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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

07 November 2017

बिगड़ रही है महिलाओं की मन की सेहत


महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने  के लिए जितनी योजनायें हैं उतना ही स्त्री विमर्श भी होता है |  लेकिन सच यह है कि हमारे यहाँ  औरतों  के स्वास्थ्य से जुड़े खतरे कम नहीं हैं | विशेषकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तो ना खुद महिलायें सजग हैं और ना ही समाज और परिवार में  दिमागी अस्वस्थता के मायने समझने की कोशिश की जाती है |  यही वजह है कि अनगिनत बीमारियों की जकड़न से लेकर बाबाओं के फेर तक, सब कुछ यह साबित करता है कि भारत में महिलायें मानसिक रूप से कितनी  परेशान रहती हैं | सामाजिक-पारिवारिक और कामकाजी मोर्चों पर एक साथ जूझ रही महिलायें आज बड़ी संख्या में मानसिक तनाव  का शिकार बन रही हैं । महिलाओं के जीवन का अनचाहा हिस्सा बना यह  तनाव उन्हें ना केवल अवसाद की ओर ले जा रहा है बल्कि कई  मानसिक व्याधियों की भी वजह बना रहा है । दुःखद ही है कि मौजूदा दौर में भी अनगिनत जिम्मेदारियों के दबाव और हमारी व्यवस्थागत असंवेदनशीलता के चलते स्त्रियों को हर कदम पर उलझनों का शिकार बनता पड़ता है । कभी अपराधबोध तो कभी असुरक्षा का भाव उन्हें घेरे ही रहता है । ऐसे में यह वाकई विचारणीय है कि आज के असुरक्षित और असंवेदनशील परिवेश में आधी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य भी एक भी चिंता का विषय बना हुआ है । 

यह वाकई चिंतनीय है कि भावनात्मक आधार पर परिवार और समाज की रीढ़ बनने वाली महिलाएं आज इन मानसिक व्याधियों का शिकार बन रही हैं । गृहिणी  हों या कामकाजी मानसिक तनाव और अवसाद महिलाओं के जीवन में जड़ें जमा रहा है । आज के देश की आधी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बन रहा है।  जो यकीनन एक विचारणीय समस्या है । महिलाओं में बढ़ रहे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामले इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे हमारी पूरी सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को प्रभावित की धुरी हैं। 2012 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार तकरीबन 57 फीसदी महिलाएं मानसिक विकारों की शिकार बनी थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर 5 में से 1 महिला और हर 12 में से 1 पुरुष मानसिक व्याधि का शिकार है। कुलमिलाकर हमारे यहां लगभग 50 प्रतिशत लोग किसी ना किसी गंभीर मानसिक विकार से जूझ रहे हैं। सामान्य मानसिक विकार के मामले में तो ये आँकड़ा और भी भयावह है। इनमें महिलाओं के आँकड़े सबसे अधिक हैं। 

दरअसल,  मानसिक सेहत आज के दौर में सभी वर्गों और हर उम्र उम्र के लोगों के लिए वाकई चिंता का विषय है । लेकिन महिलायें तेजी से इसकी गिरफ़्त में  आ रही नहीं क्योंकि वे आज भी अपनी परेशानियां खुलकर नहीं कह पातीं हैं । जिसके चलते अवसाद और तनाव के जाल में ज्यादा फंसती हैं । कई बार तो वे इस समस्या से घिर भी जाती हैं और उन्हें भान तक नहीं होता कि वे किस उलझन में हैं । हमारे वैसे यहाँ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी जागरूकता की कमी है । विशेषकर महिलाओं के बारे में तो यह बात विचारणीय  ही नहीं मानी जाती । इतना ही नहीं इन रोगों  के जाल में फंसे लोग और उनके परिवारजन  भी इलाज के बारे में कम ही सचेत हैं । ( हाल ही में प्रकाशित लेख का अंश )  

01 September 2017

अपने जीवन की नायिका बनिए शिकार नहीं

महिलाओं के लिए बराबरी,सम्मान और सुरक्षा चाहने की लड़ाई कभी ना ख़त्म होने वाली जंग है | ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि इनके बिना वे सशक्त नहीं हो सकतीं | उनके अस्तित्व को वो पहचान नहीं मिल सकती जिसकी वे हक़दार हैं | उनकी काबिलियत को वो मान नहीं मिल सकता जिसकी वे योग्यता रखती हैं | यकीनन इसके लिए हमारे पूरे परिवेश में बदलाव की दरकार है | लेकिन ऐसा भी बहुत कुछ है जो महिलायें ख़ुद अपने अस्तित्व को सहेजने- सँवारने के लिए कर सकती हैं | ऐसी कई बातें हैं जो अपनी पहचान को पुख़्ता करने के लिए वे अपने व्यवहार और विचार में शामिल कर  सशक्तीकरण  की डगर पर पूरे हौसले से आगे बढ़ सकती हैं |  

जरूरी है कि सबसे पहले तो सशक्त होने के सही मायने समझें | इसके लिए अपने अधिकारों  को  लेकर सजग होने के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों   को निभाने की  भी सोचें | यह महिला होने के नाते नहीं बल्कि समाज की एक नागरिक होने के नाते भी जरूरी है | सशक्‍त बनने और बने रहने की एक ज़रूरी शर्त  है जागरूक और सजग रहना | आज के समय में यह जागरूकता और भी जरूरी है क्योंकि  महिलाओं के खिलाफ होने वाली हर नेगेटिविटी के विरोध में आवाज़ बुलंद  करने के लिए नियम कानूनों को जानना आवश्यक है | इसीलिए इनकी जानकारी  ख़ुद भी रखें और दूसरी महिलाओं के साथ भी साझा करें। आप महिलाओं की ज़िन्दगी से जुड़ी दूसरी रूढ़ियों लेकर भी मुखर बनें | खुद भी संकीर्ण विचारों से निकलें और औरों को समझाइश देने की कोशिश करें | होममेकर हों या वर्किंग जहाँ भी मौका मिले सार्थक और सकारात्मक पहल जरूर करें |  घर-दफ्तर की जिम्मेदारियों को पूरा करने के साथ ही अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सजग रहना भी जरूरी है | यह सजगता रखने वाली महिलायें  कर्तव्यों के लिए सचेत  होते हुए अपने अधिकारों को  लेकर आवाज़ उठाने  का भी माद्दा रखती  हैं ।   वे ख़ुद को मानसिक और सामाजिक रुप से मजबूत कर पाती हैं | ज़िन्दगी के हर मोर्चे पर सशक्त भागीदारी निभाने लिए जागरूक और सजग रहना जरूरी है | समाज में मौजूद हर समस्या का  हल यही है महिलाओं में चेतना आये | जो आधी आबादी को  बदलाव लाने के साहस से लबरेज़ करे |

 सशक्त होने  के लिए एक बात सबसे जरूरी है कि  हम अपनी बात कहना सीखें | घर हो या बाहर किसी भी मामले में जो विचार रखती हैं उन्हें  खुलकर साझा करें | एक महिला होने के चलते इस बात का कोई डर नहीं रखें कि आपको क्या कहना चाहिए और क्या नहीं ? अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने का सबसे बेहतर और आत्मविश्वासी तरीका यही है कि मुखर बना जाए | यूँ भी अपनी राय बताने का हक़ सभी को होता है | लेकिन हमारे परिवेश में महिलायें अक्सर अपनी बात नहीं कह पाती हैं | अगर आपके साथ ऐसा है तो इस संकोच के दायरे से बाहर आयें  दूसरों के विचारों को सुनने  और सम्मान का का यह मतलब नहीं है कि खुद की बात साझा ही न की जाये | कई बार देखने में आता है कि महिलाएं अपने आप को  बाँधें  रहती हैं । एक सधे हुए व्यवहार के फेर में अपनी राय शेयर करने की कोशिश ही नहीं करतीं | कई बार काबिलियत और क्षमता की धनी होने के बावजूद इस संकोची स्वभाव के कारण  महिलायें घर और बाहर  हर जगह दोयम दर्जा पाती हैं | अफ़सोस कि ऐसा व्यवहार उनके सशक्त बनने में सबसे  ज़्यादा  आड़े आता है |  अपनी बात  स्पष्टता से  ना कहने का उनका व्यवहार धीरे धीरे पूरे व्यक्तित्व पर हावी हो जाता है । जिसके चलते वे अपने परिवेश और अपनों से भी दूर हो जाती हैं। इसीलिए मुखर बनें और खुद के अस्तित्व को सहेजें । 

 महिलाएँ  गृहिणी हों या कामकाजी | अपने अस्तित्व  को लेकर जागरूक रहें | हर हाल  में  अपनी एक मुकम्मल पहचान को कायम रखिए | इस मामले में कमतरी या बेहतरी का अहसास मन में कभी ना लायें |  कहते हैं कि  दूसरों के लड़ना आसान होता है लेकिन खुद अपने आवाज़ उठाने में कोताही की जाती है | इसलिए अपनी खूबियों और खामियों को समझते हुए अपने व्यक्तित्व को तराशें | आत्मविश्वास और सजगता  आपकी पहचान को पुख्ता करने वाले अहम् पहलू हैं | इसके लिए कभी अकेले अपना रास्‍ता तय करने सोच भी रखें  तो कभी टीम में काम करने  का जज़्बा भी दिखाएं  | महिलाओं के सामने घर के भीतर और बाहर जितनी भी परेशानियां आती हैं उनकी एक बड़ी वजह है उनका अपने ही  अस्तित्व के प्रति जागरूक ना होना | अपनी पहचान को लेकर गंभीर ना होना । हर अच्छे बुरे व्यवहार के लिए  स्वीकार्यता का भाव उनके चेतन अस्तित्व पर कई सारे सवाल खड़े करता है। आज के दौर में ज़रूरी है कि महिलाएं  इस सोच से बाहर आयें और  इन अनचाहे  बंधनों से खुद को आज़ाद करें | अमेरिका की जानी मानी लेखिका नोरा एफ्रान कहती हैं कि  "हर चीज से बढ़कर, अपने जीवन की नायिका बनिए शिकार नहीं " यानि ज़िन्दगी में जो भी भूमिका आप निभा रही हैं उसमें लीडरशिप का भाव रखें | ख़ुद की पहचान कभी ना खोने दें |   इसके लिए खुद भी मजबूती से खड़े होना सीखें और किसी और का भी सहारा बनें | किसी पीड़ा  भी बांटे और संबल भी दे | परेशानी के दौर में किसी का दें और कामयाबी के समय सराहना भी करें |  सशक्त होने का अर्थ ही है कि हम ख़ुद को मजबूती से  थामते  हुए दूसरों को कुछ देना भी सीखें |