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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

ब्लॉगर साथी

17 April 2012

देह के घाव



उसने यूँ अचानक  आकर
मायके का दरवाज़ा खटखटाकर
सबको हैरान कर दिया
चिंतित , चकित अपने
 बड़े विस्मित हुए
आँखों में कुछ प्रश्न लिए
उसे ताकने लगे और
अन्न-जल की जगह
परोस दिए अनगिनत सवाल

उसने कुछ शब्द ही कहे थे
दिखाए ही थे कुछ ज़ख्म
कि समझाइशों का एक दौर चला
प्रस्तुत हुए अनगिनत उदहारण
अरे इसे देख ...उसे देख ....
और उसकी बस क्या बताऊँ ?
तेरा जीवन तो फिर भी अच्छा है 
ये भी तो सोच तेरा एक बच्चा है 
अपनों के बीच,  अपनी उपस्थिति ने
उसे पराये होने  के अर्थ समझाए
तभी तो देख, सुन ये सारा बवाल 
उसके क्षुब्ध मन में उठा एक ही सवाल 
देह के घाव नहीं दिखते जिन अपनों को 
वे ह्रदय के ज़ख्म कहाँ  देख पायेंगें ?

घरेलू हिंसा को लेकर यह बात न जाने क्यूं हमारे परिवारों में अक्सर देखने में आती है कि एक लड़की के मायके के लोग , उसके अपने भी बेटी की बात नहीं सुनना चाहते । बस,  भयभीत हो जाते हैं कि कहीं बेटी वापस लौट आई तो क्या होगा ? देखकर भी अनदेखा करते हैं वे अपनी ही बेटी या बहन की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को । आखिर क्यों ? 

65 comments:

  1. देह के घाव नहीं दिखते जिन अपनों को
    वे ह्रदय के ज़ख्म कहाँ देख पायेंगें ?

    बहुत ही मार्मिक... और एक बहुत अच्छा सन्देश!

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  2. चिंतन को विवश करती कविता। सचमुच दुखद स्थिति है।

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  3. देह के घाव नहीं दिखते जिन अपनों को
    वे ह्रदय के ज़ख्म कहाँ देख पायेंगें ?

    यकीनन सवाल और भी चोट करते हैं

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  4. man ko chuti rachna....samaj ko deti sandesh

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  5. लोग उसे ही समझाते हैं,
    जिसने ही दुःख सारे झेले !!

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  6. संवेदनशील रचना बधाई

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  7. बिलकुल कटु सत्य लिखा है आपने इस रचना में ....मन झकझोर गई ये पीड़ा ...बहुत मुश्किल है इसका निदान ...
    बहुत अच्छा लिखा है ...

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  8. घोर अनैतिक और पतनशील लोग हैं हम जोकि डींगे हांकते नहीं थकते.

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  9. आपने सार्थक बात कही है ..स्त्री वेदना से परिपूर्ण एक एक पंक्ति ..
    kalamdaan

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  10. शोचनीय परिस्थिति . सत्य को उजागर करती कविता

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  11. ओह जो वह घाव नहीं देख पाते कैसे स्वजन हैं ?

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  12. बड़भागी हैं वो बेटियाँ जिन्हें मायेका का सहारा विवाह के बाद भी मिलता है.....

    जो नहीं कहते कि बिटिया ये घर अब पराया हुआ....

    मन भीग गया रचना पढकर....

    अनु

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  13. बड़भागी हैं वो बेटियाँ जिन्हें मायेका का सहारा विवाह के बाद भी मिलता है.....

    जो नहीं कहते कि बिटिया ये घर अब पराया हुआ....

    मन भीग गया रचना पढकर....

    अनु

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  14. लड़की के मायके वाले बेटी के घाव देखकर भी अनदेखा कर देते हैं क्योंकि कुछ तो पुरानी परंपराएं आड़े आ जाती हैं कि अगर यहां से बात ख़राब हो गई तो फिर इसका दूसरा विवाह करना पड़ेगा जो कि हमारे ख़ानदान में आज तक नहीं हुआ और दूसरी तरफ़ हिंदुस्तानी क़ानून औरतों का पक्षधर होने के बावजूद औरत को कुछ ख़ास नहीं दिला पाता।
    हमने अपनी बहन के दुख पर ध्यान दिया।
    आज 4 चार से ज़्यादा अदालत में केस लड़ते हुए हो गए हैं लेकिन एक पैसा अदालत अब तक ख़र्चे का नहीं दिला सकी है।
    तलाक़ का मुक़ददमा किया तो डाकिए ने सम्मन पर यह लिखकर वापस कर दिया कि घर पर ताला लगा है। परिवार के लोग कहीं बाहर गए हुए हैं। यह बात डाकिए ने लिफ़ाफ़े पर नहीं लिखी बल्कि उसे फाड़कर अंदर के सम्मन पर लिखी लेकिन अदालत ने इसे सम्मन की तामील नहीं माना और दोबारा फिर सम्मन जारी कर दिया।
    यहां उम्र ऐसे ही बर्बाद करती है अदालती कार्रवाई।
    अब हमने शरई अदालत में मुक़ददमा किया है। वहां क़ाज़ी दो बार डाक से सम्मन भेजेगा और तीसरी बार दस्ती यानि बाइ हैंड।
    या तो शौहर आकर अपना पक्ष रखेगा या फिर नहीं आएगा। तब तीन माह के अंदर क़ाज़ी लड़की को ‘ख़ुला‘ दे देगा। लड़की दूसरी जगह निकाह करने के लिए आज़ाद होगी।
    हिंदुओं में भी इस तरह की बिना ख़र्च की अदालतें हों तो लड़की के लिए जीने की राह आसान हो सकती है।
    इस विषय को विस्तार से देखिए-
    हिंदुस्तानी इंसाफ़ का काला चेहरा
    अगर आप किसी मजलूम लड़की के बाप या उसके भाई हैं तो आपके लिए हिंदुस्तान में इंसाफ़ नहीं है, हां, इंसाफ़ का तमाशा ज़रूर है। हिंदुस्तानी अदालतें इंसाफ़ की गुहार लगाने वाले को इंसाफ़ की तरफ़ से इतना मायूस कर देती हैं कि आखि़रकार वह हौसला हार कर ज़ालिमों के सामने झुक जाता है।
    यह मेरा निजी अनुभव है।
    आप किसी भी अदालत में जाइये और अपनी बहन-बेटी के साथ इंसाफ़ की आस में भटक रहे लाखों लोगों में से किसी से भी पूछ लीजिए, मेरी बात की तस्दीक़ हो जाएगी।
    See :
    http://commentsgarden.blogspot.com/2012/04/beti-ka-dard.html

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  15. अत्यंत मार्मिक व्यथा...........

    देखे तन के घाव नहीं , जखम जिगर के दूर
    वो निर्दय जल्लाद अति, ये भी क्या कम क्रूर
    ये भी क्या कम क्रूर , सुनाऊँ किसको दुखड़ा
    आते देखा मुझे , सभी का उतरा मुखड़ा
    बाबुल - भैया कहें ," कहाँ जाऊँ दुख लेके "
    समझाइश सब देत , घाव नहीं तन के देखे.

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  16. संवेदनाओं को झकझोर दिया है...

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  17. जब एक शादी ही बोझ मालूम पड़ती हो,तो दूसरी शादी की बात कौन मां-बाप सोचे। मां-बाप ने भी कई तरह की परेशानियां झेली होती हैं,इसलिए उनकी सलाह को जीवन के अनुभव के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। शुरूआत में अगर मायके वाले हिम्मत दिखा भी जाएं,तो भी,सामाजिक ताना-बाना ऐसा है कि जीवन दूभर ही हो जाता है।

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  18. hamesha se prachalit dharnaye :beti paraya dhan hai, ladki ka asli ghar uska sasural hota hai, beta hi uttaradhikari hota hai etc. mata pita ko bhi unke kartavyon se vimukh kar deti hai...vicharneey prashn uthaya aapne..

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  19. हम्म्म्म तन के घाव तो भर भी जाते हैं , पर परोसे गए सवालों का मवाद रिसता रहता है सारी उम्र . अपनी स्थिति का हवाला दे उसे दोबारा फांसी की सजा सुना देते हैं

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  20. बहुत ही सुन्दर सन्देश देती एक सार्थक पोस्ट।

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  21. बहुत ही सुन्दर सन्देश देती एक सार्थक पोस्ट।

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  22. bahut hi marmik prastuti, badhai

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  23. परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं, अब मायके वाले भी खूब बोलते हैं। रोज सैकड़ों पुलिस केस हो रहे हैं जिनमें झूठे केस ज्‍यादा हैं। इसलिए पीडित दोनों ओर ही हैं।

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  24. बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति,
    सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन सन्देश देती रचना,...

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

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  25. संवेदनशील रचना ...लेकिन आज कल हालात बादल गए हैं ... अजीत गुप्ता जी की बात से सहमत ...

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  26. मार्मिक सत्य है और इस क्यों का मुझे नहीं लगता कि कोई सही जवाब दे पाएगा।


    सादर

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  27. इस स्थिति को बदलना चाहिए... हालांकि अति कोई भी बुरी होती है.. सो संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।

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  28. बहुत प्यारी रचना.

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  29. बहुत कुछ ऐसा हो रहा है हमारे आस पास....सत्य को उजागर करती कविता

    सार्थक कविता

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  30. ना जाने कब लोग इस बात को समझेंगे ?

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  31. हालाँकि काफी कुछ बदला है फिर भी घरेलु हिंसा शारीरिक हो या मानसिक अभी भी बहुत घरों में पाई जाती है.

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  32. आपकी कविता पढ़कर कल का अपना फेसबुक स्टेटस याद आ गया...

    जैसे लड़की-लड़के शादी के समय एक-दूसरे को वचन देते हैं.....वैसे ही लड़की के माता-पिता को भी वचन देना चाहिए कि वे बेटी का हाथ एक लड़के के हाथों में सौंप तो रहे हैं..पर अपना हाथ हमेशा के लिए नहीं हटा रहे....अगर बेटी को ससुराल में दुख-तकलीफ दिए जाएँगे ..तो वे सवाल पूछेंगे और उसे दूर करने का हर संभव प्रयत्न करेंगे..अगर ससुराल वाले ना माने..तो बेटी को अपने पैरों पर खड़ा होकर अपनी जिंदगी पुनः शुरू करने का पूरा मौका देंगे.

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  33. आपकी कविता पढ़कर कल का अपना फेसबुक स्टेटस याद आ गया...

    जैसे लड़की-लड़के शादी के समय एक-दूसरे को वचन देते हैं.....वैसे ही लड़की के माता-पिता को भी वचन देना चाहिए कि वे बेटी का हाथ एक लड़के के हाथों में सौंप तो रहे हैं..पर अपना हाथ हमेशा के लिए नहीं हटा रहे....अगर बेटी को ससुराल में दुख-तकलीफ दिए जाएँगे ..तो वे सवाल पूछेंगे और उसे दूर करने का हर संभव प्रयत्न करेंगे..अगर ससुराल वाले ना माने..तो बेटी को अपने पैरों पर खड़ा होकर अपनी जिंदगी पुनः शुरू करने का पूरा मौका देंगे.

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  34. sach kaha ...kya gujarti hogi aise dil par...

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  35. ऐसे लोग लडकी को आगे नहीं बढ़ने देते ताकि वो उनकी उल्टी सीधी सहती रहे. बेटी का पिता होना भी कोई छोटी बात तो नहीं....सार्थक रचना आभार

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  36. किन शब्दों में आभार व्यक्त करूँ की आपने उस समस्या की तरफ इंगित किया है जो प्रायः हर दुसरे घर की कहानी है पर जब माता पिता ही असहाय हों तो फिर बेटी को ही एक नई शुरुआत करनी होगी ।

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  37. बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति.. कडवे सच का बेहतरीन प्रस्तुतीकरण.

    शुभकामनायें.

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  38. सार्थकता लिए हुए बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    कल 18/04/2012 को आपके इस ब्‍लॉग को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... सपना अपने घर का ...

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  39. सच पूछो तो ये समाज का घिनोना चेहरा है जो बार बार सामने आ जाता है ... पर विद्रोह नहीं करता कोई इसके विरुद्ध...
    मार्मिक रचना है ...

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  40. सार्थक प्रस्तुति!
    आभार !

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  41. This comment has been removed by the author.

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  42. इन्सान अपने मूल स्वभाव से भटक गया हैं ... और उसके मूल स्वभाव पर लालच , वासना , घृणा , हिंसा इत्यादि के विकारों की बहुतायतता उसके मूल गुणों करुणा , वात्सल्य , प्रेम , अहिंसा इत्यादि को ठीक से उजागर नहीं होने देती ... जरूरत हैं इन्सान को उसके विकारों से मुक्ति की राह मिलें ... और वह अपने विकारों की कैद से मुक्त होकर ... जियो और जीने दो की राह पर आसानी से चल सकें ... .... इस उम्दा कृति के लिए साधुवाद !!!

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  43. yeh hi yathath hai jindgi ka

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  44. कड़वा लेकिन सच .....एक ही प्रश्न कौन अपना ? ऐसी सार्थक रचना को पढवाने के लिए आभार

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  45. vaise paristhitiyon me badlav aa raha hai par abhi bhi isthiti dayniya hai ......

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  46. kadva sach vastav me aaj bhi ladki ko maa baap apne upar bojh ke roop me hi lete hain aur use shadi ke bad uske bhagya bharose chhod dete hain.nice presentation.

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  47. आज का सामाजिक परिवेश ही कुछ ऐसा है न चाहते हुवे भी बहुत कुछ करना पड़ता है किसी ने सही कहा है नारी तेरी यही कहानी ...आँचल में दूध आखों में पानी ....बेहद दुखती रग को छूती कविता और यही जीवन की कटु सच्चाई भी है ....

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  48. सम्वेदना से भरी एक बेहतरीन कविता |मोनिका जी आपको बहुत -बहुत बधाई |

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  49. सामाजिक स्वार्थ से नासूर बनी मानसिकता पर चोट है। एक मार्मिक और जागृति प्रेरक रचना!! बहुत बहुत आभार

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  50. मन के घाव कहाँ भर पाते हैं।

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  51. स्थितियां काफी दयनीय हैं मुझे भी समझ नहीं आता कि हिंसा का परिवार में स्थान क्यों.

    बेटियों का पक्ष माँ बाप नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा और अगर वो भी बेगाने हो जाये तो इससे कष्टप्रद कुछ नहीं हो सकता.

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  52. संवेदना को नए आयाम देती कविता.

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  53. Praharsh PrasoonApril 20, 2012 5:39 PM

    nice poem...

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  54. मेरा हमेशा से ही ये सोचना रहा है की रचना वो ही है जो दिल से लिखी जाये और लिखते वक़्त स्वयं को उस विषय की अनुभूति और चित्र दिखाए जिस विषय को लिखा जा रहा है.. और मुझे लगता है आपकी रचना ऐसे ही रचित हुई है.. बेहतरीन..

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  55. नमस्ते............बहुत खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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  56. सोचने के लिए मजबूर करती रचना,
    उत्त्कृष्ट प्रयास.......

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  57. तभी तो देख, सुन ये सारा बवाल
    उसके क्षुब्ध मन में उठा एक ही सवाल
    देह के घाव नहीं दिखते जिन अपनों को
    वे ह्रदय के ज़ख्म कहाँ देख पायेंगें ?
    नहीं है समाज के पास इस बुनियादी सवाल का ज़वाब ,क्योंकि नहीं है अपने ही जायों से वैसा लगाव .कृपया यहाँ भी पधारें -

    सोमवार, 30 अप्रैल 2012

    जल्दी तैयार हो सकती मोटापे और एनेरेक्सिया के इलाज़ में सहायक दवा

    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  58. डॉ. मोनिका जी, आज अपनी रचना के साथ आपकी रचना परिकल्पना उत्सव पर देकही, पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ ..बहुत बहुत प्रभावशाली लेखनी है आपकी.... आपने एक संवेदनशील मुद्दे को बहुत प्रभावपूर्ण ढंग से अपनी कविता में उठाया है ...
    बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना!

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