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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

19 July 2014

क्यों जन्में बेटियां

ये अमानुष हैं कौन ? जो ना उम्र का लिहाज करते हैं और ना  मासूमयित का मान । स्त्री क्या मात्र एक  देह भर है ? जो अमानवीयता झेलने ही संसार में आई है । आज  मन उद्वेलित है और बस यही प्रार्थना कर रहा  है कि स्त्री की अस्मिता से खेलने वाले हर अमानुष की देहरी पर सदा लिए अँधेरे बस जाएँ .... 


निशब्द हैं
स्तब्ध हैं
अस्थिर है आत्मा और
असंतुलित हैं विचार
आज हर स्त्री के
शब्द नहीं दे रहे हैं साथ
कानों में गूंजता है, बस एक ही प्रश्न
आखिर क्यों जन्में बेटियां ?
क्यों बढ़ाये कोई स्त्री तुम्हारी वंशबेल
जब तुम खेलते हो ये खेल और
शक्तिस्वरूपा कहते कहते
रक्तरंजित करते हो उनका अस्तित्व
और अमानुष बन
अनावृत करते हो उनकी देह

38 comments:

  1. अजीब लग रहा है एक माँ होकर कहना .... आमीन ..... तथास्तु ....
    लेकिन विवश हूँ क्यूँ कि अमानुष हो चुके को आशीष नहीं दिया जा सकता .....

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  2. Ours is a double faced society. On one side it worships Goddess Durga and on the other side it kills female child.

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  3. सही कह रही हैं

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 20/07/2014 को "नव प्रभात" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1680 पर.

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार।

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  6. ये एक एसा प्रश्न जो हर स्त्री को पूछने का हक़ है सच में अपने अस्तित्व पर ये प्रहार देख कर मन में तो यही आता है की क्यूँ जन्मे बेटियाँ ?पूर्णतः अनुमोदन करती हूँ आपकी रचना का |

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  7. समझ नहीं आता कभी लोग इसे देवी का रूप देते हैं और कभी पैरों के तले कुचल देते हैं ...

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  8. सच की अभिव्यक्ति ....बहुत दुखदाई हुआ ...अंतरात्मा को झिंझोड़ गया ..

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  9. सही तो है जब यही हाल करना है तो क्यों जन्में बेटियां, जब नही रहेंगी जन्मदात्री तो तुम भी कहाँ रहोगे? दुःखद ...!

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  10. कटु सत्य, हृदयस्पर्शी. यह एक यक्ष प्रश्न है...

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  11. kadwa...maarmik sach , kya likhoon ! nishabd !

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  12. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, पानी वाला एटीएम - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  13. ab to naa janme yahi behtar .. duniya mein aurat hona hi bada apradh ho gaya hai

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  14. ekdam sahi kaha aapne...................

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  15. बुराई कभी अच्छाई से नहीं जीत पायी है...शिक्षा से ही विचारों में परिवर्तन आता है या कानून से...दोनों के सशक्तिकरण की आवश्यकता है...

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  16. हिम्मत मत हारो । बेटी को मजबूत और समर्थ बनाओ ।

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  17. सच कहा आपने. आखिर इस समाज को स्त्री के होने का सौभाग्य मिले ही क्यों

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  18. कटु सत्य को बयां करती रचना

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  19. ऐसा कठोर सत्य किसी भी माँ को कहना पड़े ...
    समाज के लिए अभिशाप है ... पुरुष जाती पर अभिशाप है ... कलंक है ...

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  20. कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है ।

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  21. बिल्‍कुल सच कहा आपने .....

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  22. इन्‍सान की खाल में भेड़ि‍ये छुपे हैं

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  23. स्त्री के सामने यक्ष प्रश्न . सुंदर रचना.

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  24. जन्म लेते है भेड़िये भी देवियों के साथ
    त्रिनेत्रधारी शिव का तांडव बाकी है अभी

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  25. बेहद सटीक व सच. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  26. निशब्द हूँ ...आजकल के इन हालातों से मन दुखी है बहुत ... क्यूँ मानव दानव बन गया है

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  27. यह एक पेड़ की जड़ों को लगा हुआ ऐसा रोग है जिसका निदान हम सब खोज
    रहे है पेड़ के फूल पत्तों में , मार्मिक रचना !

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  28. उद्वेलन से भरपूर सामयिक रचना।

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  29. विश्व का कटु सत्य | दर्दनीय

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  30. Nat pishachon ne manav jaati ko hi dushit kar diya hai...hum bhartiya kis sabhyata ka jhootha dambh bharte haiN. KHUD KO mahan kahte hain jis desh me itni nrishansata hoti ho...manavon ka rashtra wo ho hi nahin sakta

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  31. बेटियों को सशक्त बनाना होगा आत्मरक्षा के लिये प्रशिक्षण देना होगा। बिना बेटियों के ये संसार नीरस और बेमानी होगा।

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  32. बेहद सटीक अभिव्यक्ति...पता नहीं इंसान क्यों अमानुष बन जाता है...बेटियों के बिना तो जीवन और संसार कितना अधूरा होगा..

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  33. ये सोच कर ही ह्रदय छलनी हो जाता है ..

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  34. दिक्कत यह भी है कि प्रताड़िता को इन्साफ भी नहीं मिलता है.. जब तक यह नहीं होगा, इस घिनौनेपन पर रोक नहीं लग पाएगी..

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  35. आधी आबादी
    जीती डरी सहमी
    कैसी आज़ादी ?
    -अनुराग तिवारी

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  36. बेहतरीन
    वाक़ई निशब्द और स्तब्ध किया आपकी रचना ने
    सोचने पर मज़बूर। बहुत ही खूब

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