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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

13 February 2013

संबंधों का दर्द


जब जाने पहचाने
अपने ही
संबंधों  का दर्द सालता है
तो मन
अनजाने, अनचाहे रिश्ते पालता है
फिर स्वतंत्र हो जाने की अभिलाषा लिए
 नया उपार्जित करने का पागलपन
प्रशस्त करता है अज्ञात राहें
ये मार्ग आडम्बर से भरे होते हैं
इनपर मिलने वाले रिश्ते कहाँ खरे होते हैं
ये छद्म व्यक्तित्व  समझ से परे होते  है
इस आभास के बावजूद अनगिनत लोग
ऐसी डगर चुनते हैं
कितने ही स्वप्न बुनते  हैं
पालते हैं कुछ महत्वाकांक्षाएं
फिर समय की गति के साथ
यही समझते गुनते हैं कि
ये अनचाही
घुटन इधर भी है
साँस उधर भी नहीं आती है
यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
अब आधुनिकता कही जाती है

66 comments:

  1. सही वेदना प्रकट की आपने. अब ये इंसान की मजबूरी बन चुकी है. शायद छलना और छले जाना यही नियति हो गई है.

    रामराम.

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  2. बिल्कुल सही मोनिका जी,यह आधुनिकता का खेल ही है की हर कोई अपने अनजाने रिश्तों में मस्त है

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  3. बेहतरीन लिखा है

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  4. बहुत ही बेहतरीन बात कही है आपने मोनिका जी,रिश्तों का ये द्वंद्व और भ्रम आज की आधुनिक जगत में कुछ ज्यादा ही छाई है जहाँ रिश्तों को तोडना-मरोड़ना बड़ा ही आसान सा काम हो गया है,विकल्प दुखदायी बन गयी है!

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  5. बहुत ही बेहतरीन बात कही है आपने मोनिका जी,रिश्तों का ये द्वंद्व और भ्रम आज की आधुनिक जगत में कुछ ज्यादा ही छाई है जहाँ रिश्तों को तोडना-मरोड़ना बड़ा ही आसान सा काम हो गया है,विकल्प दुखदायी बन गयी है!

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  6. सार्थक रचना!
    मुखौटे पहने संबंध निभाना बहुत मुश्किल हो जाता है... :(
    संबंध और रिश्ते ... जीतने सरल, सहज रूप से महसूस किए जाएँ, सहेजे जाएँ... उतने ही फलते फूलते हैं, महकते हैं.... :)
    ~सादर!!!

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  7. बहुत सुन्दर .

    ना रिश्तों की महक दिखती ना बातोँ में ही दम दीखता
    क्यों मायूसी ही मायूसी जिधर देखो नज़र आये

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  8. ये अनचाही
    घुटन इधर भी है
    साँस उधर भी नहीं आती है
    यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
    अब आधुनिकता कही जाती है
    .....बहुत ही बेहतरीन बात कही है आपने मोनिका जी

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  9. सब स्वयं को छलने में ही लगे हैं।
    सार्थक रचना !!

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  10. बहुत सच्ची और गहरी बात कही आपने...

    अनु

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  11. अपने हो या पराये हो, सबके चेहरे पर मुखौटा है आधुनिक युग में-हर जगह धोख है घुटन है,
    Latest post हे माँ वीणा वादिनी शारदे !

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  12. ये सब इंसान का खुद ही उपजा हुवा है ... अपने आप से ही छला जाता है वो ... बस नए रिश्तों के नाम का आवरण होता है ...

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  13. बिल्कुल सही मोनिका जी लोग आधुनिकता के पीछे भाग रहे हैं रिश्ते तो कब के खो चुके हैं ..........

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  14. आज रिश्तो में अपनत्व कम बनावटीपन ज्यादा नजर आता है,,,,

    RECENT POST... नवगीत,

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  15. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  16. मोरा मन कहीं चैन न पावे, जैसे जहाज का पंछी लौट कर पुन: जहाप पर आवै।

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  17. रिश्तों में बढती आधुनिकता को दर्शाती सुन्दर पोस्ट।

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  18. रिश्तों में बढती आधुनिकता को दर्शाती सुन्दर पोस्ट।

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  19. सही है आधुनिकता के दिखावे में अपने आप को भी छल रहा है इंसान... सार्थक रचना

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  20. जब सब खुद को ही धोखा दे तो कोई क्या कहे ?

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  21. बढ़िया बिम्ब और झलक है आधुनिक जीवन शैली की इस रचना में .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .

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  22. बढ़िया प्रस्तुति .

    ये अनचाही
    घुटन इधर भी है
    साँस उधर भी नहीं आती है
    यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
    अब आधुनिकता कही जाती है

    बढ़िया बिम्ब और झलक है आधुनिक जीवन शैली की इस रचना में .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .



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  23. एक कोकिला से दूसरी कोकिला तक - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  24. बेहतरीन रचना. ये अनचाही
    घुटन इधर भी है
    साँस उधर भी नहीं आती है
    यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
    अब आधुनिकता कही जाती है

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  25. ऐसी डगर चुनते हैं
    कितने ही स्वप्न बुनते हैं
    पालते हैं कुछ महत्वाकांक्षाएं.....sahi bat.....

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  26. ये रिश्ते दोहरा चरित्र वाले होते हैं।

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  27. आपकी पोस्ट 14 - 02- 2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें ।

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  28. "जब जाने पहचाने
    अपने ही
    संबंधों का दर्द सालता है
    तो मन
    अनजाने, अनचाहे रिश्ते पालता है !"

    फिर भी ये अनजाने रिश्ते पूर्णता नहीं दे पाते...क्यूँ कि खोज वहाँ भी जरी रहती है कुछ पाने की...! और जहाँ कुछ पाना हो...वहीँ से इंसान खाली हाथ आता है...!!
    बहुत सुन्दर रचना...
    बधाई...!!

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  29. बस एक भटकाव -एक छलना !

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  30. खुद को खुद से छलना ....
    भटकन ही है ....
    गहन अभिव्यक्ति है ...मोनिका जी ....

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  31. यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
    अब आधुनिकता कही जाती है...यही तो हो रहा है आजकल सटीक बात कहती सुंदर एवं सार्थक रचना।

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  32. चंचल मन बेचारे का क्या करे ?

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  33. बहोत ही बेहतरीन कविता ... सटीक और सुंदर .....

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  34. बेहतरीन व सार्थक रचना...
    :-)

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  35. आपकी कविता की टीस को मैं भली भांति समझ सकता हूँ | बहुत ही वेदना होती है ऐसे रिश्तों में जो आधुनिकता के ढकोसले में सांस लेने को मजबूर होते हैं | बेहतरीन लेखन | बधाई

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  36. हुई असहज सी जिंदगी जिसमे
    छलना छलाना सहज हो गया !
    सटीक रचना !

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  37. साँस उधर भी नहीं आती है
    यूँ स्वयं को छलने का यह प्रक्रम
    अब आधुनिकता कही जाती है

    बिलकुल सटीक बात


    सादर

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  38. सार्थकता लिये सशक्‍त भाव रचना के ...

    आभार

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  39. प्रकृति बड़ी रोचक है, जिनसे सुख देती है, उन्हीं के साथ दुख के बीज भी लाती है।

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  40. जहाँ देखो रिश्तों को निभाने की विवशता ही दिखाई देती है ।

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  41. रिश्तों के चहरे से संबंधों का मुखौटा उतार कर देखिये तो अपनत्व और आत्मीयता का छिछलापन स्वत: ही प्रकट हो जाता है ! आजकल सब कुछ सतही और नकली है जानते हुए भी हम छले ही क्यों जाते हैं ? सार्थक सुन्दर रचना ! वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  42. मोकु कहाँ ढूंढें रे बन्दे मैं तो तेरे ....

    प्रेम दिवस ,जीवन का राग रंग मुबारक 365 दिन .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .बहुत बढ़िया प्रस्तुति है आधुनिक जीवन की मरीचिका पर .

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  43. रिश्तों का एक अलग सा ही चेहरा दिख गया ....

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  44. बेहतरीन व सार्थक रचना...

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  45. Words....the most powerful weapon in the hands of mankind.
    Lovely expressions !!

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  46. behtareen prastuti..sambandho ki asliyat ki sundar vyakhya..

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  47. बिलकुल सही...
    और हम इतरा रहे हैं...कि हम हर पल विकसित हो रहे हैं...

    http://kumarkashish.blogspot.in/2013/02/blog-post_15.html

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  48. जब जाने पहचाने
    अपने ही
    संबंधों का दर्द सालता है
    तो मन
    अनजाने, अनचाहे रिश्ते पालता है

    शायद एक अपराध बोध के बाद मन शांत हो जाता है और इसीलिए आदमी अक्सर अपनी ही सीमाएं तोड़ता रहता है .

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  49. .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .आपकी टिपण्णी हमारी लेखनी की आंच बनी रहे .

    ReplyDelete
  50. .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .आपकी टिपण्णी हमारी लेखनी की आंच बनी रहे .

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  51. ये छद्म व्यक्तित्व समझ से परे होते है
    इस आभास के बावजूद अनगिनत लोग
    ऐसी डगर चुनते हैं....
    वेदनाओं से ओतप्रोत खूबसूरत रचना

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  52. सम्बन्धों का दर्द बहुत ही सलीके से लिखी गयी एक गंभीर कविता है |मोनिका जी आभार

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  53. जब जाने पहचाने
    अपने ही
    संबंधों का दर्द सालता है
    तो मन
    अनजाने,
    अनचाहे रिश्ते पालता है

    सुख और दुःख के आवेग को स्पष्ट कराती अनुभूति

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  54. बहुत अच्छी रचना आजकल के रिस्तो में प्यार कम छलावा ज्यादा होता है दिलो को जोड़ने वाले रिस्तो को दिलोके अपने करीबी ही ज्यादा तोड़ते है

    आपका बहुत आभार
    मेरी नई रचना
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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  55. मुखौटे पहने संबंध निभाना बहुत मुश्किल हो जाता है
    खुद को खुद से छलना ....
    भटकन ही है ....
    गहन अभिव्यक्ति है ...मोनिका जी ....

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  56. जब जाने पहचाने
    अपने ही
    संबंधों का दर्द सालता है
    तो मन
    अनजाने,
    अनचाहे रिश्ते पालता है

    सही कहा है आपने !!

    नई पोस्ट

    रूहानी प्यार का अटूट विश्वास

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  57. आपकी रचना बहुत प्रभावी लगी .....पढ़कर मन कुछ सोचने पर विवश हो गया .....
    रिश्तों की परिभाषा में
    उलझे सारे सपने हैं
    मन की भाषा क्या समझे
    दर्पण नहीं ये किरचें हैं

    आपसे एक अनुरोध है ...कृपया मेरा ब्लॉग(स्याही के बूटे) एक बार पढ़ें ......उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी ....मेरा ब्लॉग join करेगीं तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी .....शुभ-कामनाएं
    http://shikhagupta83.blogspot.in/

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  58. bahut hi sunder aur yatharth ka chitran karti kavita.

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