रहीं |  नादिया ने न सिर्फ खुद पर हुए जुर्म और यौन शोषण के बारे में खुलकर बात की बल्कि 'आवर पीपुल्स फाइट संगठन' की स्थापना कर यौन शोषण के खिलाफ मुहीम भी चलाई | संघर्ष की मिसाल बनी नादिया मुराद मलाला युसूफजई के बाद दूसरी सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता हैं | इसी तरह  डॉक्टर चमत्कार' के नाम से विख्यात डॉ. मुकवेगे  कांगो में लंबे समय से यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए काम करते आ रहे हैं। उन्होंने महिलाओं को  बलात्कार और यौन हिंसा के सदमे से बाहर निकालने के लिए दो दशकों तक काम किया है | वे युद्ध के दौरान महिलाओं के खिलाफ हिंसा के भी  मुखर विरोधी हैं | डॉ. मुकवेगे गंभीर यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के इलाज में  विशेषज्ञता हासिल की है। दुष्कर्म की शिकार बनी महिलाओं की पीड़ा को समझने की संवेदनशीलता लिए एक  प्रेरणादायी व्यक्तित्व बने,  डॉ. मुकवेगे ने अपने साथियों के साथ मिलकर अब तक 30 हजार से ज्यादा  दुष्कर्म पीड़िताओं का इलाज कर उनकी सहायता की है। यकीनन यह जीवट और संवेदनाओं से भरी सोच सरहानीय है |  

दरअसल, यौन हिंसा के वैश्विक अभिशाप से मुक्ति पाने की जंग में  योद्धा साबित होने के लिए दोनों को समानित किया जाना, स्त्री जीवन की इस दर्दनाक  विडंबना की और दुनिया का ध्यान खीचना भी है |  मौजूदा समय में  दुनिया के किसी एक देश में नहीं बल्कि हर हिस्से में स्त्रियाँ इस अमानवीयता को झेलने को विवश हैं |हाल ही में  मीटू कैम्पेन  जैसे अभियान से यह बात पुख्ता हुई थी कि यह पीड़ादायी समस्या कितने बड़े पैमाने पर है |  गौरतलब है कि  संसार के हर हिस्से की महिलाओं को जोड़ने वाले मी टू अभियान में देश, धर्म, जाति और  समुदाय  से परे दुनियाभर की महिलाओं ने यौन शौषण को लेकर अपनी चुप्प तोड़ी  थी | विश्व के कोने कोने से न  केवल महिलाओं ने इस अभियान में हिस्‍सा लिया बल्कि इस दुर्व्यवहार  को  लेकर कई खुलासे भी किये थे | यह हैशटैग एक समय में  85 देशों में ट्रेंड कर रहा था | अमरीकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने इस कैम्पेन को शुरू  कर ट्वीटर पर लिखा था कि   ‘यदि आप यौन शोषण या हिंसा की शिकार रही हैं तो आप इस ट्वीट का जवाब ‘मी टू’ लिखकर दें।’  समस्या की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अगली सुबह तक उनके पास 53000 जवाब आ चुके थे।  इस हॉलीवुड अभिनेत्री  ने यौन शोषण के   खिलाफ जब यह मुहिम छेड़ी तो  दुनियाभर की महिलाओं ने इस अभियान में उनका साथ  दिया । महज तीन दिन के अंदर ही दुनियाभर में 1.2 करोड़ महिलाओं ने हैशटैग मी टू के नाम से आपबीती साझा की ।  जिसमें  घरेलू हिंसा  से लेकर कार्यस्थल पर शोषण  तक की घटनाएँ तक शामिल थीं । इस  संवेदनशील मुद्दे को आवाज़ देने वाला यह अभियान इतना सफल रहा कि साल 2017 के लिए 'टाइम पर्सन ऑफ द ईयर'  के तहत यौन शोषण और हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद कर 'मी टू' अभियान में हिस्सा लेने वालीं महिलाओं  'साइलेंस ब्रेकर्स'  को पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया है | समझना मुश्किल नहीं यौन हिंसा  के इतने मामले जब सभ्य और विकसित समाज में होते हैं तो संकटग्रस्त इलाकों की स्थितियां कैसी होंगीं ? 

निःसंदेह, महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुँचाने वाली यह मानसिकता पूरी दुनिया में आधी आबादी के लिए  शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की बड़ी वजह है |  लेकिन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो हालात  सबसे  विकट हैं | यही वजह है कि डॉ.  डेनिस मुकवेगे और   नादिया मुराद के नामों की घोषणा करते हुए नोबेल समिति  के  अध्यक्ष  ने कहा कि इन दोनों को यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए चुना गया है। दोनों वैश्विक अभिशाप के खिलाफ संघर्ष का उदाहरण हैं। उन्होंने  कहा कि  ‘‘एक अति शांतिपूर्ण विश्व तभी बनाया जा सकता है जब युद्ध के दौरान महिलाओं, उनके मूलभूत अधिकारों और उनकी सुरक्षा को मान्यता और सुरक्षा दी जाए |’ यकीनन मुकवेगे और मुराद दोनों एक वैश्विक संकट के खिलाफ संघर्ष का प्रतिनिधित्व करने आए हैं जो कि किसी भी संघर्ष से परे है, जिसे बढ़ते हुए  मी टू  अभियान ने भी दिखाया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह समस्या हर स्तर मौजूद है | स्त्रियों के आगे बढ़ने और सुरक्षित जीवन जीने की राह में बड़ी बाधा है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शोध के अनुसार दुनिया भर में हर तीन में से एक से ज्यादा महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है। ऐसे में  आतंक और युद्ध की त्रासदी झेल रहे देशों में  महिलायें हद दर्जे की बर्बरता को झेलने को विवश हैं | संयुक्त  राष्ट्र और उसके मानवाधिकार आयोग की ओर से इराक और सीरिया में आतंकवादी हिंसा पर जारी एक रिपोर्ट बताती है कि आतंकी हिंसा झेल रहे देशों में बच्चे एवं महिलाएं यौन  उत्पीड़नों और अमानवीय यातनाओं का भी शिकार हैं । ग्लोबल टेरर इंडेक्स के अनुसार आज दुनिया के एक तिहाई देश आतंकी हिंसा के शिकार हैं । आतंकी हिंसा का दंश किसी देश के पूरे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक ढांचे की नींव हिला देता है। जिसके चलते सामने आने वाले खामियाज़े महिलाओं के लिए सबसे अधिक पीड़ादायी होते हैं |  

दरअसल, संकटग्रस्त इलाकों  में  यौन हिंसा की घटनाएँ  बहुत  बर्बर हैं |  ऐसे क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों को गुलाम तक बनाकर रखा जाता है | मानव तस्करी की समस्या भी वहां  दंश बनी हुई है | कुछ समय पहले  यौन हिंसा  सम्बन्धी मामलों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि द्वारा दी जानकारी के मुताबिक़ ईराक और सीरिया में आतंकवादियों द्वारा अपहृत लड़कियों को गुलामों के बाजार में सिगरेट के  पैकेट की कीमत में बेच दिया जाता है | संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि (यूएनएफपीए) द्वारा जारी आकलन  'सीरिया की आवाजें' 2018 के अनुसार, यौन उत्पीड़न के भय, जो अक्सर अपहरण से जुड़े हुए हैं, महिलाओं और लड़कियों के लिए चिंता का विषय  है जो उनके मानसिक तनाव में भी योगदान देता है।  शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है | नोबल पुरस्कार पा रहीं  नादिया भी यह भय और पीड़ा   झेल चुकी हैं | संघर्ष और हौसले की मिसाल बनी नादिया मुराद  करीब तीन साल तक आतंकवादियों  की दरिंदगी, सामूहिक दुष्कर्म  और यातानाओं की शिकार हुई हैं | मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाते हुए  कह चुकी हैं  कि महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए बाकायदा दास बाजार लगते हैं | ऐसे में यह वाकई प्रेरणादायी  है कि नादिया ने  यौन दासी बनाये जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना और  शोषण को अपनी नियति नहीं माना बल्कि संघर्ष की हिम्मत जुटाई |  इतना ही नहीं आइएस के चंगुल से आज़ाद होने के बाद उन्होंने दूसरी महिलाओं और लड़कियों की मदद करने की ठानी | दूसरी और ऐसी पीड़ा भोगने वाली महिलाओं के सहायता के लिए डॉ. मुकवेगे आगे आये |  ऐसे में अंतराष्ट्रीय स्तर दिया जाने वाला शांति का यह नोबल पुरस्कार ऐसी आवाजों को  मुखर और दृढ़ बनाएगा  जो दुनियाभर में यौन हिंसा की अमानवीयता के खिलाफ उठ रही हैं |  

01 June 2018

सच को संवेदनशीलता से उकेरती कहानियाँ


आज की भागमभाग भरी ज़िन्दगी में जो कुछ छीज रहा है, उसे संवेदनशीलता के साथ उकेरती हैं इस संग्रह की कहानियाँ | डॉ. फ़तेह सिंह भाटी ने किताब की भूमिका में कहा भी है  कि "जीवन एक कला है। सुख, एक दूसरे के प्रति अपनापन, प्रेम, समर्पण, त्याग और समझ से अनुभूत कर सकते हैं, साधनों से नहीं। इंसान सुख के साधन बढ़ाता जाता है और इस हद तक कि उसके जीवन का लक्ष्य ही पैसा हो जाता है। सारी ऊर्जा इसमें लगाकर अंततः वह स्वयं को छला महसूस करता है।" संग्रह को पढ़ते हुए पाठक को यही बात या यूँ कहें  कि यही सबक, उनकी कहानियों में भी मिलता  है | मर्मस्पर्शी भाषा में आंचलिक शब्दों का प्रभावी इस्तेमाल कर रची गई इस संग्रह की कहानियाँ मन जीवन से जुड़े  कितने ही सच सामने लाती हैं | यूँ भी सामाजिक जीवन के सच को उकेरते हुए शब्द जब कहानियों में ढलते हैं, तो वो कहानियां कहीं गहरे उतरती हैं । 'पसरती ठण्ड'  संग्रह में भी  परिवेश और पात्रों के विचार-व्यवहार का चित्रण आश्वस्त करता है कि हर कहानी आम जीवन से जुड़ी है । जिससे पाठकों का जुड़ाव भी सहजता से होता है | 

पारिवारिक  संबंधों  की  बिगड़ती  रूपरेखा पर की गई बात कहानियों में मौजूदा दौर की उस  विडंबना  को रेखांकित करती हैं जहाँ रिश्तों में स्वार्थ का बोलबाला है | ये कहानियाँ बहुत सहजता से बताती-समझाती हैं कि परिवेशगत जटिलताओं और सामाजिक ताने-बाने में उपस्थित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं में  कितना कुछ समाया होता है ।  मित्रता, स्त्रीत्व और इंसानी जीवन से जुड़े  कई मानवीय भाव कहानियों का हिस्सा बने हैं | जो लगते तो आम हैं पर इन्हें खास अंदाज़ में कहते हुए डॉ. भाटी ने इन कहानियों में  मरूभूमि की पृष्ठभूमि लेते हुए पात्रों को जीवंत बना दिया है | 'झलक-1 और झलक-2 ' में यही सामजिक विडंबना उकेरी गई है |  यहाँ आभासी संसार का ज़िक्र भी आया है | जिसने हालिया बरसों में रिश्तों में दिखावा संस्कृति की सोच को विस्तार दिया है | व्यावहारिक सोच के नाम पर किस कदर असंवेदनशीलता हमारे व्यवहार में पैठ बना चुकी है, दो भागों में लिखी इस  कहानी का  अंत इसी बात को कहता है कि "भावनाशून्य हृदय के लिए पिता हो या पति या फिर बच्चे सब अवसर हैं अपनी खुशियों के लिए अवसर |" 

स्त्री जीवन के मर्म को को रेखांकित करती  "पतित" और "उमादे" कहानियों में भले ही वर्तमान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अंतर हो, नारीमन की पीड़ा एक सी लगती है | दोनों का मर्म यही है कि स्त्री को हिम्मत से  खड़े होकर अपने आत्मसमान के लिए लड़ना होता है | अपनी गरिमा सहेजनी होती है | कहानियों को जिस तरह शब्दों में बाँधा गया है, वह वाकई  सराहनीय  है । विशेषकर तब जब ये कहानियाँ सवाल भी लिए हैं और समस्याएं की सामने रखती हैं |   "दो पेड़",  "शापित धोरा"  और " पलायन"  स्थानीयता और आंचलिकता की सुगंध से सराबोर हैं | साथ ही लोक जीवन में मौजूद रूढ़िवादी विचारधारा और सामाजिक जकड़नों  की भी बात करती हैं |   "ठूँठ" और  "मुक्त प्रेम" जैसी कहानियां  पाठक के मन-मस्तिष्क को मनन-चिंतन  की राह सुझाती हैं | आज़ादी के नाम पर स्वछंदता के परिणामस्वरूप उपजीं कई सामाजिक विद्रूपताएं पाठक को सचेत करती हैं | पढ़ने वाले के मन को परिष्कृत करती हैं |  कहानियों  के संदर्भ मौजूदा समय में  सामाजिक  और  व्यक्तिगत जीवन के विरोधाभासों को सामने रखते  हैं  | दुखद है कि यही वह कटु सच है जिसने हमारी  पूरी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को ही नहीं हमारे मनोविज्ञान को प्रभावित किया है | नतीजतन, मन-जीवन में असंवेदनशीलता अब परायों के लिए ही नहीं अपने  करीबी रिश्तों एक लिए भी जगह बना रही है  | 

कहानी संग्रह में लेखक की भाषा जिस संवेदनशीलता का बहाव उत्पन्न करती है, वह भी पढ़ने वाले को पात्रों के और करीब ले जाता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब मानवीय भावशून्यता और संवेदनहीनता से  हमारी  झोलियाँ भरी हैं, ये  कहानियाँ सोचने को विवश करती हैं कि हमारे  परिवेश की दिशा क्या है ? आखिर कौन से  शिखर पर जाने की होड़ है, जिसमें हम खुद ही पीछे छूट रहे हैं | यकीनन ‘पसरती ठण्ड’ संग्रह की कहानियाँ हमारे आज के समाज का आइना हैं |  संबंधों की दिशाहीनता का बोध करवाती हैं | जो अंततः बिखराव ही लाएगा | सुखद है कि सहज और सरल भाषा में गुंथी ये कहानियाँ हमें सचेत करती हैं | उस बिखराव के खामियाजे सामने रखती हैं जिसे हम स्वयं आमंत्रित कर रहे हैं |  समग्र रूप  से देखें तो  डॉ. फ़तेह सिंह भाटी  के इस पहले कहानी संग्रह के पन्नों से गुजरते हुए पाठक का  कई विचारणीय प्रश्नों से साक्षात्कार होता है | वह अपने परिवेश  आ रही विसंगतियों को लेकर सोचने लगता है कि बदलाव के नाम पर वो सब क्यों नहीं बदला जिसे असल में परिवर्तन की दरकार थी | इन्हीं बदलावों को लेकर लेखक द्वारा ज़ाहिर की गयी  चिंता भी कहानियों में साफ़ दिखती है |  
  

22 April 2018

किरदारों ज़रिए एक शहर से मिलना




हर शहर का अलग रंग-अलग ढंग होता है | वहां के बाशिंदों का जीने का तरीका हो या बतियाने का अंदाज़ उस शहर की पहचान बन जाता है | इस मामले मामले में मुंबई  ( जिसे कभी बॉम्बे कहा जाता  था ) की देश ही नहीं दुनियाभर में खास पहचान है |  मायानगरी की भागमभाग हो या एक दूजे से जुड़कर भी कोई जुड़ाव ना रखने वाले यहाँ के लोग | यहाँ की हवा में एक अलग ही अंदाज़ की गंध  है | पत्रकार और लेखिका जयंती रंगनाथन ने अपनी किताब ‘बॉम्बे मेरी जान में’ मुंबई के इसी अंदाज़ को बखूबी शब्दों में उकेरा है  । संस्मरण  रूपी  इस  किताब में जिन असल किरदारों की कहानियाँ हैं वे इस शहर की असलियत को भी पाठकों के समक्ष जीवंत कर देती हैं  | लेखिका को घर और दफ्तर की भागदौड़ के बीच इस शहर के जो रंग दिखे,  उन्हें जीते हुए संवेदनशील मन से वे हर पहलू को सोचती रही हैं | तभी तो ये किरदार इस नगर के ही नहीं उनकी जिंदगी से जुड़े भी लगते हैं | पढ़ते हुए लगता है मानो यह शहर ही उनके मन में रच-बस गया है | जहाँ सड़क, बस, ऑटो या  लोकल ट्रेन में में दिखने वाले चेहरों के पीछे का सच जानने-समझने को उनका अपना मन भी उद्वेलित रहा | जयंती जी ने भूमिका का शीर्षक ही 'एक शहर बन गयी मैं.....'  दिया है |   उन्होंने लिखा भी है कि ' एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैं, तो रात-दिन की भाग-दौड़, आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुम्बई की लोकल ट्रेन में आपको नये किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियाँ हर वक़्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुम्बई को अगर जानना है, तो ख़ुद एक कहानी बनना होगा।' जो कि यकीनन एक सहज सा सच  है |  
दरअसल, यह किताब कुछ खास किरदारों के माध्यम से हमें मुंबई की ख़ासियतों का परिचय देती है |  असल में देखें तो दौर कोई भी हो, हर इस शहर का हर बाशिंदा जिसे मुम्बईकर कहा जाता है, यहाँ से एक ख़ास रिश्ता जोड़ता है | दुनियाभर की आपाधापी के बीच भी यहाँ जीने वालों के दिलो-दिमाग पर तारी रहते हैं यहाँ के रंग | जयंती रंगनाथन के शब्दों को पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही लगता है | अजनबी  होकर भी जो अपनापन इस शहर में दिखता है वो शायद ही कहीं और हो |  'बॉम्बे मेरी जान'  किताब में तीन किरदारों के बारे में तीन अध्याय हैं | जो इन खास चरित्रों की ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें यह शहर भी साथ चलता है  | यह  किताब लेखाजोखा है कि    कैसे लेखिका इन तीनों से  मिलीं ?   कैसे उनके साथ उस  दुनिया की  झलक देखी,  जो मुंबई नगरिया  की जीवनशैली का पागलपन भी लिए है और पीड़ा भी |  हाँ, इन किस्सों को पढ़ते हुए बहुत सहजता के साथ मुंबई शहर रंग भी  पाठकों को  दिखते रहते हैं |   'वो छोकरा', 'वो थी एक शबनम' और 'उस दुनिया की ज्योति' | ये तीनों संस्मरण के तौर पर कही गई कहानियाँ व्यक्तित्व और विचार वो सारे अंदाज़ लिए हैं, जो बॉम्बे की बेपरवाही और हरदम व्यस्त और भागते चेहरों के पीछे के ठहराव और पीड़ा को बताते हैं  |  'वो छोकरा' लोकल ट्रेन में गाने-बजाने  वाले एक लड़के की कहानी है जो हर तरह के शोषण को झेलने को अभिशप्त रहा | कहानी बताती है कि  कैसे  एक किशोर में यहाँ जीने के लिए जूझते हुए कई अवगुण आ गए | पर हीरा नाम का यह किशोर पर मन से बच्चा ही रहा  | स्वयं लेखिका ने भी उसके मन-जीवन के संघर्ष  की  पीड़ा को  समझते  हुये उसे कई बार समझाइश भी दी है | हीरा की कहानी पढ़ते हुए मुंबई की लोकल ट्रेन में गा-बजा कर या छोटा-मोटा सामान बेचकर गुजरा करने वाले  ग़रीब बच्चों की दयनीय स्थिति की हकीकत से सामना होता है | हीरा बचपन में अपने घर से भाग कर मुंबई आ गया है। दादर स्टेशन पर कूड़ा-कचरा बीनने का काम करता है। लेकिन हालात के मारे दूसरे बच्चों की तरह   ही मासूम मन वाला हीरा भी   शोषण, अपराध, बुरी लत और नकारात्मक व्यवहार के चक्रव्यूह में  फंस जाता है  | उसे इन  हालातों में फँसा देख लेखिका के संवेदनशील मन ने भी कई बार व्यावहारिक सी प्रतिक्रिया दी है | जो इस जुड़ाव को पुख्ता करती है कि वे इस शहर और इसके मिजाज़ को अच्छे से समझ चुकी थीं |

‘वो थी एक शबनम’ में  अपने गुरूर में रहने वाली बार डांसर शबनम  की कहानी भी कई रंग लिए है |  यह किस्सा कहीं  व्यावहारिक  धरातल पर इस पेशे से जुड़ी  बद्तमीज़ी और बड़बोलापन सामने रखता है तो कहीं अपने ही जीवन से जुड़े चिंता के मानवीय रंग भी | यही वजह है कि बारबाला शबनम से मुलाक़ात का यह शाब्दिक चित्रण दिलचस्प भी  है और मर्मस्पर्शी भी | किताब में  अस्सी के दशक  के जिस दौर  के बॉम्बे का जिक्र किया गया है, उस समय बार बालाओं के प्रति अच्छी खासी दीवानगी थी | 'वो थी एक शबनम' किस्से में मुंबई के बियर बार का जीवंत वर्णन है।  अमजद और शबनम  के प्रेम प्रसंग के बैकग्राउंड में इन बार बालाओं की हसरतों  के साथ  बुनियादी   ज़रूरतें  जुटाने की जद्दोज़हद का ज़िक्र भी है  | लेखिका के लिए भी अक्खड़पन और मुंहफट अंदाज वाली शबनम से मिलना और बार डांसरों के बारे में  जानना हैरानी भरे अनुभव लिए था | ज़िन्दगी के प्रति बहुत सहज सी प्रतिक्रिया रखने वाली शबनाम दुबई जाकर पैसा कमाना चाहती थी | ताकि आगे किसी की मोहताज ना रहे |  वो अमजद से पीछा छुड़ा रही थी क्योंकि रिश्तों पर भरोसा करने का रिवाज  शायद उसकी दुनिया का हिस्सा ही नहीं था |  ऐसे ही कई मोड़ शबनम की कहानी  को भी दिल छूने वाला किस्सा बना देते हैं | जिसे लेखिका ने बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा है | 

जयंती लिखती हैं -‘धीरे से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अन्दर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है, आपको पता ही नहीं चलता | किताबे के एक किरदार का भी बॉम्बे से यूँ ही मिलना हुआ |  उस दुनिया की ज्योति’ जो हिजड़ों की दुनिया से है, किताब के तीसरे संस्मरण के केंद्र में है   | ज्योति जो बचपन में  सुरेश नाम का लड़का थी  | जन्म से सुरेश के ज्योति बनने का यह किस्सा संवेदनाओं को झकझोरता है और कई संवेदनशील सवाल भी उठाता हैं | ज्योति का किन्नरों की बस्ती में रहते हुए भी अपने माता-पिता को याद करना पाठक को  भी भावुक  कर जाता है | ज्योति की दुनिया का दुखद सच और समस्याएं जानने  के बाद हम सोचने को विवश भी होते  हैं कि आखिर क्यों  समाज के इतने बड़े तबके के हिस्से इंसानी हक़ भी नहीं आये | जयंती एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के सिलसिले में ज्योति से  मिलती हैं । कई मुलाकातों में वे हिजड़ों के रहन-सहन, शादी ब्याह, गुरु-चेली के रिश्तों और किन्नर समाज के जीवनयापन से  जुड़ी  दूसरी कई दुश्वारियों से रूबरू होती हैं |  ऐसी अधिकतर बातें आमजन भी नहीं जानते | इन बातों और किस्सों को लेखिका ने बहुत सहज अंदाज़ में संजोया है | यही वजह है कि जीवन के कटु सच दुश्वारियों  को सामने रखते ये किरदार उनके मन के करीब  प्रतीत होते हैं |  मन से जुड़ीं ये कहानियां पढ़ने वालों के मन पर भी दस्तक देती हैं |  जो ज़िंदगी की जद्दोज़हद समझा जाती हैं | जयंती कहती भी हैं कि मुंबई एक शहर भर  नहीं है  |  ज़िंदगी जीने और अपने आप को समझने का गेटवे भी है |