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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

20 June 2019

आपसी रंजिशों से उपजी अमानवीयता चिंतनीय

अमानवीय सोच और क्रूरता की कोई हद नहीं बची है अब | छोटी-छोटी बातों से उपजी रंजिशें रक्तपात की घटनाओं का कारण बन रही हैं | हाल ही में अलीगढ़ के टप्पल इलाके में  तीन साल की बच्ची की नृशंस हत्या इसी की बानगी है |  गौरतलब है कि  हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में  महज 10 हजार रुपए के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया। यह रकम बच्ची के पिता से उधार ली गई थी और आरोपी उसे वापस नहीं कर पाया था।  जिसके चलते आरोपी और बच्ची के पिता के बीच बहस हुई थी |  सवाल है इस पूरे प्रकरण में उस मासूम की क्या गलती है ?  उसे किस बात की सजा दी गई ? जबकि उधार चुकाने को लेकर   परिवारजनों से बहस करने वाले आरोपी ने अपने  साथी के साथ मिल कर  बच्ची का अपहरण किया और फिर हत्या कर कूड़े में फेंक दिया | पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मौत का कारण दम घुटना  है | लेकिन मौत से पहले  बच्ची को बहुत ज़्यादा पीटा गया है |  आत्मा को झकझोर देने वाले इस मामले में मासूम बच्ची का सड़ा-गला देखकर शव पुलिसवालों का  ही नहीं  पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का भी दिल दहल गया | 

 दरअसल, आपसी रंजिश, बेवजह का आक्रोश और नैतिक पतन ऐसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने वाले अहम् कारण बनते जा रहे हैं |  दुःखद है कि ऐसी अमानवीय वृत्तियाँ अब इंसानी मन पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गई हैं | नतीजनतन,  ना सही गलत सोचने की सुध बची है और ना ही इंसानियत  का मान करने का भाव | ऐसे में मन को झकझोर  देने वाली इन  घटनाओं की पुरावृत्ति इनका सबसे दुखद पहलू है | छोटी बच्चियों के साथ बर्बरता की बात हो या आपसी रंजिश के चलते  जान ले लेने का मामला | ऐसी घटनाएं आये दिन हो रही हैं |  आस-पड़ोस हो,  रिश्तेदारी हो या कोई सड़क पर चलता कोई अनजान इंसान | जाने कैसा आक्रोश  है कि जान  ले लेने की बर्बर घटनाएं बहुत आम हो गई हैं  ?  इस मासूम बच्ची की हत्या की  जड़ में  भी मात्र दस हजार रुपये की उधारी ही है |  

आजकल हर छोटी बात में सबक सिखाने या बदला लेने की सोच भी हावी रहने लगी है | इस मामले में भी आरोपी ने स्वीकारा है  कि उसने बेइज्जती का बदला लेने के लिए अपने साथी के  संग मिलकर  इस भयावह  घटना को अंजाम दिया है । अफसोसनाक है कि  प्रशासन-तंत्र की विफलता भी ऐसी बढती घटनाओं के लिए जिम्मेदार है |  जब तक ऐसा कोई मामला  तूल नहीं पकड़ता कोई सक्रियता नहीं दिखाई जाती   इतना ही नहीं हमारी लचर कानून व्यवस्था भी में अपराधियों को दंड का भय नहीं है |  

हालिया सालों में रंजिशों के कारण हो रही हत्याओं के आंकड़े तेज़ी से बढ़े हैं | इनमें सियासी रंजिशों से लेकर सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी प्रतिशोध लेने के मामले शामिल हैं |  हाल ही में सामने आये  दिल्ली पुलिस  के आंकड़ों  बताते हैं कि देश राजधानी में  वर्ष 2017 में 462 के मुकाबले 2018 में 477 लोगों की  हत्या कर दी गई। इनमें सबसे ज्यादा 38 प्रतिशत लोगों को किसी न किसी रंजिश की वजह से जान गंवानी पड़ी। हर दो दिन में औसतन तीन लोगों को किसी न किसी वजह से मौत के घाट उतार दिया गया। कई मामलों में तो बेहद छोटी सी बात पर  किस इंसान की जान ले ली गई है | कभी -कभी बरसों के मनमुटाव के बाद ऐसी घटनाओं को सोच-समझकर अंजाम दिया जाता है |  गाँव-कस्बे हों या महानगर  क्रोध और प्रतिशोध का भाव इस हद तक बढ़ गया  है कि  मामूली रंजिश में भी लोग परायों को ही नहीं अपनों को भी दर्दनाक मौत देने में नहीं चूक रहे | ऐसे  भी मामले हुए हैं जिनमें केवल शक के आधार पर आवेश में आकर अपनों-परायों की जान लेने के अपराध हुए हैं |  निःसंदेह, इन घटनाओं की बढ़ती संख्या बताती है कि अब नैतिकता के कोई मापदण्ड नहीं बचे हैं |   बस, कहीं बदला लेने का भाव बाकी है तो कहीं सबक सिखाने की सोच | 

विचारणीय है कि इन मामलों से अब एक और पहलू भी जुड़ गया है | अब मन को उद्वेलित करने वाली इन घटनाओं के प्रति भी जुर्म का विरोध करने का  भाव  नहीं बल्कि चुनी हुई चुप्पी या मुखरता देखने को मिलती है | सवाल यह है कि जिस समाज में जघन्य अपराधों का विरोध भी सलेक्टिव अप्रोच के साथ किया जाये वहां आपराधिक  प्रवृत्ति के लोगों को डर हो भी तो  किसका ?  अब इस बंटे हुए समाज में बेटियों को सुरक्षा का भरोसा दे भी कौन ?  हाँ,  हम भूल रहे हैं कि धर्म, सम्प्रदाय और  जात -पात के खांचे में  बंटकर हम इस अमानवीयता को और  खाद  पानी दे रहे हैं | जबकि इस  भेदभाव का फर्क तक ना समझने वाली  मासूम बच्चियां आये दिन हो रहे बर्बर मामलों में एक इंसान होने की ख़ता की सजा भोग रही  हैं | ऐसी घटनाओं को लेकर दी जा रहीं प्रतिक्रियाएं हों या मौन रहने चुनाव  | समाज के  विद्रूप हालातों के बारे में  तो सोचा  ही नहीं जा रहा है | सार्थक कानूनी बदलावों और सक्रिय कार्रवाई करने का दबाव बनाने के बजाय बहुत कुछ आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमट जाता है | जिसका फायदा आपराधिक प्रवृत्ति के लोग उठाते हैं | कानून और प्रशासनिक अमले की लचरता तो  पहले से ही निराश करने वाली है |  ऐसे में समाज का यूँ   बंटना वाकई तकलीफदेह है | 

यह एक कटु सच है कि समाज में हर स्तर पर लोगों में असंतोष और अधीरता की भावना पनप रही है।  ऐसी  घटनाएं आक्रोश, असहिष्णुता और मानसिक रुग्णता की  बानगी बन रही हैं  | आज की आपाधापी ने सबसे पहले हमारा धैर्य ही छीना है | जिसके चलते नकारात्मकता और बेरहमी भी हमारे जीवन में घुसपैठ करने में कामयाब हुई है | अफ़सोस कि यह हिंसक व्यवहार अब आम जीवन में  अपनी इतनी दखल रखने लगा है कि ऐसे बर्बर मामले सामने आ रहे हैं | 

08 May 2019

कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ?

हाल ही में राजधानी दिल्ली के फतेहपुर बेरी में डेढ़ साल के बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी गई | इस दिल दहला देने वाले मामले  को मात्र आठ साल के एक बच्चे ने ही अंजाम दिया है |  क्रूरता का कारण बस इतना कि कुछ दिन पहले आरोपी और उसके भाई को मृतक बच्चे की बहन ने धक्का देकर गिरा दिया था | जिसका बदला लेने के लिए उसने यह क्रूर कदम उठाया | यह वाकया हैरान भी करता है और भयभीत भी  कि मात्र आठ साल का बच्चा, रात के समय पड़ोस के मकान की छत पर माँ के पास सो रहे बच्चे के पास छत के रास्ते ही आया और सोते हुए मासूम को उठाकर ले गया।  उसने बर्बर व्यवहार करते हुए पहले घर के बाहर बनी पानी की  टंकी में उसे तीन-चार बार डुबोया और फिर घर से कुछ दूरी पर ही करीब तीन फुट गहरी नाली में  गिरा दिया। इतना ही नहीं डेढ़ साल के इस अबोध  को चोट पहुंचाने के लिए उसने बच्चे को पत्थर भी मारे। 
निःसंदेह, रात के अँधेरे में ऐसी भयावह घटना को अंजाम देने का दुस्साहस करने वाले बच्चे की मानसिकता और परवरिश के परिवेश को लेकर कई सवाल उठने लाजिमी हैं | साथ ही यह सोचा जाना भी जरूरी है कि हमारे यहाँ साल-दर -साल बाल अपराधियों की संख्या क्यों बढ़ रही है ?  उनका मासूम मन जिन घटनाओं को अंजाम दे रहा है, वो कोई छोटी-मोटी वारदातें नहीं हैं | हद दर्जे के बर्बर और असंवेदनशील मामलों में कम उम्र के बच्चों की भागीदारी देखने को मिल रही है |  हालिया  बरसों में   हर तरह की  सामाजिक- पारिवारिक पृष्ठभूमि  से जुड़े बच्चे ऐसे मामलों में भागीदार पाए गये हैं |  महंगे स्कूलों में पढने वाले संभ्रांत परिवारों के लाडलों से लेकर अशिक्षित और आम सी पृष्ठभूमि के परिवारों में पले-बढे बच्चों की भागीदारी के ऐसे कई मामले आये हैं | आखिर कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ? 

बच्चों में बढ़ रही असंवेदनशीलता, आक्रामकता और नकारात्मक व्यवहार अभिभावकों के लिए भी बड़ी दुविधा पैदा कर रहा है | लेकिन सच तो यह है कि बालमन में आ रही विचार और व्यवहार की दिशाहीनता का हल भी उनके अपनों को ही तलाशना होगा | गौरतलब है कि आक्रामता और रंजिश के चलते जान ले लेने के मामलों को बड़ी उम्र के लोग भी आये दिन अंजाम दे रहे  हैं |  कमोबेश हर आयु वर्ग के लोगों में अब ठहराव और संवेदनशीलता का अभाव है  | घर-परिवार ही नहीं पूरे परिवेश का माहौल ही असंवेदनशील हो गया है | ऐसे में अभिभावकों की सोचना होगा कि सब कुछ जुटाने के फेर में कहीं बच्चे ही पीछे ना छूट ना जाएँ |  (  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश ) 

14 April 2019

बेटे रुलाते नहीं यह सीख भी जरूरी


 NBT में प्रकाशित
 

लड़का होकर रोता है  ? या लड़के रोते नहीं। जैसी सीख हमारे परिवेश में आम है | परिवार, रिश्तेदार, दोस्त यहाँ तक कि अभिभावक भी, बेटों को यही सिखाते हैं कि लड़के रोते नहीं |  इतना ही नहीं फिल्मों और टीवी सीरियलों में यह वाक्य आम है |  ऐसे में जब घरेलू हिंसा के आंकड़े सामने आते हैं तो लगता है कि लड़के रुलाते नहीं यह भी तो  सिखाया जाना चाहिए | बेटों को अपने जज़्बातों पर काबू पाने का पाठ  पढ़ाना सही है पर औरों के जज़्बात समझने की संवेदनशीलता भी तो उनके सबक का हिस्सा बननी चाहिए | जाने-अनजाने  बेटों को ना रोने की सीख देते हुए यह भी सिखा दिया गया कि घर हो या बाहर किसी महिला का रोना कोई बड़ी बात नहीं | उन हालातों को समझने की दरकार ही नहीं जिसके चलते किसी बेटी, बहू, पत्नी या माँ की आँखें गीली हैं |  दरअसल, यह असंवेदनशीलता और अनदेखी ही लैंगिक भेदभाव और यौन हिंसा की जड़ है |   घरेलू हिंसा की सबसे बड़ी वजह यह भावनात्मक असहिष्णुता ही है |  मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि  घर हो या बाहर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के पीछे पुरुषों की परवरिश की अहम् भूमिका होती है | दरअसल, बुनियादी सोच में बदलाव आये बिना घर के भीतर सम्मानजनक और सुरक्षित व्यवहार स्त्रियों के हिस्से नहीं आ सकता है | यह मनुष्यता के मान का मामला है | स्त्री- पुरुष के भेद से परे हर इंसान के आत्मसम्मान का मोल समझने का विषय है | ऐसे में बेटों की परवरिश के मोर्चे पर सोचा जाना बेहद जरूरी है | माएं इस भूमिका में समाज को बदलने वाला रोल निभा सकती हैं |  ( लेख का अंश )




 

13 March 2019

बेटियों की जिंदगी सहेजने के लिए विदेशी दूल्हों पर सख्ती जरूरी

 जनसत्ता  में प्रकाशित 

दरअसल, पंजाब ही नहीं अन्य राज्यों से भी ऐसे हजारों अनिवासी भारतीय परिवार हैं, जो दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं | विशेषकर कनाडा,अमेरिका, ब्रिटेन और  ऑस्ट्रेलिया जैसे दशों में अनिवासी भारतीय बड़ी संख्या में बसे हुए हैं | इनमें से कई परिवार आज भी अपने बेटों की शादी करने के लिए दुल्हन तलाशने भारत आते हैं | ऐसे वैवाहिक रिश्तों  का सबसे दुखद पक्ष यह है कि जीवन भर के लिए जुड़ने वाले इस रिश्ते को लेकर  कई भावी दूल्हों और  उनके परिवार की मंशा शुरुआत से ही गलत होती है | नतीजतन ऐसे अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं जिनमें विदेशों में जा बसे लड़के भारतीय लड़कियों से शादी तो करते हैं लेकिन शादी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर अक्सर गंभीर नहीं होते। इस जुड़ाव को निभाने की नहीं बल्कि अपने फायदे के लिए भुनाने की सोच रखते हैं | शादी के सालों बाद तक दुल्हन यहाँ इतजार करती रहती है  लेकिन वे उनकी खोज-खबर तक नहीं लेते | ( लेख का अंश ) 

18 February 2019

भारत में भी मिले हिन्दी को मान

डेली न्यूज़ में प्रकाशित 

हाल ही में अबू धाबी  के न्यायिक विभाग ने कामगारों से जुड़े मामलों में अरबी और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी बयान, दावे और अपील दायर करने की शुरुआत की है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद  अरबी और अंग्रेजी के बाद अब हिंदी को भी वहां की अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। सुखद है कि देश के बाहर भी हिंदी भाषा अपना परचम लहरा रही है।  संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय लोगों की देश की कुल आबादी का 30 फीसदी है | वहां ऐसे कामगार भी संख्या हैं जो अंग्रेजी  भी नहीं समझ पाते |  यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया में हिंदी को भी आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है | अब हिंदी भाषी लोग भी समूची न्यायिक प्रक्रिया को सहजता से समझ पायेंगें |    

चिंतनीय यह भी है कि भारत में आज भी न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजी के दबदबे के चलते आमजन के लिए असहजता बनी हुई है | गांवों-कस्बों में बसे लोगों को अदालती प्रक्रिया से गुजरते हुए इस भाषाई दिक्कत का सामना करना पड़ता है | अफसोसनाक ही है कि जिस देश की राजभाषा हिंदी है, वहां किसी आम नागरिक के लिए यह समझना भी मुश्किल बना हुआ है कि अदालत में उसका पक्ष किस तरह रखा जा रहा है ?  हमारे देश एक बड़ी आबादी आज भी अंग्रेजी भाषा नहीं समझती-बोलती | ऐसे में  कानूनी प्रक्रिया से लेकर, सुनवाई और फैसले तक समझने में लोगों को दिक्कत आती है | यही वजह है कि यह भाषाई  बाध्यता केवल कानूनी ही नहीं संवेदनाओं और भावनाओं से जुड़ा मामला भी है |  (लेख का अंश )