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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

01 June 2018

सच को संवेदनशीलता से उकेरती कहानियाँ


आज की भागमभाग भरी ज़िन्दगी में जो कुछ छीज रहा है, उसे संवेदनशीलता के साथ उकेरती हैं इस संग्रह की कहानियाँ | डॉ. फ़तेह सिंह भाटी ने किताब की भूमिका में कहा भी है  कि "जीवन एक कला है। सुख, एक दूसरे के प्रति अपनापन, प्रेम, समर्पण, त्याग और समझ से अनुभूत कर सकते हैं, साधनों से नहीं। इंसान सुख के साधन बढ़ाता जाता है और इस हद तक कि उसके जीवन का लक्ष्य ही पैसा हो जाता है। सारी ऊर्जा इसमें लगाकर अंततः वह स्वयं को छला महसूस करता है।" संग्रह को पढ़ते हुए पाठक को यही बात या यूँ कहें  कि यही सबक, उनकी कहानियों में भी मिलता  है | मर्मस्पर्शी भाषा में आंचलिक शब्दों का प्रभावी इस्तेमाल कर रची गई इस संग्रह की कहानियाँ मन जीवन से जुड़े  कितने ही सच सामने लाती हैं | यूँ भी सामाजिक जीवन के सच को उकेरते हुए शब्द जब कहानियों में ढलते हैं, तो वो कहानियां कहीं गहरे उतरती हैं । 'पसरती ठण्ड'  संग्रह में भी  परिवेश और पात्रों के विचार-व्यवहार का चित्रण आश्वस्त करता है कि हर कहानी आम जीवन से जुड़ी है । जिससे पाठकों का जुड़ाव भी सहजता से होता है | 

पारिवारिक  संबंधों  की  बिगड़ती  रूपरेखा पर की गई बात कहानियों में मौजूदा दौर की उस  विडंबना  को रेखांकित करती हैं जहाँ रिश्तों में स्वार्थ का बोलबाला है | ये कहानियाँ बहुत सहजता से बताती-समझाती हैं कि परिवेशगत जटिलताओं और सामाजिक ताने-बाने में उपस्थित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं में  कितना कुछ समाया होता है ।  मित्रता, स्त्रीत्व और इंसानी जीवन से जुड़े  कई मानवीय भाव कहानियों का हिस्सा बने हैं | जो लगते तो आम हैं पर इन्हें खास अंदाज़ में कहते हुए डॉ. भाटी ने इन कहानियों में  मरूभूमि की पृष्ठभूमि लेते हुए पात्रों को जीवंत बना दिया है | 'झलक-1 और झलक-2 ' में यही सामजिक विडंबना उकेरी गई है |  यहाँ आभासी संसार का ज़िक्र भी आया है | जिसने हालिया बरसों में रिश्तों में दिखावा संस्कृति की सोच को विस्तार दिया है | व्यावहारिक सोच के नाम पर किस कदर असंवेदनशीलता हमारे व्यवहार में पैठ बना चुकी है, दो भागों में लिखी इस  कहानी का  अंत इसी बात को कहता है कि "भावनाशून्य हृदय के लिए पिता हो या पति या फिर बच्चे सब अवसर हैं अपनी खुशियों के लिए अवसर |" 

स्त्री जीवन के मर्म को को रेखांकित करती  "पतित" और "उमादे" कहानियों में भले ही वर्तमान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अंतर हो, नारीमन की पीड़ा एक सी लगती है | दोनों का मर्म यही है कि स्त्री को हिम्मत से  खड़े होकर अपने आत्मसमान के लिए लड़ना होता है | अपनी गरिमा सहेजनी होती है | कहानियों को जिस तरह शब्दों में बाँधा गया है, वह वाकई  सराहनीय  है । विशेषकर तब जब ये कहानियाँ सवाल भी लिए हैं और समस्याएं की सामने रखती हैं |   "दो पेड़",  "शापित धोरा"  और " पलायन"  स्थानीयता और आंचलिकता की सुगंध से सराबोर हैं | साथ ही लोक जीवन में मौजूद रूढ़िवादी विचारधारा और सामाजिक जकड़नों  की भी बात करती हैं |   "ठूँठ" और  "मुक्त प्रेम" जैसी कहानियां  पाठक के मन-मस्तिष्क को मनन-चिंतन  की राह सुझाती हैं | आज़ादी के नाम पर स्वछंदता के परिणामस्वरूप उपजीं कई सामाजिक विद्रूपताएं पाठक को सचेत करती हैं | पढ़ने वाले के मन को परिष्कृत करती हैं |  कहानियों  के संदर्भ मौजूदा समय में  सामाजिक  और  व्यक्तिगत जीवन के विरोधाभासों को सामने रखते  हैं  | दुखद है कि यही वह कटु सच है जिसने हमारी  पूरी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को ही नहीं हमारे मनोविज्ञान को प्रभावित किया है | नतीजतन, मन-जीवन में असंवेदनशीलता अब परायों के लिए ही नहीं अपने  करीबी रिश्तों एक लिए भी जगह बना रही है  | 

कहानी संग्रह में लेखक की भाषा जिस संवेदनशीलता का बहाव उत्पन्न करती है, वह भी पढ़ने वाले को पात्रों के और करीब ले जाता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब मानवीय भावशून्यता और संवेदनहीनता से  हमारी  झोलियाँ भरी हैं, ये  कहानियाँ सोचने को विवश करती हैं कि हमारे  परिवेश की दिशा क्या है ? आखिर कौन से  शिखर पर जाने की होड़ है, जिसमें हम खुद ही पीछे छूट रहे हैं | यकीनन ‘पसरती ठण्ड’ संग्रह की कहानियाँ हमारे आज के समाज का आइना हैं |  संबंधों की दिशाहीनता का बोध करवाती हैं | जो अंततः बिखराव ही लाएगा | सुखद है कि सहज और सरल भाषा में गुंथी ये कहानियाँ हमें सचेत करती हैं | उस बिखराव के खामियाजे सामने रखती हैं जिसे हम स्वयं आमंत्रित कर रहे हैं |  समग्र रूप  से देखें तो  डॉ. फ़तेह सिंह भाटी  के इस पहले कहानी संग्रह के पन्नों से गुजरते हुए पाठक का  कई विचारणीय प्रश्नों से साक्षात्कार होता है | वह अपने परिवेश  आ रही विसंगतियों को लेकर सोचने लगता है कि बदलाव के नाम पर वो सब क्यों नहीं बदला जिसे असल में परिवर्तन की दरकार थी | इन्हीं बदलावों को लेकर लेखक द्वारा ज़ाहिर की गयी  चिंता भी कहानियों में साफ़ दिखती है |  
  

22 April 2018

किरदारों ज़रिए एक शहर से मिलना




हर शहर का अलग रंग-अलग ढंग होता है | वहां के बाशिंदों का जीने का तरीका हो या बतियाने का अंदाज़ उस शहर की पहचान बन जाता है | इस मामले मामले में मुंबई  ( जिसे कभी बॉम्बे कहा जाता  था ) की देश ही नहीं दुनियाभर में खास पहचान है |  मायानगरी की भागमभाग हो या एक दूजे से जुड़कर भी कोई जुड़ाव ना रखने वाले यहाँ के लोग | यहाँ की हवा में एक अलग ही अंदाज़ की गंध  है | पत्रकार और लेखिका जयंती रंगनाथन ने अपनी किताब ‘बॉम्बे मेरी जान में’ मुंबई के इसी अंदाज़ को बखूबी शब्दों में उकेरा है  । संस्मरण  रूपी  इस  किताब में जिन असल किरदारों की कहानियाँ हैं वे इस शहर की असलियत को भी पाठकों के समक्ष जीवंत कर देती हैं  | लेखिका को घर और दफ्तर की भागदौड़ के बीच इस शहर के जो रंग दिखे,  उन्हें जीते हुए संवेदनशील मन से वे हर पहलू को सोचती रही हैं | तभी तो ये किरदार इस नगर के ही नहीं उनकी जिंदगी से जुड़े भी लगते हैं | पढ़ते हुए लगता है मानो यह शहर ही उनके मन में रच-बस गया है | जहाँ सड़क, बस, ऑटो या  लोकल ट्रेन में में दिखने वाले चेहरों के पीछे का सच जानने-समझने को उनका अपना मन भी उद्वेलित रहा | जयंती जी ने भूमिका का शीर्षक ही 'एक शहर बन गयी मैं.....'  दिया है |   उन्होंने लिखा भी है कि ' एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैं, तो रात-दिन की भाग-दौड़, आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुम्बई की लोकल ट्रेन में आपको नये किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियाँ हर वक़्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुम्बई को अगर जानना है, तो ख़ुद एक कहानी बनना होगा।' जो कि यकीनन एक सहज सा सच  है |  
दरअसल, यह किताब कुछ खास किरदारों के माध्यम से हमें मुंबई की ख़ासियतों का परिचय देती है |  असल में देखें तो दौर कोई भी हो, हर इस शहर का हर बाशिंदा जिसे मुम्बईकर कहा जाता है, यहाँ से एक ख़ास रिश्ता जोड़ता है | दुनियाभर की आपाधापी के बीच भी यहाँ जीने वालों के दिलो-दिमाग पर तारी रहते हैं यहाँ के रंग | जयंती रंगनाथन के शब्दों को पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही लगता है | अजनबी  होकर भी जो अपनापन इस शहर में दिखता है वो शायद ही कहीं और हो |  'बॉम्बे मेरी जान'  किताब में तीन किरदारों के बारे में तीन अध्याय हैं | जो इन खास चरित्रों की ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें यह शहर भी साथ चलता है  | यह  किताब लेखाजोखा है कि    कैसे लेखिका इन तीनों से  मिलीं ?   कैसे उनके साथ उस  दुनिया की  झलक देखी,  जो मुंबई नगरिया  की जीवनशैली का पागलपन भी लिए है और पीड़ा भी |  हाँ, इन किस्सों को पढ़ते हुए बहुत सहजता के साथ मुंबई शहर रंग भी  पाठकों को  दिखते रहते हैं |   'वो छोकरा', 'वो थी एक शबनम' और 'उस दुनिया की ज्योति' | ये तीनों संस्मरण के तौर पर कही गई कहानियाँ व्यक्तित्व और विचार वो सारे अंदाज़ लिए हैं, जो बॉम्बे की बेपरवाही और हरदम व्यस्त और भागते चेहरों के पीछे के ठहराव और पीड़ा को बताते हैं  |  'वो छोकरा' लोकल ट्रेन में गाने-बजाने  वाले एक लड़के की कहानी है जो हर तरह के शोषण को झेलने को अभिशप्त रहा | कहानी बताती है कि  कैसे  एक किशोर में यहाँ जीने के लिए जूझते हुए कई अवगुण आ गए | पर हीरा नाम का यह किशोर पर मन से बच्चा ही रहा  | स्वयं लेखिका ने भी उसके मन-जीवन के संघर्ष  की  पीड़ा को  समझते  हुये उसे कई बार समझाइश भी दी है | हीरा की कहानी पढ़ते हुए मुंबई की लोकल ट्रेन में गा-बजा कर या छोटा-मोटा सामान बेचकर गुजरा करने वाले  ग़रीब बच्चों की दयनीय स्थिति की हकीकत से सामना होता है | हीरा बचपन में अपने घर से भाग कर मुंबई आ गया है। दादर स्टेशन पर कूड़ा-कचरा बीनने का काम करता है। लेकिन हालात के मारे दूसरे बच्चों की तरह   ही मासूम मन वाला हीरा भी   शोषण, अपराध, बुरी लत और नकारात्मक व्यवहार के चक्रव्यूह में  फंस जाता है  | उसे इन  हालातों में फँसा देख लेखिका के संवेदनशील मन ने भी कई बार व्यावहारिक सी प्रतिक्रिया दी है | जो इस जुड़ाव को पुख्ता करती है कि वे इस शहर और इसके मिजाज़ को अच्छे से समझ चुकी थीं |

‘वो थी एक शबनम’ में  अपने गुरूर में रहने वाली बार डांसर शबनम  की कहानी भी कई रंग लिए है |  यह किस्सा कहीं  व्यावहारिक  धरातल पर इस पेशे से जुड़ी  बद्तमीज़ी और बड़बोलापन सामने रखता है तो कहीं अपने ही जीवन से जुड़े चिंता के मानवीय रंग भी | यही वजह है कि बारबाला शबनम से मुलाक़ात का यह शाब्दिक चित्रण दिलचस्प भी  है और मर्मस्पर्शी भी | किताब में  अस्सी के दशक  के जिस दौर  के बॉम्बे का जिक्र किया गया है, उस समय बार बालाओं के प्रति अच्छी खासी दीवानगी थी | 'वो थी एक शबनम' किस्से में मुंबई के बियर बार का जीवंत वर्णन है।  अमजद और शबनम  के प्रेम प्रसंग के बैकग्राउंड में इन बार बालाओं की हसरतों  के साथ  बुनियादी   ज़रूरतें  जुटाने की जद्दोज़हद का ज़िक्र भी है  | लेखिका के लिए भी अक्खड़पन और मुंहफट अंदाज वाली शबनम से मिलना और बार डांसरों के बारे में  जानना हैरानी भरे अनुभव लिए था | ज़िन्दगी के प्रति बहुत सहज सी प्रतिक्रिया रखने वाली शबनाम दुबई जाकर पैसा कमाना चाहती थी | ताकि आगे किसी की मोहताज ना रहे |  वो अमजद से पीछा छुड़ा रही थी क्योंकि रिश्तों पर भरोसा करने का रिवाज  शायद उसकी दुनिया का हिस्सा ही नहीं था |  ऐसे ही कई मोड़ शबनम की कहानी  को भी दिल छूने वाला किस्सा बना देते हैं | जिसे लेखिका ने बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा है | 

जयंती लिखती हैं -‘धीरे से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अन्दर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है, आपको पता ही नहीं चलता | किताबे के एक किरदार का भी बॉम्बे से यूँ ही मिलना हुआ |  उस दुनिया की ज्योति’ जो हिजड़ों की दुनिया से है, किताब के तीसरे संस्मरण के केंद्र में है   | ज्योति जो बचपन में  सुरेश नाम का लड़का थी  | जन्म से सुरेश के ज्योति बनने का यह किस्सा संवेदनाओं को झकझोरता है और कई संवेदनशील सवाल भी उठाता हैं | ज्योति का किन्नरों की बस्ती में रहते हुए भी अपने माता-पिता को याद करना पाठक को  भी भावुक  कर जाता है | ज्योति की दुनिया का दुखद सच और समस्याएं जानने  के बाद हम सोचने को विवश भी होते  हैं कि आखिर क्यों  समाज के इतने बड़े तबके के हिस्से इंसानी हक़ भी नहीं आये | जयंती एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के सिलसिले में ज्योति से  मिलती हैं । कई मुलाकातों में वे हिजड़ों के रहन-सहन, शादी ब्याह, गुरु-चेली के रिश्तों और किन्नर समाज के जीवनयापन से  जुड़ी  दूसरी कई दुश्वारियों से रूबरू होती हैं |  ऐसी अधिकतर बातें आमजन भी नहीं जानते | इन बातों और किस्सों को लेखिका ने बहुत सहज अंदाज़ में संजोया है | यही वजह है कि जीवन के कटु सच दुश्वारियों  को सामने रखते ये किरदार उनके मन के करीब  प्रतीत होते हैं |  मन से जुड़ीं ये कहानियां पढ़ने वालों के मन पर भी दस्तक देती हैं |  जो ज़िंदगी की जद्दोज़हद समझा जाती हैं | जयंती कहती भी हैं कि मुंबई एक शहर भर  नहीं है  |  ज़िंदगी जीने और अपने आप को समझने का गेटवे भी है |  

06 March 2018

कोलाहल





विचार साझा करने के हर माध्यम ने
संवेदनाओं की ओट में हमें
बना दिया बेहद असंवेदनशील
भुला दिया अंतर घटना और दुर्घटना का
मिटा दी लकीर सूचित करने  शोर मचाने के मध्य
कहना  कोलाहल बन गया
आवाज़ उठाने  के माध्यम
बन गए ऊँचे मचान
जिनपर चढ़कर
स्वयं को हर क्षेत्र का विशेषज्ञ समझ
सार्थक कहने  नाम पर
हम अपने ही शब्दों को अर्थहीन बना रहे  |






17 February 2018

बजट - महिलाओं की उम्मीदें, कुछ पूरी कुछ अधूरी


गांवों से लेकर शहरों तक आधी दुनिया की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए बजट में कुछ कल्याणकारी योजनाओं और महिला सशक्तीकरण को लेकर सोचा जरूर गया है पर आधी आबादी से  जुड़ी कई अहम् बातों की अनदेखी भी हुई है | दरअसल, इस सरकार के इस आख़िरी पूर्ण बजट  को  लेकर महिलाओं के पास आशाओं की एक  लंबी सूची थी  |  महिलाओं के लिए सुरक्षा और विकास के साथ-साथ रसोई का खर्च भी मायने रखता है  | ( गंभीर समाचार पत्रिका में प्रकाशित ) 





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29 December 2017

न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने वाला निर्णय



मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में करीब दो महीने पहले  नाबालिग लड़की से गैंगरेप की जिस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था, उसमें चारों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा  हुई  है | गौरतलब है कि  भोपाल की एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जज की अदालत में इस केस  पर प्रतिदिन सुनवाई चली और  फास्ट ट्रैक कोर्ट में चले इस मामले में  36 दिन में फैसला आया | जिसमें चारों दोषियों को उम्रकैद की सजा दी गई है | इस  घटना में  दोषियों का दुस्साहस और अमानवीयता इतनी थी कि आरोपी गैंगरेप के बीच पीड़िता को बेहोश छोड़ पान-गुटखा भी खाने गए और लौटकर फिर  उसके साथ दुष्कर्म किया | साथ ही यह मामला  पुलिस के असंवेदनशील व्यवहार के लिए भी सुर्ख़ियों में रहा | पीड़िता ने अपने पिता के साथ तीन  थानों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई |  यह आमजन का मनोबल तोड़ने वाली बात थी कि  पीड़िता के माता-पिता खुद पुलिसकर्मी हैं,  बावजूद इसके रिपोर्ट लिखवाने के लिए उसे ऐसे असंवेदनशील व्यवहार  को झेलना पड़ा | केस दर्ज करने से आनाकानी करने और पीड़िता की शिकायत को फिल्मी कहानी बताने वाले सात  पुलिसकर्मियों को बाद में सस्पेंड भी किया गया था |  इतना ही नहीं इस केस में मेडिकल विभाग की लापरवाही भी सामने आई थी | जिसके चलते रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टर को सस्पेंड कर दिया गया था | ऐसी व्यवस्थागत विसंगतियों से लड़ते हुए भी यह त्वरित फैसला आना और दोषियों सजा मिलना वाकई एक नजीर बनने वाला निर्णय है | 

हमारी लचर न्यायिक व्यवस्था में ऐसे फैसले वाकई उम्मीद जगाने वाले उदाहरण हैं | आमतौर पर ऐसे मामलों में सालों कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने में निकल जाते हैं और दोषी सजा भी नहीं पाते | एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साल पोक्सो के तहत  पंद्रह हज़ार मामले दर्ज किये गए लेकिन मात्र  चार  प्रतिशत मामलों में अपराधी को सजा हुई | इनमें  नब्बे फीसदी मामले लंबित हैं और  छह  फीसदी मामलों में अपराधी बरी हो गए | कोई हैरानी नहीं ऐसी लचर व्यवस्था के चलते भी ऐसे बर्बर मामलों के आंकड़े बढ़ रहे हैं |  कितने ही मामलों में तो   ऐसी कुत्सित प्रवृत्ति के अपराधियों ने  सजा से बचकर फिर ऐसी ही किसी आपराधिक घटना को भी अंजाम दिया है  | यही वजह है कि कोर्ट के फैसले पर इस नाबालिग लड़की के अभिभावकों का कहना है कि  "वे दोषियों के लिए फांसी चाहते थे, लेकिन इस फैसले से भी संतुष्ट हैं,  कम से कम दोषी जिंदा रहने तक जेल में तो रहेंगें तो फिर ऐसा गुनाह कभी नहीं कर पाएंगे।" यकीनन यह सही भी है | इस घटना के दोषियों का जीवन पर्यंत जेल में रहने और  इस तरह के मामलों में जल्दी सुनवाई होने से ना केवल कुत्सित सोच वालेलोगों  के हौसले पस्त होते हैं बल्कि आमजन का न्यायिक व्यवस्था में भरोसा भी बढ़ता है । यह मामला वाकई एक उदाहरण है  क्योंकि व्यवस्था की लचरता और असंवेदनशीलता से लड़ते हुए पीड़िता के माता-पिता ने भी हौसला बनाये रखा  | आमतौर पर बेटी से ही सवाल किये जाने वाले हमारे समाज में यह बड़ी बात है कि पिता खुद पीड़िता के साथ  घटनास्थल पर गए और दो आरोपियों को पकड़ा | यह उनकी हिम्मत ही थी कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए जिस केस के घटनाक्रम को ट्रैजडी ऑफ एरर्स करार दिया, उन्होंने  हार नहीं मानी |  

 दरअसल, देश में न्यायिक लचरता और प्रशासनिक गैर जिम्मेदारी की बात किसी से छुपी नहीं है | मामला कैसा भी हो अगर अक्सर उसकी लीपापोती की कोशिश की जाती है | महिलाओं के साथ होने वाले दुष्कर्म जैसे हादसों में तो उलटा पीड़िता से ही अनगिनत सवाल किये जाते हैं | इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ | पुलिस जब थानों के सीमा विवाद में उलझी थी, तभी  पीड़िता और उसके परिजन आरोपियों को ढूंढने निकल गए।   उन्होंने दो बदमाशों को पकड़कर पुलिस के सामने पेश  किया तब जाकर मामला दर्ज हो पाया। लापरवाही की हद ही कही जायेगी कि मेडिकल रिपोर्ट में  डॉक्टरों ने इस बर्बरता को आपसी सहमति से बनाया गया शारीरिक संबंध करार दिया था। मामला सामने आने के बाद दोबारा संशोधित रिपोर्ट जारी कर उन्होंने गैंगरेप की पुष्टि की |ऐसे में हमारे देश में कानून लचरता, जाँच और पुलिस की कार्यवाही के नाम पर ख़ुद पीड़िता के परिवार का पीड़ित बन जाना वाकई आमजन को निराश करने वाला है | इतना ही नहीं समाज में भी ऐसे दुष्कर्म के दंश को झेलने वाली महिला के साथ अपमानजनक व्यवहार ही किया जाता है | ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाओं के लिए भी कहीं ना कहीं  महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाती है | ऐसी अमानवीयता का शिकार बनीं महिलाओं का जीवन बहुत मुश्किलों से भरा बन ही जाता है । जब भी किसी महिला के साथ यह जघन्य अपराध होता है, कभी सवाल उसके कपड़ों पर तो कभी देर रात घर से बाहर रहने पर उठाए जाते हैं | जिसके चलते विकृत हो रहे माहौल और प्रशासनिक लचरता के बारे में गंभीरता से  सोचा ही नहीं जाता | कुलमिलाकर देखें तो ऐसी पीड़ा झेलने वाली महिलाओं के लिए किसी भी स्तर पर सहयोग भरा माहौल देखने में नहीं आता | 

 असल में देखा जाये तो सामूहिक दुष्कर्म के ऐसे बर्बर मामले केवल शारीरिक शोषण की घटनायें भर नहीं हैं । यह अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस और न्यायिक लचरता की बानगी हैं जो समाज के आम नागरिक के लिए भय का माहौल बना रही हैं | यही वजह है कि न्यायिक लचरता और कानून से मिल रही मायूसी के बीच आया यह निर्णय विश्वास जगाने वाला फैसला है । हालिया बरसों में जिस तरह हर उम्र की महिलाओं के लिए हमारा परिवेश असुरक्षित हो रहा है, ऐसे निर्णय जरूरी भी हैं |  हरिभूमि में प्रकाशित मेरे लेख से )