My photo
पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

31 July 2018

भरे-पूरे परिवारों का टूटता मनोबल

हाल ही में दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 सदस्यों की आत्महत्या की गुत्थी अभी सुलझी नहीं है कि झारखण्ड के हजारीबाग में एक ही परिवार के करीब 6 लोगों ने आत्महत्या कर ली है | इनमें भी  बुराड़ी के परिवार की तरह ही परिवार के बुजुर्ग-बच्चे  सभी शामिल हैं |  हजारीबाग की इस घटना में जान देने वालों में घर  के मुखिया सहित दो पुरुष, दो महिलाऐं, दो बच्चे  शामिल हैं  |  बुराड़ी के घर में मिले अजब-गज़ब निर्देशों से भरे रजिस्टर की तरह ही झारखण्ड के इस घर में भी एक लिफाफे पर सुसाइड नोट मिला है। सुसाइड नोट में गणित के फार्मूले से खुदकुशी को समझाया गया है। सुसाइड नोट के मुताबिक परिवार ने कर्ज से परेशान होकर तनाव के चलते सामूहिक खुदकुशी की है। मन को उद्वेलित करने वाले इस सुसाइड नोट में यहाँ तक लिखा हुआ  कि यमन (घर का छोटा बच्चा ) को लटका नहीं सकते थे इसलिए उसकी हत्या की गई। फिर आगे गणित के फार्मूले से  आत्महत्या की व्याख्या की गई है । 'बीमारी+दुकान बंद+ दुकानदारों का बकाया न देना+ बदनामी+ कर्ज= तनाव → मौत।'  यह परिवार तो आत्महत्या का ये  सूत्र लिखकर दुनिया से चला गया पर जिंदगी से हारने की यह व्याख्या  पूरे समाज के लिए विचारणीय है | चंद शब्दों के इस फार्मूले में अनगिनत सवाल छुपे हैं जो हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था के सामने कभी ना सुलझने वाले प्रश्नों की तरह हैं |  

सामूहिक आत्महत्याओं का सबसे अधिक चिंतनीय पक्ष यह है कि यह हमारी पारिवारिक व्यवस्था  के बिखरते हालातों को भी सामने रखने वाले मामले हैं | पारिवारिक कलह या क़र्ज़, अंधविश्वास या कहीं किसी के विश्वास को चोट पहुँचने की टूटन |   वजह चाहे जो हो, एक ही परिवार के लोग यूँ किसी समस्या से हार जाएँ तो हालात बेहद भयावह लगते हैं | बुराड़ी के मामले में जहाँ धार्मिक अनुष्ठान की बात सामने आ रही है वहीँ  हजारीबाग के इस परिवार ने क़र्ज़ ना चुका पाने के चलते उपजे तनाव से आत्महत्या की राह चुनी है | लेकिन सोचने वाली बात तो यह है इन दोनों ही मामलों में  घर  के हर उम्र के सदस्य शामिल हैं | आखिर टूटते मनोबल और अन्धविश्वास के ये  कैसे हालात हैं जिनमें घर के बुजुर्ग भी बच्चों का संबल ना बनकर ऐसे कायराना कर्म में उनके साथ हो गए ?  एक ही घर  के लोग  जिंदगी से हारने के बजाय मिलकर हालातों से लड़ने की रास्ता  क्यों नहीं चुन पाए ?   कर्ज के बोझ से दबा और परेशान झारखण्ड का यह परिवार क्या अपने बच्चों में भी अपना भविष्य नहीं देख पाया ?   बुराड़ी के शिक्षित परिवार की नई पीढ़ी ने भी बड़ों के साथ ऐसे कृत्य में शामिल होना कैसे स्वीकार कर लिया ?  आखिर नाउम्मीदी के हालातों में अपने के साथ होने के बावजूद भी पूरा परिवार ही  कमज़ोर क्यों  हो गया  ?  ऐसी घटनाएँ ऐसे कई  प्रश्न उठाती हैं कि  परिवार के जो लोग एक दूसरे की ताकत हुआ करते हैं वे मौत का  ऐसा सुनियोजित खेल  कैसे खेल जाते हैं ? मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव या धार्मिक भटकाव की ये परिस्थितियाँ  कैसे यूँ घेर  लेती  हैं कि ज़िन्दगी का हाथ छोड़ना उन्हें सही लगने लगता है | सामूहिक आत्महत्याओं से जुड़े ऐसे कई सवाल हैं जो हमारी पारिवारिक- सामाजिक स्थितियों में आ रहे बदलावों को रेखांकित करते हैं | 

दरअसल,आज की बदलती जीवनशैली में दो बातें बहुत आम हो चली हैं | सब कुछ पा लेने की की इच्छाएं बढीं हैं  और जिंदगी की उलझनों से जूझने की शक्ति कम हुई है |  गौर करें तो लगता है कि बुराड़ी का मामला भी धर्म का कम कर्म का ज्यादा है | घर में मिले रजिस्टर के नोटस में व्यवसाय को बढाने के तरीके  और उनके लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों की भी बात  शामिल है | निःसंदेह यह आध्यात्मिक विचारों से जिंदगी से जूझने की हिम्मत जुटाने के बजाय व्यावसायिक सफलता हासिल करने की जुगत ज्यादा लगती है | यह अंधविश्वास भी खुद को लाभ पहुंचाने से भरोसे से भरा है | लेकिन ऐसे ही भटकाव भरे हालातों में परिवार की भूमिका अहम् होती है | घर के बड़े-बुजुर्गों की समझाइश हो या नई पीढ़ी के भविष्य से  जुड़ी आशाएं | दोनों ही इंसान को टूटने नहीं  देतीं |  यही वजह है कि किसी भी देश में सामाजिक व्यवस्था में परिवार को एक बुनियाद के रूप में देखा जाता है | जो रिश्तों की रुपरेखा ही तय नहीं करती बल्कि ज़िन्दगी के मुश्किल दौर में भी घर के सदस्यों को थामे रखती है  |  भारत में परिवार को एक सुरक्षा कवच की तरह माना जाता रहा है | जिसमें हर पीढ़ी के लोग सुरक्षा और संरक्षण पाते हैं | परिवार भले ही समाज की सबसे छोटी ईकाई है पर इसी की बुनिायद पर पूरी सामाजिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होती है।  हमारे यहाँ नई पीढ़ी को संस्कार देने बात हो या एक दूजे के सुख दुःख में साथ देने का मामला , परिवार की भूमिका को बहुत अहम बताया गया है । ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि समाज की यह सबसे अहम् कड़ी इतनी कमज़ोर कैसे हो रही है कि  सामूहिक आत्महत्या के ऐसे मामले सामने आ रहे हैं | घर के बड़े-बुजुर्ग छोटे-छोटे बच्चों को अपने हाथों से मौत दे रहे हैं | एक ही घर के लोगों का सामूहिक रूप से यूँ मौत का चुनाव करने की प्रवृत्ति बेहद घातक है | ऐसे मामले भविष्य में स्थिति और भी भयावह होने के संकेत देते हैं |  

ऐसी घटनाओं के कारण यह सोचना जरूरी हो जाता है कि संबल बनने वाले पारिवारिक सिस्टम का सुसाइड करने में साथ देना, अपनों के ही आत्मघाती विचारों को समर्थन देना कितने तकलीफदेह पक्ष लिए है | निःसंदेह ये सभी पक्ष हमारी पूरी व्यवस्था के लिए विचारणीय हैं |  हमें यह कोशिश करनी होगी कि कोई भी परिवार ऐसी विकल्पहीन स्थिति में ना आये कि जिंदगी का चुनाव न कर सके |  इसके लिए सामाजिक-पारिवारिक सिस्टम में जो दबाव और तनाव बेवजह लोगों के हिस्से आता है उससे भी दूरी बनाने होगी | झारखण्ड के इस परिवार ने तनाव और बदनामी जैसे शब्द भी आत्महत्या के कारणों को समझाने वाले गणितीय सूत्र में लिखे हैं | कुछ ऐसे ही बुराड़ी के परिवार में भी एक बेटी की सगाई ना हो पाने के चलते यह परिवार धार्मिक अनुष्ठान  तक करने में जुट गया  | ऐसे में सवाल यह भी है किसी परिवार के आर्थिक हालात डगमगाने या शादी सगाई जैसे काम में देरी होने भर से किसी परिवार को समाज से साथ देने वाले व्यवहार के बजाय तनाव और अपमान मिलने का भय क्यों रहता है ?  डर और मानसिक उत्पीड़न के कई कारण तो हद दर्ज़े के अर्थहीन और आधारहीन लगते हैं | लेकिन आज के दौर में भी इनकी मौजूदगी बानी हुई है | गौर करें तो पता चलता है कि व्यक्तिगत हो या सामूहिक,  कितने ही मामलों में तो यह मानसिक दबाव और तिरस्कार का भय ही आत्महत्या का कारण बनता है | तभी तो ऐसी घटनाओं से समाज में आ रही संवेदनशीलता की कमी की भी झलक मिलती है |  यही वजह है कि ये पूरे समाज को चेताने वाले मामले हैं | क्योंकि  किसी एक अकेली वजह से यूँ पूरा परिवार आत्महत्या का रास्ता नहीं चुन सकता | कई सारे कारण मिलजुलकर ऐसी सामूहिक आत्महत्याओं की वजह बनते हैं | भरे-पूरे परिवारों के मनोबल को तोड़ते हैं |   ऐसे में हमारी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को समग्र रूप से इन कारणों से जूझना होगा जो परिवार यानि कि समाज की सबसे अहम् कड़ी को यूँ जिंदगी से हारने की ओर धकेलते हैं |   

01 June 2018

सच को संवेदनशीलता से उकेरती कहानियाँ


आज की भागमभाग भरी ज़िन्दगी में जो कुछ छीज रहा है, उसे संवेदनशीलता के साथ उकेरती हैं इस संग्रह की कहानियाँ | डॉ. फ़तेह सिंह भाटी ने किताब की भूमिका में कहा भी है  कि "जीवन एक कला है। सुख, एक दूसरे के प्रति अपनापन, प्रेम, समर्पण, त्याग और समझ से अनुभूत कर सकते हैं, साधनों से नहीं। इंसान सुख के साधन बढ़ाता जाता है और इस हद तक कि उसके जीवन का लक्ष्य ही पैसा हो जाता है। सारी ऊर्जा इसमें लगाकर अंततः वह स्वयं को छला महसूस करता है।" संग्रह को पढ़ते हुए पाठक को यही बात या यूँ कहें  कि यही सबक, उनकी कहानियों में भी मिलता  है | मर्मस्पर्शी भाषा में आंचलिक शब्दों का प्रभावी इस्तेमाल कर रची गई इस संग्रह की कहानियाँ मन जीवन से जुड़े  कितने ही सच सामने लाती हैं | यूँ भी सामाजिक जीवन के सच को उकेरते हुए शब्द जब कहानियों में ढलते हैं, तो वो कहानियां कहीं गहरे उतरती हैं । 'पसरती ठण्ड'  संग्रह में भी  परिवेश और पात्रों के विचार-व्यवहार का चित्रण आश्वस्त करता है कि हर कहानी आम जीवन से जुड़ी है । जिससे पाठकों का जुड़ाव भी सहजता से होता है | 

पारिवारिक  संबंधों  की  बिगड़ती  रूपरेखा पर की गई बात कहानियों में मौजूदा दौर की उस  विडंबना  को रेखांकित करती हैं जहाँ रिश्तों में स्वार्थ का बोलबाला है | ये कहानियाँ बहुत सहजता से बताती-समझाती हैं कि परिवेशगत जटिलताओं और सामाजिक ताने-बाने में उपस्थित क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं में  कितना कुछ समाया होता है ।  मित्रता, स्त्रीत्व और इंसानी जीवन से जुड़े  कई मानवीय भाव कहानियों का हिस्सा बने हैं | जो लगते तो आम हैं पर इन्हें खास अंदाज़ में कहते हुए डॉ. भाटी ने इन कहानियों में  मरूभूमि की पृष्ठभूमि लेते हुए पात्रों को जीवंत बना दिया है | 'झलक-1 और झलक-2 ' में यही सामजिक विडंबना उकेरी गई है |  यहाँ आभासी संसार का ज़िक्र भी आया है | जिसने हालिया बरसों में रिश्तों में दिखावा संस्कृति की सोच को विस्तार दिया है | व्यावहारिक सोच के नाम पर किस कदर असंवेदनशीलता हमारे व्यवहार में पैठ बना चुकी है, दो भागों में लिखी इस  कहानी का  अंत इसी बात को कहता है कि "भावनाशून्य हृदय के लिए पिता हो या पति या फिर बच्चे सब अवसर हैं अपनी खुशियों के लिए अवसर |" 

स्त्री जीवन के मर्म को को रेखांकित करती  "पतित" और "उमादे" कहानियों में भले ही वर्तमान और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अंतर हो, नारीमन की पीड़ा एक सी लगती है | दोनों का मर्म यही है कि स्त्री को हिम्मत से  खड़े होकर अपने आत्मसमान के लिए लड़ना होता है | अपनी गरिमा सहेजनी होती है | कहानियों को जिस तरह शब्दों में बाँधा गया है, वह वाकई  सराहनीय  है । विशेषकर तब जब ये कहानियाँ सवाल भी लिए हैं और समस्याएं की सामने रखती हैं |   "दो पेड़",  "शापित धोरा"  और " पलायन"  स्थानीयता और आंचलिकता की सुगंध से सराबोर हैं | साथ ही लोक जीवन में मौजूद रूढ़िवादी विचारधारा और सामाजिक जकड़नों  की भी बात करती हैं |   "ठूँठ" और  "मुक्त प्रेम" जैसी कहानियां  पाठक के मन-मस्तिष्क को मनन-चिंतन  की राह सुझाती हैं | आज़ादी के नाम पर स्वछंदता के परिणामस्वरूप उपजीं कई सामाजिक विद्रूपताएं पाठक को सचेत करती हैं | पढ़ने वाले के मन को परिष्कृत करती हैं |  कहानियों  के संदर्भ मौजूदा समय में  सामाजिक  और  व्यक्तिगत जीवन के विरोधाभासों को सामने रखते  हैं  | दुखद है कि यही वह कटु सच है जिसने हमारी  पूरी सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था को ही नहीं हमारे मनोविज्ञान को प्रभावित किया है | नतीजतन, मन-जीवन में असंवेदनशीलता अब परायों के लिए ही नहीं अपने  करीबी रिश्तों एक लिए भी जगह बना रही है  | 

कहानी संग्रह में लेखक की भाषा जिस संवेदनशीलता का बहाव उत्पन्न करती है, वह भी पढ़ने वाले को पात्रों के और करीब ले जाता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब मानवीय भावशून्यता और संवेदनहीनता से  हमारी  झोलियाँ भरी हैं, ये  कहानियाँ सोचने को विवश करती हैं कि हमारे  परिवेश की दिशा क्या है ? आखिर कौन से  शिखर पर जाने की होड़ है, जिसमें हम खुद ही पीछे छूट रहे हैं | यकीनन ‘पसरती ठण्ड’ संग्रह की कहानियाँ हमारे आज के समाज का आइना हैं |  संबंधों की दिशाहीनता का बोध करवाती हैं | जो अंततः बिखराव ही लाएगा | सुखद है कि सहज और सरल भाषा में गुंथी ये कहानियाँ हमें सचेत करती हैं | उस बिखराव के खामियाजे सामने रखती हैं जिसे हम स्वयं आमंत्रित कर रहे हैं |  समग्र रूप  से देखें तो  डॉ. फ़तेह सिंह भाटी  के इस पहले कहानी संग्रह के पन्नों से गुजरते हुए पाठक का  कई विचारणीय प्रश्नों से साक्षात्कार होता है | वह अपने परिवेश  आ रही विसंगतियों को लेकर सोचने लगता है कि बदलाव के नाम पर वो सब क्यों नहीं बदला जिसे असल में परिवर्तन की दरकार थी | इन्हीं बदलावों को लेकर लेखक द्वारा ज़ाहिर की गयी  चिंता भी कहानियों में साफ़ दिखती है |  
  

22 April 2018

किरदारों ज़रिए एक शहर से मिलना




हर शहर का अलग रंग-अलग ढंग होता है | वहां के बाशिंदों का जीने का तरीका हो या बतियाने का अंदाज़ उस शहर की पहचान बन जाता है | इस मामले मामले में मुंबई  ( जिसे कभी बॉम्बे कहा जाता  था ) की देश ही नहीं दुनियाभर में खास पहचान है |  मायानगरी की भागमभाग हो या एक दूजे से जुड़कर भी कोई जुड़ाव ना रखने वाले यहाँ के लोग | यहाँ की हवा में एक अलग ही अंदाज़ की गंध  है | पत्रकार और लेखिका जयंती रंगनाथन ने अपनी किताब ‘बॉम्बे मेरी जान में’ मुंबई के इसी अंदाज़ को बखूबी शब्दों में उकेरा है  । संस्मरण  रूपी  इस  किताब में जिन असल किरदारों की कहानियाँ हैं वे इस शहर की असलियत को भी पाठकों के समक्ष जीवंत कर देती हैं  | लेखिका को घर और दफ्तर की भागदौड़ के बीच इस शहर के जो रंग दिखे,  उन्हें जीते हुए संवेदनशील मन से वे हर पहलू को सोचती रही हैं | तभी तो ये किरदार इस नगर के ही नहीं उनकी जिंदगी से जुड़े भी लगते हैं | पढ़ते हुए लगता है मानो यह शहर ही उनके मन में रच-बस गया है | जहाँ सड़क, बस, ऑटो या  लोकल ट्रेन में में दिखने वाले चेहरों के पीछे का सच जानने-समझने को उनका अपना मन भी उद्वेलित रहा | जयंती जी ने भूमिका का शीर्षक ही 'एक शहर बन गयी मैं.....'  दिया है |   उन्होंने लिखा भी है कि ' एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैं, तो रात-दिन की भाग-दौड़, आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुम्बई की लोकल ट्रेन में आपको नये किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियाँ हर वक़्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुम्बई को अगर जानना है, तो ख़ुद एक कहानी बनना होगा।' जो कि यकीनन एक सहज सा सच  है |  
दरअसल, यह किताब कुछ खास किरदारों के माध्यम से हमें मुंबई की ख़ासियतों का परिचय देती है |  असल में देखें तो दौर कोई भी हो, हर इस शहर का हर बाशिंदा जिसे मुम्बईकर कहा जाता है, यहाँ से एक ख़ास रिश्ता जोड़ता है | दुनियाभर की आपाधापी के बीच भी यहाँ जीने वालों के दिलो-दिमाग पर तारी रहते हैं यहाँ के रंग | जयंती रंगनाथन के शब्दों को पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही लगता है | अजनबी  होकर भी जो अपनापन इस शहर में दिखता है वो शायद ही कहीं और हो |  'बॉम्बे मेरी जान'  किताब में तीन किरदारों के बारे में तीन अध्याय हैं | जो इन खास चरित्रों की ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें यह शहर भी साथ चलता है  | यह  किताब लेखाजोखा है कि    कैसे लेखिका इन तीनों से  मिलीं ?   कैसे उनके साथ उस  दुनिया की  झलक देखी,  जो मुंबई नगरिया  की जीवनशैली का पागलपन भी लिए है और पीड़ा भी |  हाँ, इन किस्सों को पढ़ते हुए बहुत सहजता के साथ मुंबई शहर रंग भी  पाठकों को  दिखते रहते हैं |   'वो छोकरा', 'वो थी एक शबनम' और 'उस दुनिया की ज्योति' | ये तीनों संस्मरण के तौर पर कही गई कहानियाँ व्यक्तित्व और विचार वो सारे अंदाज़ लिए हैं, जो बॉम्बे की बेपरवाही और हरदम व्यस्त और भागते चेहरों के पीछे के ठहराव और पीड़ा को बताते हैं  |  'वो छोकरा' लोकल ट्रेन में गाने-बजाने  वाले एक लड़के की कहानी है जो हर तरह के शोषण को झेलने को अभिशप्त रहा | कहानी बताती है कि  कैसे  एक किशोर में यहाँ जीने के लिए जूझते हुए कई अवगुण आ गए | पर हीरा नाम का यह किशोर पर मन से बच्चा ही रहा  | स्वयं लेखिका ने भी उसके मन-जीवन के संघर्ष  की  पीड़ा को  समझते  हुये उसे कई बार समझाइश भी दी है | हीरा की कहानी पढ़ते हुए मुंबई की लोकल ट्रेन में गा-बजा कर या छोटा-मोटा सामान बेचकर गुजरा करने वाले  ग़रीब बच्चों की दयनीय स्थिति की हकीकत से सामना होता है | हीरा बचपन में अपने घर से भाग कर मुंबई आ गया है। दादर स्टेशन पर कूड़ा-कचरा बीनने का काम करता है। लेकिन हालात के मारे दूसरे बच्चों की तरह   ही मासूम मन वाला हीरा भी   शोषण, अपराध, बुरी लत और नकारात्मक व्यवहार के चक्रव्यूह में  फंस जाता है  | उसे इन  हालातों में फँसा देख लेखिका के संवेदनशील मन ने भी कई बार व्यावहारिक सी प्रतिक्रिया दी है | जो इस जुड़ाव को पुख्ता करती है कि वे इस शहर और इसके मिजाज़ को अच्छे से समझ चुकी थीं |

‘वो थी एक शबनम’ में  अपने गुरूर में रहने वाली बार डांसर शबनम  की कहानी भी कई रंग लिए है |  यह किस्सा कहीं  व्यावहारिक  धरातल पर इस पेशे से जुड़ी  बद्तमीज़ी और बड़बोलापन सामने रखता है तो कहीं अपने ही जीवन से जुड़े चिंता के मानवीय रंग भी | यही वजह है कि बारबाला शबनम से मुलाक़ात का यह शाब्दिक चित्रण दिलचस्प भी  है और मर्मस्पर्शी भी | किताब में  अस्सी के दशक  के जिस दौर  के बॉम्बे का जिक्र किया गया है, उस समय बार बालाओं के प्रति अच्छी खासी दीवानगी थी | 'वो थी एक शबनम' किस्से में मुंबई के बियर बार का जीवंत वर्णन है।  अमजद और शबनम  के प्रेम प्रसंग के बैकग्राउंड में इन बार बालाओं की हसरतों  के साथ  बुनियादी   ज़रूरतें  जुटाने की जद्दोज़हद का ज़िक्र भी है  | लेखिका के लिए भी अक्खड़पन और मुंहफट अंदाज वाली शबनम से मिलना और बार डांसरों के बारे में  जानना हैरानी भरे अनुभव लिए था | ज़िन्दगी के प्रति बहुत सहज सी प्रतिक्रिया रखने वाली शबनाम दुबई जाकर पैसा कमाना चाहती थी | ताकि आगे किसी की मोहताज ना रहे |  वो अमजद से पीछा छुड़ा रही थी क्योंकि रिश्तों पर भरोसा करने का रिवाज  शायद उसकी दुनिया का हिस्सा ही नहीं था |  ऐसे ही कई मोड़ शबनम की कहानी  को भी दिल छूने वाला किस्सा बना देते हैं | जिसे लेखिका ने बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा है | 

जयंती लिखती हैं -‘धीरे से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अन्दर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है, आपको पता ही नहीं चलता | किताबे के एक किरदार का भी बॉम्बे से यूँ ही मिलना हुआ |  उस दुनिया की ज्योति’ जो हिजड़ों की दुनिया से है, किताब के तीसरे संस्मरण के केंद्र में है   | ज्योति जो बचपन में  सुरेश नाम का लड़का थी  | जन्म से सुरेश के ज्योति बनने का यह किस्सा संवेदनाओं को झकझोरता है और कई संवेदनशील सवाल भी उठाता हैं | ज्योति का किन्नरों की बस्ती में रहते हुए भी अपने माता-पिता को याद करना पाठक को  भी भावुक  कर जाता है | ज्योति की दुनिया का दुखद सच और समस्याएं जानने  के बाद हम सोचने को विवश भी होते  हैं कि आखिर क्यों  समाज के इतने बड़े तबके के हिस्से इंसानी हक़ भी नहीं आये | जयंती एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के सिलसिले में ज्योति से  मिलती हैं । कई मुलाकातों में वे हिजड़ों के रहन-सहन, शादी ब्याह, गुरु-चेली के रिश्तों और किन्नर समाज के जीवनयापन से  जुड़ी  दूसरी कई दुश्वारियों से रूबरू होती हैं |  ऐसी अधिकतर बातें आमजन भी नहीं जानते | इन बातों और किस्सों को लेखिका ने बहुत सहज अंदाज़ में संजोया है | यही वजह है कि जीवन के कटु सच दुश्वारियों  को सामने रखते ये किरदार उनके मन के करीब  प्रतीत होते हैं |  मन से जुड़ीं ये कहानियां पढ़ने वालों के मन पर भी दस्तक देती हैं |  जो ज़िंदगी की जद्दोज़हद समझा जाती हैं | जयंती कहती भी हैं कि मुंबई एक शहर भर  नहीं है  |  ज़िंदगी जीने और अपने आप को समझने का गेटवे भी है |  

06 March 2018

कोलाहल





विचार साझा करने के हर माध्यम ने
संवेदनाओं की ओट में हमें
बना दिया बेहद असंवेदनशील
भुला दिया अंतर घटना और दुर्घटना का
मिटा दी लकीर सूचित करने  शोर मचाने के मध्य
कहना  कोलाहल बन गया
आवाज़ उठाने  के माध्यम
बन गए ऊँचे मचान
जिनपर चढ़कर
स्वयं को हर क्षेत्र का विशेषज्ञ समझ
सार्थक कहने  नाम पर
हम अपने ही शब्दों को अर्थहीन बना रहे  |






17 February 2018

बजट - महिलाओं की उम्मीदें, कुछ पूरी कुछ अधूरी


गांवों से लेकर शहरों तक आधी दुनिया की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए बजट में कुछ कल्याणकारी योजनाओं और महिला सशक्तीकरण को लेकर सोचा जरूर गया है पर आधी आबादी से  जुड़ी कई अहम् बातों की अनदेखी भी हुई है | दरअसल, इस सरकार के इस आख़िरी पूर्ण बजट  को  लेकर महिलाओं के पास आशाओं की एक  लंबी सूची थी  |  महिलाओं के लिए सुरक्षा और विकास के साथ-साथ रसोई का खर्च भी मायने रखता है  | ( गंभीर समाचार पत्रिका में प्रकाशित ) 





 click here to read