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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

06 August 2015

अश्लील साइट्स पर प्रतिबंध ज़रूरी


हाल ही में   सरकार ने 857 पोर्न साइट्स को  प्रतिबंधित किया लेकिन बाद में अपना फैसला वापस ले लिया । सरकार द्वारा  अश्लील  सामग्री को बच्चों की पहुंच से दूर करने के लिए ऐसा  निर्णय लिया गया था  । अब यह प्रतिबंत केवल चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़ी साइट्स पर ही रहेगा । इस मामले में सरकार से पीछे हटने से  समाज  के एक बड़े वर्ग को निराशा तो ज़रूर हुयी पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर बैन जारी रहेगा  यह एक स्वागतयोग्य कदम है । क्योंकि बाल  अश्लीलता  बाल शोषण का एक वीभत्स रूप है  और   इंटरनेट पर बच्चों के  अश्लील  क्लिप्स को देखने की मांग के चलते बच्चों को पोर्न के व्यापार में भी धकेला जाता है। बाल  अश्लीलता  का यह भयावह रूप आज के समय का कटु और अमानवीय सच है ।  साथ ही यह  वैश्विक स्तर पर बच्चों से जुड़ी एक बड़ी समस्या भी है।। यही कारण है कि  कम से कम चाइल्ड पोर्न से जुड़ी वेबसाइट्स पर तो शिकंजा कसना ज़रूरी है ही । 

  इसमें कोई शक नहीं कि  बीते कुछ सालों में इंटरनेट पर छाये इस खुलेपन ने समाज का गरिमामयी ताना बाना बिखरने में अहम भूमिका निभाई है । जिससे मासूम बच्चे भी नहीं बचे हैं । मौजूदा समय में बाज़ार में बीस करोड़ से भी अधिक अश्लील वीडियो और क्लिपिंग आसानी से उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं  वैश्विक स्तर पर  आज चाइल्ड पोर्न सबसे तेज़ी से विस्तार पाने वाला व्यवसाय बन गया है |  गौरतलब है कि इन चिंतनीय परिणामों को देखते हुए ही कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट  ने भी पोर्न साइट्स को ब्लॉक ना किए जाने पर सरकार के प्रति नाराज़गी ज़ाहिर की थी । उस समय भी अदालत की नाराज़गी ख़ासतौर से चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी से जुड़ी वेबसाइट्स को ब्लॉक ना किए जाने पर थी । उच्चत्तम न्यायलय ने इंटरनेट पर अश्लील सामग्री (पोर्नोग्राफी) मुहैया करवाने वाली इंटरनेट साइट्स की बढ़ती संख्या पर अपनी विचारणीय टिप्पणी दी थी । कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि इस समस्या का समाधान खोजा जाय।  एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने  समाज के हर वर्ग से  जुड़ी इस समस्या पर अपनी  चिंता ज़ाहिर की  थी।  यह एक कड़वा और भयभीत करने वाला सच है कि आज छोटे बच्चों  से लेकर  दिहाड़ी  मजदूर तक थोक के भाव परोसी जा रही इस अश्लीलता के जाल में हैं ।  महानगरों से लेकर दूर दराज़ के गांवों तक विकृत मानसिकता और रिश्तों को तार तार कर देने वाली सोच को जन्म देने वाली यह अश्लील सामग्री अपनी जगह बना चुकी है । यह  वाकई  चिंतनीय है कि  हमारे बच्चों के अविकसित दिमाग और अशिक्षित वर्ग तक पोर्न साइट्स के जाल में उलझे हुए हैं । जिसके चलते उनके मन मस्तिष्क में शारीरिक संबंधों को लेकर एक वीभत्स और विकृत सोच पनप रही है। इसीलिए ज़रूरी है कि इसे बढ़ावा देने वाली पोर्न साइट्स बारे में गंभीरता से सोचा जाए । 

 इस मामले  में ये बेहद अफसोसजनक रहा  कि भारत में अश्लील साइटस को प्रतिबंधित किया जाना कई लोगों के गले नहीं उतरा ।सरकार की यह कई सख्ती कई लोगों के गले नहीं उतर पाई  । कितने ही  कुतर्कों के साथ इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन मानते हुए इसका विरोध किया गया । इस नीले ज़हर पर लगे बैन को कई लोगों ने देश  की सामाजिक प्रगति को पीछे की ओर ले जाना  करार दिया । वाकई इन जैसे लोगों से यह सवाल किया जाना चाहिए कि ये अश्लीलता देश को आगे ले जाने में किस तरह मददगार है ? यह कैसी विडंबना है कि समाज का एक वर्ग अपने बौद्धिक कुतर्कों से  इस सराहनीय कदम को तुगलकी फरमान बताकर उसका विरोध किया ।  वो भी तब जब महिलाओं और बच्चों के यौन शोषण  के  ऐसे अनगिनत  मामले सामने आ चुके हैं जिसमें आरोपी ने स्वयं  यह माना है कि ऐसे कुत्सित कर्मों की दुष्प्रेरणा उन्हें अंतरजाल पर मौजूद इन्हीं अश्लील साइट्स से ही मिली है । 

ये तथाकथित  बुद्धिजीवी ये क्यों समझते कि बंद केबिन में पोर्न देखने वाले परिपक्व  लोगों से कहीं ज़्यादा बड़ी संख्या ऐसे अर्धविकसित मस्तिष्क वाले बच्चों  और युवाओं की है जो अश्लीलता के इस बेहूदा बहाव में बहकर सदा के लिए दिशाहीन हो जाते हैं । यह अफसोसजनक ही है कि  इन्हें यह समझ नहीं आता कि इंटरनेट के माध्यम से एक क्लिक पर उपलब्ध यह विकृति समाज की नई पीढी को मनोदैहिक बीमारियों की सौगात दे रही है । पोर्न की अँधेरी दुनिया में फंस जाने वाली लड़कियों और स्त्रियों के अमानवीय शोषण की स्थितियों के प्रति  इन लोगों  की चेतना शून्य है । वरना  सरकार के इस कदम खिलाफत करने का कोई आधार ही नहीं  था । आखिर कितना और कैसा खुलापन  चाहता है ये वर्ग  ?  क्यों  बिना किसी ठोस वजह के सरकार के इस सकारात्मक कदम का इतना विरोध  किया गया ? खैर, अब  कम से कम  चाइल्ड पोर्नोग्राफी से सम्बंधित साइट्स पर तो बैन  जारी रहना ही चाहिए क्योंकि यह ना केवल बाल शोषण की विकृति को बढ़ावा देने वाला है बल्कि अमानवीय सोच का सबसे कुरूप चेहरा भी है ।   

                                                                   ( 6/8/2015 को  राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय  पृष्ठ पर  प्रकाशित मेरे लेख के अंश ) 

19 comments:

  1. विचारणीय आलेख...अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी परोसा जाना उचित नहीं. भारत में पोर्न देखने ट्रेंड दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. भारतीय लोग पोर्न देखने के मामले में तीसरे नम्बर पर हैं. पाबन्दी के बावजूद पोर्न साइट्स तक पहुँच बहुत मुश्किल नहीं. पोर्न की लत एक तरह का मानसिक विकार ही है...प्रकाशन के लिए बधाई

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (08-08-2015) को "ऊपर वाले ऊपर ही रहना नीचे नहीं आना" (चर्चा अंक-2061) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आपके हिन्दी ब्लॉग और चिट्ठे को चिट्ठा फीड्स एग्रीगेटर में शामिल किया गया है। सादर … धन्यवाद।।

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  4. मानसिक रोगों और रोगियों पर अंकुश ज़रूरी है

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  5. आवश्यक लेखन...आभार इस आलेख का...

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  6. बहुत जरुरी है प्रतिबन्ध
    गंभीर विचारणीय लेख प्रस्तुति हेतु आभार!

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  7. अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर विरोध करना लोगों की आदत बन गया है फिर विचार अच्छा हो यह बुरा. जो विरोध करते है अपने बच्चों को इससे दूर रखने में हमेश प्रयासरत रहते है. लेकिन सार्वजनिक मंच की भाषा तो कुछ और है.

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  8. कुछ लोग सिर्फ़ विरोध करना ही जानते हैं ..... और भेड़ की तरह जिधर ढकेलो चल पड़ते हैं ......स्वमतिष्क्शून्य हो चुके हैं लोग .....ये बच्चों के प्रति घातक है ...और आगे बहुत दुखद परिणाम भी आएंगे ..:-(

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  9. ये सच में एक अच्छा कदम था...बैन लगाना ऐसे साइट्स पर!

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  10. आलेख में व्यक्त विचारों से सहमत। प्रतिबंध न होने से भविष्य में घातक परिणाम की आशंका ।

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  11. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर हरेक चीज का विरोध करना आज फैशन बन गया है. वे नहीं सोचते कि बच्चों के कच्चे मष्तिष्क पर इनका कितना गलत असर हो सकता है ...बहुत सारगर्भित आलेख..

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  12. ये एक अच्छा कदम था ... और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यहाँ भी अपना काम कर दिखाया ... अफ़सोस की बात है ... अभी में कुछ दिन पहले अमेरिकन टी वी में समाचार सुन रहा था की हिल्टन ग्रुप होटल अपने ग्राहकों के लिए ऐसी साइटें बंद कर रहा है ... जहाँ दूसरे देश इस घातक खेल तो समझ रहे हैं अपने देश में फेशन साँझा जा रहा अहि आजादी के नाम पर ...

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  13. आदरणीया डॉ मोनिका जी ..ये एक अच्छा कदम था इस पर नियंत्रण बड़ा ही मुश्किल काम है यहां कुछ न कुछ धीरे धीरे ही हो जाए तो भी सराहनीय है
    भ्रमर ५

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  14. सार्थक कदम किन्तु इस पर भी विपक्ष हंगामा खड़ा कर रहा है।

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  15. रक्षाबंधन की बधाइयाँ.

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  16. Porn hamare samaj me bada anishth hai,ban Honda hi chaie.

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  17. सटीक चिंतनीय आलेख !

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