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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

25 January 2021

देहरी एक अक्षांश पर --- समीक्षात्मक टिप्पणी

मगर अब दृढ़ निश्चय बनाना होगा और स्वयं को पाना होगा --- मेरे कविता संग्रह को लेकर 

अनिता दुबे  जी की टिप्पणी |  

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सकारात्मक ऊर्जा और कलात्मक सोच  से भरे व्यक्तित्व की  धनी  जी में देहरी के अक्षांश पर पढ़कर बहुत विस्तृत सारगर्भित टिप्पणी की है | स्त्रीमन की जद्दोजहद को लिये इन रचनाओं को पढ़कर उन्होंने  सार्थक पंक्ति के साथ अपनी बात का पूरी की है कि " मगर अब दृढ़ निश्चय बनाना होगा और स्वयं को पाना होगा ।" आत्मीय आभार आपका | आपने कवितायें पढ़ीं और अपनी बात इतने अर्थपूर्ण ढंग से साझा की | 

देहरी के अक्षांश पर " मोनिका शर्मा का पहला काव्य संग्रह है । जैसा कि इसके नाम से ही विदित है देहरी घर की चौखट घर का आँगन या कहें घर में खींची हुई सीमाएं हैं जहाँ भारतीय समाज में स्त्रियाँ,  गृहिणी  या कामकाजी महिलाओं की दिनचर्या अपनी स्वयं की तलाश को जारी रखती है । कई भूमिकाएं निभाती स्त्री परिवार समाज और खुद के अस्तित्व के लिए जूझती रहती है । इन्हीं भावनाओं , संवेदनाओं से भरी कविताओं को बहुत सुन्दर सरल और स्पष्ट रूप से मोनिका ने गहन बनाया है ।

पहली कविता यात्रा चार लाइन में लिखी कविता बहुत प्रभाव डालती है "मुट्ठी भर सपनों और अपरिचित अपनों के बीच " स्त्री अपने जीवन की यात्रा शुरू करती है । अनमोल उपलब्धियाँ जो स्त्री अपने बाल्यकाल से सहेजती है अचानक  गृहिणी  बनते ही भूल जाती है या भूलना पड़ता है ।

"कुछ आता भी है तुम्हें"यह प्रश्न मानों समाज का वह प्रश्न है जो हर स्त्री से पूछकर उसके अस्तित्व को नकारना जैसा होता है चाहे स्त्री कितनी भी परिपक्व हो । हमेशा पुरूष प्रधान समाज में पहली सीढ़ी पर खड़ी ही समझी जाती है । "अनुबंधित परिचारिका "सबको समेटकर उपहास भी झेलती और एकाकीपन निराशा में भी मुस्कान भर परिवार संभालती है फिर भी धुरी बन  अधूरी सी ही रहती है ।फिरकनी सी सुबह से रात और दिनभर निरन्तर रिश्ते संभालती है और फिर भी प्रश्न होता है 
की सारा दिन क्या काम ? 

कठोर समाज के इतने गंभीर आक्षेपों को सहती है । उसकी उपस्थिति हर वक्त की ज़रूरत से जुड़ी हुई है वर्ना उसका अस्तित्व मानों शून्य ही है सिन्दूरी क्षितिज उसकी अपनी इच्छाओं पर लगा पहरा है ।

स्वादहीन व्यंजन समान अपने मन को छुपाये रखती है कि किसी को आभास भी नहीं हो सके ।उसकी मौजूदगी को नगण्य संवेदनशून्य होने दिया जाता है और वो हर दिन प्रश्न पूछती है स्वयं से कि वो कितनी और स्वयं सी बची है । समाज परिवार की अपेक्षाओं के चलते वो स्त्रीत्व और अस्तित्व को कई रूप में विभाजित करती रहती है । समय बीतता जाता और स्त्री का वक्त घटता जाता है तब अपने प्रतिबिंब को देखने के लिए भी वक्त साथ नहीं होता ।  गृहिणी  बनी तो मानो मन थम गया बंध गये इच्छाओं के पैर और कल्पनाओं के पंख भी काट दिए जाते है जबकि हर और उड़ान भरता समाज होता है ।

 गृहिणी  भावशून्य होकर मजबूर होती है जीने के लिए क्योंकि साबित करना होता है उसे समाज और परिवार के हर एक के लिए अपने अपनत्व निष्ठा और कर्तव्य को । खिड़की कविता है स्त्री के उस रूप की जहाँ सीमाएं खिचीं हैं उसकी सोच को भी बाँधकर रखा गया है । जहाँ वो सींचती है अपने एकाकीपन को बोलने बतियाने उसकी सीमाएं रसोई में अपने बांध तोड़ती है और अपने जीवन के स्वादहीन होने पर भी परिवार का स्वाद बना देती है।

एक आवरण लिए देहरी के अक्षांश पर स्वयं की सेना बन लड़ती है परंपराओं मर्यादा कर्तव्य और ना जाने अनेक कायदों की राह पर अपने मन को गहरे अंधेरे कुएं में धकेल कर ।अपने मन को दिलासा देते देते कि अभी बहुत कुछ है करना बढ़ जाती है उसकी ज़िन्दगी जहाँ सरल कुछ नहीं होता है ,होता है सिर्फ अपने आप के होने को समेटना यथार्थ की उम्मीद के आकाश पर अपने भविष्य की लौ को बुझते देखना ।

मानों अपने स्वप्नों के जन्म से उनकी हत्या देखने की पीड़ा को सहती है । वह चाहती है सिर्फ़ प्यार और सम्मान ना कि कोई मोल। चौखट से विदा होकर मानों विदा हो जाती है उसकी आत्मा क्योंकि उसे समझने की कोशिश का अधिकार समाज की इच्छा पर होता है ना कि उसका परिवार। जहाँ मन के घाव पर घर परिवार ही पर्दा डाल देता है ।सभी बंधन आवश्यकता का चोला पहन कर ओढ़ लेते है स्त्री जीवन ।हमेशा परीक्षा देती स्त्री  गृहिणी के रूप में तौल दी जाती है ।उसके व्यक्तित्व को कम ज्यादा के मूल्यांकन की संख्या से प्रमाणित किया जाता है ।

अपनी सभी भावनाओं को बहा देती है पानी सा और हर दिन उम्मीद के स्नान कर नई आशाओं के दीप जलाती है संकल्प और विकल्प में गुम हो जाने के लिए अपने मानव होने का भ्रम भी खो देती है ।अमंजस का जीवन जहाँ सपने भी नहीं होते वहाँ वो खुशहाल परिवार के लिए उदासियाँ संभालती है ।

उसकी मिथ्या भरी हंसी को समझ नही सकता समाज और परिवार क्योंकि उसे साधारण समझा जाता है जबकि वो असाधारण रूप से अपने को सहेज लेने की दक्षता हासिल कर लेती है तभी सूत्रधार बनकर सभी के जीवन को विश्वास के साथ गतिशील रखती है।जबकि घर ही उसकी सम्पूर्णता है मगर उसके साथ अस्तित्व की परछाई भी नहीं होती है।

स्त्रियों का स्वयं अपने आप में एक संसार ही है जहाँ वो अपनी कल्पनाओं को अंकुरित रखती है प्रेम के रंगों को दबाकर तीज त्यौहार में रंगीन होकर भी सहमी होती है विचित्र संसार के अपने पसंदीदा उत्तर की प्रतीक्षा करते हुए। जबकि जानती है वो भी कि अनकही बंदिशें उसे जकड़े है । उसकी छवि को बनाया जाता है आशाओं और जरूरतों के अनुसार और वह विवश होकर अपने मन को सीमाओं में जकड़ कर रख देती है जिन्हें जन्म का अधिकार नहीं होता ।जबकि स्त्री का होना सृष्टि का साकार होना है जीवन के हर रिश्ते में रहकर बचाये रखती है उज्ज्वल दीप हर अंधेरे पल को दूर करने के लिए ।कहीं ना कही स्त्री से समाज डरता है तभी हमारी भावनाओं को स्वतन्त्र नहीं होने देता । स्त्री के लिए सभी परिवर्तन समान होते जाते है किसी भी मौसम ऋतु के स्वाद और कल्पनाएँ भी अन्तर नहीं कर पाती । 

अपने जीवन के जटिल संबंधो में कई प्रश्नों के उत्तर खोजती है आखिर क्यों? आखिर क्यों उसकी उर्जा का जीवन नकारा जाता है ।आखिर क्यों? उसके शरीर के अस्तित्व को जीवन नहीं मानते और आखिर क्यों अमानुष बनते लोग यह नहीं समझते कि उनका जन्म इसी कोख से हुआ है !जबकि बचपन से अपने स्वप्न को संभालती है सभी अपनों के साथ मगर अपने ही उसकी उड़ान के शिकारी बन जाते है। जहाँ बेटियाँ जीवन की हर दिशा में इन्द्रधनुष सी है वहीं फेंक दी जाती है कूड़ेदान में सिसकने के लिए उनके कई सवालों पर मौन साध लेता है समाज । 
                                     

2 comments:

  1. सार्थक और सुन्दर समीक्षा।
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    गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. बहुत सुन्दर समीक्षा।
    72वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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