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पढ़ने लिखने में रुचि रखती हूँ । कई समसामयिक मुद्दे मन को उद्वेलित करते हैं । "परिसंवाद" मेरे इन्हीं विचारों और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है जो देश-परिवेश और समाज-दुनिया में हो रही घटनाओं और परिस्थितियों से उपजते हैं । अर्थशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्तकोत्तर | हिंदी समाचार पत्रों में प्रकाशित समाजिक विज्ञापनों से जुड़े विषय पर शोधकार्य। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ( समाचार वाचक, एंकर) के साथ ही अध्यापन के क्षेत्र से भी जुड़ाव रहा | प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के परिशिष्टों एवं राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित | संप्रति समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन । प्रकाशित काव्य संग्रह " देहरी के अक्षांश पर "

14 September 2010

अब मैं माँ को समझती हूँ ....!

हर माँ अपनी बेटी को कहती है की यह बात माँ बनोगी तो समझोगी..... वो बात माँ बनोगी तो समझोगी...... बातें तो बहुत हैं जो माँ बनकर समझ आती हैं पर सबसे खास बात यह हर बेटी माँ बनकर अपनी माँ को बेहतर समझने लगती है.......उसके जैसी बनने लगती है।


मैं न थी माँ के इतने करीब
हर नसीहत लगती थी अजीब
वक़्त ने नसीहतों का अर्थ समझाया

जिनसे संस्कार-अनुशासन पाया
मैं अब रोज़ उसे नयी सीख देती हूँ......
अब मैं माँ को समझती हूँ.....

माँ की स्नेह भरी थपकी
मेरी रूखी सी झिड़की
आधी रात हो गयी अब तो

तुम भी सो जाओ ना माँ
क्यों अब सारी रात मैं उसके
सिरहाने बैठी काटती हूँ ?......
अब मैं माँ को समझती हूँ.......


तुम मुझे नहीं समझोगी माँ
जाने कितनी बार कहा
अधूरे-तुतलाते शब्दों का भी
मैं अब अर्थ निकालती हूँ ?....
अब मैं माँ को समझती हूँ ......

तपती दुपहरी, दहलीज़ पर खड़ी
इंतजार करती चिंता में पड़ी
झट से बस्ता हाथ में लेकर
उसके माथे का पसीना पौंछती हूँ ......
अब मैं माँ को समझती हूँ ........


अब मैं भी एक माँ हूँ तो
माँ का वो स्वरुप स्वयं
मुझमे समा गया
मुझे भी माँ की तरह
जीना आ गया
तभी तो माँ अब तुम मेरी प्रेरणा हो


प्रेरणा , बिन कहे एक बच्चे का मन पढ़ने की.....
प्रेरणा , उसे इन्सान के रूप में गढ़ने की...

57 comments:

  1. सचमुच ऐसा ही होता है ...
    हर बेटी माँ बनते ही मां जैसी ही हो जाती है ..
    अच्छी कविता ..!

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  2. सच कहा ..जब स्वयं माँ बन कर ही माँ की भावनाएं समझ आती हैं ...बहुत सुंदरता से अभिव्यक्त किया है ..

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
    अच्छी पंक्तिया सृजित की है आपने ........
    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

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  4. कित्ती प्यारी और भावपूर्ण रचना ...बधाई.
    _____________
    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

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  5. माँ की स्नेह भरी थपकी
    मेरी रूखी सी झिड़की
    आधी रात हो गयी अब तो
    तुम भी सो जाओ ना माँ
    क्यों अब सारी रात मैं उसके
    सिरहाने बैठी काटती हूँ ?......
    अब मैं माँ को समझती हूँ.......

    बहुत बढ़िया, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  6. माँ को माँ समझना.. थोड़ा कठिन और थोड़ा लंबा काम है पर समय सिखा ही देता है..

    मनोज खत्री

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  7. हिन्दी दिवस पर आपको बहुत-बहुत बधाई।

    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  8. आप फुलटाइम माँ हो ........ सचमुच !!!
    बधाई ।

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  9. आप ने बिलकुल सच कहा, मेरे पिता जी भी यही कहते थे कि बाप बनेगा तो समझेगा, ओर सच मै अब वो बाते समझ आती है, अब मै भी अपने गधो को यही कहता हुं कि बाप बनो गे तो समझोगे, यह बात मां भी अपनी बेटी को कहती है, आप के लेख से सहमत है जी

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  10. sach , maa bankar hi maa ki baaten samajh me aati hain.bahut hi prabhavshali abhvyakti.
    poonam

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  11. अच्छी कविता वास्तव में ऐसा ही होता है माँ की जिस बात से हम चिढ़ते थे अपनी बेटी को वही कहते है |

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  12. माँ का हृदय समझ पाना एक उपलब्धि है। बधाई।

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  13. क्या बात कही.........मन मोह लिया... भावुक कर दिया......
    प्रशंशा को शब्द ढूंढना मुश्किल हो रहा है...
    बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर रचना...

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  14. @प्रवीणजी सचमुच हम सबके लिए माँ के ह्रदय को समझना आसन नहीं है ।
    मेरी बस कोशिश है माँ के मन के करीब जाने और उसे समझने की ।
    सुंदर टिप्पणी का शुक्रिया

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  15. माँ की स्नेह भरी थपकी
    मेरी रूखी सी झिड़की
    आधी रात हो गयी
    अब तो तुम भी सो जाओ ना माँ
    क्यों अब सारी रात मैं उसके
    सिरहाने बैठी काटती हूँ ?......
    अब मैं माँ को समझती हूँ.......
    बहुत सुन्दर कविता.

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  16. .
    माँ बनने से पहले ही नहीं वरन हर पल माँ के पद-चिन्हों पर चलती उसकी बच्ची...
    माँ ही दोस्त, माँ ही मेरी प्रेरणा ।

    सुन्दर रचना के लिए बधाई।
    .

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  17. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी!

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  18. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, हिंदी ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  19. बहुत भावुक करने वाली कविता ! माँ पर बहुत कुछ कहा गया है.. आपने नए तरह से कहा है..

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  20. monika ji
    very nic..........ma bankar hi ma ko sahi rup me samjha ja sakta hai

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  21. शारीरिक परिवर्तनों से अलग, मन के स्तर पर मातॄत्व भाव ही है जो स्त्री को पुरुष से विशिष्ट बनाती है। भावप्रबल पोस्ट है आपकी, अच्छी लगी।

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  22. सच में आज मै मा को समझती हू

    बहुत सुन्दर रचना ...

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  23. माँ कि ममता मा अहि जाने..बाकि माँ बनके पहचाने ....अच्छा लगा आपका ब्लॉग

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  24. @ Sakhi with feelings सचमुच माँ की ममता को माँ बनकर ही समझा जा सकता है....
    जो बातें कभी हमें अजीब लगती हैं कैसे हम उन्हें ही दोहराने लगतीं है.......और माँ जैसी बनने लगती हैं।

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  25. बस... लग रहा है जोर से पुकार लूं एक बार "ओsssss माँ"---और फ़िर वो पास आए तो धीरे से कहूँ---"तू कितनी अच्छी है"....

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  26. बहुत सुंदर पक्ति है
    अब मैं भी मां को समझती हूं
    ..मां बनने के बाद ही मां और मां की ममता समझ में आती है

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  27. बढ़िया प्रस्तुति.

    यहाँ भी पधारें :-
    अकेला कलम...

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  28. maa ke baare mein jitna likha jaye kam hi hai. Maa bahkar bhi lagta hai ki apni maa se thoda kam hi hain. mamta bhari rachna ke liye badhai....

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  29. brilliant poem with high voltage of emotions which electrifies heart and soul...

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  30. जननी प्रेरणा भी है और आदर्श भी। अच्छी कविता के लिए बधाई॥

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  31. प्रेरणा , बिन कहे एक बच्चे का मन पढ़ने की.....
    प्रेरणा , उसे इन्सान के रूप में गढ़ने की...


    सच कहा है माँ होने का एहसास बस माँ बन कर ही समझा जा सकता है .... बहुत मार्मिक और भावुक रचना ....

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  32. ह्म्म्म... तभी कहा गया है कि 'जाके पाँव ना फटी बिवाई वो का जाने पीर पराई' और जब बिवाई फटती है तो दर्द महसूस होने लगता है.. माँ बनते ही माँ को समझने लगते हैं... ऐसा ही कुछ बेटों के साथ भी है.. बढ़िया कविता पर बधाई मोनिका जी..

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  33. bahut hi sundar baat batayee....bahut achhi rachna

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  34. अप्रतिम रचना है ये आपकी...वाह...आप बहुत अच्छा लिखती हैं...लिखती रहें.

    नीरज

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  35. कविता अच्छी है..पर भाव बहुत खूब.. भावनाओं का अच्छा विश्लेषण किया... काबिले तारीफ ..

    आज मैंने भी एक कविता पोस्ट की माँ पर.. माँ जब छोड़ चली जाती है.. without you.

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  36. बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति
    ऐसा ही होता होगा :)

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  37. माँ की स्नेह भरी थपकी
    मेरी रूखी सी झिड़की
    आधी रात हो गयी अब तो तुम भी सो जाओ ना माँ क्यों अब सारी रात मैं उसके
    सिरहाने बैठी काटती हूँ ?......
    अब मैं माँ को समझती हूँ.......
    सचमुच कितनी देर से समझ आती है माँ । भावपूर्ण प्रस्तुति ।

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  38. सच में आशा जी .... माँ बहुत देर समझ आती है। मुझे ऐसा ही महसूस होता
    है.....

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  39. तपती दुपहरी, दहलीज़ पर खड़ी
    इंतजार करती चिंता में पड़ी
    झट से बस्ता हाथ में लेकर
    उसके माथे का पसीना पौंछती हूँ ......
    अब मैं माँ को समझती हूँ ........
    अब मैं भी एक माँ हूँ तो माँ का वो स्वरुप स्वयं मुझमे समा गया
    मुझे भी माँ की तरह जीना आ गया
    तभी तो माँ अब तुम मेरी प्रेरणा हो

    बहुत सुन्दर!!

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  40. माँ-पिता बातें तभी समझ में आती हैं जब हम खुद वैसी ही जिम्मेदारियों का सामना करते हैं। ठीक भी है वरना बच्चे बचपन, किशोर अल्हड़पन, ज़वान जवानी, मस्ती से नहीं जी पाते।
    ..सुंदर एहसास जगाती कविता के लिए बधाई।

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  41. मोनिका आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है ! उसपर माँ से सम्बन्धित कविता पढने को मिल जाये तो क्या कहने ! हम आज जो भी हैं , माँ के कारण ही हैं ! अच्छी माँ ही अच्छी माँ होने का संस्कार देती है ! आपको बहुत बहुत बधाई !

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  42. उषाजी आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ। सचमुच माँ के दिए संस्कार जीवनभर हमें मार्गदशन देते हैं।

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  43. अच्छा लिखा है.
    माँ की तरह जीना सीख लेना तो
    ज़िंदगी पा लेने की मानिंद है.
    पर है ये मुश्किल काम.
    आपकी कविता
    मुश्किल काम को
    आसान बनाने की राह तो सुझा ही रही है....बधाई.
    ...कविता को जन्म देना भी
    एक माँ का ही दायित्व निभाना है.
    यह काम भी आसान नहीं है.
    आपकी अभ्युक्ति मातृत्व के पक्ष में तो
    पूर्ण कालिक है ही,
    मुझे वह कविता के पक्ष में भी
    पूर्ण कालिक प्रतीत हो रही है.
    इसलिए आपको एक
    बार और बधाई...
    ===================================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  44. पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी हूँ. . बहुत अच्छा लगा. पहली बार आने पर माँ की कविता पढने को मिली इससे अच्छा और क्या हो सकता है ... सच में माँ बनने पर माँ जो कहती है कि हमने ऐसा किया, वैसा किया .. आज समझ में आता है उस समय कहाँ वह सब बातें समझ आती थी ... बस अब तो यही लगता है कि किस तरह अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी परवरिश दें. इसी में लगे हैं
    ..... बेहद सुन्दर अपनेपन से भरी अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद

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  45. तपती दुपहरी, दहलीज़ पर खड़ी
    इंतजार करती चिंता में पड़ी
    झट से बस्ता हाथ में लेकर
    उसके माथे का पसीना पौंछती हूँ ......
    अब मैं माँ को समझती हूँ .sach bahut pyaari rachna hai har maa ke man ko chhoo gayi hogi ,bina anubhav ke har baat samjhna aasaan nahi hota .ati sundar hai .

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  46. आपने जो लिखा है महसूस कर सकती हूँ.शुभकामनायें.

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  47. @कविताजी सचमुच बच्चों की परवरिश ही सबसे जरूरी लगती है।
    @ ज्योति जी मुझे अच्छा लगा आपको मेरी रचना पसंद आयी यह हकीकत है की
    बिना अनुभव के हर बात को नहीं समझा जा सकता.... मातृत्व को तो शायद बिल्कुल भी नहीं
    @संध्या जी बिल्कुल सही कह रहीं हैं माँ और ममता से जुडी चीज़ को मन से ही महसूस
    किया जाता है ।

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  48. सुंदर प्रस्तुति

    http://sudhirraghav.blogspot.com/
    दुनिया का बंटवारा

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  49. aksar maa ko mahaaan kaha jata hai...aur mahaan shabd main ek shabd chhipa hota hai maa haan..[matlab maa hoon to mahaan to hoon hi ...jo ek maa apne bachhe ke liye kar sakti hai wo aur koi nahi8 kar skta shayad.
    aapne bahut hi achha likha hai.jitni tareef ki j aaye kam hai.

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  50. aapki kavita har line ke saath ye sabit karti hai..ki sirf sunder shabd kavita nahi banate...sunder bhav ek achchi kavita banati hai...aapki har kavita aapki pahchan hai..aaur aapko mere samne sajiv kar deti hai.. am proud to know someone like u...

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  51. आपके ब्लॉग पर आना अच्छा लगा . ये रचना बहुत अच्छा है . बधाई ...

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