My photo
पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

20 August 2012

कूड़ेदान में मिलती बेटियां

 बेटियां,  मासूम बेटियां कभी कूड़ेदान में मिलती हैं कभी रेल की पटरियों पर । जिन मासूम बच्चियों ने दुनिया देखने के लिए आखें तक न खोली हों, उनका यूँ तिरस्कार मानवीयता की सारी  हदें पार करने वाला व्यवहार है । मन को व्यथित करने वाली ये ख़बरें आए दिन अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं  ......... जाने आखिर कहाँ जाकर रुकेंगें हम ?  प्रस्तुत है रश्मि प्रभा जी द्वारा सम्पादित   'शब्दों के अरण्य में ' संग्रह में प्रकाशित हुई  मेरी  यह रचना । 



आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?

कूड़ेदान में मिलती 
मासूम बेटियों के समाचार 
कहीं भीतर तक नहीं उतरते अब 
नहीं उठती है मन में सिहरन भी 
और न ही कांपती है हमारी आत्मा 
बड़ा विशाल ह्रदय है हमारा 
और स्वीकार्यता की तो कोई सीमा ही नहीं
कभी रीत-रिवाज़, कभी दान दहेज़ 
अनगिनत कारण हैं हमारे पास 
बेटियों को कूड़ा समझ लेने के 
और इतनी ही दलीलें भी 
तभी तो सभी कुछ स्वीकार लेता है 
हमारा निर्दयी ह्रदय 
नहीं तो ये कोई आम समाचार नहीं 
सम्पूर्ण सृष्टि के संतुलन पर 
प्रश्नचिन्ह लगातीं
हमें हमारा ही कुत्सित चेहरा 
दिखातीं हैं ये अख़बारों की सुर्खियाँ 
ये ख़बरें हैं उन बेटियों की 
जो आँगन का इन्द्रधनुष हैं 
उनके बिना कोई त्योंहार नहीं 
अपनों का मान मनुहार नहीं 
बेटियां जो आँगन की रंगोली हैं 
बेटियां जो दीवाली और होली हैं 
पराई होकर भी हर कर्तव्य 
निभाती जाती हैं  
दो गृहस्थियों के बीच 
स्वयं को बांटकर ताकि
साझी रहे सबकी पीड़ा और सुख 

ये ख़बरें हैं उन बेटियों की 
 जो मेडल लाती हैं 
 जिनकी हिम्मत और प्रतिबद्धता 
विस्मित कर जाती हैं
बेटियां जो निश्छल खिलखिलाती हैं 
जो ब्याह के गीत गातीं हैं 
 माँ , बहन और बहू बनकर 
जीवन जीना सिखाती हैं 

तभी तो कूड़ेदान में सिसकती 
बेटियां  यही प्रश्न उठाती हैं 
आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?

79 comments:

  1. मोनिका जी,
    संवेदना शून्य हो गए हैं सब. मैं भी!
    अहसास कराने का आभार!
    आशीष
    --
    द टूरिस्ट!!!

    ReplyDelete
  2. नवरात्री में झालर घंटों से पूजा करने वाले परिवारों द्वारा भी यह जघय कृत्य किया जाता है , मुझे सबसे ज्यादा यही व्यथित करता है !

    ReplyDelete

  3. कूड़ेदान में मिलती
    मासूम बेटियों के समाचार
    कहीं भीतर तक नहीं उतरते अब
    नहीं उठती है मन में सिहरन भी
    और न ही कांपती है हमारी आत्मा
    बड़ा विशाल ह्रदय है हमारा
    और स्वीकार्यता की तो कोई सीमा ही नहीं
    बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता आभार

    ReplyDelete
  4. यह संवेदनशील रचना रश्मि प्रभा जी की किताब में पढ़ चुका हूँ ! एक प्यारी रचना के लिए बधाई स्वीकारें ...

    भ्रूण हत्या से घिनौना ,
    पाप क्या कर पाओगे !
    नन्ही बच्ची क़त्ल करके ,
    ऐश क्या ले पाओगे !
    जब हंसोगे, कान में गूंजेंगी,उसकी सिसकियाँ !
    एक गुडिया मार कहते हो कि, हम इंसान हैं !

    ReplyDelete
  5. बेटियां जो आँगन की रंगोली हैं
    बेटियां जो दीवाली और होली हैं
    किस ने आज फिर अपने बदजात होने की पोल खोली है .
    .....?
    ढेर में कूड़े के अपने ही खून से खेली होली है .....ये कैसी आँख मिचौली है ......

    ReplyDelete
  6. कविता के माध्यम से आपने जिस समस्या को उठाया है वह समाज मे धन के अत्यधिक महत्व को स्वीकारने वालों की देंन है। आज समाज मे केवल धनवान का सम्मान है कोई नहीं पूछने वाला कि वह धन कैसे अर्जित किया गया है?लोगों को धोखा देकर उनका शोषण-उत्पीड़न कर अधिकाधिक 'धन' कमाना जब समाज मे पूजनीय रहेगा और 'ढोंग-पाखंडवाद ' का बोलबाला रहेगा तब तक जघन्य अपराधों पर नियंत्रण असंभव है।

    ReplyDelete
  7. मर्म पर चोट करती हुई..

    ReplyDelete
  8. ...बेटियों का अपना अलग अस्तित्व है.अब वे मैदान में सबसे आगे हैं |

    ReplyDelete
  9. आपकी यह रचना पढ़ी पुस्तक में. व्यथित कर गई.

    ReplyDelete
  10. संवेदनशील रचना, हम कब सुधरेंगें आभार

    ReplyDelete
  11. वाह अति सुन्दर, बहुत-२ बधाई

    ReplyDelete
  12. जब भी बेटियों को मर जाने के लिए फेके जाने की घटना के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही लगता है की इससे अच्छा होता की वो कोख में ही उसे मार देते , पता नहीं क्यों तब कन्या भ्रूण हत्या सही लगने लगता है इस घृणित कार्य के आगे |

    ReplyDelete
  13. संवेदनशील रचना...
    कब सुधरेगा समाज...

    ReplyDelete
  14. इन बेटियों से भी ज्यादा बदतर और लाचार हालात उन माँओं के होंगे...जो इन बच्चियों को वो दंश नहीं देना चाहतीं जो इन्होने खुद झेले होंगे...गहन संवेदना लिए...रचना...

    ReplyDelete
  15. भारत को एक विकासशील देश माना जाता है और ये सब सुन,पढ़ कर आश्चार्य होता है कि क्या हम सच में विकास के पथ पर हैं...??सचेत करती सुन्दर रचना..आभार

    ReplyDelete
  16. घर का माणिक घर ही साजे...

    ReplyDelete
  17. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल २१/८/१२ को http://charchamanch.blogspot.in/ पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

    ReplyDelete
  18. Bahut qareeb se aise wikshipt log dekhe hain....dilse bas ek aah nikaltee hai.

    ReplyDelete
  19. बेटियां समाज की धडकन होती है
    दो कुलों के बीच रिश्ता जोड़कर-
    घर बसाती है
    माँ बनकर इंसानी रिश्तों की,
    भावनाओ से जुडना सिखाती है
    पर तुमने-?
    पर जमने से पहले ही काट डाला
    शरीर में जान-?
    पड़ने से पहले ही मार डाला,
    आश्चर्य है.?
    खुद को खुदा कहने लगे हो
    प्रकृति और ईश्वर से
    बड़ा समझने लगे हो
    तुम्हारे पास नहीं है।
    कोई हमसे बड़ा सबूत,
    हम बेटियां न होती-?
    न होता तुम्हारा वजूद......

    RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,

    ReplyDelete
  20. ज्वलंत समस्या पर एक संवेदनशील रचना

    ReplyDelete
  21. बहुत दुखद है ..पर सच है ????

    ReplyDelete
  22. बेटियां जो आँगन की रंगोली हैं
    बेटियां जो दीवाली और होली हैं

    मन व्यथित कर गयी ये रचना...कब होश आएगा...कब समझ आएगी ऐसे लोगों को...

    ReplyDelete

  23. तभी तो कूड़ेदान में सिसकती
    बेटियां यही प्रश्न उठाती हैं
    आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?

    दो लाइन मेरी भी सुनियेगा

    जंगल नहीं होता तो जंगल नहीं कटता

    ReplyDelete
  24. दर्द आम हो चला , व्यथा गहराती हुई मौन हो गई

    ReplyDelete
  25. मार्मिक , ऐसे लगता है लोगो की संवेदनाये मर गई हो .ऐसे कर्म में लिप्त व्यक्ति मानवता पर कलंक है

    ReplyDelete
  26. मर्मस्पशी रचना ................हमारा प्रयास जरुर समाज को जागृत करेगा मोनिका जी

    ReplyDelete
  27. हर माँ को सजग होना पडेगा अपनी हर बेटी के लिये चाहे वह उसके कोख से उपजी हो या न हो ।

    ReplyDelete
  28. सुन्दर प्रस्तुति। मरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  29. फिर भी मेरा भारत महान ।

    ReplyDelete

  30. ये ख़बरें हैं उन बेटियों की
    जो मेडल लाती हैं
    जिनकी हिम्मत और प्रतिबद्धता
    विस्मित कर जाती हैं


    मोनिका जी, आपकी यह कविता समाज की दोहरी सोच को आईना दिखाने का माद्दा रखती है...मन को गहरे तक छू लिया इसने....

    ReplyDelete
  31. मर्मस्पशी रचना मोनिका जी

    ReplyDelete
  32. बहुत सुन्दर ,दिल को छूती कविता है मोनिका जी...जाने कितनी बार पढ़ चुकी हूँ....

    अनु

    ReplyDelete
  33. प्रभावशाली अभिव्यक्ति ....

    ReplyDelete
  34. बेटियां तो घर की रौनक होती हैं, इनके बिना तो ईद-दिवाली भी फीकी होती हैं. कैसे-कैसे बे-हिस लोग हैं ज़माने में... जिनकी सोच इतनी कमतर होती है...

    ReplyDelete
  35. गहरी संवेदनशील रचना ... हिला जाती है अंदर तक .. समाज का / अपना खुद का ऐसा घिनौना रूप देख के ...

    ReplyDelete
  36. आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    बेहद सशक्‍त भाव लिए ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

    ReplyDelete
  37. हृदयोदगार! समाज न जाने कब सोच की बेड़ियों से मुक्त होगा !

    ReplyDelete
  38. जीवमातृका वन्दना, माता के सम पाल |
    करे जीवमंदिर सुगढ़, पोसे सदा संभाल ||


    धनदा नन्दा मंगला, मातु कुमारी रूप |
    बिमला पद्मा वला सी, महिमा अमिट-अनूप ||

    कोई तो रक्षा करो, माताओं से एक |
    भ्रूणध्नी माता-पिता, देते मुझको फेंक ||

    कुन्ती तारा द्रौपदी, लेशमात्र न रंच |
    आहिल्या-मन्दोदरी , मिटती कन्या-पन्च |

    सातों माता भी नहीं, बचा सकी गर पाँच |
    रविकर महिमा पर पड़े, दैया दुर्धर्ष आँच |

    ReplyDelete
  39. आपकी कविताओं से ज़्यादा रूबरू नहीं था। अच्छा लगा।

    ReplyDelete
  40. एक मुद्दे को उठाती काव्य रचना !!

    ReplyDelete
  41. आज के सामज का कड़वा सच दिखती सशक्त अभिव्यक्ति....

    ReplyDelete

  42. तभी तो कूड़ेदान में सिसकती
    बेटियां यही प्रश्न उठाती हैं
    आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?


    पित्रीपक्षी समाज में स्वार्थ के रसातल में डूबने बाद मानुष कैसे रहें? जहा लोग स्त्रियों पर हाथ उठाने में अपनी मर्दानगी समझते हो, और सन्दर्भ में रामचरितमानस की चौपाई पढते हो वहाँ विक्षिप्त समाज नहीं पलेगा तो क्या होगा

    ढोल गवार शुद्र पशु नारी
    सकल ताड़ना के अधिकारी

    हम यह श्लोक भूल गए हैं कि :
    यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता

    ReplyDelete

  43. betiya dilo ki dhdkan hoti hai enhe mahfooj rakhna har ma bap ka naitik dayitwy hai,

    ReplyDelete
  44. सोंचनीय पहलू | समाज को बदलना ही होगा |

    ReplyDelete
  45. संवेदनशील और मार्मिक है पोस्ट.....सार्थक मुद्दे पर ।

    ReplyDelete
  46. द्रुत टिपण्णी के लिए शुक्रिया आपका क्रप्या यहाँ भी पधारें -
    "आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता "-डॉ .वागीश मेहता ,डी .लिट .,
    "आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता "-डॉ .वागीश मेहता ,डी .लिट .,1218 ,शब्दालोक ,अर्बन एस्टेट ,गुडगाँव -122-001http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    ReplyDelete
  47. very good thoughts.....
    मेरे ब्लॉग

    जीवन विचार
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

    ReplyDelete
  48. सुंदर रचना के लिये बहुत बहुत बधाई !

    ReplyDelete
  49. ये अंक,ये पदक,ये प्यारे गूंजते-से गीत
    अनसुलझे सवाल छोड़ती हैं मरती बेटियां

    ReplyDelete
  50. kataksh ke saath bauhat hi hriday sparshi rachna...

    ReplyDelete
  51. behtarin ...maine sabdon ke arany me yah kavita padhi hai ...bahut hi maarmik aur saarthak rachna hai ....

    ReplyDelete
  52. समाज के इस कड़वे सच को दूर करने का प्रयतन करना चाहिए |

    http://cityjalalabad.blogspot.in/2012/08/multiple-coloumn.html

    ReplyDelete
  53. मोनिका जी आपकी नीचे वाली पोस्ट ले रही हूँ पत्रिका के लिए ....
    अपना संक्षिप्त परिचय और पता , तस्वीर जल्द मेल करें ...

    ReplyDelete
  54. jis sanjidagi se aap samajik muddon ko uthati hai, wo wakai prasansha ke yogya hai..
    sach me ek hridaya-vidarak kavita...

    ReplyDelete
  55. बेटियों के प्रति यह निर्ममता समाज का सबसे विद्रूप और घिनौना कृत्य है।

    ReplyDelete
  56. जो यह सब देखता हूँ !
    सिहर उठता हूँ
    मन में अजीब -सी कड़वाहट भर जाती हैं ,
    मानवता लहूलुहान हो रही है ;
    सोचता हूँ ,
    जब ये नहीं रहेंगी :माँ , बहन , भाभी, ......
    हमारे झूठे वंश कहां से चलेंगे ?
    इस दुनिया का वंश चक्र
    चलेगा कैसे ?

    ReplyDelete
  57. हमारे ब्लॉग जज़्बात......दिल से दिल तक की नई पोस्ट आपके ज़िक्र से रोशन है.....वक़्त मिले तो ज़रूर नज़रे इनायत फरमाएं -

    http://jazbaattheemotions.blogspot.in/2012/08/10-3-100.html

    ReplyDelete
  58. monika ji aaj ki samsya yahi hai ek aur devi man kar pujte hain dusri aor ................
    rachana

    ReplyDelete
  59. कन्या दान की जगह अब कूड़े दान में डाल रहा है भारतीय समाज बेटियों को , तिस पर तुर्रा ये हम अभी भी संस्कृति की बात करतें हैं ."यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता?"ढोल यही पीटते हैं ,क्या सामाजिक दोगलाई है ,लगता है यह सब विज्ञापन विभाग है .हकीकत में कूड़ादान है ,भारतीय संस्कृति ,एक सडांध है ,,जूठन है एक अप -संस्कृति की .
    कृपया यहाँ भी पधारें -http://veerubhai1947.blogspot.com/
    सादा भोजन ऊंचा लक्ष्य

    स्टोक एक्सचेंज का सट्टा भूल ,ग्लाईकेमिक इंडेक्स की सुध ले ,सेहत सुधार .

    यही करते हो शेयर बाज़ार में आके कम दाम पे शेयर खरीदते हो ,दाम चढने पे उन्हें पुन : बेच देते हो .रुझान पढ़ते हो इस सट्टा बाज़ार के .जरा सेहत का भी सोचो .ग्लाईकेमिक इंडेक्स की जानकारी सेहत का उम्र भर का बीमा है .

    भले आप जीवन शैली रोग मधुमेह बोले तो सेकेंडरी (एडल्ट आन सेट डायबीटीज ) के साथ जीवन यापन न कर रहें हों ,प्रीडायबेटिक आप हो न हों ये जानकारी आपके काम बहुत आयेगी .स्वास्थ्यकर थाली आप सजा सकतें हैं रोज़ मर्रा की ग्लाईकेमिक इंडेक्स की जानकारी की मार्फ़त .फिर देर कैसी ?और क्यों देर करनी है ?

    हारवर्ड स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के शोध कर्ताओं ने पता लगाया है ,लो ग्लाईकेमिक इंडेक्स खाद्य बहुल खुराक आपकी जीवन शैली रोगों यथा मधुमेह और हृदरोगों से हिफाज़त कर सकती है .बचाए रह सकती है आपको तमाम किस्म के जीवन शैली रोगों से जिनकी नींव गलत सलत खानपान से ही पड़ती है .

    ReplyDelete
  60. तभी तो कूड़ेदान में सिसकती
    बेटियां यही प्रश्न उठाती हैं
    आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?

    इन प्रश्नों के सदैव अनुत्तरित रहने की संभावना है. बहुत विकट परिस्थतियों है. कब यह सिलसिला थमेगा.

    गभीर विषय पर सुंदर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  61. आदरणीय मोनिका जी,
    कूड़ेदान में मिलती मासूम बेटियों के समाचार कहीं भीतर तक नहीं उतरते अब नहीं उठती है मन में सिहरन भी और न ही कांपती है हमारी आत्मा बड़ा विशाल ह्रदय ....
    गहरी संवेदनशील रचना..बहुत ही भावात्मक अभिव्यक्ति है
    http://suganafoundation.blogspot.in/2012/09/save-girl-child1-sugana-foundation.html

    ReplyDelete
  62. ईश्वर नही है,
    ऐसा लगता है जब,
    मिलते हैं नवजात शिशु,
    कूड़े के ढ़ेर में,
    दिखते हैं अबोध बच्चे,
    भूखे प्यासे भीख मांगते हुए,
    और देखता हूं जब,
    कच्चे परिवारों से,
    बाप का साया उठते हुए,
    खबर छपती है जब,
    जवान बच्चों की मौत की,
    कैसे ईश्वर दर्शक बन सकता है,
    मासूम बच्चियों के बलात्कार का,
    ईश्वर बिलकुल ही नही है मानो,
    जब मूक पशु,पक्षी होते हैं ,
    शिकार मनुष्य की हिंसा के,
    प्रार्थना है उस ईश्वर से,
    दे सबूत अपने होने का,
    मॄत्यु हो सभी की,
    पर समय से,
    ना हो कोई अनाथ,
    ना हो कोई बेचारगी,
    प्रकॄति का कार्य,
    लगे प्राकॄतिक ही,
    अ-समय या कु-समय,
    ना हो कोई घटना,
    मंदिर/मस्जिद में फ़टे बम कभी,
    तो विध्वंस हो भले ही खूब,
    पर अंत ना हो एक भी जीवन का।

    ReplyDelete
  63. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति। mankamanthan पर भी पधारे और मुझे आशिरवाद दे।

    ReplyDelete
  64. बहुत सुन्दर विचार। कृपया यहां भी पधारे http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

    ReplyDelete
  65. विक्षिप्त? जिस इंसान के अन्दर एक हत्यारा न छिपा हो वह ऐसा कृत्य कैसे कर सकता है! :(

    ReplyDelete
  66. bahut hi marmik pratuti.....manav se danav ban gaye log ...

    ReplyDelete
  67. ना जाने ये कब तक चलेगा व्यथित करती हुयी पर सामाजिक सच का पर्दा फाश करती रचना !

    ReplyDelete
  68. " वक्त का कूड़ा ढ़ोते ढोते खुद कूड़ा हो जाती हैं
    बीबी, बेटी, बहिन पड़ोसन , फिर भी कहलातीं हैं
    माँ बनकर तो दुनिया जन्मी, अग्नि फूंकी जन जन में
    बेटी बनकर, हा दुर्भाग्य!, स्वयं जलाई जाती हैं......"

    एक वक़्त होगा हम (लडकियां) गिनती में स्वमेव कम हो जायेंगे, और तब हम ढूंढे से भी शायद ही मिले.
    इस और ध्यान खींचने का धन्यवाद.

    ReplyDelete
  69. आज भले कूड़े दान में जा रही हैं बेटियाँ ,
    कल सबक सिखाएंगी यही बेटियाँ ,|
    देखें तब कौन करें इनकी हेटियाँ .
    बिजली सी चमकेंगी यही बेटियाँ ||

    हिला हुआ समाज है आरक्षण की बेड़ियाँ ,
    टूटेंगी ये सामाजिक झडबेरियाँ |
    राज करेंगी बेटियाँ ,मार्ग गढ़ेंगी बेटियाँ ,
    सुयश दिलावाएंगी यही बेटियाँ .

    ReplyDelete
  70. तभी तो कूड़ेदान में सिसकती
    बेटियां यही प्रश्न उठाती हैं
    आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?

    ...सम्वेदना शून्य समाज को इसका ज़वाब देना ही होगा...आखिर कब बदलेगी हमारी मानसिकता...रचना के भाव मन को उद्वेलित कर गये..बहुत मर्मस्पर्शी...

    ReplyDelete
  71. आखिर क्यूं विक्षिप्त हुए हम ...?
    क्यूं, कैसे मानुष न रहे हम ...?
    प्रश्न कैक्टस उठे हवा में ,
    जनसांख्यिकी विषम यहाँ पे ,
    क्या कृष्ण करेंगे आकर "सम "?क्यों कंस घूमते गली गली ?

    ... नारी शक्ति :भर लो झोली सम्पूरण से
    नारी शक्ति :भर लो झोली सम्पूरण से

    आधी दुनिया के लिए सम्पूरण -पूरी तरह स्वस्थ रहे आधी दुनिया इसके लिए ज़रूरी है देहयष्टि की बस थोड़ी ज्यादा निगरानी ,रखरखाव की ओर थोड़ा सा ध्यान और .बस पुष्टिकर तत्वों को नजर अंदाज़ न करें .सुखी स्वस्थ परिवार के लिए इन खुराकी सम्पूरकों पर थोड़ा गौर कर लें:


    रविकर फैजाबादी
    चुस्त धुरी परिवार की, पर सब कुछ मत वार |
    देहयष्टि का ध्यान कर, सेहत घर-संसार |
    सेहत घर-संसार, स्वस्थ जब खुद न होगी |
    सन्तति पति घरबार, भला हों कहाँ निरोगी ?
    संरचना मजबूत, हाजमा ठीक राखिये |
    सक्रिय रहे दिमाग, पदारथ सकल चाखिये ||

    ReplyDelete
  72. यह हमारी विडम्बना है जो लोहा लोहे को काट रहा है | समाज को बदलना जरूरी है

    ReplyDelete
  73. अत्यंत संवेदनशील रचना.यही हमारे समय का घिनौना सच है.

    ReplyDelete
  74. ह्रदय को छू गयी आपकी यह कविता.

    ReplyDelete