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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

27 January 2014

माँ भी कभी




 विस्मृति का सुख

विस्मृति की अनिवार्यता के
अर्थ  वही  समझता है
जो प्रतिदिन जाता है
उन पगडंडियों तक
जिन पर सुखद स्मृतियाँ
बिखरी पड़ी हैं
और प्रतीक्षारत खड़े हैं
दुखद क्षण भी,
जो मिटते ही नहीं
न ही धुंधले होते हैं
बीतते समय के साथ
यथार्थ के कठोर धरातल
और कल्पनाओं  में  बुने  संसार को सहेजे
इन रँगों को
बिसरा देने के प्रयास  
और विस्तार दे जाते हैं
बीती बातों और आघातों को
करते हैं  गहरी चोट  
वर्तमान पर
स्मृतियों का ये भार
बाधित करता है
आज का विस्तार
सच, जीवन धारा के
निर्बाध बहाव हेतु
 ज़रूरी है  विस्मृति का सुख

  

46 comments:

  1. माँ फिर भी माँ रहती है ... उन झुर्रियों के पीछे आज भी लड़की जैसी ही दिखेगी माँ ... भोली भाली शीतल चांदनी सी ...
    दिल को छू गई ये रचना ...

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  2. माँ तो माँ है ,जवान हो या बूढी ,संतान के लिए वो माँ है और माँ के नज़रों में संतान हमेश बच्चा है चाहे वो ६ फुट का हो या 60 साल का ...रचना भाव अच्छा है !
    नई पोस्ट मेरी प्रियतमा आ !
    नई पोस्ट मौसम (शीत काल )

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  3. कर्म की क्‍यारी संस्‍कारों के बीज बोनेवाली मां भी पहले छोटी बच्‍ची थी। (http://vbadola.blogspot.in/2013/09/12.html) ये लिंक अवश्‍य पढ़िएगा।

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  4. अक्षरश: मन में कहीं गहरे तक उतरती यह अभिव्‍यक्ति

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  5. बहुत सुंदर,भावपूर्ण रचना.

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  6. जीवन की आपाधापी में पता ही नही चलता कब लड़कियां अपनी माँ के रोल में रूपांतरित हो जाती है!

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  7. सच, माँ भी कभी लड़की जैसी थी

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  8. एक सार्थक जीवन तो रहा -पल पल का सार्थक जीवन!

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन तुम भूल न जाओ उनको, इसलिए कही ये कहानी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. सच कोई याद नहीं रखता कि माँ भी कभी एक लड़की जैसी थी........
    बहुत ही सुन्दर और मर्मस्पर्शी....

    अनु

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  11. sach kaha monika , maaN bhi kabhi ladki thi , bahut sunder

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  12. यही सच है...नारी जिम्मेदारियों को जिस तरह ओढ़ लेती है कि ये अंदाज़ लगाना भी मुश्किल हो जाता है...कि वो भी कभी लड़की थी...

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  13. बहुत सुन्दर भाव आदरणीय मोनिका जी और चित्र भी बहुत प्यारा

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  14. भावपूर्ण रचना ...!!!!

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  15. बहुत ही सुन्दर रचना, कैसे अपने रूप संवर्धित कर लेती है।

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  16. वाणी जी ठीक कह रही है, माँ को देखते देखते हम कब उसके
    सांचे में ढल गए पता ही न चला, सार्थक सटीक रचना !

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  17. माँ के संवर्धन से कविता भी संवर्धित हुयी।

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  18. सच है..जिम्मेदारियो का बोझ सहते सहते कब लड़की से बूढे हो चेहरा बदल जाता है पता ही नही चलता..बहुत सुन्दर भाव पिरोया है मोनिका जी आप ने ..्बधाई

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  19. वाह ! वाह ! सही कहा आपने माँ भी लड़की जैसी थी | कविता बहुत सुन्दर लगी |

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  20. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

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  21. वो खुद भी कहाँ याद रख पाती है कि कभी वह भी एक लड़की थी, माँ बनकर उसी रंग में रंग जाती है .... लाज़वाब … सुन्दर भाव

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  22. माँ भी कभी लड़की थी....
    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना...
    :-)

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  23. सच, माँ भी कभी लड़की जैसी थी
    ऊर्जावान और दिव्यस्वरूपा
    जुझारू और जीवंत
    पर समय के साथ
    सब कुछ बदल गया
    यूँ ही सारा जीवन निकल गया
    अपनों के जीवन की पगडण्डी
    समतल करने और
    चिंताओं को बुहारने की
    व्यग्रता के निशान
    झुर्रियों में ढल गये
    देखते ही देखते
    माँ के नयन नक्श बदल गये
    सच, माँ भी कभी लड़की जैसी थी
    अति सुन्दर व्यंजना।

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  24. ye din sabhi ke sath aata hai ....ek dard bhi chhipa hai is kathy ki pichhe ....

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  25. बहुत ही भावुक और सशक्त रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  26. माँ में एक लड़की हमेशा रहती है

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  27. माँ की संवेदना से जुड़ी एक अच्छी कविता |

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  28. माँ तो माँ है दिल को छू गई ये रचना ..!!

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  29. मां की मुकम्मल तस्वीर। लड़की से मां तक का सफर करने वाली कोई मां ही रच सकती है।
    नमन स्वीकार करें।
    बसंत पंचमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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  30. वाह !! बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई ----

    आग्रह है--
    वाह !! बसंत--------

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  31. बहुत खूब बहुत खूब बहुत खूब लड़की में ही माँ पल्लवित होती है सतत

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  32. बहुत खूब बहुत खूब बहुत खूब लड़की में ही माँ पल्लवित होती है सतत

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  33. वाह !!
    बहुत खूब !

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  34. वक्त के चेहरे पर झुर्रियां पड़ती है
    पर माँ का चेहरा तो हमेशा ही सुन्दर होता है
    बहुत ही सुन्दर रचना
    मन को छूती हुई

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  35. वक्त के चेहरे पर झुर्रियां पड़ती है
    पर माँ का चेहरा तो हमेशा ही सुन्दर होता है
    बहुत ही सुन्दर रचना
    मन को छूती हुई

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  36. बहुत सुंदर .... मेरी कविता समय की भी उम्र होती है पर आपका स्वागत है।

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  37. माँ बनाते ही बचपन पीछे ....छूट जाता है ....यही नारी का ईश्वरीय गुण है ...!!कितनी सार्थक लिखा है आपने मोनिका जी ...!!

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  38. अति सुन्दर कृति..

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  39. सहज सुन्दर लेखन के लिए आपको बधाई प्रोत्साहक टिप्पणियों के लिए आपका नेहा सहित आभार।

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  40. माँ का बिम्ब माँ सा ही दिखता है सशक्त जीवंत। आभार आपकी निरंतर टिप्पणियों का।

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  41. माँ की परिभाषा - 'कर्म की क्यारी में
    संस्कारों के बीज बोती'..

    बहुत सुंदर..!!!

    ढ़ेरों शुभकामनायें..

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  42. bahut hi sunder, bhaavpurn aur sarthak rachana

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