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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

10 September 2013

मनुष्यता के मोर्चे

कभी तो निकलें  
मनुष्यता के मोर्चे 
मोर्चे जिनमें केवल 
महिला-पुरुष की बात ना हो 
ना ही नारे लगें एक धर्म की जय 
और दूसरे की पराजय के 
जिनमें समानता, असमानता का  स्वर 
लिंगभेद को आधार बनाकर न गूंजे 
जीवन के प्रसंग ऊंच- नीच, जात-पात 
तक ही ना सिमट जाएँ
मोर्चे जो भीड़ की सार्थकता दर्शायें 
जिनमें स्वार्थ की खोटी नहीं 
परिवर्तन की खरी बातें हों 
मोर्चे जिनमें समर्पित सोच के साथ 
मनुष्यता के नारे गूँजें,और 
हो बस, मानवता की बात
मोर्चे जो सद्भाव की सरिता बहायें 
हर क्रूर व्यवहार का विरोध करते  
दुर्भाव की कालिमा को छांटते
बिना किसी भेदभाव के 
परिवर्तन लायें 
परिष्कृत करें हमारे व्यवहार को 
मोर्चे जिनमें राजनीतिक-धार्मिक 
स्वार्थ का कोलाहल नहीं
मानवीय संवेदनाओं का स्वर हो 
जो निकलेंगें ऐसे मोर्चे
तो निश्चित ही बहुत कुछ बदलेगा  
तब मनुष्यता मात्र शब्दों में नहीं 
हमारे व्यवहार में मिलेगी 

56 comments:

  1. ऐसा मोर्चा अब स्वप्न सदृश है .मनुष्यता गई है रसातल में. .

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  2. हमने जीभर कर बाँटा है,
    एक विश्व जो हमने पाया,
    सभी व्यक्त और सभी व्यक्तिगत,
    छिन्न भिन्न जग, छला गँवाया।

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  3. अगर यह मुमकिन हो भी जाता तो फिर किसी सियासी दांव पेंच की बलि चढ़ जाता ...आजकल सब कुछ भुन्जाने का चलन जो है

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  4. हमारी 'सोच' को ही मुर्चा (जंग) लगा हुआ है । ऐसे में ऐसा मोर्चा कहाँ निकलने वाला ।

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  5. मनुष्‍य वही है जो सृष्टि के संरक्षण का विचार करे, वर्तमान में तो केवल स्‍वयं तक सीमित होकर रह गया है मनुष्‍य नामक जीव।

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  6. जब मात्र इंसानियत ही धर्म होगा, कब आएगा वह समय प्रभु....

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  7. उत्कृष्ट सोच .... लेकिन आज इसे मात्र काल्पनिक ही कहा जा सकता है .... हर बात में सियासी दांव , धर्म की छांव नर - नारी का अलगाव यही रह गया है.....न संवेदनाएं हैं न स्नेह है तो बस स्वार्थ ..... कैसे ऐसे मोर्चे निकल सकेंगे ?

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  8. शुभप्रभात
    विघ्नहर्ता आपके सारे विघ्न हरे
    आपकी लेखनी को नमन
    फिर इस कविता की वजूद ही नहीं होती
    ??

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  9. काश ऐसा सम्भव हो ... तब भी इस उम्मीद के लिए आमीन !!!

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  10. स्वार्थ का कोलाहल नहीं
    मानवीय संवेदनाओं का स्वर हो
    जो निकलेंगें ऐसे मोर्चे
    तो निश्चित ही बहुत कुछ बदलेगा

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  11. ऐसे मोर्चे से बदलाव मुमकिन हैं.… और आवश्यकता है ऐसे ही मोर्चे की ...

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  12. विडम्बना है की एक ही घर में रहने वाले भी इस सोच को आगे नहीं बढ़ने देते और गली मुहल्लों में नेता बनने की होड़ में लगी नई पीढ़ी मोर्चे में ही विश्वास नहीं रखती ,बस छिनना है ,पाना है ये ही उनका अल्प लक्ष है |

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  13. विडम्बना है की एक ही घर में रहने वाले भी इस सोच को आगे नहीं बढ़ने देते और गली मुहल्लों में नेता बनने की होड़ में लगी नई पीढ़ी मोर्चे में ही विश्वास नहीं रखती ,बस छिनना है ,पाना है ये ही उनका अल्प लक्ष है |

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  14. कभी तो निकलें
    मनुष्यता के मोर्चे
    मोर्चे जिनमें केवल
    महिला-पुरुष की बात ना हो ....

    ऐसा अगर हो जाय तो दुनिया बहुत ही ख़ूबसूरत हो जाएगी ....

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  15. मोर्चे जिनमें राजनीतिक-धार्मिक
    स्वार्थ का कोलाहल नहीं
    मानवीय संवेदनाओं का स्वर हो
    जो निकलेंगें ऐसे मोर्चे
    तो निश्चित ही बहुत कुछ बदलेगा
    तब मनुष्यता मात्र शब्दों में नहीं
    हमारे व्यवहार में मिलेगी ................................काश सही मायनों में ऐसा कुछ हो जाए ...तो बदलाव की उम्मीद हर किसी के भीतर जग जाएगी

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  16. कभी तो निकलें
    मनुष्यता के मोर्चे
    मोर्चे जिनमें केवल
    महिला-पुरुष की बात ना हो .

    काश ! ऐसा हो जाता
    गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !

    RECENT POST : समझ में आया बापू .

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  17. ऐसे मोर्चे अब इतिहास की बात बन के रह गए हैं ... जब एक ही आवाज़ पे सभी चल निकलते थे ... अब वो लीडर देश प्रेमी कहां हैं ...
    अब तो बस स्वार्थ से भरे, संवेदनहीन, कुर्सी के भूखे नेता ओर धाराओं में बनते इन्सान ही रह गए हैं ...

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  18. मनुष्यता व्यवहार में मिले..यह सोचने का विषय है..

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  19. वर्तमान हालातों में तो ऐसे मोर्चो की कल्पना भी नहीं की जा सकती....

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  20. मोनिका जी ....काश ऐसा संभव हो पाता !!!!

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  21. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
    आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  22. काश सभी लोग आपकी सलाह पर चल सके, बहुत ही सटीक और सामयिक रचना.

    रामराम.

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  23. जब दरिंदों की आवाज पर हम निकल सकते हैं तो अच्छाई का साथ क्यों नहीं - गुनाहगार तो हम भी हैं.

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  24. कभी तो निकलें
    मनुष्यता के मोर्चे
    मोर्चे जिनमें केवल
    महिला-पुरुष की बात ना हो
    बहुत सुन्दर.आने वाले कल में मुमकिन हो जाये .

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  25. फिलहाल तो कल्पना ही लगती है.. आने वाले समय में मुमकिन हो दुआ यही रहेगी.

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  26. मोर्चे जो भीड़ की सार्थकता दर्शायें
    जिनमें स्वार्थ की खोटी नहीं
    परिवर्तन की खरी बातें हों
    मोर्चे जिनमें समर्पित सोच के साथ
    मनुष्यता के नारे गूँजें,और
    हो बस, मानवता की बात
    आदरणीया डॉ मोनिका जी प्रभु से दुआ है कि ये आप की सोच कल्पना सत्य हो जाए मानव मानव बन जाए तो आनंद अति आये
    भ्रमर ५

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  27. शुभ चिंतन प्रार्थना!!

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  28. मोर्चे जो भीड़ की सार्थकता दर्शायें

    काश ऐसा हो पाए

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  29. मोर्चे जिनमें समर्पित सोच के साथ
    मनुष्यता के नारे गूँजें,और
    हो बस, मानवता की बात
    मोर्चे जो सद्भाव की सरिता बहायें
    हर क्रूर व्यवहार का विरोध करते
    दुर्भाव की कालिमा को छांटते
    बिना किसी भेदभाव के
    परिवर्तन लायें----आमीन ऐसा ही हो
    latest post: यादें

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  30. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 12/09/2013 को क्या बतलाऊँ अपना परिचय - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः004 पर लिंक की गयी है ,
    ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें. कृपया आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  31. मोर्चे जो भीड़ की सार्थकता दर्शायें
    जिनमें स्वार्थ की खोटी नहीं
    परिवर्तन की खरी बातें हों
    मोर्चे जिनमें समर्पित सोच के साथ
    मनुष्यता के नारे गूँजें,और
    हो बस, मानवता की बात
    बेहद सार्थक व सशक्‍त विचार ..

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  32. जरूरत ऐसे ही मोर्चों की है लेकिन ऐसे मोर्चे निकलेंगे तो बहुत से दूसरे मोर्चे वालों की दुकानदारी बंद हो जायेगी।

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  33. सलाम करता हूँ इस सोच को बस इंसानों को इंसानियत की ही सबसे ज्यादा ज़रूरत है। ….सार्थक और सुन्दर पोस्ट |

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  34. सुंदर प्रस्तुति...

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  35. आज बुलेटिन टीम के सबसे युवा ब्लॉग रिपोर्टर हर्षवर्धन जी का जन्मदिवस है , उन्हें अपना स्नेह और आशीष दीजिये साथ ही साथ पढिए उनके द्वारा तैयार की गई आज की ब्लॉग बुलेटिन ........
    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जन्मदिन और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  36. wo din jarur aayega .....bs kalam me takat honi chahiye ...

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  37. आज देश को जरूरत है ऐसे ही मोर्चों की...सुन्दर विचार..

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  38. वो सुबह कभी तो आएगी।

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  39. बहुत आवश्यकता है देश को ऐसी मानसिकता की जो संकीर्णता की बेड़ियों को तोड़ मनुष्यता के हित में काम करे|

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  40. मानवता ही तो भूले हैं हम ..

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  41. संकल्पों आदर्शों को ललकारती रचना। सुन्दर मनोहर भाव लिए जीवन का रस सार लिए। राजनीति का तार लिए।

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  42. काश ऐसा हो पाता !!

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  43. तब मनुष्यता मात्र शब्दों में नहीं
    हमारे व्यवहार में मिलेगी
    बिलकुल सही कहा है सटीक रचना !

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  44. Praiseworthy thoughts and expression!Thanks for visiting my blog and giving your comments.

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  45. मनुष्यता के मोर्चे.. the thing of which country is in need of.

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  46. ऐसा मनुष्य कभी-न-कभी तो आएगा जो मनुष्यता के मोर्चे का नेतृत्व करे !
    आपकी यह रचना समय की पुकार है।

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  47. एक अच्छी कविता हमेशा एक अच्छा विचार होती है आपकी रचना यह सिद्ध करती है। सचमुच कब निकलेंगे ऐसे मोर्चे?

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  48. मोर्चे जिनमें राजनीतिक-धार्मिक
    स्वार्थ का कोलाहल नहीं
    मानवीय संवेदनाओं का स्वर हो
    जो निकलेंगें ऐसे मोर्चे
    तो निश्चित ही बहुत कुछ बदलेगा
    तब मनुष्यता मात्र शब्दों में नहीं
    हमारे व्यवहार में मिलेगी

    मय की मांग है ऐसी रचना .....

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  49. समयानुसार पोस्ट

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  50. काश ऐसा हो जग बदले
    इंसानियत शब्दों की जगह दिलों में हो... शुभकामनायें…

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  51. बेहतरीन पोस्ट गहन विश्लेषण के साथ आभार मोनिका जी

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  52. तब मनुष्यता मात्र शब्दों में नहीं
    हमारे व्यवहार में मिलेगी
    .............. सटीक रचना !

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  53. ऐसा तो कल्पनातीत ही लगता है

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