महिला सशक्तिकरण की जब भी बात होती है हमेशा महसूस किया है कि मोर्चे निकालने से बात नहीं बनेगी। अगर कुछ बदल सकता है तो हमारी मानसिकता बदलने से ही। उस मानसिकता को बदलने से जो महिलाओं के दोयम दर्जे के लिए जिम्मेदार है । हमारी रूढिवादी विचारधाराएं एक समय में सामाजिक नियमन के लिए बनाई गईं श्रृंखलाएं कही जा सकती हैं जिन्हें बनाने में स्त्रीयों की भी भागीदारी तो रही ही होगी। ऐसे में इनसे बाहर आने में भी समाज की आधी आबादी को एक दूसरे के विरूद्ध नहीं साथ खङा होना होगा। इसीलिए हमारे समाज और परिवारों में उपस्थित इस सोच में परिवर्तन लाने का यह सद्प्रयास भी हमारे घरों से ही शुरू होना चाहिए। साथ ही इसकी सूत्रधार भी स्वयं महिलाएं ही हों ।
माँ, बहन, भाभी, ननद या सखी किसी भी रूप में एक महिला का साथ किसी दूसरी महिला के लिए संबल देने वाला भी हो सकता और आत्मविश्वास जगाने वाला भी। ठीक इसी तरह एक स्त्री के मन को ठेस भी किसी दूसरी स्त्री का दुर्व्यवहार ही पहुँचाता है। विशेषकर तब जब उन्हीं परिस्थितियों को जी चुकी एक स्त्री किसी अन्य स्त्री के मन की वेदना समझ ही नहीं पाती या फिर समझना ही नहीं चाहती , ऐसा क्यों ?
बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला है और बदल रहा है, लेकिन एक स्त्री दूसरी स्त्री की पक्षधर बने, उसके हालात समझे और उसके साथ डटी रहे, इस मोर्चे पर महिलाएं कुछ ज्यादा आगे नहीं बढी हैं। जबकि सच तो यह है कि पारिवारिक जीवन से लेकर व्यावसायिक सफलता तक महिलाएं एक दूसरे को कहीं ज्यादा सहायता और संबल दे सकती हैं।
भारतीय समाज को भले ही पुरूष प्रधान समाज कहा जाए पर वास्तविक रूप से हमारे घरों में महिलाओं का दबदबा भी कम नहीं है। विशेषकर उम्रदराज महिलाओं का। ऐसे में घर की बङी उम्र की महिलाएं बतौर माँ एक बेटी का और बतौर सास एक बहू का साथ दें, तो क्या परिवार के अन्य सदस्य उनके खिलाफ जा पायेंगें ? शायद नहीं। घर या बाहर स्वयं स्त्रीयां भी एक दूसरे से सरोकर रखें, अपनी साथी महिला की कुशलता और दक्षता को सराहें, एक दूजे की संघर्ष की साथी बनें तो बहुत कुछ सरलता से बदल भी सकता है और समाज में स्वीकार्यता भी पा सकता है।
हम जरा सोचें कि घर में पोती जन्मे तो दादी उसे गोद में उठा लें, बुआ प्यार-दुलार लुटाए, माँ बिटिया के जन्म से आल्हादित हो और चाची-ताई मंगल गाएं तो उस बेटी को घर में मान-सम्मान मिलेगा या नहीं । घर में मान मिलेगा तो समाज से भी मिलना ही हैं। कुछ इसी तरह अगर एक माँ बेटी का संबल बने और उसके जीवन में कुछ पाने , बन जाने की इच्छाओं को पूरा करने की राह में सदा स्नेह का संबल देती नजर आए तो वो बेटी स्वयं को अकेला क्यों पायेगी...? घर आने वाली नई दुल्हन के सिर पर सासू माँ हाथ रख दें और कहें कि यह उसका अपना घर है। ऐसे में किसी भी नई नवेली दुल्हन को पहले ही दिन सास का साथ और मार्गदर्शन मिल जाए तो क्या बहू के मन में असुरक्षा का भाव आयेगा ? घर से विदा होती ननद को भाभी ही कह दे कि जीवन के हर अच्छे बुरे वक्त में यह घर उसका अपना घर रहेगा। तो क्या पराये घर जाने वाली बेटी को यह महसूस होगा कि उसके अपने अब छूट गये है हमेशा के लिए ? नहीं ना ।
हमारे परिवारों में आज भी सामंजस्यपूर्ण व्यवहार की जिम्मेदारी महिलाओं की ही है । ना जाने क्यों यही व्यवहार घर की दूसरी स्त्री के लिए कटु क्यों जाता है ? स्वयं की इस सोच में व्यवहारिक बदलाव लाकर ही महिलाएं घर के पुरुष सदस्यों को भी महिला सदस्यों के प्रति नई सोच दे सकती हैं । एक दूसरे का व्यक्तित्व और अस्तित्व गढ़ने में सहायक हो सकती हैं । परिवार से शुरूआत कर समाज तक स्त्रियाँ अपनी जमीन खुद तलाश सकती हैं, एक दूसरे का साथ देकर । एक महिला हर रूप में किसी दूसरी महिला की मददगार साबित हो सकती है, उसे उसके होने का आभास करवा सकती है, बस एक दूजे की पक्षधर बनें तो ।


82 comments:
बिलकुल यही सोच रहा था मैं!
बहुत अच्छा आलेख, पूर्णतः सहमत हूँ आपसे! सधन्यवाद!
शब्द शब्द सार्थक बात कहता हुआ ...बहुत अच्छा आलेख ....मोनिका जी आज नई-पुरानी हलचल पर आपकी पोस्ट का लिंक है ....कृपया अपने विचार दीजियेगा ...
मैं तो यही देखता हूं।
yh bhi dekhen :
जागरण की वेबसाइट पर बेस्ट ब्लॉगर इस हफ़्ते
[Blog News] नारी स्वयं नारी के लिए संवेदनहीन क्यों ? NAARI
SATYA SHEEL AGRAWAL
एक महिला दूसरी महिला के लिए कितनी संवेदनहीन होती है इसके अनेको उदाहरण विद्यमान हैं .अनेक युवतियां अपना विवाह न हो पाने की स्तिथि में अथवा अपनी मनपसंद का लड़का न मिलने पर किसी विवाहित युवक से प्रेम प्रसंग करती है और बात आगे बढ़ने पर उससे विवाह रचा लेती है .उसके क्रिया कलाप से सर्वाधिक नुकसान एक महिला का ही होता है .एक विवाहिता का परिवार बिखर जाता है उसके बच्चे अनाथ हो जाते हैं .जिसकी जिम्मेदार भी एक महिला ही होती है .फ़िल्मी हस्तियों के प्रसंग तो सबके सामने ही हैं .जहाँ अक्सर फ़िल्मी तारिकाएँ शादी शुदा व्यक्ति से ही विवाह करती देखी जा सकती हैं. ऐसी महिलाये सिर्फ अपना स्वार्थ देखती हैं जिसका लाभ पुरुष वर्ग उठता है .महिला समाज कोयदि समानता का अधिकार दिलाना है, तो अपने महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले सोचना चाहिए की उसके निर्णय से किसी अन्य महिला पर अत्याचार तो नहीं होगा ,उसका अहित तो नहीं हो रहा.
उदहारण संख्या आठ ;
त्रियाचरित्र ,महिलाओं में व्याप्त ऐसा अवगुण है जो पूरे महिला समाज को संदेह के कठघरे में खड़ा करता है ,कुछ शातिर महिलाएं त्रियाचरित्र से पुरुषों को अपने माया जाल में फंसा लेती हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध करती रहती हैं ,शायद अपनी इस आडम्बर बाजी की कला को अपनी योग्यता मानती हैं . परन्तु उनके इस प्रकार के व्यव्हार से पूरे महिला समाज का कितना अहित होता है उन्हें शायद आभास भी नहीं होता .उनके इस नाटकीय व्यव्हार से पूरे महिला समाज के प्रति अविश्वास की दीवार खड़ी हो जाती है . जिसका खामियाजा एक मानसिक रूप से पीड़ित महिला को भुगतना पड़ता है . परिश्रमी ,कर्मठ ,सत्चरित्र परन्तु मानसिक व्याधियों की शिकार महिलाएं अपने पतियों एवं उनके परिवार द्वारा शोषित होती रहती हैं .क्योंकि पूरा परिवार उसके क्रियाकलाप को मानसिक विकार का प्रभाव न मान कर उस की त्रियाचरित्र वाली आदतों को मानता रहता है .इसी भ्रम जाल में फंस कर कभी कभी बीमारी इतनी बढ़ जाती है की वह मौत का शिकार हो जाती है .
अतः प्रत्येक महिला को अपने व्यव्हार में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है. साथ ही पूरे नारी समाज को तर्क संगत एवं न्यायपूर्ण व्यव्हार के लिए प्रेरित करना चाहिए,तब ही नारी सशक्तिकरण अभियान को सफलता मिल सकेगी .
Source :
http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/02/naari.html
अगर पोते को दादा गोदी ना उठाये ,
अगर ससुर और दामाद में ना सामंजस्य हो
अगर पिता और बेटे में ना बनती हो
तो कभी भी इस और ऊँगली नहीं उठाई जाती
हम हमेशा महिला , उसके व्यवहार , उसके सोचने पर , उसके जीवन पर ऊँगली उठाते हैं
डॉ मोनिका समस्या महिला का आपसी सामंजस्य नहीं हैं समस्या हैं समाज की ये कंडिशनिंग की महिला दोयम हैं और इसलिये उसे अपने वर्चस्व के लिये लड़ना हैं
दो महिला की आम बहस को भी "औरतो की बाते , लड़ायी " कहकर उपहास में उड़ा दिया जाता हैं .
जब तक वर्गीकरण ख़तम नहीं होगा और औरतो की बाते समाज की नहीं मानी जायेगी कोई बदलाव संभव नहीं हैं
मै आलेख के इस भाग से पूर्ण सहमत हूँ की नारी सशक्तिकर्ण के लिये नारी का आपस में जुड़ना बहुत जरुरी हैं और जो नारी जहां हैं वहीं से अगर किसी भी नारी का अपमान देखे तो विरोध का स्वर उठाये . जिस दिन नारी ने अपना ये दर की "समाज क्या कहेगा " ख़तम करदिया उसदिन वो सशक्त होगी
बाकी कुछ बातो से असहमत हूँ क्युकी दादी के गोदी उठाने मात्र से कोई फरक नहीं पड़ता बदलना एक दादी को नहीं हैं पूरे समाज को हैं ताकि वो दादी जो दोयम के दर्जे पर हैं ये समझ सके की उसकी पोती को भी समाज दोयम नहीं मानता हैं . दादी जिस पीड़ा से सारी उम्र गुजरी हैं उसके तहत नहीं चाहती हैं की उसकी बेटी , पोती उससे गुजरे . बेटियों को मारने का सबसे बड़ा कारण हैं समाज में उनक दोयम का दर्जा
@दो महिला की आम बहस को भी "औरतो की बाते , लड़ायी " कहकर उपहास में उड़ा दिया जाता हैं .
रचना तभी तो एक महिला का दूसरी के साथ जुड़ना आवश्यक ताकि ऐसे बंधे बंधाएं जुमलों से बाहर आया जाये ,
समाज उस पोती का दोयम दर्जा न माने इसीलिए तो दादी का यानि की घर की सबसे बड़ी महिला का उसे मान देना आवश्यक है , समाज को तो फिर मान देना ही होगा , मुझे तो लगता है शुरूआत करने के लिए घर से बेहतर जगह और कोई नहीं,
सादर
यह अचुक उपाय है कि घर के नारी सदस्यों को घर की नारी सदस्यों से प्रोत्साहन सम्मान और महत्व मिलना चाहिए, निश्चित ही इसका प्रेरक प्रभाव समाज पर पडता है।
Bilkul sahee kah rahee hain aap!
....बहुत सही आंकलन..परिवार में अधिकतर स्त्री ही स्त्री की विरोधी होती है. अगर उनकी इस मानसिकता में बदलाव आए तो न केवल परिवार बल्कि समाज का रूप बदल सकता है...
aaj bhi zaroorat hai mansikta badlne ki...
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
kalamdaan.blogspot.in
sahamat.
शुरुवात परिवार की ईकाई से ही होना चाहिए, एकदम सार्थक आलेख.
आपकी सभी प्रस्तावनाएँ विचार सरणियाँ अनुकरणीय है .ये हो जाए तो बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाए जड़ हो चुके सामाजिक विधान में परिधान में .
नारियों की वैचारिक एकता उन्हें ज्यादा शक्तिशाली बनाएगी।
कुछ लोग कमेन्ट में कह रहे हैं की व्यवहार/सोंच में बदलाव की ज़रुरत है.मगर ये तो तभी सम्भव है जब सच्चाई को कोई मानें.
aapne sahi mudda uthaya hai
bahut bahut badhai
rachana
बहुत सुंदर प्रस्तुति
NEW POST....
...काव्यान्जलि ...: बोतल का दूध...
...फुहार....: कितने हसीन है आप.....
बहुत अच्छा आलेख, पूर्णतः सहमत हूँ|
धन्यवाद!
vicharneey post.
उल्लू भी तो साध लेता है।
स्त्रियाँ जाने क्यूँ आपसी तालमेल बैठाने में पिछड़ जाती हैं...ज़रा सी उदारता की ज़रुरत है बस...
बहुत सार्थक लेखन मोनिका जी.
शुक्रिया.
सदाजी की हलचल में जड़ा एक नायाब मोती.
स्त्री पुरुष सभी एक पक्ष हों तो क्या बात है.
मेरे परिवार में मैं हमेशा अपनी देवरानियो को आगे बढ़ने को प्रेरित करती हूँ क्योकि इसी से मेरे अपने परिवार की तरक्की होगी और सोच भी बदलेगी.....और जब हर परिवार उन्नत होगा तो समाज और देश की तरक्की तो होनी ही है
धन्यवाद
अब सभी ये कहने पर मजबूर हो जायेगें ,एक स्त्री दुसरे स्त्री की मददगार होती है..... :):)
तब बहुत सारी समस्याओं का निदान आसानी से होता चला जाएगा.... !!
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