My photo
पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

14 October 2018

अस्मिता के योद्धाओं का सम्मान



मौजूदा समय में स्त्री अस्मिता की लड़ाई दुनिया के हर हिस्से का दुर्भाग्यपूर्ण सच बन गई है | अफ़सोस कि दुनिया के कई हिस्सों में तो यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है |   विशेषकर अशांत और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो बरसों से हालात बेहद चिंतनीय बने हुए हैं | आर्थिक, राजनीतिक स्वार्थ साधने की हिंसक गतिविधियाँ स्त्री जीवन के लिए दंश बन गई हैं |  ऐसे में  युद्धग्रस्त क्षेत्रों में यौन हिंसा के खिलाफ काम करने के लिए डॉ.  डेनिस मुकवेगे और यजीदी कार्यकर्ता नादिया मुराद को इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार  चुना जाना वाकई सराहनीय है |  इन दोनों शख्सियतों ने  यौन हिंसा के खिलाफ लंबी जंग लड़ी है | गौरतलब है कि आईएस के आंतक का शिकार हुई यजीदी दुष्कर्म पीड़िता, नादिया मुराद ने आंतकवादियों की यातना झेलने के बावजूद  संघर्ष किया और महिलाओं की अस्मिता के लिए डटी रहीं |  नादिया ने न सिर्फ खुद पर हुए जुर्म और यौन शोषण के बारे में खुलकर बात की बल्कि 'आवर पीपुल्स फाइट संगठन' की स्थापना कर यौन शोषण के खिलाफ मुहीम भी चलाई | संघर्ष की मिसाल बनी नादिया मुराद मलाला युसूफजई के बाद दूसरी सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता हैं | इसी तरह  डॉक्टर चमत्कार' के नाम से विख्यात डॉ. मुकवेगे  कांगो में लंबे समय से यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए काम करते आ रहे हैं। उन्होंने महिलाओं को  बलात्कार और यौन हिंसा के सदमे से बाहर निकालने के लिए दो दशकों तक काम किया है | वे युद्ध के दौरान महिलाओं के खिलाफ हिंसा के भी  मुखर विरोधी हैं | डॉ. मुकवेगे गंभीर यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के इलाज में  विशेषज्ञता हासिल की है। दुष्कर्म की शिकार बनी महिलाओं की पीड़ा को समझने की संवेदनशीलता लिए एक  प्रेरणादायी व्यक्तित्व बने,  डॉ. मुकवेगे ने अपने साथियों के साथ मिलकर अब तक 30 हजार से ज्यादा  दुष्कर्म पीड़िताओं का इलाज कर उनकी सहायता की है। यकीनन यह जीवट और संवेदनाओं से भरी सोच सरहानीय है |  

दरअसल, यौन हिंसा के वैश्विक अभिशाप से मुक्ति पाने की जंग में  योद्धा साबित होने के लिए दोनों को समानित किया जाना, स्त्री जीवन की इस दर्दनाक  विडंबना की और दुनिया का ध्यान खीचना भी है |  मौजूदा समय में  दुनिया के किसी एक देश में नहीं बल्कि हर हिस्से में स्त्रियाँ इस अमानवीयता को झेलने को विवश हैं |हाल ही में  मीटू कैम्पेन  जैसे अभियान से यह बात पुख्ता हुई थी कि यह पीड़ादायी समस्या कितने बड़े पैमाने पर है |  गौरतलब है कि  संसार के हर हिस्से की महिलाओं को जोड़ने वाले मी टू अभियान में देश, धर्म, जाति और  समुदाय  से परे दुनियाभर की महिलाओं ने यौन शौषण को लेकर अपनी चुप्प तोड़ी  थी | विश्व के कोने कोने से न  केवल महिलाओं ने इस अभियान में हिस्‍सा लिया बल्कि इस दुर्व्यवहार  को  लेकर कई खुलासे भी किये थे | यह हैशटैग एक समय में  85 देशों में ट्रेंड कर रहा था | अमरीकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने इस कैम्पेन को शुरू  कर ट्वीटर पर लिखा था कि   ‘यदि आप यौन शोषण या हिंसा की शिकार रही हैं तो आप इस ट्वीट का जवाब ‘मी टू’ लिखकर दें।’  समस्या की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अगली सुबह तक उनके पास 53000 जवाब आ चुके थे।  इस हॉलीवुड अभिनेत्री  ने यौन शोषण के   खिलाफ जब यह मुहिम छेड़ी तो  दुनियाभर की महिलाओं ने इस अभियान में उनका साथ  दिया । महज तीन दिन के अंदर ही दुनियाभर में 1.2 करोड़ महिलाओं ने हैशटैग मी टू के नाम से आपबीती साझा की ।  जिसमें  घरेलू हिंसा  से लेकर कार्यस्थल पर शोषण  तक की घटनाएँ तक शामिल थीं । इस  संवेदनशील मुद्दे को आवाज़ देने वाला यह अभियान इतना सफल रहा कि साल 2017 के लिए 'टाइम पर्सन ऑफ द ईयर'  के तहत यौन शोषण और हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद कर 'मी टू' अभियान में हिस्सा लेने वालीं महिलाओं  'साइलेंस ब्रेकर्स'  को पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया है | समझना मुश्किल नहीं यौन हिंसा  के इतने मामले जब सभ्य और विकसित समाज में होते हैं तो संकटग्रस्त इलाकों की स्थितियां कैसी होंगीं ? 

निःसंदेह, महिलाओं की अस्मिता को ठेस पहुँचाने वाली यह मानसिकता पूरी दुनिया में आधी आबादी के लिए  शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की बड़ी वजह है |  लेकिन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में तो हालात  सबसे  विकट हैं | यही वजह है कि डॉ.  डेनिस मुकवेगे और   नादिया मुराद के नामों की घोषणा करते हुए नोबेल समिति  के  अध्यक्ष  ने कहा कि इन दोनों को यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए चुना गया है। दोनों वैश्विक अभिशाप के खिलाफ संघर्ष का उदाहरण हैं। उन्होंने  कहा कि  ‘‘एक अति शांतिपूर्ण विश्व तभी बनाया जा सकता है जब युद्ध के दौरान महिलाओं, उनके मूलभूत अधिकारों और उनकी सुरक्षा को मान्यता और सुरक्षा दी जाए |’ यकीनन मुकवेगे और मुराद दोनों एक वैश्विक संकट के खिलाफ संघर्ष का प्रतिनिधित्व करने आए हैं जो कि किसी भी संघर्ष से परे है, जिसे बढ़ते हुए  मी टू  अभियान ने भी दिखाया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह समस्या हर स्तर मौजूद है | स्त्रियों के आगे बढ़ने और सुरक्षित जीवन जीने की राह में बड़ी बाधा है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शोध के अनुसार दुनिया भर में हर तीन में से एक से ज्यादा महिला को शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है। ऐसे में  आतंक और युद्ध की त्रासदी झेल रहे देशों में  महिलायें हद दर्जे की बर्बरता को झेलने को विवश हैं | संयुक्त  राष्ट्र और उसके मानवाधिकार आयोग की ओर से इराक और सीरिया में आतंकवादी हिंसा पर जारी एक रिपोर्ट बताती है कि आतंकी हिंसा झेल रहे देशों में बच्चे एवं महिलाएं यौन  उत्पीड़नों और अमानवीय यातनाओं का भी शिकार हैं । ग्लोबल टेरर इंडेक्स के अनुसार आज दुनिया के एक तिहाई देश आतंकी हिंसा के शिकार हैं । आतंकी हिंसा का दंश किसी देश के पूरे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक ढांचे की नींव हिला देता है। जिसके चलते सामने आने वाले खामियाज़े महिलाओं के लिए सबसे अधिक पीड़ादायी होते हैं |  

दरअसल, संकटग्रस्त इलाकों  में  यौन हिंसा की घटनाएँ  बहुत  बर्बर हैं |  ऐसे क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों को गुलाम तक बनाकर रखा जाता है | मानव तस्करी की समस्या भी वहां  दंश बनी हुई है | कुछ समय पहले  यौन हिंसा  सम्बन्धी मामलों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि द्वारा दी जानकारी के मुताबिक़ ईराक और सीरिया में आतंकवादियों द्वारा अपहृत लड़कियों को गुलामों के बाजार में सिगरेट के  पैकेट की कीमत में बेच दिया जाता है | संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि (यूएनएफपीए) द्वारा जारी आकलन  'सीरिया की आवाजें' 2018 के अनुसार, यौन उत्पीड़न के भय, जो अक्सर अपहरण से जुड़े हुए हैं, महिलाओं और लड़कियों के लिए चिंता का विषय  है जो उनके मानसिक तनाव में भी योगदान देता है।  शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है | नोबल पुरस्कार पा रहीं  नादिया भी यह भय और पीड़ा   झेल चुकी हैं | संघर्ष और हौसले की मिसाल बनी नादिया मुराद  करीब तीन साल तक आतंकवादियों  की दरिंदगी, सामूहिक दुष्कर्म  और यातानाओं की शिकार हुई हैं | मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाते हुए  कह चुकी हैं  कि महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए बाकायदा दास बाजार लगते हैं | ऐसे में यह वाकई प्रेरणादायी  है कि नादिया ने  यौन दासी बनाये जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना और  शोषण को अपनी नियति नहीं माना बल्कि संघर्ष की हिम्मत जुटाई |  इतना ही नहीं आइएस के चंगुल से आज़ाद होने के बाद उन्होंने दूसरी महिलाओं और लड़कियों की मदद करने की ठानी | दूसरी और ऐसी पीड़ा भोगने वाली महिलाओं के सहायता के लिए डॉ. मुकवेगे आगे आये |  ऐसे में अंतराष्ट्रीय स्तर दिया जाने वाला शांति का यह नोबल पुरस्कार ऐसी आवाजों को  मुखर और दृढ़ बनाएगा  जो दुनियाभर में यौन हिंसा की अमानवीयता के खिलाफ उठ रही हैं |  

3 comments:

  1. अत्यधिक संवेदनशील विषय है। समूचे विश्व की महिलाये इसकी चपेट मे है।

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 14/10/2018 की बुलेटिन, अमर शहीद सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेतरपाल जी को सादर नमन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-10-2018) को "सब के सब चुप हैं" (चर्चा अंक-3126) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete