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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

01 May 2010

परिवार की रीढ़ है -गृहिणी

कल विश्व श्रमिक दिवस है। पूरी दुनिया में काम के मोल की बात की जाती है। मोल यानि की किसी भी काम एवज में मिलाने वाला मेहनताना। ऐसे में आज के दिन बात उन महिलाओं की जो लक्ष्मी कमाने घर के बहार भले ही न जाती हों, और महीने के आखिर में फिक्स तनख्वाह नहीं लाती पर समाज और परिवार में उनका योगदान अनमोल है। अक्सर यह देखने में आता है की गृहणियों की भूमिका को नज़रन्दाज किया जाता है, जबकि गृहणियां परिवार की उस पृष्ठभूमि की तरह हैं जो खुद भले ही पीछे छुप जाती हैं पर इनके बिना घर के किसी भी सदस्य की तस्वीर साफ तौर पर उभर कर सामने नहीं आ सकती। बावजूद इसके उनके काम को न तो कोई महत्त्व दिया जाता है और न ही उसकी कीमत समझी जाती है। ऊपर से घर का कोई भी सदस्य, किसी भी समय कह देता है........... दिन भर घर में करती ही क्या हो ?

चाहे गाँव हो या शहर सबसे पहले बिस्तर छोड़ने और सबसे बाद अपने आराम की सोचने वाली घरेलू महिलाएं पति, बच्चों और घर के अन्य सदस्यो की देखभाल में इतनी व्यस्त हो जाती हैं की खुद को हमेशा दोयम दर्जे पर ही रखती हैं। घर परिवार के सभी सदस्यों के लिए हर समय कुछ न कुछ करते रहने वाली गृहणियों की भूमिका को अनदेखा करने की सबसे बड़ी वजह यह है की हमारे देश में घरेलू महिलाओं के योगदान की वैल्यू पैसे में नहीं आंकी गयी है। जबकि हमारी जरूरतों को पूरा करने वाली गृहणी माँ या पत्नी के रूप में हमारा सपोर्ट सिस्टम है जिनके सहयोग के बिना घर के दूसरे मेम्बर्स जिंदगी सही ढंग से नहीं चल सकती ।

मई २००७ में अमेरिका में हुए एक सर्वे में वहां गृहणियों द्वारा किये गए घरेलू कार्यों की सालाना कीमत ५७ लाख रूपये आंकी गयी थी। ऐसे में हम खुद सोच सकते हैं की हमारे देश में जहाँ घर पर रहने वाली महिलाओं के पास विकसित देशों के परिवारों से काम कहीं ज्यादा और सुविधाएं काफी कम हैं , तो उनके काम की कीमत क्या होगी ?

यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है की हमारे यहाँ घरेलू कामों में पुरुषों का सहयोग न के बराबर होता है ऐसी जिम्मेदारियां पूरी तरह से गृहणियों के ऊपर ही होती हैं २००१ में एक मुकदमें का फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के जज आर एस सोंधी कह चुके हैं की समाज में किसी भी महिला का योगदान ३००० रूपये मासिक से कम नहीं आँका जा सकता। उनका यह भी कहना था की किसी भी गृहणी के योगदान को हलके में नहीं लिया जा सकता। इतना ही नहीं क्या आप जानते हैं की हमारे देश में गृहणियों की सेविंग समूची बचत का २४ फ़ीसदी है जो की दुनिया भर में सबसे ज्यादा है।

6 comments:

  1. इंटरनेट पर विचरण करते हुए आपके ब्लाग पर आगमन हुआ.आपके विचारों से अवगत हुआ.यशस्वी एवं सार्थक ब्लाग जीवन के लिए शुभकामनाएं स्वीकारें

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  2. your writing is great and had the strength to keep the reader engaged.

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  3. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 04 -12 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज .जोर का झटका धीरे से लगा

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  4. सही विश्लेषण करती अच्छी पोस्ट ..

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  5. विचारणीय आलेख्।

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