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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

02 December 2018

मेहनत और प्रतिबद्धता का मुक्का

 डेलीन्यूज़ में 

 चैंपियन खिलाड़ी एमसी मैरी कॉम ने महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद  आंसुओं के साथ कहा कि 'मैं भारत को स्वर्ण पदक के अलावा और कुछ नहीं दे सकती' लेकिन सच तो यह कि देश को गौरवान्वित करने साथ ही मैरी ने भारत की महिलाओं को प्रतिबद्धता और हौसले की सौगात दी है | वे एक माँ और पत्नी की भूमिका का निर्वहन करते हुए ऐसे क्षेत्र में उपलब्धि हासिल कर विश्व चैम्पियन बनीं हैं जिसमें महिलाओं का दखल न के बराबर था | हालाँकि शुरुआत से ही मैरी का सफर  आसान नहीं रहा पर संघर्ष और प्रतिबद्धता के बल पर  उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अपना ही नहीं देश का भी नाम रौशन किया है  |  गौरतलब है कि हाल ही में भारत की दिग्गज खिलाड़ी एमसी मैरी कॉम ने  महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के10वें संस्करण में 48 किलोग्राम भारवर्ग का खिताब अपने नाम कर लिया है  | यूक्रेन की युवा खिलाड़ी हाना ओखोटा को 5-0 से मात देकर मैरी कॉम, स्वर्ण पदक  हासिल कर  छह वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाली दुनिया की पहली खिलाड़ी बन गई हैं |  इससे पहले मैरी  ने साल 2002, 2005, 2006, 2008 और साल 2010 में विश्व चैंपियनशिप का खिताब  अपने नाम किया था |  इसके अलावा  मैरी  2001 में रजत पदक भी जीत चुकी हैं।  मैरी कॉम अब  विश्व चैम्पियनशिप (महिला एवं पुरुष) में सबसे अधिक पदक जीतने वाली खिलाड़ी भी बन गईं हैं | 
 दैनिक जागरण में 
हाल ही में भारत की मेजबानी में 70 देशों की 300 महिलाएं दिल्ली में आयोजित अन्तराष्ट्रीय मुक्केबाजी के महाकुम्भ में शामिल हुईं तो भारतीय महिला मुक्केबाजों से काफी उम्मीदें लगी हुईं थी   | गौरतलब है कि 12 साल पहले जब हमारा देश इसका मेजबान था तब कोई विशेष कामयाबी हमारे हिस्से नहीं आई थी | महिला मुक्केबाजी जैसी स्पर्धा में भारत की स्थिति बेहद कमज़ोर थी | यह होना लाजिमी भी था क्योंकि इस क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना अनगिनत  मुश्किलों को पार करने जैसा था |  हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में शारीरिक सौष्ठव वाली इस खेल में बेटियों का दखल सहज स्वीकार्य नहीं था | लेकिन हालिया बरसों में भारत में विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ खिलाड़ी अपनी पहचान बना रही हैं | यही वजह है कि अब इस खेल में बेटियों की भागीदारी को लेकर भी लोगों की राय बदल रही है | तीन बच्चों की मां और भारत की स्टार महिला मुक्केबाज एमसी  मैरी कॉम खुद मणिपुर में बॉक्सिंग अकादमी चलाती हैं | कभी खेतों  में काम करते हुए अपना बचपन बिताने वाली देश की इस बेटी ने अपने से 13 साल छोटी प्रतिद्वंदी को हराकर छठी बार विश्व महिला बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा है । मैरी  की  साल 2008 में विश्व मुक्केबाजी और 2014 में एशियन गेम्स में  गोल्ड मेडल लाने वाली जीत तो  यकीनन  स्त्रीमन की दृढ़ता की ही बानगी है |  यह सुखद भी है और सराहनीय भी कि ये दोनों ही स्वर्ण पदक मैरी कॉम ने माँ बनने के बाद  हासिल किये थे | तभी तो उनकी कामयाबी के सफ़र ने महिला बॉक्सिंग के प्रति देश भर में लोगों का नजरिया भी बदला है | यहाँ तक कि  युद्ध की विभाषिका के हालातों से जूझते हुए अपने  परिवार से छुपकर मुक्केबाजी करने वाली सोमालिया की रमाला अली भी मैरी कॉम को अपनी प्रेरणा मानती हैं |

भारत में जहाँ एक आम खिलाड़ी के लिए संघर्षपूर्ण स्थितियां हैं, वहां मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में तो बेटियों के लिए पहचान बनाना और भी कठिन है | लेकिन कुछ सालों हमारे यहाँ कई महिला मुक्केबाज़ पूरी शिद्दत से इस क्षेत्र में आगे आ रही हैं | सुखद है इनके साथ पारिवारिक सहयोग भी है | खुद मैरी कॉम भी अपनी  कामयाबी के लिए अपने  पति  ओनलर के सहयोग और साथ की बात करती रही हैं | हमारे यहाँ आज भी  बड़ी संख्या में महिलाएं  पारिवारिक दायित्वों के कारण अपने काम से दूरी बना लेती हैं | महिला खिलाड़ियों के जीवन में तो मातृत्व और वैवाहिक  जीवन की जिम्मेदारियों के चलते यह विराम बहुत आम है |  क्योंकि इस क्षेत्र ने सिर्फ नियत समय की ड्यूटी ही नहीं करती होती बल्कि खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय रखना भी जरूरी है |  ऐसे में अपनों का सहयोग और भरोसा किसी भी क्षेत्र में महिलाओं  के लिए आगे बढ़ने की राह सहज  बनाता है | साथ ही समाज का बदलता नजरिया भी बॉक्सिंग की दुनिया में बेटियों के दखल की बड़ी वजह है | आज पिंकी जांगड़ा, सीमा पूनिया, लवलीना बोरगोहेन , स्वीटी बूरा और सिमरनजीत कौर जैसी विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ भारत की पहचान बना रही हैं | भारत में ही आयोजित 10वीं  विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत की चार बॉक्सर सेमीफाइनल में पहुंची हैं  |  इनमें  सिमरनजीत कौर और लवलीना  ने  कांस्य पदक अपने नाम किये हैं | जबकि सोनिया ने  रजत पदक अपने नाम किया | महिला मुक्केबाजी के इस महाकुम्भ में मैरी कॉम के हर भारतीय को गर्वित करने वाले विश्व रिकॉर्ड के साथ एक गोल्ड, एक सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल देश की झोली में आये हैं |

जिस देश में  खेल के मैदान में तिरंगा लहराने का सपना देखने वाली बेटियों के लिए उलझनें आर्थिक ही नहीं सामाजिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाली भी होती हैं, वहां अभावों और विषमताओं की आग में तपकर आगे आने वाली मैरी कॉम जैसी माँओं और बेटियों का सफ़र यकीनन प्रेरणादायी है | जीतने के जज़्बे के मायने समझाने वाली ऐसी कहानियाँ बताती हैं कि बेटियाँ किसी भी मोर्चे पर कम नहीं हैं | इतनी परेशानियाँ उठाकर वे आगे बढ़ सकती हैं तो जरा सोचिये कि सहजता, सुरक्षा और समानता का माहौल पाकर वे सफलता के किस शिखर को छू सकती हैं | मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में भारत की महिलाओं का बढ़ता दबदबा कई मायनों में एक तयशुदा सोच से बाहर आने की बानगी है | इन महिला खिलाड़ियों के संघर्ष को देखकर आशा और विश्वास को एक नया आधार मिलता है | विशेषकर मैरी कॉम की सफलता  तो आत्मविश्वास, जीतने का जज़्बा, माँ का समर्पण और एक स्त्री के मन की दृढ़ता का उदाहरण है, जो कई बेटियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा | 

06 November 2018

ज़मीनी अनुभवों का दस्तावेज - मीडिया के दिग्गज


आज के समय में मीडिया यानी विवाद, विमर्श और निर्बाध आमजन तक पहुंचती सूचनाएं | लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ जिससे जनता को शिकायतें हैं अपर बदलाव की उम्मीदें भी इसी से जुड़ी  हैं |  मीडिया की इसी दुनिया से रूबरू करवाती है  हीरेन्द्र झा की किताब मीडिया के दिग्गज | लेकिन एक अलग अंदाज़ में | यह सफ़र उन चर्चित चेहरों की जुबानी किताब का हिस्सा बना है जो घर-घर में पहचान बना चुके हैं | दर्शकों और पाठकों के लिए किसी के बोलने का अंदाज़ दिलचस्प है तो किसी के लिए शब्द मन पर चस्पा हो जाते हैं | किसी की क्राइम रिपोर्टिंग बहुत प्रभावी होती है तो कोई मानवीय मुद्दों को भावनात्मक सामने रखने में बेहद सफल है | लेकिन इन चेहरों के मीडिया में अपनी पुख्ता जगह बनाने और जन सामान्य के दिल में बस जाने की यात्रा भी कम रोचक नहीं | मीडिया के दिग्गज ऐसे ही सोलह चर्चित चर्चित चेहरों के साक्षात्कार लिए है | पत्रकारिता के  विद्यार्थियों लेकर आम पाठक तक इस किताब के जरिये उन चेहरों के करीब जा पाते हैं जिन्हें वे नाम और चेहरे से पहचानते हैं | लेखक ने भूमिका में यह बात लिखी भी है कि मीडिया के इन दिग्गजों को जानने, उनकी यात्रा से  परिचित होने के साथ ही आप कुछ बुनियादी सवालों के जवाब भी जान सकेंगें | देश के जाने माने मीडियाकर्मियों के साक्षात्कार के इस संग्रह को पढ़ते हुए यह महसूस भी होता है | 

किताब में बहुत सहज और सरल भाषा में सवाल पूछे गए हैं |  हाँ, पूछे गए सभी सवाल जरूरी लगते हैं | इन जाने -माने चेहरों और इनके सफ़र को जानने-समझने की उत्सुकता लिए हैं | किताब में देश चर्चित मीडियाकर्मियों शम्स ताहिर खान- जुर्म अभी बाकि है जाइयेगा नहीं, वर्तिका नन्दा- रानियाँ सब जानती हैं, शशिशेखर- समय को तराशा है उन्होंनें, ओम थानवी- मेरे पास  अज्ञान का भण्डार है, खुरापाती नितिन- रेडियो मेरी इबादत है, मुकेश कुमार- नौकरी मैं चुटकियों में छोड़ता हूँ, डॉ. वेदप्रताप वैदिक-पत्रकारिता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं ठगी की स्वतंत्रता है, दारैन शाहिदी-दस्ताने दारैन, अजीत अंजुम- मेहनत, ईमानदारी, निष्ठा,वफ़ादारी और काम यही मेरी पहचान, ओ पी राठौर-उसकी योजना मेरी कल्पना से बेहतर है, राहुल देव-भाषा बचेगी तभी भारतीयता बचेगी , आलोक पुराणिक- व्यंग्य लेखन की वर्कशॉप हो, दीपक चौरसिया-काजल की कोठरी में मैं काला नहीं, अमीन सायानी- जीवन के हर क्षेत्र में बढ़ा है फूहड़पन, पुण्य प्रसून वाजपेयी- लिटिल मास्टर ऑफ़  जर्नलिज़्म और  पराग  छापेकर- ग्लैमर दिखता है पर इसके पीछे मेहनत है | ये सभी साक्षात्कार मीडिया की दुनिया में इन शख्सियतों के अपने सफ़र को तो बताते ही हैं, पाठक को भी टीवी, अखबार और रेडियो की की दुनिया कई अनजाने पक्षों से रूबरू करवाते हैं |  

इस क्षेत्र में काम करने की मुश्किलों और काम के दबाव को लेकर किये गए कई सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि  मीडिया की दुनिया में पहचान बनाना कितना मुश्किल काम है | किताब में शामिल सभी विस्तृत इंटरव्यूज़ में  मीडिया के मौजूदा हालातों की भी साफ़ झलक मिलती है | एक पुख्ता पहचान बना चुके इन दिग्गजों के संघर्ष को समझने का परिदृश्य इस क्षेत्र की कई और बातों को भी सामने ले आता है | लेखक के सवालों  ने  सभी  दिग्गजों की कामयाबी के पीछे के पूरे सफ़र को सामने लाने का काम बखूबी किया है | यही वजह है कि यह मीडिया  में आने वाले नवांकुरों के लिए यह किताब काफी उपयोगी है | लेखक हीरेन्द्र झा लिखते भी हैं  कि एक रिपोर्टर, एंकर, रेडियो जॉकी में क्या गुण होने चाहिए. आपकी भाषा कैसी हो, आपकी तैयारी कैसी हो ? इन बातों की जानकरी लेकर इस संसार में अपनी राह तलाशना  ज्यादा  बेहतर है | वाकई, इस संसार का हिस्सा बनने से पहले  विद्यार्थियों के अपने चहेते चेहरों की यात्रा का क्रम जनाना रोचक ही नहीं  कई पहलुओं पर चेताने वाला भी है |  उनकी मेहनत और समर्पण की उस बुनियाद से परिचय करवाने वाला है जिसके बूते इन दिग्गजों ने यह ख्याति हासिल की | 
मौजूदा समय में जब मीडिया से  आमजन का भरोसा भी कुछ डगमगा रहा है, कई सवाल इस दुनिया के भीतर झाँकने का सार्थक प्रयास हैं | असल स्थितियों पर रोशनी डालते हैं | दबाव और भागदौड़ से भरी इस दुनिया में इन चहेरों ने कैसे अपनी पहचान बनाई ? परिवार के लिए कैसे समय निकालते हैं ?  क्या ख़बरें गढ़ी जाती हैं ?   नए बच्चों को क्या मशवरा देंगें ?  आपकी जो शैली है, कैसी विकसित की आपने ? एक पत्रकार में क्या खूबी देखते हैं आप ? सफलता को कैसे देखते हैं ?आज कैसी पत्रकारिता हो रही है ? जैसे कितने ही सवाल  मीडिया के संसार को जानने समझने में मददगार हैं |  बात चाहे रेडियो जॉकी बनने की चुनौतियों की हो पत्रकारिता की दुनिया में भाषा और ख़बरों की समझ के  मायने समझने की | टीआरपी के खेल की बात हो या समाचारों को सनसनी बना देने की | किताब में लेखक के सवालों के जवाब में मीडिया के चर्चित चेहरों द्वारा दिए गए जवाब बहुत कुछ बताते- सिखाते और समझाते हैं | कई प्रश्नों के उत्तर  पढ़ने वाले के वैचारिक द्वंद्व को व्यावहारिक राह दिखाने वाले हैं |  सभी साक्षात्कार बेहतरीन हैं जो मीडिया जगत में इन दिग्गजों के ज़मीनी अनुभव  और संघर्ष से रूबरू करवाते हैं | 

23 October 2018

सहज अभिव्यक्ति लिए सतरंगी विमर्श


कवितायें जितनी सहजता से अपनी बात कहती हैं, उतनी ही सरलता से उन शब्दों के भाव मन में उतर जाते हैं | शिल्पा शर्मा  का काव्य संग्रह ' सतरंगी मन' ऐसी ही सहज अभिव्यक्ति लिए है | संकलन में  कई रचनाएं हमारे परिवेश की स्थितियों को लेकर सार्थक प्रश्न उठाती है तो कुछ कविताओं में उन्होंने उस द्वंद्व पर ही सवाल उठाया है, जो हमने समाज को स्त्री पुरुष खांचे में बांटकर खड़ा किया है |  शिल्पा,अपनी कविताओं में एक मानवीय भाव की बात करती हैं |  इसीलिए दोषारोपण की बात नहीं बल्कि सहजता से सच को शब्दों में  ढालती  हैं | रिश्तों नातों और मानवीय भावों से जुड़े जीवन के कई पहलुओं को उन्होंने इसी सादगी के साथ उकेरा है |  

मौजूदा समय में ऐसे पुरुषों की कमी नहीं है जो अपनी जीवनसंगिनी को बराबरी का दर्ज़ा दे रहे हैं | एक  सार्थक रचना 'काश' इन पुरुषों को ऐसा बनने की परवरिश देने वाली दादियों, माँओं और बहनों को समर्पित करते हुए वे लिखती हैं कि

काश मैं उन्हें बता पाती 
भले ही तुम्हे अवसर नहीं मिले 
पर जो अवसर हमने पाए हैं 
वो तुम्हारे समर्थन की देन है .... इसी कविता का एक अंश यह भी है जो पूरी पीढ़ी की उस भागीदारी को रेखांकित करता है, जिसके चलते आज कई  बदलाव सामने हैं - 

तुम्हारे सपनों को वो पंख नहीं मिले 
 जो मिलने चाहिए थे 
तुम्हारी प्रतिभा को वो रंग नहीं मिले 
जो मिलने चाहिए थे 
 तुम्हारे  व्यक्तित्व को वो संबल नहीं मिला 
जो खिलने के लिए निहायत ज़रूरी था -------- पर यह तुम्हारा मौन समर्थन ही था 
जिसने हमें संबल दिया 
काश मैं उन्हें बता पाती 
कि अब समय बदल रहा है 
लोग समझ रहे हैं 
हमारा पूरक पुरुष बदल रहा है | 
एक रचना के साथ परिचय की पंक्तियों में शिल्पा खुद लिखती हैं कि पुरुष के पुरुष और महिला के महिला होने में ही जीवन छुपा है |   छद्मवाद  से बचें तो पूरक बन जीना कितनी जाने खुशियाँ ले आएगा - 

काश... 
यूँ होता कि हम उठ पाते 
स्त्री-पुरुष शरीर से ऊपर 
 गूँथ पाते मन के तार
बुनते एक चादर इन तारों से 
और उस  चादर पर बैठ 
साझा होने का मर्म समझते |
संकलन की एक रचना 'स्व का अर्थ'  स्त्रीमन की उस जद्दोज़हद को विराम देने की बता कहती है जो अनगिनत जिम्मेदारियों के चलते कभी नहीं थमती :) 
नितांत अकेली हूँ 
पर उदास नहीं 
कामों की लम्बी सूची को 
तह कर के 
डाल दिया है 
अलमारी के 
सबसे ऊपरी खाने में 
और चुरा लिया है 
कुछ घंटों का समय  
केवल अपने लिए---- क्योंकि कभी-कभी 

जीवन का  थोड़ा  सा हिस्सा 
स्व के लिए जीना 
भी तो नितांत  ज़रूरी है | 

आज की भागमभाग जिंदगी में पल भर फुरसत नहीं किसी के पास | महानगरों की जिंदगी का यही हाल उनकी रचना  'मशीनी महानगर की कथा' में  समाहित है | 'क्या यही है परम्परा' शीर्षक की कविता त्योहारों पर होने वाले दिखावे और प्रदूषण  पर प्रश्न उठाती है | 'हिसाब', 'मेरा स्त्रीविमर्श', 'औरों के लिए' (जो कम शब्दों एक पेड़ की आत्मकथा सी रचना है ), 'उम्मीद' , 'ये कटु स्त्रियाँ', 'समानता के पैरोकार' और 'घाव' पठनीय बन पड़ी हैं | जीवन का कोई न  कोई अर्थपूर्ण  दृष्टिकोण हर कविता में परिलक्षित होता है |

आज  के समय में सोशल मीडिया में  प्रबुद्ध  दिखते  हुए जो आडम्बर रचा जा रहा है, उसे लेकर उनकी एक रचना  बहुत सामायिक भाव लिये है -

मैदान था युद्द का 
थी उँगलियों की सेना 
ईंट से ईंट बज रही थी 
और  ईंट का जवाब 
दिया जा रहा था 
पत्थरों से 
चाय की चुस्कियों  के बीच | 

क्योंकि मैदान छद्म था 
स्क्रीन और की बोर्ड वाला 
और सूरमा 
कई थे 
ताल ठोंकते 
अपने विचारों को 
बेहतर बताते 
उम्दा इंसान होने का 
पुरजोर दम भरते |  वाकई आभासी संसार का सच यह भी तो है | एक सवाल और जो इसी माध्यम से जुड़ा है और अहम् है- 

दो दिन 
सुर्ख़ियों में रहकर 
कहाँ गम हो जाते हैं 
ये प्रशासकों, मीडिया और 
आम जनता को 
गरमा देनेवाले  मुद्दे 
क्या इतने उथले हो गए हैं 
अब मानवता के 
ये विषय ?
या हम सभी 
पीड़ित हैं / शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस से ? 
या फिर टीआरपी के 
हिसाब से ये ऊपर नीचे
हो जाते हैं------- हमारे दिमागों में भी   ?  
सहजता से उठाये गए सार्थक प्रश्न और जीवन एवं रिश्तों-नातों का खींचा गया व्यावहारिक खाका हैं शिल्पा की कवितायें | जहाँ 'अब ये क्या हुए जाते हैं हम' भौतिकवादी दौड़ में ठहरकर सोचने को विवश करती रचना हैं वहीँ  ' हिसाब'  घर और दफ्तर की जिम्मेदारियों के बीच जूझती स्त्री के मनोभावों का लेखा जोखा है |  रचना 'दबाव' जीवन में संतुष्टि के मायने समझाने की बात करती है | अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत छोटी उम्र में ही माता-पिता को खो देने के चलते संघर्ष और सच्चाइयों से रूबरू हुईं शिल्पा की रचनाओं में उकेरी गईं संवेदनाएं पढ़ने वाले के मन तक पहुँचती है | शब्द उनका हौसला प्रतीत होते हैं | संकलन में कई कविताओं के साथ प्रकाशित अंजना भार्गव की  सुंदर मधुबनी पेंटिंग्स भी मनमोहक हैं | कुलमिलाकर यह संकलन पढ़ना एक सुखद अनुभव रहा |     हार्दिक बधाई और सतत सृजनशील रहने की शुभकामनाएं | 



14 October 2018

अस्मिता के योद्धाओं का सम्मान



मौजूदा समय में स्त्री अस्मिता की लड़ाई दुनिया के हर हिस्से का दुर्भाग्यपूर्ण सच बन गई है | अफ़सोस कि दुनिया के कई हिस्सों में तो यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है |   विशेषकर अशांत और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो बरसों से हालात बेहद चिंतनीय बने हुए हैं | आर्थिक, राजनीतिक स्वार्थ साधने की हिंसक गतिविधियाँ स्त्री जीवन के लिए दंश बन गई हैं |  ऐसे में  युद्धग्रस्त क्षेत्रों में यौन हिंसा के खिलाफ काम करने के लिए डॉ.  डेनिस मुकवेगे और यजीदी कार्यकर्ता नादिया मुराद को इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार  चुना जाना वाकई सराहनीय है |  इन दोनों शख्सियतों ने  यौन हिंसा के खिलाफ लंबी जंग लड़ी है | गौरतलब है कि आईएस के आंतक का शिकार हुई यजीदी दुष्कर्म पीड़िता, नादिया मुराद ने आंतकवादियों की यातना झेलने के बावजूद  संघर्ष किया और महिलाओं की अस्मिता के लिए डटी रहीं |  नादिया ने न सिर्फ खुद पर हुए जुर्म और यौन शोषण के बारे में खुलकर बात की बल्कि 'आवर पीपुल्स फाइट संगठन' की स्थापना कर यौन शोषण के खिलाफ मुहीम भी चलाई | संघर्ष की मिसाल बनी नादिया मुराद मलाला युसूफजई के बाद दूसरी सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता हैं | इसी तरह  डॉक्टर चमत्कार' के नाम से विख्यात डॉ. मुकवेगे  कांगो में लंबे समय से यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए काम करते आ रहे हैं। उन्होंने महिलाओं को  बलात्कार और यौन हिंसा के सदमे से बाहर निकालने के लिए दो दशकों तक काम किया है | वे युद्ध के दौरान महिलाओं के खिलाफ हिंसा के भी  मुखर विरोधी हैं | डॉ. मुकवेगे गंभीर यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के इलाज में  विशेषज्ञता हासिल की है। दुष्कर्म की शिकार बनी महिलाओं की पीड़ा को समझने की संवेदनशीलता लिए एक  प्रेरणादायी व्यक्तित्व बने,  डॉ. मुकवेगे ने अपने साथियों के साथ मिलकर अब तक 30 हजार से ज्यादा  दुष्कर्म पीड़िताओं का इलाज कर उनकी सहायता की है। यकीनन यह जीवट और संवेदनाओं से भरी सोच सरहानीय है |  

दरअसल, यौन हिंसा के वैश्विक अभिशाप से मुक्ति पाने की जंग में  योद्धा साबित होने के लिए दोनों को समानित किया जाना, स्त्री जीवन की इस दर्दनाक  विडंबना की और दुनिया का ध्यान खीचना भी है |  मौजूदा समय में  दुनिया के किसी एक देश में नहीं बल्कि हर हिस्से में स्त्रियाँ इस अमानवीयता को झेलने को विवश हैं |हाल ही में  मीटू कैम्पेन  जैसे अभियान से यह बात पुख्ता हुई थी कि यह पीड़ादायी समस्या कितने बड़े पैमाने पर है |  गौरतलब है कि  संसार के हर हिस्से की महिलाओं को जोड़ने वाले मी टू अभियान में देश, धर्म, जाति और  समुदाय  से परे दुनियाभर की महिलाओं ने यौन शौषण को लेकर अपनी चुप्प तोड़ी  थी | विश्व के कोने कोने से न  केवल महिलाओं ने इस अभियान में हिस्‍सा लिया बल्कि इस दुर्व्यवहार  को  लेकर कई खुलासे भी किये थे | यह हैशटैग एक समय में  85 देशों में ट्रेंड कर रहा था | अमरीकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने इस कैम्पेन को शुरू  कर ट्वीटर पर लिखा था कि   ‘यदि आप यौन शोषण या हिंसा की शिकार रही हैं तो आप इस ट्वीट का जवाब ‘मी टू’ लिखकर दें।’  समस्या की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अगली सुबह तक उनके पास 53000 जवाब आ चुके थे।  इस हॉलीवुड अभिनेत्री  ने यौन शोषण के   खिलाफ जब यह मुहिम छेड़ी तो  दुनियाभर की महिलाओं ने इस अभियान में उनका साथ  दिया । महज तीन दिन के अंदर ही दुनियाभर में 1.2 करोड़ महिलाओं ने हैशटैग मी टू के नाम से आपबीती साझा की ।  जिसमें  घरेलू हिंसा  से लेकर कार्यस्थल पर शोषण  तक की घटनाएँ तक शामिल थीं । इस  संवेदनशील मुद्दे को आवाज़ देने वाला यह अभियान इतना सफल रहा कि साल 2017 के लिए 'टाइम पर्सन ऑफ द ईयर'  के तहत यौन शोषण और हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद कर 'मी टू' अभियान में हिस्सा लेने वालीं महिलाओं  'साइलेंस ब्रेकर्स'  को पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया है | समझना मुश्किल नहीं यौन हिंसा  के इतने मामले जब सभ्य और विकसित समाज में होते हैं तो संकटग्रस्त इलाकों की स्थितियां कैसी होंगीं ? 

निःसंदेह, महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुँचाने वाली यह मानसिकता पूरी दुनिया में आधी आबादी के लिए  शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की बड़ी वजह है |  लेकिन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो हालात  सबसे  विकट हैं | यही वजह है कि डॉ.  डेनिस मुकवेगे और   नादिया मुराद के नामों की घोषणा करते हुए नोबेल समिति  के  अध्यक्ष  ने कहा कि इन दोनों को यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए चुना गया है। दोनों वैश्विक अभिशाप के खिलाफ संघर्ष का उदाहरण हैं। उन्होंने  कहा कि  ‘‘एक अति शांतिपूर्ण विश्व तभी बनाया जा सकता है जब युद्ध के दौरान महिलाओं, उनके मूलभूत अधिकारों और उनकी सुरक्षा को मान्यता और सुरक्षा दी जाए |’ यकीनन मुकवेगे और मुराद दोनों एक वैश्विक संकट के खिलाफ संघर्ष का प्रतिनिधित्व करने आए हैं जो कि किसी भी संघर्ष से परे है, जिसे बढ़ते हुए  मी टू  अभियान ने भी दिखाया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह समस्या हर स्तर मौजूद है | स्त्रियों के आगे बढ़ने और सुरक्षित जीवन जीने की राह में बड़ी बाधा है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शोध के अनुसार दुनिया भर में हर तीन में से एक से ज्यादा महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है। ऐसे में  आतंक और युद्ध की त्रासदी झेल रहे देशों में  महिलायें हद दर्जे की बर्बरता को झेलने को विवश हैं | संयुक्त  राष्ट्र और उसके मानवाधिकार आयोग की ओर से इराक और सीरिया में आतंकवादी हिंसा पर जारी एक रिपोर्ट बताती है कि आतंकी हिंसा झेल रहे देशों में बच्चे एवं महिलाएं यौन  उत्पीड़नों और अमानवीय यातनाओं का भी शिकार हैं । ग्लोबल टेरर इंडेक्स के अनुसार आज दुनिया के एक तिहाई देश आतंकी हिंसा के शिकार हैं । आतंकी हिंसा का दंश किसी देश के पूरे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक ढांचे की नींव हिला देता है। जिसके चलते सामने आने वाले खामियाज़े महिलाओं के लिए सबसे अधिक पीड़ादायी होते हैं |  

दरअसल, संकटग्रस्त इलाकों  में  यौन हिंसा की घटनाएँ  बहुत  बर्बर हैं |  ऐसे क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों को गुलाम तक बनाकर रखा जाता है | मानव तस्करी की समस्या भी वहां  दंश बनी हुई है | कुछ समय पहले  यौन हिंसा  सम्बन्धी मामलों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि द्वारा दी जानकारी के मुताबिक़ ईराक और सीरिया में आतंकवादियों द्वारा अपहृत लड़कियों को गुलामों के बाजार में सिगरेट के  पैकेट की कीमत में बेच दिया जाता है | संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि (यूएनएफपीए) द्वारा जारी आकलन  'सीरिया की आवाजें' 2018 के अनुसार, यौन उत्पीड़न के भय, जो अक्सर अपहरण से जुड़े हुए हैं, महिलाओं और लड़कियों के लिए चिंता का विषय  है जो उनके मानसिक तनाव में भी योगदान देता है।  शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है | नोबल पुरस्कार पा रहीं  नादिया भी यह भय और पीड़ा   झेल चुकी हैं | संघर्ष और हौसले की मिसाल बनी नादिया मुराद  करीब तीन साल तक आतंकवादियों  की दरिंदगी, सामूहिक दुष्कर्म  और यातानाओं की शिकार हुई हैं | मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाते हुए  कह चुकी हैं  कि महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए बाकायदा दास बाजार लगते हैं | ऐसे में यह वाकई प्रेरणादायी  है कि नादिया ने  यौन दासी बनाये जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना और  शोषण को अपनी नियति नहीं माना बल्कि संघर्ष की हिम्मत जुटाई |  इतना ही नहीं आइएस के चंगुल से आज़ाद होने के बाद उन्होंने दूसरी महिलाओं और लड़कियों की मदद करने की ठानी | दूसरी और ऐसी पीड़ा भोगने वाली महिलाओं के सहायता के लिए डॉ. मुकवेगे आगे आये |  ऐसे में अंतराष्ट्रीय स्तर दिया जाने वाला शांति का यह नोबल पुरस्कार ऐसी आवाजों को  मुखर और दृढ़ बनाएगा  जो दुनियाभर में यौन हिंसा की अमानवीयता के खिलाफ उठ रही हैं |  

31 July 2018

भरे-पूरे परिवारों का टूटता मनोबल

हाल ही में दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 सदस्यों की आत्महत्या की गुत्थी अभी सुलझी नहीं है कि झारखण्ड के हजारीबाग में एक ही परिवार के करीब 6 लोगों ने आत्महत्या कर ली है | इनमें भी  बुराड़ी के परिवार की तरह ही परिवार के बुजुर्ग-बच्चे  सभी शामिल हैं |  हजारीबाग की इस घटना में जान देने वालों में घर  के मुखिया सहित दो पुरुष, दो महिलाऐं, दो बच्चे  शामिल हैं  |  बुराड़ी के घर में मिले अजब-गज़ब निर्देशों से भरे रजिस्टर की तरह ही झारखण्ड के इस घर में भी एक लिफाफे पर सुसाइड नोट मिला है। सुसाइड नोट में गणित के फार्मूले से खुदकुशी को समझाया गया है। सुसाइड नोट के मुताबिक परिवार ने कर्ज से परेशान होकर तनाव के चलते सामूहिक खुदकुशी की है। मन को उद्वेलित करने वाले इस सुसाइड नोट में यहाँ तक लिखा हुआ  कि यमन (घर का छोटा बच्चा ) को लटका नहीं सकते थे इसलिए उसकी हत्या की गई। फिर आगे गणित के फार्मूले से  आत्महत्या की व्याख्या की गई है । 'बीमारी+दुकान बंद+ दुकानदारों का बकाया न देना+ बदनामी+ कर्ज= तनाव → मौत।'  यह परिवार तो आत्महत्या का ये  सूत्र लिखकर दुनिया से चला गया पर जिंदगी से हारने की यह व्याख्या  पूरे समाज के लिए विचारणीय है | चंद शब्दों के इस फार्मूले में अनगिनत सवाल छुपे हैं जो हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था के सामने कभी ना सुलझने वाले प्रश्नों की तरह हैं |  

सामूहिक आत्महत्याओं का सबसे अधिक चिंतनीय पक्ष यह है कि यह हमारी पारिवारिक व्यवस्था  के बिखरते हालातों को भी सामने रखने वाले मामले हैं | पारिवारिक कलह या क़र्ज़, अंधविश्वास या कहीं किसी के विश्वास को चोट पहुँचने की टूटन |   वजह चाहे जो हो, एक ही परिवार के लोग यूँ किसी समस्या से हार जाएँ तो हालात बेहद भयावह लगते हैं | बुराड़ी के मामले में जहाँ धार्मिक अनुष्ठान की बात सामने आ रही है वहीँ  हजारीबाग के इस परिवार ने क़र्ज़ ना चुका पाने के चलते उपजे तनाव से आत्महत्या की राह चुनी है | लेकिन सोचने वाली बात तो यह है इन दोनों ही मामलों में  घर  के हर उम्र के सदस्य शामिल हैं | आखिर टूटते मनोबल और अन्धविश्वास के ये  कैसे हालात हैं जिनमें घर के बुजुर्ग भी बच्चों का संबल ना बनकर ऐसे कायराना कर्म में उनके साथ हो गए ?  एक ही घर  के लोग  जिंदगी से हारने के बजाय मिलकर हालातों से लड़ने की रास्ता  क्यों नहीं चुन पाए ?   कर्ज के बोझ से दबा और परेशान झारखण्ड का यह परिवार क्या अपने बच्चों में भी अपना भविष्य नहीं देख पाया ?   बुराड़ी के शिक्षित परिवार की नई पीढ़ी ने भी बड़ों के साथ ऐसे कृत्य में शामिल होना कैसे स्वीकार कर लिया ?  आखिर नाउम्मीदी के हालातों में अपने के साथ होने के बावजूद भी पूरा परिवार ही  कमज़ोर क्यों  हो गया  ?  ऐसी घटनाएँ ऐसे कई  प्रश्न उठाती हैं कि  परिवार के जो लोग एक दूसरे की ताकत हुआ करते हैं वे मौत का  ऐसा सुनियोजित खेल  कैसे खेल जाते हैं ? मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव या धार्मिक भटकाव की ये परिस्थितियाँ  कैसे यूँ घेर  लेती  हैं कि ज़िन्दगी का हाथ छोड़ना उन्हें सही लगने लगता है | सामूहिक आत्महत्याओं से जुड़े ऐसे कई सवाल हैं जो हमारी पारिवारिक- सामाजिक स्थितियों में आ रहे बदलावों को रेखांकित करते हैं | 

दरअसल,आज की बदलती जीवनशैली में दो बातें बहुत आम हो चली हैं | सब कुछ पा लेने की की इच्छाएं बढीं हैं  और जिंदगी की उलझनों से जूझने की शक्ति कम हुई है |  गौर करें तो लगता है कि बुराड़ी का मामला भी धर्म का कम कर्म का ज्यादा है | घर में मिले रजिस्टर के नोटस में व्यवसाय को बढाने के तरीके  और उनके लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों की भी बात  शामिल है | निःसंदेह यह आध्यात्मिक विचारों से जिंदगी से जूझने की हिम्मत जुटाने के बजाय व्यावसायिक सफलता हासिल करने की जुगत ज्यादा लगती है | यह अंधविश्वास भी खुद को लाभ पहुंचाने से भरोसे से भरा है | लेकिन ऐसे ही भटकाव भरे हालातों में परिवार की भूमिका अहम् होती है | घर के बड़े-बुजुर्गों की समझाइश हो या नई पीढ़ी के भविष्य से  जुड़ी आशाएं | दोनों ही इंसान को टूटने नहीं  देतीं |  यही वजह है कि किसी भी देश में सामाजिक व्यवस्था में परिवार को एक बुनियाद के रूप में देखा जाता है | जो रिश्तों की रुपरेखा ही तय नहीं करती बल्कि ज़िन्दगी के मुश्किल दौर में भी घर के सदस्यों को थामे रखती है  |  भारत में परिवार को एक सुरक्षा कवच की तरह माना जाता रहा है | जिसमें हर पीढ़ी के लोग सुरक्षा और संरक्षण पाते हैं | परिवार भले ही समाज की सबसे छोटी ईकाई है पर इसी की बुनिायद पर पूरी सामाजिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होती है।  हमारे यहाँ नई पीढ़ी को संस्कार देने बात हो या एक दूजे के सुख दुःख में साथ देने का मामला , परिवार की भूमिका को बहुत अहम बताया गया है । ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि समाज की यह सबसे अहम् कड़ी इतनी कमज़ोर कैसे हो रही है कि  सामूहिक आत्महत्या के ऐसे मामले सामने आ रहे हैं | घर के बड़े-बुजुर्ग छोटे-छोटे बच्चों को अपने हाथों से मौत दे रहे हैं | एक ही घर के लोगों का सामूहिक रूप से यूँ मौत का चुनाव करने की प्रवृत्ति बेहद घातक है | ऐसे मामले भविष्य में स्थिति और भी भयावह होने के संकेत देते हैं |  

ऐसी घटनाओं के कारण यह सोचना जरूरी हो जाता है कि संबल बनने वाले पारिवारिक सिस्टम का सुसाइड करने में साथ देना, अपनों के ही आत्मघाती विचारों को समर्थन देना कितने तकलीफदेह पक्ष लिए है | निःसंदेह ये सभी पक्ष हमारी पूरी व्यवस्था के लिए विचारणीय हैं |  हमें यह कोशिश करनी होगी कि कोई भी परिवार ऐसी विकल्पहीन स्थिति में ना आये कि जिंदगी का चुनाव न कर सके |  इसके लिए सामाजिक-पारिवारिक सिस्टम में जो दबाव और तनाव बेवजह लोगों के हिस्से आता है उससे भी दूरी बनाने होगी | झारखण्ड के इस परिवार ने तनाव और बदनामी जैसे शब्द भी आत्महत्या के कारणों को समझाने वाले गणितीय सूत्र में लिखे हैं | कुछ ऐसे ही बुराड़ी के परिवार में भी एक बेटी की सगाई ना हो पाने के चलते यह परिवार धार्मिक अनुष्ठान  तक करने में जुट गया  | ऐसे में सवाल यह भी है किसी परिवार के आर्थिक हालात डगमगाने या शादी सगाई जैसे काम में देरी होने भर से किसी परिवार को समाज से साथ देने वाले व्यवहार के बजाय तनाव और अपमान मिलने का भय क्यों रहता है ?  डर और मानसिक उत्पीड़न के कई कारण तो हद दर्ज़े के अर्थहीन और आधारहीन लगते हैं | लेकिन आज के दौर में भी इनकी मौजूदगी बानी हुई है | गौर करें तो पता चलता है कि व्यक्तिगत हो या सामूहिक,  कितने ही मामलों में तो यह मानसिक दबाव और तिरस्कार का भय ही आत्महत्या का कारण बनता है | तभी तो ऐसी घटनाओं से समाज में आ रही संवेदनशीलता की कमी की भी झलक मिलती है |  यही वजह है कि ये पूरे समाज को चेताने वाले मामले हैं | क्योंकि  किसी एक अकेली वजह से यूँ पूरा परिवार आत्महत्या का रास्ता नहीं चुन सकता | कई सारे कारण मिलजुलकर ऐसी सामूहिक आत्महत्याओं की वजह बनते हैं | भरे-पूरे परिवारों के मनोबल को तोड़ते हैं |   ऐसे में हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को समग्र रूप से इन कारणों से जूझना होगा जो परिवार यानि कि समाज की सबसे अहम् कड़ी को यूँ जिंदगी से हारने की ओर धकेलते हैं | ( दैनिक जागरण  में प्रकाशित )