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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

19 March 2020

पीड़ा हो या सुख- हम सनसनी बनाने को अभिशप्त और अभ्यस्त हो चले हैं...


 इन दिनों जिस चीज़ से सबसे ज्यादा कोफ़्त हुई, वो है हद से ज्यादा सूचनाएं और बेवजह के बेहूदा मजाक | ना विषय की गंभीरता को समझा जाता है और ना ही सूचनाओं का सच जानने की जरूरत समझी जाती है | बस, सनसनी बनाना है हर विषय को | चुटकुले बनाकर मायने ही ख़त्म कर देने हैं किसी भी मामले के | बेवजह के विचार और अर्थहीन बातें बो देनी हैं कि नई कोपलें कुछ अलग ही रंग में फूटें | पुरानी समस्या तो जड़ें जमाये रहे ही नई विप्पत्ति और खड़ी हो जाय | कमाल यह कि यह सब बिना रुके-बिना थके जारी है | ऐसे शोर की तरह जो गूँजता तो नहीं पर सोच और समझ गुम करने को काफी है |


अब हर मुसीबत एक मौका है ----अपना प्रोडक्ट बेचने का--अपना ज्ञान बघारने का--ख़ुद को ख़ास दिखाने का--हंसी-ठिठोली करने का | सजगता और सतर्कता को दिया जाने वाला समय ऐसे-ऐसे मोर्चों पर खर्च होता है कि आपदा के लड़ना और मुश्किल हो जाए | हर वो खुरापात की जाए जो ख़ौफ़ को और बढ़ा दे | दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल से इसी सनसनी की बदौलत एक दुखद खबर सामने आ गई है | कोरोना वायरस से संक्रमित एक मरीज ने आत्महत्या कर ली है | सातवीं मंजिल से कूदकर अपनी जान देने वाला यह व्यक्ति सिडनी से वापस अपने देश लौटा था | कोई हैरानी नहीं हमने इस वैश्विक विपदा को भी मजाक और सूचनाएं ठेलने का मौका बना लिया है | नतीजा, भरोसे से भरे परिवेश की जगह भय का माहौल बन रहा है |

संयम और ठहराव हमारी परवरिश का हिस्सा रहा है | हमारे यहाँ आज भी ज़िंदगी इतनी आसान नहीं कि बिना समझ और धैर्य के कट सके | लेकिन न्यूज चैनल्स हों या सोशल मीडिया - कहीं कोई ठहराव नहीं दिखता | आपदा से लड़ने का नहीं बल्कि कहीं दिखने और कहीं बिकने का भाव ज्यादा दिख रहा है | जीवन पर बन आये तब भी हम एक अलग ही उन्माद में डूबे रहते हैं | ख़ुशी का मौका हो या कोई आपदा | हम तो आदी हो गए हैं इसे सनसनी बनाने के | प्लीज़ इससे बचिए --- थोड़ा ठहरिये |

24 January 2020

बेटियों एक प्रति संवेदनशील बने समाज

जिस समाज में लैंगिक असमानता और भ्रूणहत्या जैसी कुरीतियाँ आज भी मौजूद हैं, वहां संवेदनशील और सहयोगी सामाजिक व्यवस्था ही बालिकाओं के जीवन की दशा बदल सकती है | विचारणीय है कि बेटियों के लिए संवेदनशील और सम्मानजनक परिवेश बनाने का अहम् पहलू जन- जागरूकता से जुड़ा है | राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य समाज में बेटियों को समानता का अधिकार दिलाने की जागरूकता लाना ही है | इस खास दिवस का मकसद देश की बेटियों के लिए सहयोगी, सुविधापूर्ण  और सम्मानजनक वातावरण बनना है, जिसमें उनके व्यक्तित्व का सर्वांगींण विकास हो | बालिकाएं शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक, हर मोर्चे पर भेदभाव से परे संविधान द्वारा दिए गए उन अधिकारों को जी सकें, जो भारत की नागरिक होने के नाते उनके हिस्से आये हैं | सुखद है कि हालिया बरसों में आये बदलावों के चलते बेटियां आगे भी  बढ़ रही हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी गढ़ रही हैं  |  ऐसे में अगर सुरक्षा और समानता का माहौल  मिले तो बेटियों का आज ही नहीं संवरेगा बल्कि आने  वाले कल में वे सशक्त और चेतनासंपन्न नागरिक भी बन पाएगीं |  (  नईदुनिया में प्रकाशित लेख का अंश ) 


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15 January 2020

मानसिक स्वास्थ्य की चिंतनीय स्थितियां



हमारे यहाँ अवसाद और व्यग्रता यानी कि Depression और Anxiety आज सबसे आम मानसिक विकार हैं | दोनों ही बीमारियाँ बहुत तेज़ी से फ़ैल भी रही हैं | ताजा आँकड़े भी इस बात को पुख्ता करते हैं | पर बिगड़ती मनोदशा से जुड़ीं ऐसी स्थितियां सिर्फ आकंड़ों तक नहीं समेटी जा सकतीं | हर उम्र , हर तबके के लोगों के मन की बढ़ती बेचैनी बताती है कि सिमटते रिश्तों और सामाजिकता के इस दौर में इन व्याधियों का विस्तार पाना आसान हो गया है | 

10 January 2020

न्याय की आस को मिलेगा बल

  
सात साल पहले निर्भया के साथ राजधानी दिल्ली के मुनिरका में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने ना केवल देश को दहला दिया था बल्कि बर्बरता की भी ऐसी बानगी सामने रखी थी कि हर माता-पिता के मन में भय का स्याह  अँधेरा छा गया था | इस अमानवीय और क्रूर मामले ने बेटियों की असुरक्षा से जुड़ीं दर्दनाक  स्थितियां ही नहीं, महिलाओं के प्रति पलती कुत्सित सोच को भी सामने रखा था | निर्ममता की सारी सीमायें पार करने वाली सामूहिक दुष्कर्म की इस घटना ने आमजन को भीतर तक झकझोर दिया था |  वैश्विक स्तर पर भी भारत को 'रेप केपिटल'  और सबसे असुरक्षित देश तक कहा गया | यही वजह थी कि लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहे निर्भया के परिवार को ही नहीं पूरे देश को निर्भया के साथ बर्बरता करने वालों को  फांसी पर लटकाने के निर्णय का इंतजार था | गौरतलब है कि निर्भया के दोषियों को फ़ास्ट ट्रैक अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही फाँसी की सजा सुना चुके हैं |  बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी ।  उच्चत्तम न्यायालय  के आदेश के बाद दोषियों को दी गई फांसी की सजा कायम रही । अब साल 2012 में  हुए निर्भया गैंगरेप के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों का डेथ वॉरंट जारी  किया  है | इन चारों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी  दी जायेगी |  निर्भया के माता-पिता ने पिछले महीने चारों दोषियों के खिलाफ डेथ वारंट जारी करने के लिए दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका दायर की थी। पटियाला हाउस कोर्ट का यह  निर्णय आने के बाद  निर्भया की मां ने कहा है कि 'मेरी बेटी को न्याय मिल गया। अपराधियों को फांसी की सजा मिलने से देश की महिलाओं को ताकत मिलेगी। इस फैसले से लोगों का न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दोषियों को फांसी देने से अपराधी डरेंगे |' यकीनन महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मोर्चे पर बिखरते भरोसे के इस दौर में  यह  फैसला एक उम्मीद जगाने वाला है |  डेली न्यूज- राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित लेख  का अंश ) 

31 October 2019

क्यों है दायित्वबोध की कमी

राजस्थान के बीकानेर से सामने आये एक मामले में डाक विभाग  के एक डाकिये ने  बीते एक साल से डाक नहीं बांटी थी  | डाकिये के घर में  10 बोरी एटीएम कार्ड,  पैन कार्ड, चेक बुक, शोक संदेश, सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र, आधार कार्ड, इंश्योरेंश के दस्तावेज़ और शादी के कार्ड मिले हैं  |  पोस्ट ऑफिस से डाक ले जाकर  वितरित करने के बजाय वह अपने घर पर बोरों में भर कर रखता जा रहा था |  काफी समय से उस क्षेत्र के  लोगों की शिकायत थी कि उन्हें डाक नहीं मिल पा रही है |  शिकायत जब उच्च स्तर तक पहुची तो जांच टीम भी  बोरों भरे में  सामान को देख कर  हैरान रह गई | 

दरअसल, यह वाकया अपने काम के प्रति जिम्मेदारी के भाव के अभाव को दर्शाता है  | अफ़सोस कि यह देश में एक अकेला मामला भी नहीं है | दफ्तर पहुँचने में लेटलतीफी करनी हो या दायित्व निर्वहन की राह में बच निकलने के रास्ते तलाशना, ऐसे लोग लगभग हर क्षेत्र में मिल जाते हैं |  सार्वजानिक सेवाओं  से जुड़े  कर्मचारी इस मोर्चे पर आम लोगों को सदा से ही निराश करते आये हैं | काम के प्रति टालमटोल की आदत हमारे वर्क कल्चर हिस्सा बन चुकी है | ऑफिस  में  जानबूझकर अपने  दायित्व निर्वहन में पीछे रह जाना तो बहुत से  कर्मचारियों  के लिए मानसिक संतुष्टि  देने वाली आदत है | उन्हें यह  सोचना भी जरूरी नहीं लगता कि उनकी ऐसी कार्यशैली कितने लोगों के जीवन को प्रभावित करती है | बीकानेर से सामने आये इस  मामले में भी पोस्टमैन की गैर-जवाबदेही की हरकत के कारण हजारों लोगों को  नुकसान हुआ होगा  |  नियुक्ति पत्र समय पर नहीं  मिलने से कई बेरोजगार युवा अपनी नौकरी से वंचित हो गए होंगें  | कितने ही लोग अपने नाते रिश्तेदारों के शोक और शादी समारोह में शामिल नहीं हो  पाए होंगें । कई तरह के जरूरी कागजात लोगों तक नहीं पहुंचे होंगें, जो उनके लिए बेहद उपयोगी थे |यह कटु सच है कि देश और समाज को बदलने की बड़ी-बड़ी बातों में अव्वल रहने वाले भारतीय  सबसे बड़ी चूक उस जिम्मेदारी को निभाने में करते हैं, जो बतौर नागरिक उनके हिस्से आती है |  ( NBT में प्रकाशित लेख का अंश  )  

25 October 2019

विद्यार्थियों के साथ संवेदनहीनता



हाल ही में कर्नाटक के हावेरी जिले  के एक कॉलेज में छात्रों को नकल करने से रोकने के लिए उनके सिर पर कार्डबोर्ड बॉक्स यानी कि गत्ते पहना दिए गए। चौंका देने वाले इस अव्यावहारिक और अमानवीय  व्यवहार  वाले मामले में विद्यार्थियों के सिर पर गत्ता पहनाकर प्रशासन ने नकल पर लगाम लगाने के लिए यह अजीबो-गरीब तरीका निकाल लिया |  इस अनोखे और हैरान-परेशान करने वाले नियम के तहत मुंह की तरफ गत्ते में वर्गाकार छेद किया गया ताकि परीक्षार्थी सवाल देख सकें और जवाब लिख सकें।  परीक्षा कक्ष की सोशल मीडिया में  दिख रही तस्वीर सभी को हैरान कर रही है | हंसी-मजाक का विषय बन गई है |  लेकिन  यह तस्वीर सिर्फ हँसने-मुस्कुराने का मामला भर नहीं है  | यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की भी अजब-गज़ब स्थिति और अव्यवस्था को सामने रखती  है |   जिसमें  परीक्षा के दौरान स्‍टूडेंट्स को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए बाकायदा बाध्‍य किया गया | अब सरकार ने कॉलेज प्रशासन को नोटिस जारी कर इस पर स्‍पष्‍टीकरण मांगा है  कि आखिर छात्रों को गत्‍ते के बॉक्‍स सिर पर पहनने के लिए क्‍यों मजबूर किया गया ? कर्नाटक के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री ने भी नकल रोकने के लिए ऐसी व्यवस्था को निंदनीय और  किसी भी रूप में अस्वीकार्य  बताया है |  
नकल पर लगाम के लिए बच्चों के साथ किया गया यह व्यवहार अनुचित और अव्यावहारिक है | परीक्षा के दौरान छात्रों को सबसे ज्यादा सहूलियत और सहजता की दरकार होती है |  ऐसे में नक़ल पर शिकंजा कसने के लिए निकाला गया यह अजीबो-गरीज़ रास्ता वाकई अफसोसनाक है | आम लोग भी कॉलेज प्रशासन के इस तरीके से हैरान-परेशान हैं |  इसकी आलोचना कर कर रहे हैं |  क्योंकि नकल रोकने के नाम पर परीक्षा केन्द्रों में बच्चों  के साथ किया गया यह बर्ताव बच्चों और अभिभावकों का मनोबल तोड़ने वाला है | ऐसे गत्ते के बॉक्स  पहना देना,  परीक्षा केंद्र में  विद्यार्थियों को असहज करने वाला है | साथ ही अहम्  बात यह कि यह ऐसा कोई   सार्थक रास्ता भी नहीं जो नकल पर लगाम लगा सके |  (दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख  का अंश  )  

12 August 2019

सुषमा स्वराज ----- देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व

जिस देश की आधी आबादी आज भी सुरक्षा, सम्मान और समानता के मोर्चे पर  लड़ाई लड़ रही हो, वहां की आम  स्त्रियों के लिए  सुषमा स्वराज जैसी नेता का व्यक्तित्व पीढ़ियों तक उम्मीद और हौसले की बुनियाद रहेगा | सुषमा स्वराज ने इस देश की महिलाओं को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से यह समझाया है  कि आम सा जीवन जीते हुए भी ख़ास बना जा सकता है |  बदलाव लाने की ठानी जा सकती है | सहज और संयत रहते हुए भी प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी जा सकती है |  अपनी संस्कृति से जुड़ाव रखते हुए  देश ही नहीं  विदेश में भी अपनी और अपने  मुल्क की ख़ास प्रतिष्ठा हासिल की जा सकती है | इतना ही नहीं उन्हें  भारतीय संस्कृति की राजदूत भी  कहा जा सकता है | वे तीज  पर्व  मनाते हुए भी दिखीं तो  महिलाओं की अस्मिता के लिए आवाज़ बुलंद करते हुए भी |   यही वजह है कि  उनका गरिमामयी  और विचारशील व्यक्तित्व देश की आम स्त्रियों को सदैव बेहद अपना सा लगा |

भारतीय राजनीति की यह कद्दावर और विदुषी नेता शुरुआत से ही एक सामर्थ्यवान सोच वाली स्त्री भी रहीं |  संघर्ष और सकारात्मक समझ के साथ  देश के राजनीतिक पटल पर अपना अहम् स्थान बनाया |  इतना ही नहीं वे अपने घर-परिवार के दायित्वों और राजनेता की भूमिका, दोनों का निर्वहन करने में पूरी तरह सफल रहीं  | अपने परिवार के प्रति समर्पित सुषमा ने राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद  निजी जिंदगी में भी अपनी जिम्मेदारियों  को पूरे मनोयोग से निभाया | भारत जैसे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे वाले देश में उनके जीवन का यह पहलू यकीनन प्रेरणादायी है |  क्योंकि यहाँ अधिकतर स्त्रियाँ कई मोर्चों पर जूझते हुए, अनगिनत दायित्व निभाते हुए आगे बढती हैं | सुषमा  जितनी  कुशल सांसद, प्रशासक, केंद्रीय मंत्री और ओजस्वी वक्ता रहीं  उतनी  सहज और मानवीय भावों से भरी इन्सान भी |  यही वजह है कि वे एक राजनीतिक व्यक्तित्व ही नहीं जन-जन के हृदय में बसने वाली जन-प्रतिनिधि भी साबित हुईं |  हमारे यहाँ राजनीतिक पार्टियों में महिलाओं को एक सहयोगी कार्यकर्ता के तौर पर  ही देखा जाता रहा है । इतना ही नहीं उनकी निर्णयात्मक  भूमिका पर भी हमेशा ही सवाल उठाये जाते रहे हैं । ऐसे में सुषमा भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता रहीं, जिन्हें असाधारण सांसद भी चुना गया | पड़ोसी देश को लेकर तीखे तेवर अपनाने की बात हो आया और आमजन की मदद के लिए संवेदनशीलता भरा व्यवहार,  उनका प्रेरणादायी और प्रभावी व्यक्तित्व  सदा के लिए देश और विदेशों में बसे भारतीयों  के मन दर्ज हो गया |  पराई धरती पर जा बसे भारतीय नागरिकों के मन में तो उन्होंने एक भरोसा पैदा किया कि संकट के समय उन्हें अपने आँगन से मदद मिल सकती है । भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने सजग व्यक्तित्व  और विचारशील राजनीतिज्ञ की भूमिका अदा की |  इन्हीं मानवीय भावों के बल पर भारतीय राजनीति  में आधी आबादी का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने वाली सुषमा ने वैश्विक स्तर पर देश की साख को नई पहचान दी  । कूटनीतिक मोर्चे पर सधकर बोलने वाली सुषमा स्वराज  मदद और  इंसानी सरोकारों के मामले में सदैव सहजता से संवाद करती  नज़र आईं | (  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित ) 

03 August 2019

स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति

हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट  ‘हेल्दी स्टेट प्रोगेसिव इंडिया’ ने  देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति को सामने रखा है | ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ रिपोर्ट के इस दूसरे संस्करण में सामने आये बिगड़ती  चिकित्स्कीय सेवाओं के हालात वाकई चिंतनीय हैं | गौरतलब है कि इस अध्ययन के अंतर्गत नीति आयोग ने राज्यों की एक रैंकिंग जारी की है।  23 संकेतकों  को  आधार बनाकर राज्यों की सूची  तैयार की गई है | ये सभी संकेतक जीवन सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक हैं |  इनमें  नवजात  मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय लिंगानुपात, संचालन व्यवस्था-अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि  के  साथ ही   नर्सों और डॉक्टरों के खाली पद आदि शामिल हैं |  भारत में चिकित्सकीय सेवाओं की  दुःखद हकीकत बयान करने वाली इस रिपोर्ट  को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक और नीति आयोग ने मिलकर तैयार किया है।  रिपोर्ट को तीन हिस्सों बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बांटकर बनाया गया है | 21 प्रदेशों की  इस फेहरिस्त में देश के सबसे बड़े राज्य,  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर बताई गई है।  यू पी के बाद क्रमश: बिहार और  ओडिशा जैसे राज्यों को स्थान दिया गया है | दरअसल,  भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति हमेशा से ही चिंता का विषय रही है | जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्स्कीय सेवाओं की स्थिति नागरिकों को निराश ही करती  आई  है | ( जनसत्ता में प्रकाशित लेख का अंश )

अन्तरिक्ष विज्ञान में सिरमौर

पाँच साल पहले मार्स ऑर्बिटर मिशन  'मॉम' की इस सफलता के बाद अख़बारों, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया तक,   सहज और साधारण सी दिखने-लगने वाली असाधारण प्रतिभा वाली  स्त्रियों की तस्वीरें दुनियाभर में छा गईं थीं |  ये सभी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की महिला वैज्ञानिक थीं, जो   भारत  के  प्रथम मंगल अभियान की टीम का अहम् हिस्सा रहीं |  भारत को अंतरिक्ष में मिली  मंगल मिशन की ऐतिहासिक सफलता में महिला वैज्ञानिकों की भूमिका को वैश्विक स्तर पर  रेखांकित किया था | गौरतलब है कि  मार्स आर्बिटर मिशन  की  कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने  वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए मार्स आर्बिटर मिशन को मातृत्व के संदर्भ में 'मॉम' कहा था |  इसरो के इस अंतरिक्ष  प्रोजेक्ट की यूनिट में कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को महिला वैज्ञानिकों ने बखूबी निभाया था | इस यूनिट में क़रीब डेढ़ सौ से दो सौ महिला वैज्ञानिकों ने कई मोर्चों  अहम् भागीदारी निभाई  थी | जिनमें 8  आठ महिलाओं की बड़ी भूमिका रही थी |  हाल ही सफलतापूर्वक लांच किये गए चंद्रयान -2 अभियान में भी  इसरो की दो महिला वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है | अपने देश के  सपनों को आकार देने वाले  चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में ऋतु करिधाल अभियान निदेशक और एम. वनिता  परियोजना निदेशक हैं | सुखद है कि भारत का अंतरिक्ष में फतेह पाने का  यह सिलसिला विज्ञान की दुनिया में देश की आधी आबादी की भूमिका भी पुख्ता कर रहा है |  

 ख़ास प्रतिभा की धनी आम सी महिलाएं  
विज्ञान के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी  बढ़ना सामजिक-पारिवारिक स्तर भी बड़ा बदलाव लाएगी | वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी जागरूकता  स्त्री जीवन से जुड़ी कई रूढ़ियों से भी मुक्ति दिला सकती है | आज ज़िंदगी के हर मोर्चे पर महिलाएं बराबरी से शामिल हैं | खेल का मैदान हो, राजनीति का अखाड़ा हो या फिर अंतरिक्ष से जुड़े अनुसन्धान की दुनिया |  हालांकि हमारे यहाँ कई कारणों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम रही है  | यही वजह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को कम करने और आधी आबादी का प्रतिनिधित्‍व बढ़ाने के लिए प्रशासनिक ही नहीं सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी सहयोगी वातावरण बनाना जरूरी है | ताकि बड़ी संख्या में युवा महिलाएं  विज्ञान की दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकें | सुखद है कि इस मोर्चे पर भी  धीरे-धीरे स्थिति बदल भी  रही है |  विज्ञान और अनुसन्धान की दुनिया में न  केवल महिलाओं की  हिस्सेदारी बढ़ रही है, बल्कि वे नेतृत्वकारी भूमिका में भी अपना अहम् योगदान दे रही हैं |  ( हाल ही में दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश )  

20 June 2019

आपसी रंजिशों से उपजी अमानवीयता चिंतनीय

अमानवीय सोच और क्रूरता की कोई हद नहीं बची है अब | छोटी-छोटी बातों से उपजी रंजिशें रक्तपात की घटनाओं का कारण बन रही हैं | हाल ही में अलीगढ़ के टप्पल इलाके में  तीन साल की बच्ची की नृशंस हत्या इसी की बानगी है |  गौरतलब है कि  हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में  महज 10 हजार रुपए के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया। यह रकम बच्ची के पिता से उधार ली गई थी और आरोपी उसे वापस नहीं कर पाया था।  जिसके चलते आरोपी और बच्ची के पिता के बीच बहस हुई थी |  सवाल है इस पूरे प्रकरण में उस मासूम की क्या गलती है ?  उसे किस बात की सजा दी गई ? जबकि उधार चुकाने को लेकर   परिवारजनों से बहस करने वाले आरोपी ने अपने  साथी के साथ मिल कर  बच्ची का अपहरण किया और फिर हत्या कर कूड़े में फेंक दिया | पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मौत का कारण दम घुटना  है | लेकिन मौत से पहले  बच्ची को बहुत ज़्यादा पीटा गया है |  आत्मा को झकझोर देने वाले इस मामले में मासूम बच्ची का सड़ा-गला देखकर शव पुलिसवालों का  ही नहीं  पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का भी दिल दहल गया | 
दरअसल, आपसी रंजिश, बेवजह का आक्रोश और नैतिक पतन ऐसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने वाले अहम् कारण बनते जा रहे हैं |  दुःखद है कि ऐसी अमानवीय वृत्तियाँ अब इंसानी मन पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गई हैं | नतीजनतन,  ना सही गलत सोचने की सुध बची है और ना ही इंसानियत  का मान करने का भाव | ऐसे में मन को झकझोर  देने वाली इन  घटनाओं की पुरावृत्ति इनका सबसे दुखद पहलू है | छोटी बच्चियों के साथ बर्बरता की बात हो या आपसी रंजिश के चलते  जान ले लेने का मामला | ऐसी घटनाएं आये दिन हो रही हैं |  आस-पड़ोस हो,  रिश्तेदारी हो या कोई सड़क पर चलता कोई अनजान इंसान | जाने कैसा आक्रोश  है कि जान  ले लेने की बर्बर घटनाएं बहुत आम हो गई हैं  ?