My photo
पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

13 March 2019

बेटियों की जिंदगी सहेजने के लिए विदेशी दूल्हों पर सख्ती जरूरी

 जनसत्ता  में प्रकाशित 

दरअसल, पंजाब ही नहीं अन्य राज्यों से भी ऐसे हजारों अनिवासी भारतीय परिवार हैं, जो दूसरे देशों में जाकर बस गए हैं | विशेषकर कनाडा,अमेरिका, ब्रिटेन और  ऑस्ट्रेलिया जैसे दशों में अनिवासी भारतीय बड़ी संख्या में बसे हुए हैं | इनमें से कई परिवार आज भी अपने बेटों की शादी करने के लिए दुल्हन तलाशने भारत आते हैं | ऐसे वैवाहिक रिश्तों  का सबसे दुखद पक्ष यह है कि जीवन भर के लिए जुड़ने वाले इस रिश्ते को लेकर  कई भावी दूल्हों और  उनके परिवार की मंशा शुरुआत से ही गलत होती है | नतीजतन ऐसे अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं जिनमें विदेशों में जा बसे लड़के भारतीय लड़कियों से शादी तो करते हैं लेकिन शादी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर अक्सर गंभीर नहीं होते। इस जुड़ाव को निभाने की नहीं बल्कि अपने फायदे के लिए भुनाने की सोच रखते हैं | शादी के सालों बाद तक दुल्हन यहाँ इतजार करती रहती है  लेकिन वे उनकी खोज-खबर तक नहीं लेते | ( लेख का अंश ) 

18 February 2019

भारत में भी मिले हिन्दी को मान

डेली न्यूज़ में प्रकाशित 

हाल ही में अबू धाबी  के न्यायिक विभाग ने कामगारों से जुड़े मामलों में अरबी और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी बयान, दावे और अपील दायर करने की शुरुआत की है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद  अरबी और अंग्रेजी के बाद अब हिंदी को भी वहां की अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। सुखद है कि देश के बाहर भी हिंदी भाषा अपना परचम लहरा रही है।  संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय लोगों की देश की कुल आबादी का 30 फीसदी है | वहां ऐसे कामगार भी संख्या हैं जो अंग्रेजी  भी नहीं समझ पाते |  यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया में हिंदी को भी आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है | अब हिंदी भाषी लोग भी समूची न्यायिक प्रक्रिया को सहजता से समझ पायेंगें |    

चिंतनीय यह भी है कि भारत में आज भी न्यायिक प्रक्रिया में अंग्रेजी के दबदबे के चलते आमजन के लिए असहजता बनी हुई है | गांवों-कस्बों में बसे लोगों को अदालती प्रक्रिया से गुजरते हुए इस भाषाई दिक्कत का सामना करना पड़ता है | अफसोसनाक ही है कि जिस देश की राजभाषा हिंदी है, वहां किसी आम नागरिक के लिए यह समझना भी मुश्किल बना हुआ है कि अदालत में उसका पक्ष किस तरह रखा जा रहा है ?  हमारे देश एक बड़ी आबादी आज भी अंग्रेजी भाषा नहीं समझती-बोलती | ऐसे में  कानूनी प्रक्रिया से लेकर, सुनवाई और फैसले तक समझने में लोगों को दिक्कत आती है | यही वजह है कि यह भाषाई  बाध्यता केवल कानूनी ही नहीं संवेदनाओं और भावनाओं से जुड़ा मामला भी है |  (लेख का अंश )  

03 February 2019

स्त्रियों का हौसला बढ़ाती कदमताल




 सामना में प्रकाशित 
 इस वर्ष कई मायनों में विशेष रही गणतंत्र दिवस की परेड, महिलाओं की कदमताल के लिए भी खास रही |  नौसेना, भारतीय सेना सेवा कोर और सिग्नल्स कोर की एक यूनिट के दस्तों की अगुवाई इस वर्ष महिला अधिकारियों द्वारा की गई | इतना ही नहीं डेयरडेविल्स टीम के पुरुष साथियों के साथ सिगनल्स कोर की एक सदस्या ने बाइक पर हैरतअंगेज करतब दिखाते हुए सलामी दी, और पहली बार एक महिला अधिकारी  द्वारा भारत सेना सेवा कोर के दस्ते का नेतृत्व  किया गया |  सशस्त्र सेना में तीसरी पीढ़ी की एक अधिकारी  ने ट्रांसपोर्टेबल सैटेलाइट टर्मिंनल के दस्ते का नेतृत्व किया जो कहीं ना कहीं महिलाओं का मनोबल बढ़ाने और समानता का सन्देश देने वाला है |असम राइफल्स के महिला दस्ते का पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होना भी  इतिहास रचने जैसा रहा | असम राइफल्स की इस  सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व एक ऐसी अधिकारी ने किया जो एक  बेटी की माँ हैं | इस बार सेना की तीनों ही इकाइयों ने महिलाओं का खुले मन से स्वागत किया | नतीजतन इस साल महिलाओं की भागीदारी ने विस्तार ही पाया है |  यह कदम भी बदलाव और हर क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी की बानगी है | ऐसे में इस वर्ष गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ,  शौर्य और शक्ति प्रदर्शन के साथ ही लैंगिक समानता लाने की  ओर उठते कई कदमों का भी साक्षी बना | यह देशवासियों का गौरव और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाली बात है |

 यह कटु है कि देश में संविधान ने तो महिलाओं और पुरुषों को समान नागरिक हक तो दिए हैं पर इन अधिकारों को जीने और अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने के लिए आधी आबादी को कई  मोर्चों पर भी संघर्ष  करना पड़ा है |  सुखद है  कि हमारे देश की महिलाओं ने  पूरे मनोयोग से हर स्तर पर यह लड़ाई लड़ी और गणतंत्र को सशक्त बनाने में अपनी प्रभावी भूमिका निभाई | तभी तो संघर्ष की लम्बी राह पर चलते हुए हासिल की गई कई गर्व करने वाली उपलब्धियां उनके हिस्से हैं | ऐसे में महिलाओं की इन उपलब्धियों और  शौर्य के शानदार प्रदर्शन लिए यह गणतंत्र दिवस स्त्री सशक्तीकरण का यादगार अवसर बन गया | जो कि आधी आबादी के लिए बेहतरी के भावी बदलावों की आशाएं हमारी झोली में डालने वाला है | लेख का अंश )

18 January 2019

आपदा में देवदूत सरीखे जवान



 दैनिक जागरण में प्रकाशित 
हाल ही में सिक्किम के नाथूला पास में भारी बर्फबारी के चलते  फंसे करीब तीन हजार पर्यटकों को  सेना के जवानों ने जी जान से प्रयास कर बचाया | अब एक  महिला ने जान बचाने के लिए  भारतीय सेना को थैंक्‍यू  कहने के लिए एक वीडियो  ट्विटर पर पोस्‍ट किया |  आंखों में आंसू लिए इस लड़की ने न सिर्फ अपनी बल्कि सभी 3,000 पर्यटकों की तरफ से सेना को  शुक्रिया कहा है।  गौरतलब है कि बर्फ़बारी एक चलते मुश्किल में फंसे टूरिस्‍ट्स  में महिलाएं, बच्‍चे और  बुजुर्ग भी शामिल थे | सिक्किम में यह अब तक का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन था। वीडियो में महिला ने कहा कि हम अक्‍सर पूछते हैं कि ' सेना क्‍या करती है, आज मैंने देख लिया कि वह हमारे लिए क्‍या करती है।' इन्हीं दिनों भारतीय सेना ने एकबार फिर अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सिक्किम की लाचुंग घाटी में  भी 150 लोगों को बचाने और उन्हें मेडिकल सुविधाएं देने का काम किया  |  सेना ने बेहद तकलीफदेह हालातों  का सामना करते हुए उनका जीवन सहेजा | सोशल मीडिया पर भी आमजन  सेना  के इस  जज्बे  की सराहना  कर रहे हैं |  बीते साल केरल में आई  बाढ़ की भीषण आपदा  में भी  जानें बचाने वाले सेना के जवानों को लोगों ने अनोखे अंदाज में  थैंक्स कहा था । भारतीय नौसेना के ट्विटर हैंडल से एक घर की छत पर अंग्रेजी में THANKS लिखी तस्वीर शेयर की गई थी। गौरतलब है कि बाढ़ की आपदा में  इसी घर से भारतीय नौसेना के कमांडर ने बड़ी बहादुरी से दो महिलाओं को बचाया था।  उसी घर की छत पर सफेद रंग से 'थैंक्स' पेंट किया देखा गया था  | बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में सेना, वायु सेना, नौसेना और अन्य बचाव एजेन्सियों ने राहत और बचाव इस अभियान में लोगों संकट से बाहर निकाला था |  

दरअसल, ऐसे सन्देश उस भरोसे की बानगी हैं, जो देश के हर हिस्से का नागरिक अपनी सेना के प्रति मन में सहेजे रखता है |  आपदा के समय लोगों को सुरक्षित रखने के लिए जी जान लगा देने वाले जवान इस विश्वास को और पुख्ता करते हैं | संकट की घड़ी में साथ होने का संबल देते हैं | इसीलिए  यह  'शुक्रिया' भारतीय सेना को उसकी जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए ही नहीं ही कहा गया एक शब्द भर नहीं है बल्कि हर भारतीय के भावनात्मक भावों से  परिपूर्ण संवाद के समान है | क्योंकि आपदा के समय सेना के जवानों की ऐसी तत्परता देखकर देश के आम नागरिक को हर बार यह भरोसा मिलता है कि हमारे जवान देश की सीमा पर ही नहीं संकट के समय भी हर मोर्चे पर डटे रहे हैं | ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित रखने के लिए सेना के जवान हर खतरे से लड़ जाते हैं | खुद हर तकलीफ झेल जाते हैं | ( लेख का अंश ) 

02 December 2018

मेहनत और प्रतिबद्धता का मुक्का

 डेलीन्यूज़ में 

 चैंपियन खिलाड़ी एमसी मैरी कॉम ने महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद  आंसुओं के साथ कहा कि 'मैं भारत को स्वर्ण पदक के अलावा और कुछ नहीं दे सकती' लेकिन सच तो यह कि देश को गौरवान्वित करने साथ ही मैरी ने भारत की महिलाओं को प्रतिबद्धता और हौसले की सौगात दी है | वे एक माँ और पत्नी की भूमिका का निर्वहन करते हुए ऐसे क्षेत्र में उपलब्धि हासिल कर विश्व चैम्पियन बनीं हैं जिसमें महिलाओं का दखल न के बराबर था | हालाँकि शुरुआत से ही मैरी का सफर  आसान नहीं रहा पर संघर्ष और प्रतिबद्धता के बल पर  उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अपना ही नहीं देश का भी नाम रौशन किया है  |  गौरतलब है कि हाल ही में भारत की दिग्गज खिलाड़ी एमसी मैरी कॉम ने  महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के10वें संस्करण में 48 किलोग्राम भारवर्ग का खिताब अपने नाम कर लिया है  | यूक्रेन की युवा खिलाड़ी हाना ओखोटा को 5-0 से मात देकर मैरी कॉम, स्वर्ण पदक  हासिल कर  छह वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाली दुनिया की पहली खिलाड़ी बन गई हैं |  इससे पहले मैरी  ने साल 2002, 2005, 2006, 2008 और साल 2010 में विश्व चैंपियनशिप का खिताब  अपने नाम किया था |  इसके अलावा  मैरी  2001 में रजत पदक भी जीत चुकी हैं।  मैरी कॉम अब  विश्व चैम्पियनशिप (महिला एवं पुरुष) में सबसे अधिक पदक जीतने वाली खिलाड़ी भी बन गईं हैं | 
 दैनिक जागरण में 
हाल ही में भारत की मेजबानी में 70 देशों की 300 महिलाएं दिल्ली में आयोजित अन्तराष्ट्रीय मुक्केबाजी के महाकुम्भ में शामिल हुईं तो भारतीय महिला मुक्केबाजों से काफी उम्मीदें लगी हुईं थी   | गौरतलब है कि 12 साल पहले जब हमारा देश इसका मेजबान था तब कोई विशेष कामयाबी हमारे हिस्से नहीं आई थी | महिला मुक्केबाजी जैसी स्पर्धा में भारत की स्थिति बेहद कमज़ोर थी | यह होना लाजिमी भी था क्योंकि इस क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना अनगिनत  मुश्किलों को पार करने जैसा था |  हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में शारीरिक सौष्ठव वाली इस खेल में बेटियों का दखल सहज स्वीकार्य नहीं था | लेकिन हालिया बरसों में भारत में विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ खिलाड़ी अपनी पहचान बना रही हैं | यही वजह है कि अब इस खेल में बेटियों की भागीदारी को लेकर भी लोगों की राय बदल रही है | तीन बच्चों की मां और भारत की स्टार महिला मुक्केबाज एमसी  मैरी कॉम खुद मणिपुर में बॉक्सिंग अकादमी चलाती हैं | कभी खेतों  में काम करते हुए अपना बचपन बिताने वाली देश की इस बेटी ने अपने से 13 साल छोटी प्रतिद्वंदी को हराकर छठी बार विश्व महिला बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा है । मैरी  की  साल 2008 में विश्व मुक्केबाजी और 2014 में एशियन गेम्स में  गोल्ड मेडल लाने वाली जीत तो  यकीनन  स्त्रीमन की दृढ़ता की ही बानगी है |  यह सुखद भी है और सराहनीय भी कि ये दोनों ही स्वर्ण पदक मैरी कॉम ने माँ बनने के बाद  हासिल किये थे | तभी तो उनकी कामयाबी के सफ़र ने महिला बॉक्सिंग के प्रति देश भर में लोगों का नजरिया भी बदला है | यहाँ तक कि  युद्ध की विभाषिका के हालातों से जूझते हुए अपने  परिवार से छुपकर मुक्केबाजी करने वाली सोमालिया की रमाला अली भी मैरी कॉम को अपनी प्रेरणा मानती हैं |

भारत में जहाँ एक आम खिलाड़ी के लिए संघर्षपूर्ण स्थितियां हैं, वहां मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में तो बेटियों के लिए पहचान बनाना और भी कठिन है | लेकिन कुछ सालों हमारे यहाँ कई महिला मुक्केबाज़ पूरी शिद्दत से इस क्षेत्र में आगे आ रही हैं | सुखद है इनके साथ पारिवारिक सहयोग भी है | खुद मैरी कॉम भी अपनी  कामयाबी के लिए अपने  पति  ओनलर के सहयोग और साथ की बात करती रही हैं | हमारे यहाँ आज भी  बड़ी संख्या में महिलाएं  पारिवारिक दायित्वों के कारण अपने काम से दूरी बना लेती हैं | महिला खिलाड़ियों के जीवन में तो मातृत्व और वैवाहिक  जीवन की जिम्मेदारियों के चलते यह विराम बहुत आम है |  क्योंकि इस क्षेत्र ने सिर्फ नियत समय की ड्यूटी ही नहीं करती होती बल्कि खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय रखना भी जरूरी है |  ऐसे में अपनों का सहयोग और भरोसा किसी भी क्षेत्र में महिलाओं  के लिए आगे बढ़ने की राह सहज  बनाता है | साथ ही समाज का बदलता नजरिया भी बॉक्सिंग की दुनिया में बेटियों के दखल की बड़ी वजह है | आज पिंकी जांगड़ा, सीमा पूनिया, लवलीना बोरगोहेन , स्वीटी बूरा और सिमरनजीत कौर जैसी विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ भारत की पहचान बना रही हैं | भारत में ही आयोजित 10वीं  विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत की चार बॉक्सर सेमीफाइनल में पहुंची हैं  |  इनमें  सिमरनजीत कौर और लवलीना  ने  कांस्य पदक अपने नाम किये हैं | जबकि सोनिया ने  रजत पदक अपने नाम किया | महिला मुक्केबाजी के इस महाकुम्भ में मैरी कॉम के हर भारतीय को गर्वित करने वाले विश्व रिकॉर्ड के साथ एक गोल्ड, एक सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल देश की झोली में आये हैं |

जिस देश में  खेल के मैदान में तिरंगा लहराने का सपना देखने वाली बेटियों के लिए उलझनें आर्थिक ही नहीं सामाजिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाली भी होती हैं, वहां अभावों और विषमताओं की आग में तपकर आगे आने वाली मैरी कॉम जैसी माँओं और बेटियों का सफ़र यकीनन प्रेरणादायी है | जीतने के जज़्बे के मायने समझाने वाली ऐसी कहानियाँ बताती हैं कि बेटियाँ किसी भी मोर्चे पर कम नहीं हैं | इतनी परेशानियाँ उठाकर वे आगे बढ़ सकती हैं तो जरा सोचिये कि सहजता, सुरक्षा और समानता का माहौल पाकर वे सफलता के किस शिखर को छू सकती हैं | मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में भारत की महिलाओं का बढ़ता दबदबा कई मायनों में एक तयशुदा सोच से बाहर आने की बानगी है | इन महिला खिलाड़ियों के संघर्ष को देखकर आशा और विश्वास को एक नया आधार मिलता है | विशेषकर मैरी कॉम की सफलता  तो आत्मविश्वास, जीतने का जज़्बा, माँ का समर्पण और एक स्त्री के मन की दृढ़ता का उदाहरण है, जो कई बेटियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा |