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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

15 January 2013

भेद




एक आम गृहणी 
होती है कितनी खास 
 कर लेती है सब कुछ 
भले ही वो नहीं होती  
विशेषज्ञ किसी एक क्षेत्र की ।
वो होती है निपुण भेद छुपाने में 
घर के सारे मतभेद-मनभेद
देहरी के भीतर ही समा लेने की 
पा जाती है दक्षता 
जो अपने भी ना करें साझा 
उसकी वेदना तो 
सहेज  लेती है सब कुछ 
अपने ही भीतर 
उर की पीड़ा कहने की 
आदत ही छूट जाती है उसकी 
 इस सीमा तक कि 
उसके अपने  भी नहीं जान पाते  
उसकी झूठी  हंसी का भेद |

65 comments:

  1. सच्ची बात . सब कुछ जानते हुए हुए भी चुप रहना , झूठी मुस्कान ओढ़ लेना . भारतीय गृहिणी के जीवन की विडम्बना है ये .

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  2. गृहिणी होना निस्संदेह एक बहुत ही बड़ी ज़िम्म्मेदारी है। और परिवार को सँभालने की इस ज़िम्मेदारी को जो निभाती हैं, वो गृहिणियां निस्संदेह नमनीय हैं।
    बहरहाल, सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति।
    सादर
    मधुरेश

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  3. यही वो अदृश्य अजश्र धार है जो नारी को पूज्यनीय बनाती है.

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  4. सिर्फ गृहिणी ही नहीं , अक्सर स्त्रियाँ ऐसी होती है !!

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  5. एक गृहिणी की स्थिति का सटीक चित्रण कहती
    बहुत ही बेहतरीन रचना..गृहिणिया पुरे घर को बहुत ही प्यार से संभालती है..
    :-)

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  6. कुछ न कहना,
    कब तक गहना,
    मन को थोड़ा,
    दे दो बहना।

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  7. गृहिणी की व्यथा एक गृहिणी ही जान सकती है ........बहुत बढ़िया लिखा आपने

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  8. एक गृहणी पर बेहतरीन रचना !!

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  9. गृहणी जितना काम पुरुष को करना पड़े तो नानी याद आ जायेगी. गृहणी को कमतर समझने वाले भूल में हैं.

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  10. यह क्षमता अतुलनीय,अकथनीय है ...

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  11. गृहिणी होना निस्संदेह एक बहुत ही बड़ी
    ज़िम्म्मेदारी है।जिसे बाखूबी जीवन भर निर्वाह करती है

    recent post: मातृभूमि,

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  12. घर को बनाने और बिगाड़ने दोनों में ही स्त्री कि महत्त्व पूर्ण भूमिका होती है .... सटीक प्रस्तुति

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  13. बेहद सार्थक व सशक्‍त अभिव्‍यक्ति

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  14. सही कहा मोनिका जी ।लेकिन जरूरत से ज्यादा सहनशील होना भी दुर्गुण बन जाता है।आप कुछ बोलेंगें नहीं तो कोई आपकी तकलीफ कैसे समझेगा।

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  15. वाह !सुंदर पंक्तियाँ

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  16. बस यही तो है स्त्री

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  17. जानते हुवे भी कुछ पुरुष समझ नहीं पाते उसे ... पता नहीं क्यों ... जबकि वो करती है इन सब के लिए ही ...

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  18. सच कहा............सुन्दर ।

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  19. नारी का भेद तो देवता भी नही जान पाये तो मनुष्य कहां ....।

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  20. यही हकीकत है और इसी गुण की वजह से यह दुनियादारी चल भी रही है.

    रामराम.

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  21. गृहणी के मर्म को अभिव्यक्त करती एक अच्छी कविता |

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  22. अनुभूत सत्य से सहज निसृत रहना .श्रेष्ठ रूपकात्मक अभिव्यक्ति की मिसाल .

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  23. मन में लिए पीड़ा होठों मे मुस्कान यही हे नारी की पहचान..

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  24. सटीक बात कहटी सार्थक प्रस्तुति...

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  25. badlav ho yaa naa ho par har baar ye kahna accha lagta hai ki ham bhi house wife hai

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  26. इन पंक्तियों में गृहणी की पूरी हकीकत बयान कर दी है।
    सटीक अभिव्यक्ति

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  27. सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

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  28. इसीलिए हर आम गृहणी बहुत ख़ास हो जाती है ...
    नमन उनको ..

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  29. कुशल गृहणी गृह के सारे दुःख हर लेती है। घर भी उसके दुःख से दुखी, उसके सुख से सुखी हो जाता है।

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  30. shabdo - bhavnao ka atulniy mishran-***

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  31. गृहणी का मतलब ...ही ख़ास है
    इस रिश्ते में मिठास ही मिठास है ...

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  32. आपकी अनुभूत संवेद ना।
    और हमारी जानी-पहचानी सम वेदना।
    ...बचपन में माँ के इर्द-गिर्द रहने के कारण से ही इस सत्य के दर्शन अच्छे से हुए हैं।

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  33. samwedana purn kathan ke liye badhai

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  34. सागर की तरह होती है गृहणी , सतह के नीचे, दोनों के अन्दर कितना संघर्ष होता है लेकिन सतह पर कुछ नहीं आ पाता .सागर अपना आकार घटा बढ़ा लेता है ,कितनी अपार जल राशि समोए रहता है फिर भी कभी ज्वार कभी भाट़ा .गृहणी के अन्दर भी कितनी उथल पुथल होती रहती है लेकिन सबको ज़ज्ब किये रहती है वह .यह प्रतिबिम्बित हुआ है इस रचना में .यही रूपक है इस रचना का .

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  35. सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति...

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  36. सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति...

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  37. कुशल गृहिणी बनने में नारी का अपना व्यक्तित्व होम हो जाता है!

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  38. गृहिणी के सभी तकलीफे जिसे उसके गुण कहकर ढक दिया जाता है ,उसका वास्तविक ,अति सुन्दर चित्रण
    New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
    New post: कुछ पता नहीं !!!

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  39. बहुत अच्छी रचना!
    बिल्कुल सही व सच्ची बात कही आपने मोनिका जी....
    ~सादर!!!

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  40. "हौसले की जैसे कोई खान है
    सहनशक्ति को मेरा सलाम है"

    हृदयपुष्प पर 'गेंद और बल्ला'

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  41. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति .....आप भी पधारो आपका स्वागत है मेरा पता है ...http://pankajkrsah.blogspot.com

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  42. बहुत सुन्दर....
    रश्क हो आया खुद पर...एक गृहिणी पर..

    अनु

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  43. पिछले साल गणतंत्र दिवस पर,प्रसिद्ध भोजपुरी कवि राही जी ने इसे ही इन शब्दों में व्यक्त कियाः
    टूट के सगरो सपना छिटाइल भले
    कई बखरा में जिनगी बंटाइल भले
    एगो घर अपना भीतर संवार चलली
    तुलसी चौरा पर दियना के बारि चलली....

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  44. सच है.इसी स्त्री गुण का गलत फायदा उठाते हैं लोग.

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  45. बेहतरीन कविता



    सादर

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  46. पूरी सच्चाई के साथ एक गृहणी को परिभाषित किया है मोनिका जी ! आपने नि:संदेह उसके मान और गरिमा को बढ़ाया है ! आभार आपका !

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  47. गृहिणी की व्यथा एक गृहिणी ही जान सकती है ...

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  48. nari hoti hi aesi hai
    sunder abhivyakti
    badhai
    rachana

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  49. मौन वेदना की प्रतिमूर्ति बनी वह कर्तव्य की वेदी पर हव्य सामग्री बनी सुलगती रहती है .महकती रहती है ,शुद्ध करती है आबोहवा घर की .आभार आपकी सद्य टिपण्णी का .

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  50. अच्‍छे शब्‍द संयोजन के साथ सशक्‍त अभिव्‍यक्ति।

    संजय भास्कर

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  51. सार्थक प्रस्तुति...

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  52. सागर की गहराई लेकर
    किसको दर्द बताती हो ?
    कैसे कैसे कष्ट झेलकर
    निज वेदना छुपाती हो !
    कौन कहेगा,कौन सुनेगा, करें सत्य उद्घोषित गीत !
    ज़ख़्मी दिल में छुपी वेदना किसे दिखा पायेंगे गीत !

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  53. मकान को घर एक गृहणी अपने अथक परिश्रम से ही बना पाती है. सुंदर अभिव्यक्ति.

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