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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

08 May 2019

कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ?

हाल ही में राजधानी दिल्ली के फतेहपुर बेरी में डेढ़ साल के बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी गई | इस दिल दहला देने वाले मामले  को मात्र आठ साल के एक बच्चे ने ही अंजाम दिया है |  क्रूरता का कारण बस इतना कि कुछ दिन पहले आरोपी और उसके भाई को मृतक बच्चे की बहन ने धक्का देकर गिरा दिया था | जिसका बदला लेने के लिए उसने यह क्रूर कदम उठाया | यह वाकया हैरान भी करता है और भयभीत भी  कि मात्र आठ साल का बच्चा, रात के समय पड़ोस के मकान की छत पर माँ के पास सो रहे बच्चे के पास छत के रास्ते ही आया और सोते हुए मासूम को उठाकर ले गया।  उसने बर्बर व्यवहार करते हुए पहले घर के बाहर बनी पानी की  टंकी में उसे तीन-चार बार डुबोया और फिर घर से कुछ दूरी पर ही करीब तीन फुट गहरी नाली में  गिरा दिया। इतना ही नहीं डेढ़ साल के इस अबोध  को चोट पहुंचाने के लिए उसने बच्चे को पत्थर भी मारे। 
निःसंदेह, रात के अँधेरे में ऐसी भयावह घटना को अंजाम देने का दुस्साहस करने वाले बच्चे की मानसिकता और परवरिश के परिवेश को लेकर कई सवाल उठने लाजिमी हैं | साथ ही यह सोचा जाना भी जरूरी है कि हमारे यहाँ साल-दर -साल बाल अपराधियों की संख्या क्यों बढ़ रही है ?  उनका मासूम मन जिन घटनाओं को अंजाम दे रहा है, वो कोई छोटी-मोटी वारदातें नहीं हैं | हद दर्जे के बर्बर और असंवेदनशील मामलों में कम उम्र के बच्चों की भागीदारी देखने को मिल रही है |  हालिया  बरसों में   हर तरह की  सामाजिक- पारिवारिक पृष्ठभूमि  से जुड़े बच्चे ऐसे मामलों में भागीदार पाए गये हैं |  महंगे स्कूलों में पढने वाले संभ्रांत परिवारों के लाडलों से लेकर अशिक्षित और आम सी पृष्ठभूमि के परिवारों में पले-बढे बच्चों की भागीदारी के ऐसे कई मामले आये हैं | आखिर कैसे बच्चे बड़े कर रहे हैं हम ? 

बच्चों में बढ़ रही असंवेदनशीलता, आक्रामकता और नकारात्मक व्यवहार अभिभावकों के लिए भी बड़ी दुविधा पैदा कर रहा है | लेकिन सच तो यह है कि बालमन में आ रही विचार और व्यवहार की दिशाहीनता का हल भी उनके अपनों को ही तलाशना होगा | गौरतलब है कि आक्रामता और रंजिश के चलते जान ले लेने के मामलों को बड़ी उम्र के लोग भी आये दिन अंजाम दे रहे  हैं |  कमोबेश हर आयु वर्ग के लोगों में अब ठहराव और संवेदनशीलता का अभाव है  | घर-परिवार ही नहीं पूरे परिवेश का माहौल ही असंवेदनशील हो गया है | ऐसे में अभिभावकों की सोचना होगा कि सब कुछ जुटाने के फेर में कहीं बच्चे ही पीछे ना छूट ना जाएँ |  (  दैनिक हरिभूमि में प्रकाशित लेख का अंश ) 

2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 09.09.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3330 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 08/05/2019 की बुलेटिन, " पैरंट्स टीचर मीटिंग - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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