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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

07 September 2012

पीड़ा तो व्यक्तिगत ही होती है


दुःख दर्द साझा करने की बातें
बातें भर रह जाती है
जब शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं
किसी की पीड़ा देखकर
तब आभास होता है कि
 किसी के मन की वेदना को समझना
कितना कठिन है
और स्वयं के लिए भी कहाँ सरल है
अपने दर्द को शब्द दे पाना
आसान कहाँ है  किसी और को
 समझा पाना अपने भीतर की
पीड़ा और ह्रदय की टीस
इन्हें तो स्वयं ही जीना होता है
समेट कर अपनी शक्ति और आत्मविश्वास को
ताकि अपना संबल आप बना जा सके
पार की जा सकें जीवन की तपन भरी राहें
क्यूंकि सुख भले ही बँटा लें कोई
पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है 

91 comments:


  1. vyatha-katha aur vaiyktik jwan ko badi khoobshuruti se piroya gya hai,acchi prastuti

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  2. वाह! बहुत सुन्दर.
    कहा भी गया है
    जाके पैर न फटी बिबाई
    वो क्या जाने पीर पराई.

    पीड़ा जब तक व्यक्तिगत न हो,
    उसका साझा करना 'बातें भर'
    रह जाता है.

    भावमय प्रस्तुति के लिए आभार,मोनिका जी.

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  3. यह कविता महज कवयित्री का बयान भर नहीं है । इसमें ऐसा कुछ है जो इस संश्लिष्ट और अर्थसघन बनाता है ।

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  4. बहुत सुन्दर रचना। परपीड़ा समझी जा सकती है, पर उसे कम कर पाना उतना आसान नहीं।

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  5. जब 'पीड़ा दाता' पीड़ा झेले तो सहानुभूति और जब वह पीड़ा दे तो वाह-वाह ,यह है संसार की 'रीति'।

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  6. बिलकुल सही कहा...
    पीढा अपनी होती है....
    अपने दर्द खुद ही सहने होते हैं....

    अनु

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  7. क्यूंकि सुख भले ही बँटा लें कोई
    पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

    सही कहा आपने सचमुच ये खुद की होती है

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  8. हाँ पीड़ा तो एकान्तिक ही होती है .अकेले ही जीनी भोगनी पड़ती है .जेहि बिध राखे राम अंदाज़ लिए .एहसास बस इतना हो -मुश्किलें मुझपर पड़ीं इतनी के आसां हो गईं .बहुत सुन्दर प्रस्तुति है जो इस कहावत का भी अतिक्रमण कर आगे निकल जाती है कि -जाके पैर न फटी बिवाई ,वो क्या जाने पीर पराई .
    यहाँ तो आलम ये है -बिना एहसास के जिए जा रहा हूँ ,इसलिए कि जब कभी एहसास लौटें खैर मकदम कर सकूं .
    ram ram bhai
    शुक्रवार, 7 सितम्बर 2012
    क्या अपपठन (डिसलेक्सिया )और आत्मविमोह (ऑटिज्म )का भी इलाज़ है काइरोप्रेक्टिक में ?

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  9. सुख और दुःख तो जीवन में आते रहते है
    सुख में तो सभी शामिल हो कर साझा कर
    लेते है लेकिन दुख में लोग सुहानभूति देकर
    चले जाते है लेकिन पीड़ा तो जीवन भर अकेले
    झेलनी पडती है,,,,

    बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति,,,,
    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  10. दिल दिमाग जिस वक़्त झंझावातों के मध्य में खुद के पाँव लडखडाने से बचाता है , संस्कारों के घेरे में अनगिनत वार सहकर खामोश रहता है ... वह चाहता तो है एक साथ, पर साथ वही है - जो बिना कहे सर पर हाथ रख दे और सही मायनों में वही समझता भी है ! जिसने एक भी प्रश्न , उत्तर दे दिया - वह दुनियादारी की रस्म निभाता है और घर जाते भूल जाता है !

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  11. sach kahaa..
    धूप ही धूप है बराबर सबके लिए
    अपने गीतों में दुनिया की पीड़ा कहिये
    kavi man hi ye kar sakta hai...

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  12. sahi kaha ma'am...peeda vyaktigat hi hoti hai..
    kahte hain dukh baant lene chahiye us-se wo km ho jaate hai ..par shyd aisa karte huye wo sirf punravrutt hote hain is-se jyada kuchh nahin..

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  13. बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... सार्थकता लिए सटीक लेखन ...आभार

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  14. जैसे सुख बाँटने से बढ़ता है उसी तरह दुख बाँटने से भी बढ़ता है नकि कम होता है ..सार्थक पोस्ट..

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  15. दुनिया में हर तरह के लोग हैं।अच्छे और संवेदनशील भी और बुरे भी।पीड़ा तो खैर स्वयं को ही भुगतनी होती है लेकिन कुछ लोगों से मन की बात कहकर हमारा मन भी हल्का हो जाता है तो कुछ ऐसे होते है जिनसे बात करके पीड़ा और बढ़ जाती है ऐसे लोगों के लिए ही राजस्थान में तो एक कहावत भी है कि अपना मरण और जगत की हँसी।

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  16. आसान कहाँ है किसी और को
    समझा पाना अपने भीतर की
    पीड़ा और ह्रदय की टीस
    इन्हें तो स्वयं ही जीना होता है

    ...... सच है, फिर भी कोशिश जारी है.... स्वानुभूत पीड़ा को दूसरे तक पहुँचाना... उसे 'परपीड़ा' बनाना.

    हो जाती जब कोई उलझन, होने लगती जब है अनबन, पड़ जाती रस्ते में अड़चन, आती संबंधों में जकड़न, खोता समाज में जब बचपन, होने लगता युग परिवर्तन, आदर्शों का उत्थान पतन, देखा करते निर्लज्ज नयन, शिक्षित होकर होते निर्धन, हो रही व्यर्थ एजुकेशन. -- ऐसे में जलता है तनमन, व्याकुलता से झन झन झननन।
    खुद को पावरफुल कहता मन, मानता नहीं किंचित वर्जन, मैं उल्लंघन बो+लता जिसे, मन करे उसी का आलिंगन, कल्पनाशील कितना हैं मन, हर दम करता रहता चिंतन, बाहों में भरके नंग बदन, शय्या पर करता रहे शयन, संबंधों में होती जकड़न, भागा-भागा फिरता है मन. -- तब नहीं मानता कोई बहन, कामुकता में, झन झन झननन।
    कर सको आप तो करो श्रवन, सभ्यता सनातन का कृन्दन, चिंता चिंतन सत सोच मनन, मर गया हमारा संवेदन, कर रही विदेशी कल्चर, घर की परम्पराओं का मर्दन, अब नहीं रहे सत भाव, ना माटी ही माथे का चन्दन, देहात शहर बन रहे और, बन रहे शहर नेकिड लन्दन. -- होता मर्यादा-उल्लंघन, पीड़ा होती झन झन झननन।
    जब समाचार पत्रों को भी, घर में छिपकर पड़ता यौवन, छापते अवैध संबंधों पर, झूठे सच्चे जब अंतरमन, जब करे दूसरे मज़हब का, कोई हुसैन नंगा सर्जन, गीतों की धुन पर जब बच्ची, करती है कोई फूहड़पन, एडल्ट फिल्म को देख करे, बच्चा जब बहना को चुम्बन. -- हो जाते खुद ही बंद नयन, पीड़ा होती झन झन झननन।

    विलुप्त हुआ परिवार विज़न, कमरे-कमरे में टेलिविज़न, जो भी चाहे जैसे कर ले, चौबीस घंटे मन का रंजन, सबकी अपनी हैं एम्बीशन, अनलिमिटेशन, नो-बाउंडएशन, फादर-इन-ला कंसल्टेशन, इंटरफेयर, नो परमीशन, बिजली पानी चूल्हा ईंधन, न्यू कपल सेपरेट कनेक्शन. --पर्सनल लाइफ पर्सनल किचन, पीड़ा होती झन झन झननन।

    बच्चे बूढ़े इक्वल फैशन, इक्वल मेंटल लेवल नैशन, बच्चे तो जीते ही बचपन, बूढों में भी बचकानापन, डेली रूटीन सीनियर सिटिजन, वाकिंग, लाफिंग, वाचिंग चिल्ड्रन, वृद्धावस्था पाते पेंशन, फिर भी रहती मन में टेंशन, एँ! ये कैसी एजुकेशन, आंसर देंगे जब हो ऑप्शन. -- है रेपर नोलिज नंबर वन, पीड़ा होती झन झन झननन।

    सत्ता पाने को नेतागन, जनता में करते ज़हर वमन, चाहे समाज टूटे-बिखरे, करने को रहते परिवर्तन, जब सत्ता में उत्थान पतन, होता रहता पिस्ता निर्धन, जब देश चुनावों में रहता, कितना व्यर्थ होता है धन, हा! राजनीति में घटियापन, बन रहे 'दलित', फिर से हरिजन. -- गांधी पर जब सुनता अवचन, पीड़ा होती झन झन झननन।

    जब होता हो सब कोनो से, विकृत कल्चर का अतिक्रमण, बंदी हो जाए समाज, कुछ भ्रष्ट चिंतकों के बंधन, करने लागे कोई विरोध, जब सरस्वती तेरा वंदन, उदघोष मातरम् वन्दे का, जब बोले नहीं यहाँ रहिमन, हम करें संधि लेकिन दुश्मन,सीमा पर करता हो 'दन-दन'. -- तब क्रोध किया करता क्रंदन, पीड़ा होती झन झन झननन।

    स्कूलों के एन्युल फंक्शन, नैतिकता का कर रहे वमन, टैलेंट नाम पर विक्साते, मो... डलिंग केटवोक फैशन, जब भक्ति नाम पर हो प्रेयर, और देशभक्ति को जन-गन-मन, शिष्टता नाम पर जब टीचर, बनने को कहता हो मॉडर्न, गुरु करे नहीं जब शिष्यों का, जीवन उपयोगी निर्देशन. -- अंतर्मन करता रहे रुदन, पीड़ा होती झन झन झननन ।

    फायर जैसी फिल्मों में जब, खोखला दिखाते हैं रिलिजन, कर देते भ्रष्ट तरीके से, वर्जित दृश्यों का उदघाटन, जब जन की गुप्त समस्या पर, मोटे चश्मे से हो दर्शन, मिल जाए कथित विद्वानों का, सहयोग समर्थन अपनापन, होती है मन में तभी चुभन, क्यों सही नहीं होता चिंतन. -- आँखों में ध्वंसक उठे जलन, पीड़ा होती झन झन झननन॥

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  17. सही कहा आपने ...

    "जो साज़ से निकली है वो धुन सब ने सुनी है ;
    जो साज पर गुज़री है वो किस दिल को पता है !!"


    मुझ से मत जलो - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

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  18. पीड़ा और ह्रदय की टीस
    इन्हें तो स्वयं ही जीना होता है

    पीड़ा व्यक्तिगत ही होती है ....

    रहीम जी का एक दोहा याद आ रहा है ...


    रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
    सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय ॥

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  19. सच कहा है आपने....... शीर्षक ही सब कह रहा है अपना दर्द हम खुद ही जानते हैं....अपना सलीब हमे अपनी पीठ पर खुद उठाना पड़ता है ।

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  20. एक और बेहतरीन रचना के लिए बधाइयाँ !

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  21. सचमुच पीड़ा को शब्द दे पाना नामुमकिन है, नहीं समझाया जा सकता इसे किसी को, जो इसे जीता है वही समझ सका है इसे...

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  22. सुख और दुःख तो जीवन में आते रहते है
    सुख में तो सभी शामिल हो कर साझा कर
    लेते है लेकिन दुख में लोग सुहानभूति देकर
    चले जाते है लेकिन पीड़ा तो जीवन भर अकेले
    झेलनी पडती है.


    बेहतरीन प्रस्तुति, संवेदनशील भी.

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  23. आसान कहाँ है किसी और को
    समझा पाना अपने भीतर की
    पीड़ा और ह्रदय की टीस
    इन्हें तो स्वयं ही जीना होता है
    ...
    यही सत्य है पीड़ा सदैव नितांत व्यक्तिगत होती है !

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  24. मोनिका जी इस पीड़ा को समझ सकते है | यह पीड़ा भी एक आत्मीयता की झलक और रूप होती है |

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  25. सही बात , पीड़ा तो अपनी ही होती है , दूसरा केवल उसे जान सकता है महसूस नहीं कर सकता .

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  26. jee peeda ko to khud hi bhogna hota hai...:)
    bahut pyari bhav abhivyakti..

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  27. सही कहा है आपने..
    सुख में सब साथ निभाते है..
    पर दुःख में साथ ना आए कोई..
    यथार्थ कहती रचना..

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  28. बिल्कुल सही है.
    घुघूतीबासूती

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  29. हम किसी की पीड़ा को समझ ज़रूर सकते हैं मगर महसूस नहीं कर सकते...तभी तो कहते हैं।
    "जिस तन लागे वो मन जाने"

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  30. बहुत ही सुन्दर रचना है, आभार!

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  31. बहुत सुन्दर पोस्ट ,काबिले तारीफ ।
    मेरे नए पोस्ट - "क्या आप इंटरनेट पर मशहूर होना चाहते है?" को अवश्य पढ़े ।धन्यवाद ।
    मेरा ब्लॉग पता है - harshprachar.blogspot.com

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  32. अपने दर्द को शब्द दे पाना
    आसान कहाँ है किसी और को
    समझा पाना अपने भीतर की
    पीड़ा और ह्रदय की टीस............बहुत ही सुन्दर रचना.........पीड़ा तो अपनी ही होती है

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  33. लोग सिर्फ मजाक उड़ाते हैं ....

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  34. सबका अपना पाथेय ,पंथ एकाकी है ,
    अब होश हुआ जब इने गिने दिन बाकी हैं .
    सीख लिया हमने गमों को दिल में उतारने का फ़न,
    ये खजाने यूं महफिलों में लुटाये नहीं जाते .
    ये दुःख तो अपना पैरहन (लिबास ),
    कैसी भी इस पे हो शिकन .
    बढिया रचना है तदानुभूति अंदर तक हुई .


    ram ram bhai
    शुक्रवार, 7 सितम्बर 2012
    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक

    शब्दार्थ ,व्याप्ति और विस्तार :काइरोप्रेक्टिक
    इस स्तंभ "कभी कभार "के तहत चिकित्सा पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ और विस्तार (स्कोप )पर विमर्श ज़ारी रहेगा .यह पहली किस्त है .
    काइरोप्रेक्टिक कुदरती स्वास्थ्य संभाल जीविका है जिसके लिए उच्च प्रशिक्षण और शिक्षा दोनों ही ज़रूरी हैं .गत सौ सालों से इसके माहिर हमारे बीच मौजूद हैं .अमरीका में यह वैकल्पिक और प्राकृत चिकित्सा का सबसे बड़ा पेशा है ,वैकल्पिक चिकित्सा की एक ख़ास किस्म है .

    इस वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था की बुनियादी अवधारणा के तहत बीमारियों की वजह हमारे स्नायुविक तंत्र पर आ पड़ने वाला दवाब ,स्पाइनल स्ट्रेस बनती है .यह स्नायुविक प्रणाली (नर्वस सिस्टम )एक अंतर जाल है कोशाओं का ,तंत्रिकाओं का ,जो हर मिलने वाली सूचना का संसाधन करता ,संचार का एक सेतु बनता है .हमारे दिमागी टेलीफोन एक्सचेज का यह एक एहम हिस्सा है .इसके काम में किसी भी किस्म की बाधा आने पर हमारी काया अपने एक नैसर्गिक गुण से वंचित रह जाती है .वह गुण है हीलिंग ,खुद -बा -खुद स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते रहना ,टूट फूट की मरम्मत करते रहना .सेल्फ हीलिंग ओर्गेन हैं हमारी बॉडी .

    इसी लिए इस चिकित्सा प्रणाली का माहिर उन तमाम लोगों को राहत पहुंचाने की कोशिश करता है जो जुदा किस्म की स्वास्थ्य सम्बन्धी शिकायतें लेकर आतें हैं ,कोई सिर दर्द ,कोई पाचन सम्बन्धी ,कोई हारमोनों के उतार चढ़ाव से सम्बंधित जबकि काइरोप्रेक्टर (इस चिकित्सा व्यवस्था के डोकटर या माहिर )के पास अमूमन लोग गर्दन और कमर के निचले हिस्से में रहने वाले दर्द की शिकायत के लिए ही अकसर जातें हैं .

    काइरोप्रेक्टर अपना सारा ध्यान अपनी सारी तवज्जो तंत्रिकापेशीय प्रणाली (न्यूरोमस्कुलर सिस्टम ) को देतें हैं .यहाँ न कोई दवा है न शल्य कर्म .तवज्जो में भी तवज्जो (ख़ास तवज्जो )का केंद्र बनती है हमारी रीढ़ (स्पाइन )क्योंकि यह रीढ़ या मेरुदंड ही हमारी स्नायुविक प्रणाली से विशेष ताल्लुक रखता है .इसका एहम किरदार है .

    रीढ़ के किसी हिस्से या खंड में संरेखण का अभाव ,किसी भी किस्म का विक्षोभ या विचलन ,स्पाइनल मिसएलाइनमेंट ,ही तंत्रिकाओं के काम में खलल पैदा कर देता है .इस पेशे की ख़ास भाषा में इस गंभीर खलल को vertebral subluxation (मेरुदंड खलल ,रीढीय गडबडी ) को कहा जाता है .

    काइरोप्रेक्टर इस खलल को दूर कर देतें हैं विशेष रीढ़ समायोजन ,रीढ़ संधान से ,स्पाइनल एडजस्टमेंट से .क्योंकि ये सारा काम माहिर के हाथों का ही विशेष हुनर होता है इसीलिए इस चिकित्सा व्यवस्था को कहा जाता है -काइरोप्रेक्टिक .

    After all, the word chir is derived from the Greek word meaning “referring to the hand”, and prassein “to do”.

    (kiro praktik )

    CHIRO +Greek praktikos "effective"

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  35. गहरे भावार्थ से युक्त अच्छी कविता |

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  36. क्यूंकि सुख भले ही बँटा लें कोई
    पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

    gahan chintan se upaji sarthak rachna ...
    bahut sundar abhivyakti Monica ji ...

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  37. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है.....बहुत ही सुन्दर रचना.

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  38. क्यूंकि सुख भले ही बँटा लें कोई
    पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

    सच्ची बात...सुन्दर कविता

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  39. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है ...
    होनी भी चाहिए ...लोग कहते है दर्द बाँटने से हल्का होता है
    इसमें कोई तथ्य नहीं है पीड़ा हमारी पर्सनल है किसी के साथ न बाँटना ही अच्छा है
    सुंदर रचना ....

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  40. वुँक्तिगत पीड़ा जब तक बाहर नहीं आती ... सुलगती रहती है ... पर नए सृजन को भी जन्म देती है ... अर्थ पूर्ण अभिव्यक्ति ...

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  41. दर्द को महसूस करना और उसे शब्दो में बांधना
    क्या कहूं
    बहुत अच्छी रचना

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  42. सच है , पीड़ा अगर बांटी जा सकती ,तो दुःख इतना एकाकी क्यों होता .......

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  43. अन्दर अन्दर पीड़ा पीना,
    जीवन को जीवन सा जीना,

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  44. This comment has been removed by the author.

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  45. इस कविता में सत्य को स्वर मिला है।

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  46. इस कविता में सत्य को स्वर मिला है।

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  47. सच है , दर्द ही हमदर्द होता है और कोई दूसरा नहीं |

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  48. सार्थक अभिव्यक्ति !!दुख का भार खुद वहन करना पड़ता है|

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  49. आपके पोस्ट पर आना सार्थक हुआ। रचना काफी अच्छी लगी ।धन्यवाद।

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  50. निराला ने इसलिए ही कहा था -दुःख ही जीवन की कथा रही क्या कहूं जो अब तक नहीं कही -दुःख को तो अपने में ही जज्ब कर जीना है !

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  51. दुःख दर्द साझा करने की बातें
    बातें भर रह जाती है
    जब शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं
    किसी की पीड़ा देखकर
    तब आभास होता है कि
    किसी के मन की वेदना को समझना
    कितना कठिन है
    अद्भुत कविता |

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  52. सुख और दुःख तो जीवन में आते रहते है
    सुख में तो सभी शामिल हो कर साझा कर
    लेते है लेकिन दुख में लोग सुहानभूति देकर
    चले जाते है लेकिन पीड़ा तो जीवन भर अकेले
    झेलनी पडती है,,,,

    RECENT POST - मेरे सपनो का भारत

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  53. जिसने व्ही पीड़ा झेली हो वह ही परपीड़ा समझ सकता है.
    सुन्दर भाव.
    घुघूतीबासूती

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  54. सही कहा है आपने.,,क्योंकि ....''रहिमन निज मन की व्यथा ......." ह्रदय को स्पर्श करनी वाली रचना...आभार!

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  55. ताकि अपना संबल आप बना जा सके

    पीड़ा को समेट कर जीवन जीना सार्थक है
    सुन्दर रचना

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  56. दूसरों के दुःख महसूस कर छाती फटती तो है , उससे जुड़े प्रभाव उस मनुष्य को ही झेलने पड़ते हैं , जिसकी अपनी पीड़ा है !

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  57. .सुख में सुमिरन न किया ,दुःख में करता याद रे ,कहे कबीर उस दास की कौन सुनें फ़रियाद रे ....हाँ पीड़ा और दुःख को दिशा दी जा सकती है हंस कर ,गाकर ,लिखकर --वियोगी होगा पहला कवि ,आह से निकला होगा गान ,निकलकर अधरों से चुपचाप ,बही होगी कविता अनजान .,दुःख से पीर से संसिक्त हैं विश्व के सुन्दरतम गीत .....हैं सबसे मधुर वह गीत जिन्हें हम .... ..ram ram bhai
    मंगलवार, 11 सितम्बर 2012
    देश की तो अवधारणा ही खत्म कर दी है इस सरकार ने

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  58. मोनिका जी ..
    बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ .. कितना सुन्दर बना लिया है आपने इसे .. बधाई !
    सचमुच बहुत मुश्किल होता किसी कि पीड़ा को समझ पाना ..कभी कभी लगता है संवेदना कहाँ चली गयी इस कोलाहल में ..खुद अपने भीतर झाँकने का समय भी नहीं मिल पाता ...
    कठिनाइयाँ जीने का संबल भी दे ही जाती है ..
    पर संवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए ..

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  59. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

    सही कहा ....

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  60. sahii.....
    bahut pasand aayi kavita!!

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  61. दूसरे के दुख को समझने का दावा करना आसान होता है, पर अपने दर्द के आगे सब दिखावा मात्र रह जाता है। स्व-पीड़ा ज्यादा शोक देती है।

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  62. SAHI KAHA AAPNE... DUKH TO KHUD KE HI HISSE MEN AATE HAI. SUNDER PRASTUTI.

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  63. sahi bat hai pida hmesha wyaktigat hi hoti hai .......ise bantna aasan nahi ...

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  64. आपकी टिपण्णी के लिए शुक्रिया .


    शुक्रवार, 14 सितम्बर 2012
    सजा इन रहजनों को मिलनी चाहिए


    Dr. shyam guptaSeptember 13, 2012 10:10 AM
    वीरू भाई आपने जो भी लिखा सब सत्य है..यही होरहा है आजकल...परन्तु आप यदि अमेरिका में यदि बैठे हैं तो आपको कैसे पता चलेगा कि कौन गलत है कौन सही....असीम या आपका वक्तव्य ही क्यों सही माना जाय..???

    --वास्तव में तो --राष्ट्रीय प्रतीकों से छेड़छाड बिलकुल उचित नहीं ..
    सत्य तथ्य यह है कि हम लोग बड़ी तेजी से बिना सम्यक सोच-विचारे अपनी जाति -वर्ग ( पत्रकार , ब्लोगर , लेखक तथा तथाकथित प्रगतिशील विचारक आदि एक ही जाति के हैं और यह नवीन जाति-व्यवस्था का विकृत रूप बढता ही जा रहा है ) का पक्ष लेने लगते हैं |
    ---- देश-राष्ट्र व नेता-मंत्री में अंतर होता है ...देश समष्टि है,शाश्वत है....नेता आदि व्यक्ति, वे बदलते रहते हैं, वे भ्रष्ट हो सकते हैं देश नहीं ..अतः राष्ट्रीय प्रतीकों से छेड़-छाड स्पष्टतया अपराध है चाहे वह देश-द्रोह की श्रेणी में न आता हो.. यदि किसी ने भी ऐसा कार्टून बनाया है तो निश्चय ही वे अपराध की सज़ा के हकदार हैं ....साहित्य व कला का भी अपना एक स्वयं का शिष्टाचार होता है..
    --- अतः वह कार्टूनिष्ट भी देश के अपमान का उतना ही अपराधी है जितना आपके कहे अनुसार ये नेता...
    Reply
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    ब्लॉग

    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    श्याम स्मृति..The world of my thoughts...डा श्याम गुप्त का चिट्ठा..

    डॉ श्याम गुप्त जी !

    जिन पर संसद की मर्यादा का भार था ,वह रहजन हो गए ,थुक्का फजीहत की है सांसदों ने संसद की जिनमें तकरीबन १५० तो अपराधी हैं .क्या नहीं होता संसद में क्या नोट के सहारे संख्या नहीं बढ़ाई जाती ?क्या इसी संसद में इक राज्य पाल को बूढी गाय और पूर्व राष्ट्र पति को यह नहीं कहा गया -इक हथिनी पाल रखी है .क्या ये तमाम राहजन(रहजन ) आज जिनके हाथ काले हैं संसद की मर्यादा का दायित्व निभा सके ?

    असीम त्रिवेदी को आज इस पीड़ा में किसने डाला .किसने किया उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित .वह तो चित्र व्यंग्य से अपनी रोटी चला रहा था .उस रोटी को भी उसने देश की वर्तमान अवस्था से दुखी होकर दांव पे लगा दिया .जिन नेताओं को सज़ा मिलनी चाहिए उनके प्रति यदि सहानुभूति जतलाई गई ,सारे युवा गुमराह हो जायेंगे ,

    ये असीम त्रिवेदी की और श्याम गुप्त जी यहाँ अमरीका में हमारी व्यक्तिगत दुखन नहीं है ,हत्यारों के बीच खड़े होकर उन्हें हत्यारा कहना बड़ी हिम्मत का काम होता है .जोखिम का भी .असीम ने यह जोखिम क्या लखनऊ वालों को तमाशा दिखाने के लिए उठाया है जो उसे सज़ा दिलवाने की पेश कर रहें हैं .

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  65. बहुत सच कहा मोनिकाजी ..लेकिन संवेदना और अपनेपन के दो शब्द उस पीड़ा को सहने की शक्ति बढ़ा देते हैं....लेकिन हाँ दुःख तो व्यक्तिगत ही होता है .......वाकई ..!!

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  66. सत्य

    पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

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  67. बहुत ही प्यारी रचना ....

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  68. जो भी दुख है जीवन में,वह सब बाहर से आया हुआ है। भीतर केवल सुख ही सुख है। अब यह हम पर निर्भर है कि हम बाहर का कितना कचरा अपने भीतर भर जाने देते हैं।
    मन के तल से ऊपर उठते ही,जिसे अक्सर केवल सैद्धांतिक बातें कहकर खारिज़ किया जाता है,भीतर की दुनिया बदल जाती है क्योंकि वहां संसारी के लिए भी,न कुछ दुख है,न सुख।

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  69. Everything is very open with a really clear description of the issues.
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  70. बहुत सुन्दर प्रस्तुति , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग "प्रेम सरोवर" पर पधारकर मुझे प्रोत्साहित करें। धन्यवाद ।

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  71. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है.....haan....

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  72. "पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है"
    जी बिल्कुल सही कहा है आपने |

    सादर नमन |

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  73. बहुत ही सही कहा आपने...एक एक शब्द अनुभवजन्य सत्य में तपा हुआ..

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  74. क्यूंकि सुख भले ही बँटा लें कोई
    पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है

    ...बिलकुल सच..बहुत भावमयी रचना..

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  75. कैग नहीं ये कागा है ,जिसके सिर पे बैठ गया
    वो अभागा है .

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  76. सुन्दर प्रस्तु्ति

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  77. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है. बात तो यही सच है.

    भावमयी प्रस्तुति के लिये बधाई. गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर बहुत बधाइयाँ और शुभकामनायें.

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  78. माँ के गर्भाशय का बेटियों में सफल प्रत्यारोपण

    स्वीडन के एक अस्पताल में दो महिलाओं को उनकी ही माताओं द्वारा दान किया गया गर्भाशय फिट कर दिया गया है .यह अपनी किस्म का पहला सफल प्रत्यारोपण हैं .इनमें से एक महिला को अपने गर्भाशय से तब हाथ धोना पड़ा था जब वह बरसों पहले गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (बच्चेदानी की गर्दन cervical cancer )का शिकार हो गई थी .

    दूसरी महिला जन्म से ही बिना गर्भाशय के थी .

    दोनों ही महिलाएं उम्र के चौथे दशक में प्रवेश कर चुकीं हैं तीसम तीसे के आरम्भिक बरसों में हैं .इसीलिए परखनली गर्भाधान के ज़रिए इनके ह्यूमेन एग से निषेचन के बाद एम्ब्रियो तैयार करके प्रशीतित कर दिए गएँ हैं ताकि साल बाद ही इन्हें प्राप्त गर्भाशय में पुन : रोप दिया जाए .

    प्रत्यारोपण की असल कामयाबी का पता गर्भ काल की अवधि लगाके तकरीबन २१ महीने बाद ही चल सकेगा .ईश्वर करे इनका प्रसव कामयाब आये .माहिरों की मेहनत रंग लाए .

    गर्भाधान या निषेचन दो किस्म का होता है एक इन वाइवो (in vivo ) जैसा अपने पुरुष साथी के साथ मैथुन के बाद शुक्राणु (स्परमेटा -जोआ)और अंडाणु (फिमेल एग या ओवम ) के मिलन मनाने के बाद किसी महिला गर्भाशय में होता है .

    दूसरा परखनली में या फिर पेट्री डिश में .इन वीट्रो यानी गर्भाशय के बाहर किसी अंत :पात्र में (परखनली या किसी अन्य वैज्ञानिक उपकरण में जैविक प्रक्रिया कराके )किया जाता है .होता यह भी शुक्राणु और अंडाणु के संयोजन से ही है .अंडाणु युक्तिपूर्वक महिला से प्राप्त किए जातें हैं .शुक्र स्पर्म बैंक से या पुरुष साथी से .बस निषेचन (गर्भाधान )की क्रिया शरीर से बाहर होती है .

    यह महत्वपूर्ण आलमी प्रत्यारोपण गत दस सालों की स्वीडन और अंतर -राष्ट्रीय सहयोग के स्तर पर की गई शोध का नतीज़ा है जिसमें सर्जरी के दस माहिरों की एक टीम ने जो सालों से यही प्रशिक्षण लेते रहे थे (एनीमल स्टडी ,इतर स्रोतों से )शिरकत की है .

    संतोष का विषय है दाता माताएं सकुशल हैं और दो चार दिनों में ही इन्हें अस्पताल से घर भेज दिया जाएगा .प्राप्त करता बेटियाँ भी मज़े में हैं भले सर्जरी की थकान बाकी है लेकिन एक समस्या (बांझपन )से निजात की अपनी एक अलग ख़ुशी इस थकान से कहीं ज्यादा है .

    गौर तलब है स्वीडन में तकरीबन दो से तीन हज़ार महिलाएं गर्भाशय के अभाव में संतान से वंचित हैं .यह प्राविधि उनके लिए नया रास्ता दिखाती है .

    ये दोनों ही मामले लाइव डोनर यूट्रस ट्रांसप्लांट के अग्रणी मामलें हैं जिनमें प्रत्यारोप माँ से संतान को मिला है .

    बेशक सन २००० में एक ऐसा ही प्रत्यारोप आजमाया गया जो असफल रहा था .

    तुर्की में एक शव से बच्चेदानी लेकर एक महिला में फिट ज़रूर की गई थी गए साल .लेकिन फिलाल उस महिला ने गर्भ धारण नहीं किया है .

    माहिरों को यह विचार तब कौंधा जब १९९८ में एक युवती का गर्भाशय उन्हें बच्चे दानी के कैंसर की वजह से ही निकालना पड़ा था .

    उसे बता दिया गया था ,उसका कैंसर तो ठीक हो जाएगा लेकिन बच्चे दानी के न रहने पर वह गर्भ धारण नहीं कर सकेगी .

    इस महिला ने ही सुझाया था .क्यों न उसकी माँ का गर्भाशय ही निकालके उसे फिट कर दिया जाए .

    तभी से पशुओं पर इस प्राविधि की आज़माइश की जा रही थी .कुछ ने गर्भ धारण भी किया है .उम्मीद की जाती है इन मानवियों पर भी यह खरा उतरेगा .

    सन्दर्भ -सामिग्री :-CNN's Alexander Felton contributed to this report.

    First mother-daughter womb transplants performed in Sweden
    By Ashley Hayes, CNN
    updated 4:17 PM EDT, Wed September 19, 2012

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  79. माँ के गर्भाशय का बेटियों में सफल प्रत्यारोपण

    स्वीडन के एक अस्पताल में दो महिलाओं को उनकी ही माताओं द्वारा दान किया गया गर्भाशय फिट कर दिया गया है .यह अपनी किस्म का पहला सफल प्रत्यारोपण हैं .इनमें से एक महिला को अपने गर्भाशय से तब हाथ धोना पड़ा था जब वह बरसों पहले गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (बच्चेदानी की गर्दन cervical cancer )का शिकार हो गई थी .

    दूसरी महिला जन्म से ही बिना गर्भाशय के थी .

    दोनों ही महिलाएं उम्र के चौथे दशक में प्रवेश कर चुकीं हैं तीसम तीसे के आरम्भिक बरसों में हैं .इसीलिए परखनली गर्भाधान के ज़रिए इनके ह्यूमेन एग से निषेचन के बाद एम्ब्रियो तैयार करके प्रशीतित कर दिए गएँ हैं ताकि साल बाद ही इन्हें प्राप्त गर्भाशय में पुन : रोप दिया जाए .

    प्रत्यारोपण की असल कामयाबी का पता गर्भ काल की अवधि लगाके तकरीबन २१ महीने बाद ही चल सकेगा .ईश्वर करे इनका प्रसव कामयाब आये .माहिरों की मेहनत रंग लाए .

    गर्भाधान या निषेचन दो किस्म का होता है एक इन वाइवो (in vivo ) जैसा अपने पुरुष साथी के साथ मैथुन के बाद शुक्राणु (स्परमेटा -जोआ)और अंडाणु (फिमेल एग या ओवम ) के मिलन मनाने के बाद किसी महिला गर्भाशय में होता है .

    दूसरा परखनली में या फिर पेट्री डिश में .इन वीट्रो यानी गर्भाशय के बाहर किसी अंत :पात्र में (परखनली या किसी अन्य वैज्ञानिक उपकरण में जैविक प्रक्रिया कराके )किया जाता है .होता यह भी शुक्राणु और अंडाणु के संयोजन से ही है .अंडाणु युक्तिपूर्वक महिला से प्राप्त किए जातें हैं .शुक्र स्पर्म बैंक से या पुरुष साथी से .बस निषेचन (गर्भाधान )की क्रिया शरीर से बाहर होती है .

    यह महत्वपूर्ण आलमी प्रत्यारोपण गत दस सालों की स्वीडन और अंतर -राष्ट्रीय सहयोग के स्तर पर की गई शोध का नतीज़ा है जिसमें सर्जरी के दस माहिरों की एक टीम ने जो सालों से यही प्रशिक्षण लेते रहे थे (एनीमल स्टडी ,इतर स्रोतों से )शिरकत की है .

    संतोष का विषय है दाता माताएं सकुशल हैं और दो चार दिनों में ही इन्हें अस्पताल से घर भेज दिया जाएगा .प्राप्त करता बेटियाँ भी मज़े में हैं भले सर्जरी की थकान बाकी है लेकिन एक समस्या (बांझपन )से निजात की अपनी एक अलग ख़ुशी इस थकान से कहीं ज्यादा है .

    गौर तलब है स्वीडन में तकरीबन दो से तीन हज़ार महिलाएं गर्भाशय के अभाव में संतान से वंचित हैं .यह प्राविधि उनके लिए नया रास्ता दिखाती है .

    ये दोनों ही मामले लाइव डोनर यूट्रस ट्रांसप्लांट के अग्रणी मामलें हैं जिनमें प्रत्यारोप माँ से संतान को मिला है .

    बेशक सन २००० में एक ऐसा ही प्रत्यारोप आजमाया गया जो असफल रहा था .

    तुर्की में एक शव से बच्चेदानी लेकर एक महिला में फिट ज़रूर की गई थी गए साल .लेकिन फिलाल उस महिला ने गर्भ धारण नहीं किया है .

    माहिरों को यह विचार तब कौंधा जब १९९८ में एक युवती का गर्भाशय उन्हें बच्चे दानी के कैंसर की वजह से ही निकालना पड़ा था .

    उसे बता दिया गया था ,उसका कैंसर तो ठीक हो जाएगा लेकिन बच्चे दानी के न रहने पर वह गर्भ धारण नहीं कर सकेगी .

    इस महिला ने ही सुझाया था .क्यों न उसकी माँ का गर्भाशय ही निकालके उसे फिट कर दिया जाए .

    तभी से पशुओं पर इस प्राविधि की आज़माइश की जा रही थी .कुछ ने गर्भ धारण भी किया है .उम्मीद की जाती है इन मानवियों पर भी यह खरा उतरेगा .

    सन्दर्भ -सामिग्री :-CNN's Alexander Felton contributed to this report.

    First mother-daughter womb transplants performed in Sweden
    By Ashley Hayes, CNN
    updated 4:17 PM EDT, Wed September 19, 2012

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  80. पुनश्च :

    कोख की साख

    कोख और कोख में फर्क है .आज विज्ञान उस मुकाम पे चला आया है जहां एक ही कोख से माँ और बेटी पैदा हो सकतें हैं .अभी स्वीडन में एक माँ ने अपनी उस बेटी को अपनी कोख (चिकित्सा शब्दावली में ,विज्ञान की भाषा में गर्भाशय ,बच्चेदानी )डोनेट कर दी जो कुछ साल पहले बच्चेदानी के कैंसर की वजह से अपनी बच्चेदानी निकलवा चुकी थी .ठीक होने का और कोई रास्ता बचा ही नहीं था .सफलता पूर्वक बेटी में माँ की कोख का प्रत्यारोप लग चुका है .अंत :पात्र निषेचन (इन वीट्रो फ़र्तिलाइज़ेशन )के ज़रिये उसका एम्ब्रियो (भ्रूण की आरम्भिक अवस्था )प्रशीतित करके रखा जा चुका है साल एक के बाद इसे प्राप्त करता युवती के ही गर्भाशय में रोप दिया जाएगा .फिर इसी गर्भाशय से एक बेटी और पैदा हो सकती है .दाता महिला इन नवजात कन्या की नानी कहलायेगी लेकिन माँ बेटी एक ही गर्भाशय की उपज कहलाएंगी .तो ज़नाब ऐसी है गर्भाशय की महिमा .इस खबर से अभिभूत हो हमारे नाम चीन ब्लोगर भाई रविकर फैजाबादी (लिंक लिखाड़ी )ने अपने उदगार यूं व्यक्त किये हैं -


    रविकर फैजाबादीSeptember 20, 2012 9:20 AM
    कहते हम हरदम रहे, महिमा-मातु अनूप ।

    पावन नारी का यही, सबसे पावन रूप ।

    सबसे पावन रूप, सदा मानव आभारी ।

    जय जय जय विज्ञान, दूर कर दी बीमारी ।

    गर्भाशय प्रतिरोप, देख ममता रस बहते ।

    माँ बनकर हो पूर्ण, जन्म नारी का कहते ।।

    सोचता हूँ और फिर गंभीर हो जाता हूँ हमारे उस देश में जहां कर्ण ने अपने कवच कुंडल तक दान कर दिए थे ,ऋषि दाधीच (दधिची )ने अपनी अस्थियाँ दान कर दिन थीं -
    अब लगता है -

    अरे दधिची झूंठा होगा ,
    जिसने कर दी दान अस्थियाँ ,
    जब से तुमने अस्त्र सम्भाला ,
    मरने वाला संभल गया है .

    अपना हाथी दांत का सपना ,
    लेकर अपने पास ही बैठो ,
    दलदल में जो फंसा हुआ था ,
    अब वो हाथी निकल चुका है .

    दफन हो रहीं हैं मेरे भारत में ,
    कोख में ही बेटियाँ .

    मूक हो ,निर्मूक हो राष्ट्र सारा देखता है .

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  81. बृहस्पतिवार, 20 सितम्बर 2012
    माँ के गर्भाशय का बेटियों में सफल प्रत्यारोपण
    माँ के गर्भाशय का बेटियों में सफल प्रत्यारोपण

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  82. सच है मोनिका जी!
    दर्द आदमी की बड़ी निजी संपत्ति होती है
    "दुनिया में बार-ए-गम उठवाते नहीं मज़दूर से....."
    प्यारा लिखा है...
    प्यार! :)

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  83. बिल्कुल सही कहा आपने...पीड़ा खुद को ही झेलनी पड़ती है...और आज की दिखावे भरी दुनिया में लोग सब अच्छा-अच्छा दिखाते है लेकिन मन की पीड़ा कोई नहीं दिखाता क्योकि लोग पीड़ा बाँटते नहीं पीठ पीछे हँसते है.....आभार

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  84. बिल्कुल सही कहा आपने अपनी पीडा स्वंय झेलनी पडती है ।

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  85. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन....बहुत खूब
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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  86. पीड़ा तो सदा व्यक्तिगत ही होती है
    बहुत सही कहा अपने ।

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  87. पीड़ित मन की व्यथा न जाने कोई, मेरे हिय मे कहा भयो ये ना जाने कोई।
    आपने सच ही कहा है कि अपनी पीड़ा को स्वयं ही झेलना होता है।बाकी किसी को बता कर आप तो यह समझते हैं कि मन हलका हो जाएगा लैकिन देखने में आता है कि
    रोय रोय के पूँछ लेत हैं बाद उड़ावे हाँसी
    ये समाज वड़ो ही सत्यानासी। ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय
    http://ayurvedlight.blogspot.in

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  88. पीड़ित मन की व्यथा न जाने कोई, मेरे हिय मे कहा भयो ये ना जाने कोई।
    आपने सच ही कहा है कि अपनी पीड़ा को स्वयं ही झेलना होता है।बाकी किसी को बता कर आप तो यह समझते हैं कि मन हलका हो जाएगा लैकिन देखने में आता है कि
    रोय रोय के पूँछ लेत हैं बाद उड़ावे हाँसी
    ये समाज वड़ो ही सत्यानासी। ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय
    http://ayurvedlight.blogspot.in

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