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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

17 June 2012

क्यूँकी मैं पिता हूँ..............!

पिता, जीवन की पृष्ठभूमि हैं । पिता, बच्चों के लिए शक्ति स्तम्भ हैं ,  जीवन की धूप से सुरक्षित रखने वाली छाँव  हैं ।  पिता बच्चों के लिए आदर्श होते हैं । पिता का साथ वो संबल देता है जो जीवन भर के लिए स्वयं को सहेजने की शक्ति भर देता है बच्चों में  (आज प्रस्तुत है यह कविता जो मेरे ब्लॉग पर पहले भी  प्रकाशित हो चुकी है | ) 




       क्यूँकी मैं पिता हूँ.......!

मेरे हिस्से ना आया
तुम्हारा गीला बिछौना, रातों का रोना
ना ही आईं थपकियाँ, न लोरी, न पालने की डोरी
न आंसू बहाना, ना तुम्हें गोदी में छुपाना
न साज-संभाल करने वाले हाथ, न ही कोई उनींदी रात
क्यूँकी मैं पिता हूँ..............!


मेरे हिस्से आया
अल-सुबह घर से निकलना
कुछ तिनकों की तलाश में
एक नीड़ सहेजने की आस में
ताकि सांझ ढले जब लौटूं
तो गुड़िया, मुनिया और छोटू
सबके चहरे पर हो खिलखिलाहट
सुनकर मेरे कदमों की आहट
तब मेरा तन भले ही मैला हो
 हाथ में खिलौनों भरा थैला हो
इन पलों में मैं बचपन को जीता हूँ
क्यूँकी मैं पिता हूँ........!

मुझे तो समझनी है
तुम्हारी हर इच्छा, हर बात
लाकर देनी है तुम्हें हर सौगात
खिलौने, गुब्बारे और मिठाई
कपड़े , किताबें, रोशनाई
तुम्हारा हर स्वप्न करूँ पूरा
नहीं तो मैं रहूँगा अधूरा
 इसी सोच के साथ मैं जीता हूँ
क्यूँकी मैं  पिता हूँ .....!


मुझे बनना है घर का हिमालय
बलवान, अडिग और अटल
मज़बूत कंधे मौन संबल
तुम्हारा आदर्श, जीवन का मान
तुम्हारी जीत पर गर्वित
और हार पर धैर्यवान

मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
क्यूँकी मैं  पिता हूँ .....!

77 comments:

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    पिता का साया आगे बढने का संबंल देता है। उनकी क्षत्र छाया में पाल्य अपना जीवन गढते हैं।


    दंतैल हाथी से मुड़भेड़
    सरगुजा के वनों की रोमांचक कथा



    ♥ पितृ दिवस की शुभकामनाएं ! ♥

    ♥ पढिए पेसल फ़ुरसती वार्ता,"ये तो बड़ा टोईंग है !!" ♥


    ♥सप्ताहांत की शुभकामनाएं♥

    ब्लॉ.ललित शर्मा
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  2. चुप रहकर सहता है , मन ही मन ढेरों आशीष देता है , वह पिता है !

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  3. एक माँ की पितृत्व और वात्सल्य पर लिखी इतनी सुन्दर कविता पढ़ते ही बनती है.. क्या कहूं.. कितनी तारीफ़ करूं.. शब्द कम पड़ेंगे..
    बहुत हार्दिक शुभकामनाएं..
    सादर

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  4. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!
    bahut sundar abhivyakti .....

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  5. समझ नहीं पाया हूँ अब तक कि एक बिटिया अपने पिता को सबसे अधिक कैसे समझ जाती है..अद्भुत अभिव्यक्ति..

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  6. क्यूँकी मैं पिता हूँ........!

    फादर्स डे पर पिता की भूमिका पर बहुत सुंदर भावपूर्ण विचार. एक खूबसूरत भावुक प्रस्तुति.

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  7. रीतने के बाबजूद पिता हमेशा भरते रहते हैं..सुन्दर लिखा है..

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  8. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज ...............क्योंकि मैं पिता हूँ.......
    खूबसूरत भावुक प्रस्तुति.
    _______________
    पी.एस. भाकुनी
    _______________

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  9. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज ...............क्योंकि मैं पिता हूँ.......
    खूबसूरत भावुक प्रस्तुति.
    _______________
    पी.एस. भाकुनी
    _______________

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  10. बहुत प्यारे भाव मोनिका जी......
    बहुत सुन्दर....

    अनु

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  11. पिता नही है जिनके पूछे उनसे दिल का हाल,
    नयन भीग जाते है उनके मन हो जाता बेहाल!
    जब तक जीवित थे,चिंता न थी किसी बात की,
    हर पग आशीर्वाद तुम्हारा इच्छा हर संतान की!

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

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  12. अद्भुत केवल अद्भुत .

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  13. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 18-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-914 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  14. बहुत सुन्दर !

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  15. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन रचना....
    :-)

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  16. पिता का होना एक स्वार्थ रहित छाते का होना है .पिता प्रेम की ज़ज्बी है माँ उसका उदगार .उसका कर्म प्रेम से ज्यादा गाढा प्रेम संसिक्त है .

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  17. पिता की भावनाओं को खूबसूरती से उकेरा है।

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  18. बहुत सुंदर कविता!
    पितृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  19. बहत खूब ....सुन्दर अभिव्यक्ति |

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  20. कविता पहले भी पढ़ी है और आगे भी पढे जाने लायक है,हमेशा ताज़ी ही लगेगी। आदर्श अभिव्यक्ति है ।

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  21. ek pita ke jeewan ka behad hee sanjeedgi se chitran kiya hai aapne..padhkar behad accha laga..mere blog par bhee aapka swagat hai

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  22. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....! पिता की इस अनमोल भूमिका को अनुभव से ही जाना जा सकता है

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  23. पिता शब्द 'अनुशासित' व्यक्तित्व से आबद्ध हो गया है.
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  24. बहुत सुन्दर! सबको मुकम्मल जहाँ भले न मिले, उससे प्यार कम नहीं होता। पितृदिवस की शुभकामनायेंक!

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  25. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज ...............क्योंकि मैं पिता हूँ.......बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  26. मेरे हिस्से आया
    अल-सुबह घर से निकलना
    कुछ तिनकों की तलाश में
    एक नीड़ सहेजने की आस में
    ताकि सांझ ढले जब लौटूं
    तो गुड़िया, मुनिया और छोटू
    सबके चहरे पर हो खिलखिलाहट


    लाजवाब!!♥ पितृ दिवस की शुभकामनाएं ! ♥

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  27. मज़बूत कंधे मौन संबल
    तुम्हारा आदर्श, जीवन का मान
    तुम्हारी जीत पर गर्वित
    और हार पर धैर्यवान

    यथार्थ स्पष्ट चित्र पिता की छवि का!
    सुन्दर रचना!

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  28. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!

    बहुत सुन्दर ...

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  29. जिन मातु पिता की सेवा की ,तिन और को नाम लियो न लियो ,जिनके हृदय श्री राम बसें तिन और को ध्यान धरो न धरो ...पिता का मतलब ही है जो उद्यत रहता है भग दौड़ करने को किसको कब क्या चाहिए ...शुक्रिया ब्लॉग दस्तक के लिए .

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  30. दिल छु गयी आपकी यह रचना...बहुत ही अच्छा एवं मार्मिक और अति संवेदन शील लिखा है आपने, क्यूंकि माँ के बारे में तो सभी लिखते है मगर पिता के महत्व को भी यहाँ बड़ी खूबसूरती से शब्दों में पिरो दिया है आपने...यथार्थ का आईना दिखती सार्थक रचना आभार सहित शुभकामनायें।

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  31. सबके चहरे पर हो खिलखिलाहट
    सुनकर मेरे कदमों की आहट
    तब मेरा तन भले ही मैला हो
    हाथ में खिलौनों भरा थैला हो
    इन पलों में मैं बचपन को जीता हूँ

    I LOVE ALL LINES BUT PARTICLAR.ABOVE LINES .DR MONIKA JI YOU ARE REAL....Y
    GREAT GREAT .

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  32. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!

    पिता के हृदय की बात सटीक रूप में लिख दी ...बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  33. प्यारे प्यारे चैतन्य की प्यारी प्यारी अम्मी जान !
    बेटे के थ्रू आप तक पहुँची, पर पहुँची तो हैरान थी, रब्बा ये कहाँ आ पहुँची!
    सच्ची, आकर अच्छा लगा. "क्योंकि मै पिता हूँ" में पापा लोगो की मजबूरी, पापा होने के गर्व के साथ चन्दन पानी सी ही घुल गयी है और ठंडी
    ठंडी आराइश सी महसूस हो रही है. -प्यार, लोरी.

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  34. वाह, पिता की ओर से एक मार्मिक अभिव्यक्ति .........

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  35. नि:शब्‍द करती अभिव्‍यक्ति भावमय करते शब्‍दों का संगम ...

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  36. Bahut hi shandar aur Mann ko chu leni wali rachna..

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  37. बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति ........

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  38. कुछ पाने की चाह में खोता
    बचपन के जो स्वर्णिम पल
    लिए कसक है स्वप्न संजोता
    कौन और,बस एक पिता!

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  39. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!

    एक पिता की सजीव तस्वीर उकेर दी आपने मोनिका जी ! इससे अलग पिता को परिभाषित किया ही नहीं जा सकता ! बेमिसाल रचना ! पितृ दिवस की आपको हार्दिक शुभकामनाएं !

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  40. एक पिता के जज्बात कों कितना सहज लिखा है आपने ... हर पिता के दिल की बात है ये ...

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  41. पितृत्व को समझने और विश्लेषण के लिए गहन सोच की आवश्यकता है वही आपने किया

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  42. एक मार्मिक अभिव्यक्ति ......पिता की भावनाओ कोबहुत खुबसूरती से उकेरा है मोनिका जी..बधाई..

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  43. bahut pyare bhaw, achchha lga, kyon ki main bhi pita hoon:)

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  44. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!
    एक खूबसूरत भावुक प्रस्तुति.

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  45. पिता के मनोभावों को अभिव्यक्त करती अच्छी कविता। अभी तक बच्चों के माध्यम से कहा गया पढ़ा था, आज पिता कहते तो क्या कहते?.. पढ़कर अच्छा लगा।

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  46. बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन रचना....

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  47. क्या बात है..क्या बात है....बहुत खूब! सुंदर मार्मिक कविता....आपको ढेरों शुभकामनाएँ।

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  48. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति....
    पिता की भावनाओं को बड़ी बारीकी से सामने रखा है आपने...

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  49. i have never read any better poem on "father" than this one. awesome.. and superb..

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  50. पिता के मनोभावों को अभिव्यक्त करती सुन्दर रचना...

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  51. बहुत सुन्दर और सटीक पोस्ट।

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  52. वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!

    ....बहुत गहन और शाश्वत सत्य...बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति...

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  53. bahut badia rachana sadhuwad dr.monika ji

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  54. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!
    bahut sundar rachna ....

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  55. हाथ में खिलौनों भरा थैला हो इन पलों में मैं बचपन को जीता हूँ क्यूँकी मैं पिता हूँ.
    ........खूबसूरत भावुक प्रस्तुति !!!

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  56. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    इस भावमयी रचना के लिए बधाई स्वीकारें..!!!

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  57. पिता के बहुत ही खूबसूरत एहसासों को पिरोया है शब्दमाला में आपने अतिसुन्दर ...वाह ...sorry पढने में लेट हो गई

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  58. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़ अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़ वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!




    निच्छल सकारात्मक सोच की कविता...

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  59. अनुभव जन्य अर्जित गुण .पितृ मन की थाह लेती रचना .शुक्रिया आपकी ब्लॉग दस्तक का .

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  60. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकी मैं पिता हूँ .....!

    आदरणीया डॉ मोनिका जी बहुत सुन्दर रचना ...पिता के त्याग वलिदान उसके अनुशासन आदर्श को दर्शाती हुयी ...गजब कहा पिता माँ नहीं हो सकता लेकिन उस का गढा हुआ संस्कार अनुशासन जीवन भर साथ निभाता है तब सच में याद आता है पिता ...बधाई हो
    भ्रमर ५

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  61. ईश्वर को परमपिता क्यों कहते हैं, यह आपकी कविता से सहज ही समझा जा सकता है...

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  62. मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़
    अनुशासन , अभिव्यक्ति का राज़
    वक़्त की धूप में पककर तुम समझ पाओगे
    फिर मेरे मन के करीब आओगे.... और जान जाओगे
    इतना सब होकर भी मैं भीतर से रीता हूँ
    क्यूँकि मैं पिता हूँ .....!

    पिता की परिभाषा इससे बेहतर और क्या हो सकती है, वाह !!!!!!!!!!!!

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  63. शुक्रिया इस रचना के लिए भी जो पितृत्व को शब्द रूप आकार दे रही है आपकी ब्लॉग दस्तक के लिए भी .

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  64. शुक्रिया इस रचना के लिए भी जो पितृत्व को शब्द रूप आकार दे रही है आपकी ब्लॉग दस्तक के लिए भी .

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  65. सुंदर अभिव्यक्ति ...!

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  66. बेहद ही खूबसूरत रचना.......

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  67. Beyond Excellence. My congrats . May U reach the horizon in writing .

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  68. Beyond Excellence. My congrats . May U reach the horizon in writing .

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  69. Beyond Excellence. My congrats . May U reach the horizon in writing .

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  70. "मेरी लेखनी पर टिपण्णी के लिए "
    आपकी ज़र्रा नवाज़ी का बहुत शुक्रिया . भीड़ में बस आप ही थे , जो अब तक साथ चलते आ रहे हैं , दरअसल ये एक टेस्ट भी था , की ब्लॉग्गिंग की दुनिया में टिप्पणियों की दोस्ती कितनी दूर तक चलती है। पुन: धन्यवाद .

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  71. bahut acchha laga.

    nayaneesh
    nayaneesh@gmail.com

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