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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

22 July 2017

हरियल देहरी



बरसते सावन में पीछे छूटे मायके लो याद करते हुए ये विचार भी आया -  


गाँव -घर तो पुरुषों  के भी
छूटते हैं
कि वे भी निकल पड़ते हैं
ज़रूरतें जुटाने अनजान दिशा में -अनभिलाषित दशा में
अनचाही दूरियों को जीने और अकेलेपन का  गरल पीने |


बदलती रुत और बरसती बूंदों में
वे भी तो याद करते होंगें
माँ-बाबा और अपना आँगन
अपनी हरियल देहरी से परे देश-विदेश में
अपनों का सुख बटोरने की
जद्दोज़हद में जुटे पिता, भाई या पति का
मन  कितना उदास और शुष्क होता होगा  ?







11 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-07-2017) को "शंखनाद करो कृष्ण" (चर्चा अंक 2675) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. Sataya hai. yeh bhi toh hota hai. par ajkal ke rishton mein kahan kuch bacha hai yeh anubhaw karne ke liye. sundar anubhuti.

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  3. परुषों के मन के भावों को बहुत सहजता से सहेजा है ... घर से दूर रहने पर तीज त्योहारों पर पुरुष भी घर की ड्योढ़ी याद करते ही होंगे .

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  4. Bahut hi Sundar lines hai

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  5. बस वही कसक लिए हुए ।

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  6. प्राय: पुरूष अपनी पीडा छुपा जाता है इसलिये दूसरा जान नही पाता वर्ना पुरूष और स्त्री मन में शायद ही कोई ज्यादा फ़र्क होता होगा. सुंदरता से अभिव्यक्त किया आपने, बहुत शुभकामनाएं.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  7. bahut sundar ...yah bhi ek peeda hai ..jise shabd dena jaroori hai ..

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  8. ज़रूर याद करते होंगे, पर सोचने का दोनो का अपना-अपना ढंग होता है .

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  9. पुरुषों की इस अनुभूति को आपने सुंदरता से उकेरा है । पुरुष को जब अपना ‘मायका’ याद आता है तो वे बहन और बेटी को याद करते हैं ।

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  10. पुरुष की भावनाओं का सटीक वर्णन ... सच है याद को हर किसी को आती है अपनी देहरी की ...

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