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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

10 July 2015

ड्योढ़ी


घर की ड्योढ़ी पर
भोर की पहली किरण की 
अंगड़ाई से पहले
माँ  के आँचल में
छुपी  दिव्य उजास  
कर देती है  
आँगन को आलोकित । 

14 comments:

  1. सत्य एवं सुन्दर !

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  2. सत्य लिखा है. समय कोई भी हो, सानिध्य माँ का हो तो उजाला ही उजाला है मन में और बाहर में. सुन्दर रचना.

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  3. सच है माँ का एहसास ही आलोकित कर देता है घर-आँगन को, माँ होती ही है ऐसी...सुंदर अभिव्यक्ति

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  4. और ये उजास रहती है किसी ज्योति की तरह दिल में ... और सूरज की किरण हो न हो .... ये प्रकाश देती है जीवन भर ...
    माँ का तो एहसास ही काफी है रौशनी के लिए ...

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  5. सुन्दर अभिव्यक्ति !

    आभार !

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति !

    आभार !

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  7. सच है माँ का नाम ही पर्याप्त है माँ है तो उजाला ही होगा
    आभार

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  8. मां का आंचल सूरज से कम नहीं।
    ममता की नितांत नई व्याख्या।

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  9. ये प्रेम ही तो परमात्मा स्वरूप है माँ के आँचल सा।

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  10. आह...खूबसूरत !

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  11. बहुत सुन्दर क्षणिका !

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  12. सत्य लिखा है....बहुत सटीक

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