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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर | हिन्दी समाचार पत्रों में प्रकाशित सामाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य।प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | सम्प्रति ---समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित पुस्तकें-----कविता संग्रह- 'देहरी के अक्षांश पर' और 'दरवाज़ा खोलो बाबा', आलेख संग्रह-'खुले किवाड़ी बालमन की', लघुकथा संग्रह-'ड्योढ़ी से व्योम तक'

ब्लॉगर साथी

04 February 2024

खुले किवाड़ी बालमन की


मौजूदा दौर में परवरिश के सभी  पहलुओं पर चर्चा  ज़रूरी हो चली है | पैरेंटिंग के मोर्चे पर छोटी-छोटी  बातों का बड़ा असर  होता है |  मेरे लिए विषय केवल लिखने-पढ़ने भर का नहीं  | बीते सोलह वर्ष अपने बच्चे की परवरिश करते हुए इसी विषय पर सबसे ज़्यादा सोचने-समझने, जानने और उन बातों को व्यावहारिक धरातल पर जीने में  ही बीते हैं  | 

परवरिश, बच्चों को सिखाते हुए स्वयं अभिभावकों के लिए भी बहुत कुछ सीखने की यात्रा है। पालन-पोषण के मोर्चे पर चुनौतियाँ भी मिलती हैं तो चमत्कारी अनुभव भी। बच्चों के मासूम और चैतन्य भाव की सरलता पल-पल कुछ समझाती है। बच्चे के कोरे मन को प्रेम से पूरते हुए समग्र संसार के प्रति माता-पिता का दृष्टिकोण ही बदल जाता है। नैतिक समझ से लेकर सामाजिक मेलजोल तक, जीवन मूल्यों का महत्व समझ में आने लगता है।

इस आलेख संग्रह में समाज की इस साझी ज़िम्मेदारी से जुड़े सवाल, समस्याएँ और सुझाव ही समाहित हैं। आशा है बच्चों के पालन-पोषण से जुड़े विचार अभिभावकों की उलझती सोच को सुलझाने और बालमन की किवाड़ी पर स्नेहपगी दस्तक देने में मददगार बनेंगे।  अपना मन ना खोलने के मामले हों या तकनीक के फेर में  दिशाहीन होती सोच |  पारिवारिक दबाव की असहजता हो या ख़ुद को साबित करने की धुन में बिखरता बालपन | मन की मज़बूती पर पिछड़ने के हालात हों या आपराधिक घटनाओं तक में लिप्त होने का दुस्साहस |  बच्चों के मन-जीवन को समझना एक पहेली बन गया है | देश, समाज और परिवार का भविष्य  कहे जाने वाले  बचपन को सहेजने-समझने वाले  शब्दों को समेटती यह किताब अद्विक पब्लिकेशन से ..... इस  आशा और विश्वास के साथ कि हम बालमन की किवाड़ी पर समय रहते दस्तक दें |  


किताब मँगवाने की जानकारी और लिंक 

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प्रकाशक  से सम्पर्क कर के पुस्तक मँगवाने पर प्रथम सौ पाठकों के लिए डाक-शुल्क ‘अद्विक पब्लिकेशन’ द्वारा वहन किया जाएगा। प्रथम  100 प्रतियां खरीदने वाले मित्रों के नामों में से पर्ची निकालकर 3 नाम चुनेंगे और उन्हें किताब के दाम लौटा देंगे यानी पर्ची वाले 3 मित्र किताब की अपनी प्रति मुफ्त में पायेंगे। आप भी इन तीन में से एक हो सकते हैं। अपनी प्रति प्राप्त करने के लिए कृति का मूल्य रु.220/-  9560397075 नंबर पर ‘पेटीएम’, ‘गूगल पे’ या ‘फोन पे’ द्वारा अदा करें और स्क्रीन-शॉट सहित अपना पूरा पता व्हाट्स करें | 

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1 comment:

Admin said...

यह लेख पढ़कर लगता है कि आप परवरिश को सच में जीकर लिख रही हैं। सोलह साल का अनुभव हर पंक्ति में साफ झलकता है। आप बच्चों की बात करते हुए अभिभावकों की जिम्मेदारी भी ईमानदारी से सामने रखती हैं। आज के समय में यह बातचीत बहुत ज़रूरी लगती है, क्योंकि बच्चे और माता-पिता दोनों उलझन में रहते हैं।

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