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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

24 August 2020

14 June 2020

जा चुके सुशांत से पीड़ा में डूबे मन के कुछ सवाल

तुम आज इस दुनिया में नहीं हो सुशांत- मन दुखी है | पीड़ा में डूबा है | पर सच कहूं तो इस पीड़ा के पीछे तुम्हारी परिस्थतियाँ, तुम्हारे मन की टूटन और अकेलापन नहीं बल्कि सवालों की एक बड़ी फेहरिस्त है सुशांत | वो इसलिए कि इस दौर में बेघर, बेरोजगार, अपनों से दूर फंसे लोग भी जीवन से जूझ रहे हैं | आने वाले कल की सुबह अपने साथ क्या लाये कुछ पता नहीं, ऐसी परिस्थतियों में भी जीवन का मान कर रहे हैं | जिजीविषा से जिंदगी को साध रहे हैं | यकीनन तुम्हारी पीड़ा और हालात सड़क पर नंगे पाँव चल रहे लोगों से बढ़कर नहीं हो सकते | इसीलिए तुम्हारे लिए सिर्फ सवाल ही हैं मन में ---- हाँ दिल दुखी जरूर है --- मैं तुम्हारे अपनों के लिए दुखी हूँ.... तुम जो उदाहरण छोड़ गए कमजोर पड़ने का उसके लिए परेशान हूँ | सब कुछ हासिल कर लेने के बाद मन में जो रीतपान तुम जैसे युवा पाल लेते हैं ना, उसके लिए दुखी हूँ मैं |
मुंबई जैसा महानगर एक समंदर सा है सुशांत | यहाँ हर दिन हजारों युवा सपने पूरे करने आते हैं | सपनों के इस संघर्ष की लहरों में तैरते कम और डूबते ज्यादा हैं | पर हर कोई जिंदगी से तो नहीं हारता | फिर इस शहर में तुम्हारे तो सारे सपने पूरे हुए | वो भी किसी समझौते के साथ नहीं बल्कि सम्मानजनक काम करके | स्नेह, सम्मान,पैसा सब कुछ तुम्हारी झोली में आया --- फिर यह क्यों सुशांत ?? इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनकी जिंदगी ही संघर्ष में गुजर जाती है सुशांत | जीवन के सबसे प्यारे और ऊर्जामयी मोड़ पर तो तुमने लगभग सब कुछ पा लिया था | फिर यूँ जिंदगी का हाथ छोड़कर तुम उन युवाओं के लिए कैसा उदाहरण छोड़ गए हो सुशांत- जो आज संघर्षशील हैं | जो नहीं जानते कि उन्हें इस मेहनत का कोई फल मिलेगा भी या नहीं ? तुम्हारा कदम निराश करता है क्योंकि तुम हारने का एक उदाहरण छोड़ गए हो सुशांत - आखिर क्यों ??
तुम चकाचौंध भरी दुनिया में पैदा नहीं हुये थे सुशांत | सब कुछ मेहनत पाया | आम परिवार के बच्चे थे तो उलझनें और कमी-बेशी भी देखी ही होगी | दुःख-पीड़ा और मन की टूटन से पहले भी वास्ता तो पड़ा ही होगा | तो जानते-समझते ही होगे कि आम घरों के बच्चे तो उम्मीदों के सहारे ही जीते-जूझते हैं | हर हाल में जिन्दगी का हाथ थामे रहते हैं | छोटे शहरों -कस्बों के बच्चों के लिए तो तुम एक प्रेरणा के समान थे | जब कुछ नहीं था तब डटे रहे तो अब सब कुछ पाकर तुम्हारी उम्मीद क्यों टूटी सुशांत ? बैक डांसर से लेकर टीवी सीरियल और फिर सिनेमाई परदे तक का सफ़र आसान तो नहीं रहा होगा ? कितना जूझकर यह सब हासिल किया होगा ? एक छोटे शहर से लेकर मायानगरी तक के सफर में कितने उतार-चढाव देखें होंगें ? कितने अंधेरे तुम्हारे हिस्से आये होंगें समझना मुश्किल नहीं हैं | सुशांत , तुमने तो अपनों से लड़कर भी अपने सपने साकार करने की ठानी और सफल भी हुए | जब रास्तों की मुश्किलों से नहीं हारे तो हर तरह से सफल कही जा सकने वाली जिन्दगी तक पहुंचकर कैसे उसका हाथ छोड़ दिया ??
तुम्हारी एक हालिया फिल्म तो बाकायदा आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बजाय जीवन का सामना करने की सीख देने वाली थी | संवाद और साथ जरूरी है, यही समझाने वाली थी | तुम अवसाद या उलझन में तो कम से कम फिल्म की कहानी को याद करते हुए अपने बड़ों की ओर लौटते | यकीन मानो तुम निराश नहीं होते | घर के अपने बच्चों को निराश करते ही नहीं कभी | तकलीफों के दौर में बिलकुल भी नहीं | पिता के सामने रोते | बहनों के सामने मन खोलते | अब तुम्हारे जाने के बाद उनका यह जानना कि तुम अवसाद के शिकार थे | दवाइयां खा रहे थे | कितना तोड़ेगा उन्हें ? तुम अपनों तक को मन की क्यों नहीं कह पाए सुशांत ? ?सबसे बड़ा सवाल तुम इतने स्वार्थ कैसे हो गए कि अपनों को यह असहनीय पीड़ा देकर चल दिए | जिस माँ के तुम बहुत करीब रहे, उनके सालों पहले दुनिया से चले जाने की पीड़ा झेलकर भी संभल गये थे तो अब यह कौनसा भय और दुःख तुम्हे बिखेर गया सुशांत ? माँ को तुम हर दिन याद करते रहे, तो यह भी सोचते कि अब तुम्हारे ना होने की इस पीड़ा के पहाड़ तले बहनों और पापा की जिन्दगी कैसे कटेगी ?? यकीन मानो प्रश्न और भी बहुत हैं | लम्बी सूची है सवालों की मन में पर नम आँखों से लिखा न जा रहा |शायद तुम किसी चीज़ या हालात से नाख़ुश थे सुशांत -- पर यह कदम उठाकर अनगिनत अपनों-परायों को निराश कर गए हो - जहां हो वहां सुकून पाओ यही दुआ है |
 

19 March 2020

पीड़ा हो या सुख- हम सनसनी बनाने को अभिशप्त और अभ्यस्त हो चले हैं...


 इन दिनों जिस चीज़ से सबसे ज्यादा कोफ़्त हुई, वो है हद से ज्यादा सूचनाएं और बेवजह के बेहूदा मजाक | ना विषय की गंभीरता को समझा जाता है और ना ही सूचनाओं का सच जानने की जरूरत समझी जाती है | बस, सनसनी बनाना है हर विषय को | चुटकुले बनाकर मायने ही ख़त्म कर देने हैं किसी भी मामले के | बेवजह के विचार और अर्थहीन बातें बो देनी हैं कि नई कोपलें कुछ अलग ही रंग में फूटें | पुरानी समस्या तो जड़ें जमाये रहे ही नई विप्पत्ति और खड़ी हो जाय | कमाल यह कि यह सब बिना रुके-बिना थके जारी है | ऐसे शोर की तरह जो गूँजता तो नहीं पर सोच और समझ गुम करने को काफी है |


अब हर मुसीबत एक मौका है ----अपना प्रोडक्ट बेचने का--अपना ज्ञान बघारने का--ख़ुद को ख़ास दिखाने का--हंसी-ठिठोली करने का | सजगता और सतर्कता को दिया जाने वाला समय ऐसे-ऐसे मोर्चों पर खर्च होता है कि आपदा के लड़ना और मुश्किल हो जाए | हर वो खुरापात की जाए जो ख़ौफ़ को और बढ़ा दे | दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल से इसी सनसनी की बदौलत एक दुखद खबर सामने आ गई है | कोरोना वायरस से संक्रमित एक मरीज ने आत्महत्या कर ली है | सातवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान देने वाला यह व्यक्ति सिडनी से वापस अपने देश लौटा था | कोई हैरानी नहीं हमने इस वैश्विक विपदा को भी मजाक और सूचनाएं ठेलने का मौका बना लिया है | नतीजा, भरोसे से भरे परिवेश की जगह भय का माहौल बन रहा है |

संयम और ठहराव हमारी परवरिश का हिस्सा रहा है | हमारे यहाँ आज भी ज़िंदगी इतनी आसान नहीं कि बिना समझ और धैर्य के कट सके | लेकिन न्यूज चैनल्स हों या सोशल मीडिया - कहीं कोई ठहराव नहीं दिखता | आपदा से लड़ने का नहीं बल्कि कहीं दिखने और कहीं बिकने का भाव ज्यादा दिख रहा है | जीवन पर बन आये तब भी हम एक अलग ही उन्माद में डूबे रहते हैं | ख़ुशी का मौका हो या कोई आपदा | हम तो आदी हो गए हैं इसे सनसनी बनाने के | प्लीज़ इससे बचिए --- थोड़ा ठहरिये |

24 January 2020

बेटियों एक प्रति संवेदनशील बने समाज

जिस समाज में लैंगिक असमानता और भ्रूणहत्या जैसी कुरीतियाँ आज भी मौजूद हैं, वहां संवेदनशील और सहयोगी सामाजिक व्यवस्था ही बालिकाओं के जीवन की दशा बदल सकती है | विचारणीय है कि बेटियों के लिए संवेदनशील और सम्मानजनक परिवेश बनाने का अहम् पहलू जन- जागरूकता से जुड़ा है | राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य समाज में बेटियों को समानता का अधिकार दिलाने की जागरूकता लाना ही है | इस खास दिवस का मकसद देश की बेटियों के लिए सहयोगी, सुविधापूर्ण  और सम्मानजनक वातावरण बनना है, जिसमें उनके व्यक्तित्व का सर्वांगींण विकास हो | बालिकाएं शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक, हर मोर्चे पर भेदभाव से परे संविधान द्वारा दिए गए उन अधिकारों को जी सकें, जो भारत की नागरिक होने के नाते उनके हिस्से आये हैं | सुखद है कि हालिया बरसों में आये बदलावों के चलते बेटियां आगे भी  बढ़ रही हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी गढ़ रही हैं  |  ऐसे में अगर सुरक्षा और समानता का माहौल  मिले तो बेटियों का आज ही नहीं संवरेगा बल्कि आने  वाले कल में वे सशक्त और चेतनासंपन्न नागरिक भी बन पाएगीं |  (  नईदुनिया में प्रकाशित लेख का अंश ) 


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15 January 2020

मानसिक स्वास्थ्य की चिंतनीय स्थितियां



हमारे यहाँ अवसाद और व्यग्रता यानी कि Depression और Anxiety आज सबसे आम मानसिक विकार हैं | दोनों ही बीमारियाँ बहुत तेज़ी से फ़ैल भी रही हैं | ताजा आँकड़े भी इस बात को पुख्ता करते हैं | पर बिगड़ती मनोदशा से जुड़ीं ऐसी स्थितियां सिर्फ आकंड़ों तक नहीं समेटी जा सकतीं | हर उम्र , हर तबके के लोगों के मन की बढ़ती बेचैनी बताती है कि सिमटते रिश्तों और सामाजिकता के इस दौर में इन व्याधियों का विस्तार पाना आसान हो गया है | 

10 January 2020

न्याय की आस को मिलेगा बल

  
सात साल पहले निर्भया के साथ राजधानी दिल्ली के मुनिरका में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने ना केवल देश को दहला दिया था बल्कि बर्बरता की भी ऐसी बानगी सामने रखी थी कि हर माता-पिता के मन में भय का स्याह  अँधेरा छा गया था | इस अमानवीय और क्रूर मामले ने बेटियों की असुरक्षा से जुड़ीं दर्दनाक  स्थितियां ही नहीं, महिलाओं के प्रति पलती कुत्सित सोच को भी सामने रखा था | निर्ममता की सारी सीमायें पार करने वाली सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना ने आमजन को भीतर तक झकझोर दिया था |  वैश्विक स्तर पर भी भारत को 'रेप केपिटल'  और सबसे असुरक्षित देश तक कहा गया | यही वजह थी कि लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे निर्भया के परिवार को ही नहीं पूरे देश को निर्भया के साथ बर्बरता करने वालों को  फांसी पर लटकाने के निर्णय का इंतजार था | गौरतलब है कि निर्भया के दोषियों को फ़ास्ट ट्रैक अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही फाँसी की सजा सुना चुके हैं |  बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी ।  उच्चत्तम न्यायालय  के आदेश के बाद दोषियों को दी गई फांसी की सजा कायम रही । अब साल 2012 में  हुए निर्भया गैंगरेप के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों का डेथ वॉरंट जारी  किया  है | इन चारों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी  दी जायेगी |  निर्भया के माता-पिता ने पिछले महीने चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वारंट जारी करने के लिए दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका दायर की थी। पटियाला हाउस कोर्ट का यह  निर्णय आने के बाद  निर्भया की मां ने कहा है कि 'मेरी बेटी को न्याय मिल गया। अपराधियों को फांसी की सजा मिलने से देश की महिलाओं को ताकत मिलेगी। इस फैसले से लोगों का न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दोषियों को फांसी देने से अपराधी डरेंगे |' यकीनन महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर बिखरते भरोसे के इस दौर में  यह  फैसला एक उम्मीद जगाने वाला है |  डेली न्यूज- राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित लेख  का अंश ) 

31 October 2019

क्यों है दायित्वबोध की कमी

राजस्थान के बीकानेर से सामने आये एक मामले में डाक विभाग  के एक डाकिये ने  बीते एक साल से डाक नहीं बांटी थी  | डाकिये के घर में  10 बोरी एटीएम कार्ड,  पैन कार्ड, चेक बुक, शोक संदेश, सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र, आधार कार्ड, इंश्योरेंश के दस्तावेज़ और शादी के कार्ड मिले हैं  |  पोस्ट ऑफिस से डाक ले जाकर  वितरित करने के बजाय वह अपने घर पर बोरों में भर कर रखता जा रहा था |  काफी समय से उस क्षेत्र के  लोगों की शिकायत थी कि उन्हें डाक नहीं मिल पा रही है |  शिकायत जब उच्च स्तर तक पहुची तो जांच टीम भी  बोरों भरे में  सामान को देख कर  हैरान रह गई | 

दरअसल, यह वाकया अपने काम के प्रति जिम्मेदारी के भाव के अभाव को दर्शाता है  | अफ़सोस कि यह देश में एक अकेला मामला भी नहीं है | दफ्तर पहुँचने में लेटलतीफी करनी हो या दायित्व निर्वहन की राह में बच निकलने के रास्ते तलाशना, ऐसे लोग लगभग हर क्षेत्र में मिल जाते हैं |  सार्वजानिक सेवाओं  से जुड़े  कर्मचारी इस मोर्चे पर आम लोगों को सदा से ही निराश करते आये हैं | काम के प्रति टालमटोल की आदत हमारे वर्क कल्चर हिस्सा बन चुकी है | ऑफिस  में  जानबूझकर अपने  दायित्व निर्वहन में पीछे रह जाना तो बहुत से  कर्मचारियों  के लिए मानसिक संतुष्टि  देने वाली आदत है | उन्हें यह  सोचना भी जरूरी नहीं लगता कि उनकी ऐसी कार्यशैली कितने लोगों के जीवन को प्रभावित करती है | बीकानेर से सामने आये इस  मामले में भी पोस्टमैन की गैर-जवाबदेही की हरकत के कारण हजारों लोगों को  नुकसान हुआ होगा  |  नियुक्ति पत्र समय पर नहीं  मिलने से कई बेरोजगार युवा अपनी नौकरी से वंचित हो गए होंगें  | कितने ही लोग अपने नाते रिश्तेदारों के शोक और शादी समारोह में शामिल नहीं हो  पाए होंगें । कई तरह के जरूरी कागजात लोगों तक नहीं पहुंचे होंगें, जो उनके लिए बेहद उपयोगी थे |यह कटु सच है कि देश और समाज को बदलने की बड़ी-बड़ी बातों में अव्वल रहने वाले भारतीय  सबसे बड़ी चूक उस जिम्मेदारी को निभाने में करते हैं, जो बतौर नागरिक उनके हिस्से आती है |  ( NBT में प्रकाशित लेख का अंश  )