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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

14 April 2019

बेटे रुलाते नहीं यह सीख भी जरूरी


 NBT में प्रकाशित
 

लड़का होकर रोता है  ? या लड़के रोते नहीं। जैसी सीख हमारे परिवेश में आम है | परिवार, रिश्तेदार, दोस्त यहाँ तक कि अभिभावक भी, बेटों को यही सिखाते हैं कि लड़के रोते नहीं |  इतना ही नहीं फिल्मों और टीवी सीरियलों में यह वाक्य आम है |  ऐसे में जब घरेलू हिंसा के आंकड़े सामने आते हैं तो लगता है कि लड़के रुलाते नहीं यह भी तो  सिखाया जाना चाहिए | बेटों को अपने जज़्बातों पर काबू पाने का पाठ  पढ़ाना सही है पर औरों के जज़्बात समझने की संवेदनशीलता भी तो उनके सबक का हिस्सा बननी चाहिए | जाने-अनजाने  बेटों को ना रोने की सीख देते हुए यह भी सिखा दिया गया कि घर हो या बाहर किसी महिला का रोना कोई बड़ी बात नहीं | उन हालातों को समझने की दरकार ही नहीं जिसके चलते किसी बेटी, बहू, पत्नी या माँ की आँखें गीली हैं |  दरअसल, यह असंवेदनशीलता और अनदेखी ही लैंगिक भेदभाव और यौन हिंसा की जड़ है |   घरेलू हिंसा की सबसे बड़ी वजह यह भावनात्मक असहिष्णुता ही है |  मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि  घर हो या बाहर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे पुरुषों की परवरिश की अहम् भूमिका होती है | दरअसल, बुनियादी सोच में बदलाव आये बिना घर के भीतर सम्मानजनक और सुरक्षित व्यवहार स्त्रियों के हिस्से नहीं आ सकता है | यह मनुष्यता के मान का मामला है | स्त्री- पुरुष के भेद से परे हर इंसान के आत्मसम्मान का मोल समझने का विषय है | ऐसे में बेटों की परवरिश के मोर्चे पर सोचा जाना बेहद जरूरी है | माएं इस भूमिका में समाज को बदलने वाला रोल निभा सकती हैं |  ( लेख का अंश )




 

13 March 2019

बेटियों की जिंदगी सहेजने के लिए विदेशी दूल्हों पर सख्ती जरूरी

 जनसत्ता  में प्रकाशित 

दरअसल, पंजाब ही नहीं अन्य राज्यों से भी ऐसे हजारों अनिवासी भारतीय परिवार हैं, जो दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं | विशेषकर कनाडा,अमेरिका, ब्रिटेन और  ऑस्ट्रेलिया जैसे दशों में अनिवासी भारतीय बड़ी संख्या में बसे हुए हैं | इनमें से कई परिवार आज भी अपने बेटों की शादी करने के लिए दुल्हन तलाशने भारत आते हैं | ऐसे वैवाहिक रिश्तों  का सबसे दुखद पक्ष यह है कि जीवन भर के लिए जुड़ने वाले इस रिश्ते को लेकर  कई भावी दूल्हों और  उनके परिवार की मंशा शुरुआत से ही गलत होती है | नतीजतन ऐसे अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं जिनमें विदेशों में जा बसे लड़के भारतीय लड़कियों से शादी तो करते हैं लेकिन शादी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर अक्सर गंभीर नहीं होते। इस जुड़ाव को निभाने की नहीं बल्कि अपने फायदे के लिए भुनाने की सोच रखते हैं | शादी के सालों बाद तक दुल्हन यहाँ इतजार करती रहती है  लेकिन वे उनकी खोज-खबर तक नहीं लेते | ( लेख का अंश ) 

18 February 2019

भारत में भी मिले हिन्दी को मान

डेली न्यूज़ में प्रकाशित 

हाल ही में अबू धाबी  के न्यायिक विभाग ने कामगारों से जुड़े मामलों में अरबी और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी बयान, दावे और अपील दायर करने की शुरुआत की है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद  अरबी और अंग्रेजी के बाद अब हिंदी को भी वहां की अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। सुखद है कि देश के बाहर भी हिंदी भाषा अपना परचम लहरा रही है।  संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय लोगों की देश की कुल आबादी का 30 फीसदी है | वहां ऐसे कामगार भी संख्या हैं जो अंग्रेजी  भी नहीं समझ पाते |  यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया में हिंदी को भी आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है | अब हिंदी भाषी लोग भी समूची न्यायिक प्रक्रिया को सहजता से समझ पायेंगें |    

चिंतनीय यह भी है कि भारत में आज भी न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजी के दबदबे के चलते आमजन के लिए असहजता बनी हुई है | गांवों-कस्बों में बसे लोगों को अदालती प्रक्रिया से गुजरते हुए इस भाषाई दिक्कत का सामना करना पड़ता है | अफसोसनाक ही है कि जिस देश की राजभाषा हिंदी है, वहां किसी आम नागरिक के लिए यह समझना भी मुश्किल बना हुआ है कि अदालत में उसका पक्ष किस तरह रखा जा रहा है ?  हमारे देश एक बड़ी आबादी आज भी अंग्रेजी भाषा नहीं समझती-बोलती | ऐसे में  कानूनी प्रक्रिया से लेकर, सुनवाई और फैसले तक समझने में लोगों को दिक्कत आती है | यही वजह है कि यह भाषाई  बाध्यता केवल कानूनी ही नहीं संवेदनाओं और भावनाओं से जुड़ा मामला भी है |  (लेख का अंश )  

03 February 2019

स्त्रियों का हौसला बढ़ाती कदमताल




 सामना में प्रकाशित 
 इस वर्ष कई मायनों में विशेष रही गणतंत्र दिवस की परेड, महिलाओं की कदमताल के लिए भी खास रही |  नौसेना, भारतीय सेना सेवा कोर और सिग्नल्स कोर की एक यूनिट के दस्तों की अगुवाई इस वर्ष महिला अधिकारियों द्वारा की गई | इतना ही नहीं डेयरडेविल्स टीम के पुरुष साथियों के साथ सिगनल्स कोर की एक सदस्या ने बाइक पर हैरतअंगेज करतब दिखाते हुए सलामी दी, और पहली बार एक महिला अधिकारी  द्वारा भारत सेना सेवा कोर के दस्ते का नेतृत्व  किया गया |  सशस्त्र सेना में तीसरी पीढ़ी की एक अधिकारी  ने ट्रांसपोर्टेबल सैटेलाइट टर्मिंनल के दस्ते का नेतृत्व किया जो कहीं ना कहीं महिलाओं का मनोबल बढ़ाने और समानता का सन्देश देने वाला है |असम राइफल्स के महिला दस्ते का पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होना भी  इतिहास रचने जैसा रहा | असम राइफल्स की इस  सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व एक ऐसी अधिकारी ने किया जो एक  बेटी की माँ हैं | इस बार सेना की तीनों ही इकाइयों ने महिलाओं का खुले मन से स्वागत किया | नतीजतन इस साल महिलाओं की भागीदारी ने विस्तार ही पाया है |  यह कदम भी बदलाव और हर क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी की बानगी है | ऐसे में इस वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ,  शौर्य और शक्ति प्रदर्शन के साथ ही लैंगिक समानता लाने की  ओर उठते कई कदमों का भी साक्षी बना | यह देशवासियों का गौरव और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाली बात है |

 यह कटु है कि देश में संविधान ने तो महिलाओं और पुरुषों को समान नागरिक हक तो दिए हैं पर इन अधिकारों को जीने और अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने के लिए आधी आबादी को कई  मोर्चों पर भी संघर्ष  करना पड़ा है |  सुखद है  कि हमारे देश की महिलाओं ने  पूरे मनोयोग से हर स्तर पर यह लड़ाई लड़ी और गणतंत्र को सशक्त बनाने में अपनी प्रभावी भूमिका निभाई | तभी तो संघर्ष की लम्बी राह पर चलते हुए हासिल की गई कई गर्व करने वाली उपलब्धियां उनके हिस्से हैं | ऐसे में महिलाओं की इन उपलब्धियों और  शौर्य के शानदार प्रदर्शन लिए यह गणतंत्र दिवस स्त्री सशक्तीकरण का यादगार अवसर बन गया | जो कि आधी आबादी के लिए बेहतरी के भावी बदलावों की आशाएं हमारी झोली में डालने वाला है | लेख का अंश )

18 January 2019

आपदा में देवदूत सरीखे जवान



 दैनिक जागरण में प्रकाशित 
हाल ही में सिक्किम के नाथूला पास में भारी बर्फबारी के चलते  फंसे करीब तीन हजार पर्यटकों को  सेना के जवानों ने जी जान से प्रयास कर बचाया | अब एक  महिला ने जान बचाने के लिए  भारतीय सेना को थैंक्‍यू  कहने के लिए एक वीडियो  ट्विटर पर पोस्‍ट किया |  आंखों में आंसू लिए इस लड़की ने न सिर्फ अपनी बल्कि सभी 3,000 पर्यटकों की तरफ से सेना को  शुक्रिया कहा है।  गौरतलब है कि बर्फ़बारी एक चलते मुश्किल में फंसे टूरिस्‍ट्स  में महिलाएं, बच्‍चे और  बुजुर्ग भी शामिल थे | सिक्किम में यह अब तक का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन था। वीडियो में महिला ने कहा कि हम अक्‍सर पूछते हैं कि ' सेना क्‍या करती है, आज मैंने देख लिया कि वह हमारे लिए क्‍या करती है।' इन्हीं दिनों भारतीय सेना ने एकबार फिर अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सिक्किम की लाचुंग घाटी में  भी 150 लोगों को बचाने और उन्हें मेडिकल सुविधाएं देने का काम किया  |  सेना ने बेहद तकलीफदेह हालातों  का सामना करते हुए उनका जीवन सहेजा | सोशल मीडिया पर भी आमजन  सेना  के इस  जज्बे  की सराहना  कर रहे हैं |  बीते साल केरल में आई  बाढ़ की भीषण आपदा  में भी  जानें बचाने वाले सेना के जवानों को लोगों ने अनोखे अंदाज में  थैंक्स कहा था । भारतीय नौसेना के ट्विटर हैंडल से एक घर की छत पर अंग्रेजी में THANKS लिखी तस्वीर शेयर की गई थी। गौरतलब है कि बाढ़ की आपदा में  इसी घर से भारतीय नौसेना के कमांडर ने बड़ी बहादुरी से दो महिलाओं को बचाया था।  उसी घर की छत पर सफेद रंग से 'थैंक्स' पेंट किया देखा गया था  | बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में सेना, वायु सेना, नौसेना और अन्य बचाव एजेन्सियों ने राहत और बचाव इस अभियान में लोगों संकट से बाहर निकाला था |  

दरअसल, ऐसे सन्देश उस भरोसे की बानगी हैं, जो देश के हर हिस्से का नागरिक अपनी सेना के प्रति मन में सहेजे रखता है |  आपदा के समय लोगों को सुरक्षित रखने के लिए जी जान लगा देने वाले जवान इस विश्वास को और पुख्ता करते हैं | संकट की घड़ी में साथ होने का संबल देते हैं | इसीलिए  यह  'शुक्रिया' भारतीय सेना को उसकी जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए ही नहीं ही कहा गया एक शब्द भर नहीं है बल्कि हर भारतीय के भावनात्मक भावों से  परिपूर्ण संवाद के समान है | क्योंकि आपदा के समय सेना के जवानों की ऐसी तत्परता देखकर देश के आम नागरिक को हर बार यह भरोसा मिलता है कि हमारे जवान देश की सीमा पर ही नहीं संकट के समय भी हर मोर्चे पर डटे रहे हैं | ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए सेना के जवान हर खतरे से लड़ जाते हैं | खुद हर तकलीफ झेल जाते हैं | ( लेख का अंश )