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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

12 August 2019

सुषमा स्वराज ----- देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व

जिस देश की आधी आबादी आज भी सुरक्षा, सम्मान और समानता के मोर्चे पर  लड़ाई लड़ रही हो, वहां की आम  स्त्रियों के लिए  सुषमा स्वराज जैसी नेता का व्यक्तित्व पीढ़ियों तक उम्मीद और हौसले की बुनियाद रहेगा | सुषमा स्वराज ने इस देश की महिलाओं को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से यह समझाया है  कि आम सा जीवन जीते हुए भी ख़ास बना जा सकता है |  बदलाव लाने की ठानी जा सकती है | सहज और संयत रहते हुए भी प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी जा सकती है |  अपनी संस्कृति से जुड़ाव रखते हुए  देश ही नहीं  विदेश में भी अपनी और अपने  मुल्क की ख़ास प्रतिष्ठा हासिल की जा सकती है | इतना ही नहीं उन्हें  भारतीय संस्कृति की राजदूत भी  कहा जा सकता है | वे तीज  पर्व  मनाते हुए भी दिखीं तो  महिलाओं की अस्मिता के लिए आवाज़ बुलंद करते हुए भी |   यही वजह है कि  उनका गरिमामयी  और विचारशील व्यक्तित्व देश की आम स्त्रियों को सदैव बेहद अपना सा लगा |

भारतीय राजनीति की यह कद्दावर और विदुषी नेता शुरुआत से ही एक सामर्थ्यवान सोच वाली स्त्री भी रहीं |  संघर्ष और सकारात्मक समझ के साथ  देश के राजनीतिक पटल पर अपना अहम् स्थान बनाया |  इतना ही नहीं वे अपने घर-परिवार के दायित्वों और राजनेता की भूमिका, दोनों का निर्वहन करने में पूरी तरह सफल रहीं  | अपने परिवार के प्रति समर्पित सुषमा ने राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद  निजी जिंदगी में भी अपनी जिम्मेदारियों  को पूरे मनोयोग से निभाया | भारत जैसे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे वाले देश में उनके जीवन का यह पहलू यकीनन प्रेरणादायी है |  क्योंकि यहाँ अधिकतर स्त्रियाँ कई मोर्चों पर जूझते हुए, अनगिनत दायित्व निभाते हुए आगे बढती हैं | सुषमा  जितनी  कुशल सांसद, प्रशासक, केंद्रीय मंत्री और ओजस्वी वक्ता रहीं  उतनी  सहज और मानवीय भावों से भरी इन्सान भी |  यही वजह है कि वे एक राजनीतिक व्यक्तित्व ही नहीं जन-जन के हृदय में बसने वाली जन-प्रतिनिधि भी साबित हुईं |  हमारे यहाँ राजनीतिक पार्टियों में महिलाओं को एक सहयोगी कार्यकर्ता के तौर पर  ही देखा जाता रहा है । इतना ही नहीं उनकी निर्णयात्मक  भूमिका पर भी हमेशा ही सवाल उठाये जाते रहे हैं । ऐसे में सुषमा भारतीय संसद की ऐसी अकेली महिला नेता रहीं, जिन्हें असाधारण सांसद भी चुना गया | पड़ोसी देश को लेकर तीखे तेवर अपनाने की बात हो आया और आमजन की मदद के लिए संवेदनशीलता भरा व्यवहार,  उनका प्रेरणादायी और प्रभावी व्यक्तित्व  सदा के लिए देश और विदेशों में बसे भारतीयों  के मन दर्ज हो गया |  पराई धरती पर जा बसे भारतीय नागरिकों के मन में तो उन्होंने एक भरोसा पैदा किया कि संकट के समय उन्हें अपने आँगन से मदद मिल सकती है । भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने सजग व्यक्तित्व  और विचारशील राजनीतिज्ञ की भूमिका अदा की |  इन्हीं मानवीय भावों के बल पर भारतीय राजनीति  में आधी आबादी का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने वाली सुषमा ने वैश्विक स्तर पर देश की साख को नई पहचान दी  । कूटनीतिक मोर्चे पर सधकर बोलने वाली सुषमा स्वराज  मदद और  इंसानी सरोकारों के मामले में सदैव सहजता से संवाद करती  नज़र आईं |

उनका मन सदैव ममत्व और संवेदनाओं से लबरेज़ रहा | यही वजह है कि  भारत और पाकिस्तान  के तनावपूर्ण सम्बन्धों के बावजूद 2016 में सुषमा चंडीगढ़ में  ग्लोबल यूथ पीस फेस्टिवल में हिस्सा लेने आईं  पाकिस्तानी लड़कियों  के लिए भी आम स्त्री की तरह ही  चिंतित दिखीं थीं | तब वापसी की तय तारीख में संशय होने सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान से आये इस  दल की सुरक्षित वापसी का भरोसा दिलाया था । उनके सुरक्षित और सम्मानपूर्वक अपने घर लौटने का वादा करते हुए भारत विदेश मंत्री ने  ट्वीट किया था कि   "क्योंकि बेटियां सबकी साझी होती हैं, किसी सीमा में बंधी नहीं होतीं ।" उनके इन भावों ने पूरी दुनिया का मन जीत लिया था | । कूटनीटिक बयानों से  परे उनका यूँ यह साधारण बात सोचना और कहना उनके असाधारण व्यक्तित्व को परिलक्षित कर गया था, उस उम्मीद का आधार बना था कि वे इंसानी रिश्तों को सबसे ऊपर रखती हैं  ।यही वजह है कि हमेशा प्रभावी और तार्किक  तरीके से अपने राजनीतिक विचार रखने वाली सुषमा स्वराज विदेश मंत्री के तौर पर जज्बाती बातों को भी गहनता से समझने के लिए जानी जायेंगीं |

भारतीय राजनीति में  महिलाओं  के प्रतिनिधित्व के जो हालात हैं, उनमें ऐसे चहरे कम ही  हैं जिन्हें  जन-जन में मन में स्थान  मिला हो ।  सुषमा स्वराज ऐसे ही चेहरों में से एक रहीं | वे  अपने गरिमामयी  व्यवहार  और कर्मशील व्यक्तित्व बल पर भारतीय राजनीति की लोकप्रियता के शिखर को छूने में कामयाब हो सकीं |  उनकी सहजता और विचारशीलता अपने आप  में एक मिसाल है । वे भारतीयता का सलोना चेहरा बनीं |  उनकी जनप्रियता  राजनीति  में महिलाओं की भागीदारी से जुड़े कई मिथक  तोड़ने वाली है । राजनीतिक दावपेचों और कूटनीतिक चालों के बावजूद भी उनके इस संवेदनशील व्यवहार और विचार को  आमजन  ही नहीं विरोधियों से भी समर्थन और सराहना मिली |  बतौर विदेश मंत्री उन्होंनें  वैश्विक स्तर पर भारत के लिए सकारात्मक और संवेदनशील राष्ट्र की  छवि पेश की  | सुषमा स्वराज जिस तरह अपना राजनीतिक और वैचारिक पक्ष सशक्त ढंग से सामने रखती  थीं, ठीक उसी तरह एक संवेदनशील हृदय वाली महिला  के तौर पर  भी लोगों से जुड़ी  रहीं | उनका यह सफर देश की आम स्त्रियों के लिए प्रेरणादायी है | 


03 August 2019

स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति

हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट  ‘हेल्दी स्टेट प्रोगेसिव इंडिया’ ने  देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति को सामने रखा है | ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ रिपोर्ट के इस दूसरे संस्करण में सामने आये बिगड़ती  चिकित्स्कीय सेवाओं के हालात वाकई चिंतनीय हैं | गौरतलब है कि इस अध्ययन के अंतर्गत नीति आयोग ने राज्यों की एक रैंकिंग जारी की है।  23 संकेतकों  को  आधार बनाकर राज्यों की सूची  तैयार की गई है | ये सभी संकेतक जीवन सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक हैं |  इनमें  नवजात  मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय लिंगानुपात, संचालन व्यवस्था-अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि  के  साथ ही   नर्सों और डॉक्टरों के खाली पद आदि शामिल हैं |  भारत में चिकित्सकीय सेवाओं की  दुःखद हकीकत बयान करने वाली इस रिपोर्ट  को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक और नीति आयोग ने मिलकर तैयार किया है।  रिपोर्ट को तीन हिस्सों बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बांटकर बनाया गया है | 21 प्रदेशों की  इस फेहरिस्त में देश के सबसे बड़े राज्य,  उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर बताई गई है।  यू पी के बाद क्रमश: बिहार और  ओडिशा जैसे राज्यों को स्थान दिया गया है | दरअसल,  भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति हमेशा से ही चिंता का विषय रही है | जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्स्कीय सेवाओं की स्थिति नागरिकों को निराश ही करती  आई  है | 

अफ़सोस कि स्वास्थ्य सेवाओं की स्तरीय स्थिति के मामले में भारत विकसित देशों से तो पीछे है ही कई विकासशील देशों से भी बराबरी नहीं कर पा रहा है । हम स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर मानक पर हम दुनिया के देशों में निचले पायदान पर खड़े हैं । हमारे यहाँ चिकित्सा सुविधाओं जैसी अतिमहत्त्वपूर्ण सेवाओं के बरसों से वही हालात बने हुए हैं | विचारणीय है नीति आयोग ने दूसरी बार  स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर यह रैंकिंग जारी की है | पिछले साल भी  बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस सूची  में शामिल थे |  ऐसे में यह सवाल अहम् है कि बीमारियां हों या संक्रमण,  जो व्याधियां  बीते बरस लोगों की जान ले  रहीं थीं वही इस साल भी दस्तक दे रही हैं |  प्रश्न यह है कि आखिर क्यों गंभीर बीमारियां फैलने पर भी सही और सकारात्मक कदम उठाते हुए आगे के लिए कोई सबक नहीं लिया जाता । जबकि किसी भी देश के नागरिकों की सेहत वहां के जन-संसाधन के स्वास्थ्य की रक्षा, आर्थिक उन्नति  और स्तरीय जीवन जीने की मानवीय परिस्थितियों  की बानगी होती है |  ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों  को स्वास्थ्य के क्षेत्र को बुनियादी तौर पर मजबूत का प्रण करना चाहिए |  सरकार हो या समाज,  हमें यह समझना होगा कि आर्थिक विकास और सफलता से जुड़ी सभी महत्वाकांक्षी योजनाओं की कामयाबी के मायने भी तभी हैं जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार हो | आमजन की सेहत को बेहतर संभाल मिले । ( जनसत्ता में प्रकाशित लेख का अंश )
   

अन्तरिक्ष विज्ञान में सिरमौर


पाँच साल पहले मार्स ऑर्बिटर मिशन  'मॉम' की इस सफलता के बाद अख़बारों, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया तक,   सहज और साधारण सी दिखने-लगने वाली असाधारण प्रतिभा वाली  स्त्रियों की तस्वीरें दुनियाभर में छा गईं थीं |  ये सभी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की महिला वैज्ञानिक थीं, जो   भारत  के  प्रथम मंगल अभियान की टीम का अहम् हिस्सा रहीं |  भारत को अंतरिक्ष में मिली  मंगल मिशन की ऐतिहासिक सफलता में महिला वैज्ञानिकों की भूमिका को वैश्विक स्तर पर  रेखांकित किया था | गौरतलब है कि  मार्स आर्बिटर मिशन  की  कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने  वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए मार्स आर्बिटर मिशन को मातृत्व के संदर्भ में 'मॉम' कहा था |  इसरो के इस अंतरिक्ष  प्रोजेक्ट की यूनिट में कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को महिला वैज्ञानिकों ने बखूबी निभाया था | इस यूनिट में क़रीब डेढ़ सौ से दो सौ महिला वैज्ञानिकों ने कई मोर्चों  अहम् भागीदारी निभाई  थी | जिनमें 8  आठ महिलाओं की बड़ी भूमिका रही थी |  हाल ही सफलतापूर्वक लांच किये गए चंद्रयान -2 अभियान में भी  इसरो की दो महिला वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है | अपने देश के  सपनों को आकार देने वाले  चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट में ऋतु करिधाल अभियान निदेशक और एम. वनिता  परियोजना निदेशक हैं | सुखद है कि भारत का अंतरिक्ष में फतेह पाने का  यह सिलसिला विज्ञान की दुनिया में देश की आधी आबादी की भूमिका भी पुख्ता कर रहा है |  

 ख़ास प्रतिभा की धनी आम सी महिलाएं  

विज्ञान के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी  बढ़ना सामजिक-पारिवारिक स्तर भी बड़ा बदलाव लाएगी | वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी जागरूकता  स्त्री जीवन से जुड़ी कई रूढ़ियों से भी मुक्ति दिला सकती है | आज ज़िंदगी के हर मोर्चे पर महिलाएं बराबरी से शामिल हैं | खेल का मैदान हो, राजनीति का अखाड़ा हो या फिर अंतरिक्ष से जुड़े अनुसन्धान की दुनिया |  हालांकि हमारे यहाँ कई कारणों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं की संख्या कम रही है  | यही वजह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को कम करने और आधी आबादी का प्रतिनिधित्‍व बढ़ाने के लिए प्रशासनिक ही नहीं सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी सहयोगी वातावरण बनाना जरूरी है | ताकि बड़ी संख्या में युवा महिलाएं  विज्ञान की दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा सकें | सुखद है कि इस मोर्चे पर भी  धीरे-धीरे स्थिति बदल भी  रही है |  विज्ञान और अनुसन्धान की दुनिया में न  केवल महिलाओं की  हिस्सेदारी बढ़ रही है, बल्कि वे नेतृत्वकारी भूमिका में भी अपना अहम् योगदान दे रही हैं |  ( हाल ही में दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश )  

20 June 2019

आपसी रंजिशों से उपजी अमानवीयता चिंतनीय

अमानवीय सोच और क्रूरता की कोई हद नहीं बची है अब | छोटी-छोटी बातों से उपजी रंजिशें रक्तपात की घटनाओं का कारण बन रही हैं | हाल ही में अलीगढ़ के टप्पल इलाके में  तीन साल की बच्ची की नृशंस हत्या इसी की बानगी है |  गौरतलब है कि  हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में  महज 10 हजार रुपए के लिए इस घटना को अंजाम दिया गया। यह रकम बच्ची के पिता से उधार ली गई थी और आरोपी उसे वापस नहीं कर पाया था।  जिसके चलते आरोपी और बच्ची के पिता के बीच बहस हुई थी |  सवाल है इस पूरे प्रकरण में उस मासूम की क्या गलती है ?  उसे किस बात की सजा दी गई ? जबकि उधार चुकाने को लेकर   परिवारजनों से बहस करने वाले आरोपी ने अपने  साथी के साथ मिल कर  बच्ची का अपहरण किया और फिर हत्या कर कूड़े में फेंक दिया | पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, मौत का कारण दम घुटना  है | लेकिन मौत से पहले  बच्ची को बहुत ज़्यादा पीटा गया है |  आत्मा को झकझोर देने वाले इस मामले में मासूम बच्ची का सड़ा-गला देखकर शव पुलिसवालों का  ही नहीं  पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों का भी दिल दहल गया | 

 दरअसल, आपसी रंजिश, बेवजह का आक्रोश और नैतिक पतन ऐसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने वाले अहम् कारण बनते जा रहे हैं |  दुःखद है कि ऐसी अमानवीय वृत्तियाँ अब इंसानी मन पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गई हैं | नतीजनतन,  ना सही गलत सोचने की सुध बची है और ना ही इंसानियत  का मान करने का भाव | ऐसे में मन को झकझोर  देने वाली इन  घटनाओं की पुरावृत्ति इनका सबसे दुखद पहलू है | छोटी बच्चियों के साथ बर्बरता की बात हो या आपसी रंजिश के चलते  जान ले लेने का मामला | ऐसी घटनाएं आये दिन हो रही हैं |  आस-पड़ोस हो,  रिश्तेदारी हो या कोई सड़क पर चलता कोई अनजान इंसान | जाने कैसा आक्रोश  है कि जान  ले लेने की बर्बर घटनाएं बहुत आम हो गई हैं  ?  इस मासूम बच्ची की हत्या की  जड़ में  भी मात्र दस हजार रुपये की उधारी ही है |  

आजकल हर छोटी बात में सबक सिखाने या बदला लेने की सोच भी हावी रहने लगी है | इस मामले में भी आरोपी ने स्वीकारा है  कि उसने बेइज्जती का बदला लेने के लिए अपने साथी के  संग मिलकर  इस भयावह  घटना को अंजाम दिया है । अफसोसनाक है कि  प्रशासन-तंत्र की विफलता भी ऐसी बढती घटनाओं के लिए जिम्मेदार है |  जब तक ऐसा कोई मामला  तूल नहीं पकड़ता कोई सक्रियता नहीं दिखाई जाती   इतना ही नहीं हमारी लचर कानून व्यवस्था भी में अपराधियों को दंड का भय नहीं है |  

हालिया सालों में रंजिशों के कारण हो रही हत्याओं के आंकड़े तेज़ी से बढ़े हैं | इनमें सियासी रंजिशों से लेकर सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर भी प्रतिशोध लेने के मामले शामिल हैं |  हाल ही में सामने आये  दिल्ली पुलिस  के आंकड़ों  बताते हैं कि देश राजधानी में  वर्ष 2017 में 462 के मुकाबले 2018 में 477 लोगों की  हत्या कर दी गई। इनमें सबसे ज्यादा 38 प्रतिशत लोगों को किसी न किसी रंजिश की वजह से जान गंवानी पड़ी। हर दो दिन में औसतन तीन लोगों को किसी न किसी वजह से मौत के घाट उतार दिया गया। कई मामलों में तो बेहद छोटी सी बात पर  किस इंसान की जान ले ली गई है | कभी -कभी बरसों के मनमुटाव के बाद ऐसी घटनाओं को सोच-समझकर अंजाम दिया जाता है |  गाँव-कस्बे हों या महानगर  क्रोध और प्रतिशोध का भाव इस हद तक बढ़ गया  है कि  मामूली रंजिश में भी लोग परायों को ही नहीं अपनों को भी दर्दनाक मौत देने में नहीं चूक रहे | ऐसे  भी मामले हुए हैं जिनमें केवल शक के आधार पर आवेश में आकर अपनों-परायों की जान लेने के अपराध हुए हैं |  निःसंदेह, इन घटनाओं की बढ़ती संख्या बताती है कि अब नैतिकता के कोई मापदण्ड नहीं बचे हैं |   बस, कहीं बदला लेने का भाव बाकी है तो कहीं सबक सिखाने की सोच | 

विचारणीय है कि इन मामलों से अब एक और पहलू भी जुड़ गया है | अब मन को उद्वेलित करने वाली इन घटनाओं के प्रति भी जुर्म का विरोध करने का  भाव  नहीं बल्कि चुनी हुई चुप्पी या मुखरता देखने को मिलती है | सवाल यह है कि जिस समाज में जघन्य अपराधों का विरोध भी सलेक्टिव अप्रोच के साथ किया जाये वहां आपराधिक  प्रवृत्ति के लोगों को डर हो भी तो  किसका ?  अब इस बंटे हुए समाज में बेटियों को सुरक्षा का भरोसा दे भी कौन ?  हाँ,  हम भूल रहे हैं कि धर्म, सम्प्रदाय और  जात -पात के खांचे में  बंटकर हम इस अमानवीयता को और  खाद  पानी दे रहे हैं | जबकि इस  भेदभाव का फर्क तक ना समझने वाली  मासूम बच्चियां आये दिन हो रहे बर्बर मामलों में एक इंसान होने की ख़ता की सजा भोग रही  हैं | ऐसी घटनाओं को लेकर दी जा रहीं प्रतिक्रियाएं हों या मौन रहने चुनाव  | समाज के  विद्रूप हालातों के बारे में  तो सोचा  ही नहीं जा रहा है | सार्थक कानूनी बदलावों और सक्रिय कार्रवाई करने का दबाव बनाने के बजाय बहुत कुछ आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमट जाता है | जिसका फायदा आपराधिक प्रवृत्ति के लोग उठाते हैं | कानून और प्रशासनिक अमले की लचरता तो  पहले से ही निराश करने वाली है |  ऐसे में समाज का यूँ   बंटना वाकई तकलीफदेह है | 

यह एक कटु सच है कि समाज में हर स्तर पर लोगों में असंतोष और अधीरता की भावना पनप रही है।  ऐसी  घटनाएं आक्रोश, असहिष्णुता और मानसिक रुग्णता की  बानगी बन रही हैं  | आज की आपाधापी ने सबसे पहले हमारा धैर्य ही छीना है | जिसके चलते नकारात्मकता और बेरहमी भी हमारे जीवन में घुसपैठ करने में कामयाब हुई है | अफ़सोस कि यह हिंसक व्यवहार अब आम जीवन में  अपनी इतनी दखल रखने लगा है कि ऐसे बर्बर मामले सामने आ रहे हैं | 

08 May 2019

कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ?

हाल ही में राजधानी दिल्ली के फतेहपुर बेरी में डेढ़ साल के बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी गई | इस दिल दहला देने वाले मामले  को मात्र आठ साल के एक बच्चे ने ही अंजाम दिया है |  क्रूरता का कारण बस इतना कि कुछ दिन पहले आरोपी और उसके भाई को मृतक बच्चे की बहन ने धक्का देकर गिरा दिया था | जिसका बदला लेने के लिए उसने यह क्रूर कदम उठाया | यह वाकया हैरान भी करता है और भयभीत भी  कि मात्र आठ साल का बच्चा, रात के समय पड़ोस के मकान की छत पर माँ के पास सो रहे बच्चे के पास छत के रास्ते ही आया और सोते हुए मासूम को उठाकर ले गया।  उसने बर्बर व्यवहार करते हुए पहले घर के बाहर बनी पानी की  टंकी में उसे तीन-चार बार डुबोया और फिर घर से कुछ दूरी पर ही करीब तीन फुट गहरी नाली में  गिरा दिया। इतना ही नहीं डेढ़ साल के इस अबोध  को चोट पहुंचाने के लिए उसने बच्चे को पत्थर भी मारे। 
निःसंदेह, रात के अँधेरे में ऐसी भयावह घटना को अंजाम देने का दुस्साहस करने वाले बच्चे की मानसिकता और परवरिश के परिवेश को लेकर कई सवाल उठने लाजिमी हैं | साथ ही यह सोचा जाना भी जरूरी है कि हमारे यहाँ साल-दर -साल बाल अपराधियों की संख्या क्यों बढ़ रही है ?  उनका मासूम मन जिन घटनाओं को अंजाम दे रहा है, वो कोई छोटी-मोटी वारदातें नहीं हैं | हद दर्जे के बर्बर और असंवेदनशील मामलों में कम उम्र के बच्चों की भागीदारी देखने को मिल रही है |  हालिया  बरसों में   हर तरह की  सामाजिक- पारिवारिक पृष्ठभूमि  से जुड़े बच्चे ऐसे मामलों में भागीदार पाए गये हैं |  महंगे स्कूलों में पढने वाले संभ्रांत परिवारों के लाडलों से लेकर अशिक्षित और आम सी पृष्ठभूमि के परिवारों में पले-बढे बच्चों की भागीदारी के ऐसे कई मामले आये हैं | आखिर कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ? 

बच्चों में बढ़ रही असंवेदनशीलता, आक्रामकता और नकारात्मक व्यवहार अभिभावकों के लिए भी बड़ी दुविधा पैदा कर रहा है | लेकिन सच तो यह है कि बालमन में आ रही विचार और व्यवहार की दिशाहीनता का हल भी उनके अपनों को ही तलाशना होगा | गौरतलब है कि आक्रामता और रंजिश के चलते जान ले लेने के मामलों को बड़ी उम्र के लोग भी आये दिन अंजाम दे रहे  हैं |  कमोबेश हर आयु वर्ग के लोगों में अब ठहराव और संवेदनशीलता का अभाव है  | घर-परिवार ही नहीं पूरे परिवेश का माहौल ही असंवेदनशील हो गया है | ऐसे में अभिभावकों की सोचना होगा कि सब कुछ जुटाने के फेर में कहीं बच्चे ही पीछे ना छूट ना जाएँ |  (  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश )